7. आन्तरिक प्रवास को प्रभावित करने वाले कारक एवं इसके प्रकारों का वर्णन

7. आन्तरिक प्रवास को प्रभावित करने वाले कारक एवं इसके प्रकारों का वर्णन



      आन्तरिक प्रवास 

      आन्तरिक प्रवास एक राष्ट्र के भीतर स्थान परिवर्तन करने को कहते हैं। इसमें जनसंख्या अपने राष्ट्र की राजनीतिक सीमा को पार नहीं करती है, बल्कि वह अपने मूल स्थान से अन्य सुविधाजनक या इच्छित स्थान पर रहने लगती है, तो ऐसा प्रवास आन्तरिक प्रवास कहलाता है।

प्रो. डोनाल्ड बोग के अनुसार, “जब कोई व्यक्ति राष्ट्रीय सीमाओं के अन्तर्गत अपने मूल निवास को छोड़कर दूसरे स्थान पर रहने लगता है, तो ऐसे प्रवास को आन्तरिक प्रवास कहते हैं। यह अन्तर्गमन अन्तर्प्रवास या अन्तर-देशान्तरण (In-migration) कहलाता है।

आन्तरिक प्रवास को प्रभावित करने वाले कारक (FACTORS AFFECTING THE INTERNAL MIGRATION)

        आन्तरिक प्रवास प्रमुखतया आन्तरिक विषमताओं का परिणाम होता है। जब किसी राष्ट्र में आर्थिक स्तर पर असमानताएँ, भौगोलिक व सामाजिक परिस्थितियों में भिन्नता स्थापित हो जाती हैं, तो आन्तरिक प्रवास को प्रोत्साहन मिलने लगता है। लोगों की आर्थिक व सामाजिक दशा प्रवास की यात्रा व दिशा को प्रभावित करती है। आन्तरिक प्रवास को प्रभावित करने वाले निम्नलिखित कारक महत्वपूर्ण है:

1. भूमि पर जनसंख्या का असामान्य दबाव (Abnormal pressure of population on land):-

       देश के जिन भागों में जनसंख्या का अत्यधिक दबाव होता है, तो उन क्षेत्रों के निवासी ऐसे क्षेत्रों में जाकर बसना पसन्द करते हैं, जहाँ जनसंख्या का कम दबाव हो तथा भूमि उत्पादन के लिए सुलभ हो। जहाँ भूमि सुधार की सम्भावना हो, लोग वहाँ जाकर रहने लगते हैं।

2. भूमि मूल्य (Land value):-

       जिन भागों में भूमि का मूल्य इतना अधिक हो जाए, कि वह लोगों की वहन शक्ति से अधिक हो जाए तो ऐसी दशा में लोग सस्ती भूमि वाले भू-भागों की ओर प्रवास कर जाते हैं। नगर के भीतरी भाग में जब रिहाइशी भूमि का मूल्य लोगों की क्रय शक्ति के बाहर हो जाता है, तो लोग नगर के बाहरी क्षेत्रों की ओर प्रवास कर जाते हैं।

3. सामाजिक परिस्थितियां एवं जाति, धर्म संपर्क (Social conditions and caste, religion conflict):-

       देश के वह भाग जहाँ छुआछूत, वर्ग संघर्ष, जाति संघर्ष, धार्मिक भिन्नता, व्यक्तिगत दुश्मनी, आदि बुराइयों के कारण लोगों का रहना कठिन हो जाता है तो यहाँ से लोग उन क्षेत्रों की ओर प्रवास कर जाते हैं जहाँ यह नफरत करने वाली सामाजिक बुराइयाँ नही होती अथवा इन सामाजिक बुराइयों का प्रभाव बहुत कम होता है। ग्रामीण क्षेत्रों से लोग ग्रामीण रूढ़िवादिता के कारण नगरों में जाकर बस जाते हैं।

4. पारिवारिक व्यवस्था (Family system):-

        जब परिवार बड़े-बड़े हो जाते हैं तथा उनका एक स्थान पर मिलकर रहना सम्भव नहीं होता है, तब परिवार के कुछ लोग अन्य स्थानों पर रहना प्रारम्भ कर देते हैं। वर्तमान समय में बड़े ग्रामीण परिवारों के वह लोग जो शिक्षा प्राप्त करने, नौकरी करने के लिए नगरों में जाते हैं, वहीं जाकर बस जाते हैं। पारिवारिक कलह के कारण भी बड़े-बड़े परिवार टुकड़ों में बंट जाते हैं तथा परिवार के कुछ लोग अन्यत्र जाकर बस जाते हैं।

5. विवाह (Marriage):-

        भारतीय समाज में विवाह आन्तरिक प्रवास का एक प्रबल कारक है। विवाह के बाद लड़की को लड़के के पैतृक निवास स्थान पर रहना पड़ता है, अतः लड़कियाँ निश्चित तौर पर विवाह के बाद पैतृक निवास स्थान को छोड़कर अपने पति के घर पर जाकर रहने लगती हैं, तो ऐसा प्रवास भी आन्तरिक प्रवास कहलाता है।

6. ऋणग्रस्तता एवं निम्न आर्थिक स्तर (Indebtness and low economic standard):-

       जिन ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक विकास की सम्भावनाएँ कम होती हैं, लोगों पर ऋण काफी अधिक हो जाता है, रोजगार में स्थायित्व नहीं होता है, तो ऐसे लोग आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न क्षेत्रों में जाकर बस जाते हैं। ग्रामीण व पिछड़े क्षेत्रों से नगरों की ओर पलायन इसी प्रवास का परिणाम है।

7. औद्योगिक नगरों का स्थापन (Establishment of industrial towns):-

        नई-नई औद्योगिक इकाइयों के स्थापन के कारण, जहाँ एक ओर नगरों का विस्तार होने लगता है वहीं दूसरी ओर नए-नए नगर व उपनगर बस जाते हैं और लोग ऐसे स्थानों पर अन्य क्षेत्रों से आकर बसने लगते हैं। मुम्बई, चेन्नई, कोलकाता के उपनगरों तथा नए-नए औद्योगिक नगरों के स्थापन जैसे मोदीपुरम्, रानीपुर के कारण लोग अन्यत्र स्थानों से आकर वहाँ रहने लगते हैं।

8. प्राकृतिक आपदाएं, मानव निवास की विपरीत परिस्थितियां बन जाना:-

      आँधी, तूफान, भूकम्प, ज्वालामुखी का फटना, सूखा पड़ जाना, अति वृष्टि के कारण बाढ़ आ जाना, आदि प्राकृतिक आपदाएँ लोगों को अन्यत्र बसने को मजबूर कर देती है। यह स्थान मानव निवास के अनुकूल नहीं रह पाते है और लोग सुरक्षित स्थानों में जाकर बसना पसन्द करते हैं। मई 2000 में गुजरात में सूखे के प्रभाव से लोगों को अपने स्थानों को छोड़ना पड़ा।

आन्तरिक प्रवास के प्रकार (TYPES OF INTERNAL MIGRATION)

       भारत में होने वाले आन्तरिक प्रवास को आधार मानकर इसको छः प्रकारों में रखा जा सकता है:-

1. अन्तर्राज्यीय प्रवास (Inter state migration)

2. ग्राम से ग्राम को प्रवास (Migration from rural to rural)

3. ग्राम से नगर को प्रवास (Migration from rural to urban)

4. नगर से नगर को प्रवास (Migration from urban to urban)

5. नगर से समीपवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों को प्रवास (Migration from urban to adjoining rural areas)

6. सम्बद्धताजन्य प्रवास (Interrelated migration)

1. अन्तर्राज्यीय प्रवास:-

        जब एक देश की सीमाओं के भीतर उस देश के नागरिक अपना राज्य छोड़कर अन्य किसी राज्य में रोजगार, सुरक्षा या विवाद सम्बन्धी कारणों से जाकर बस जाते हैं तो ऐसा प्रवास अन्तर्राज्यीय प्रवास कहलाता है। राजस्थान से अनेक मारवाड़ी परिवार व्यापार के कारण पश्चिम बंगाल और असम में जाकर बस गए। यह इस प्रवास का एक उदाहरण है।

2. ग्राम से ग्राम को प्रवास:-

        ग्रामीण क्षेत्रों में यह प्रवास वर्तमान में काफी महत्व रखता है। छोटे-छोटे गांवों से लोग अपने निकट के उन गांवों, जो केन्द्रीय सुविधाजनक स्थिति होने के कारण अनेक प्रकार की सेवाएँ व सुविधाएँ एकत्रित कर लेते हैं, आकर रहने लग जाते हैं। धीरे-धीरे यह गाँव ग्रामीण सेवा केन्द्र का रूप ले लेते हैं। भारत के ग्रामीण भूदृश्य पर ऐसे केन्द्रों का तेजी से विकास हो रहा है।

3. ग्राम से नगर को प्रवास:-

      वर्तमान समय की एक महत्वपूर्ण घटना नगरीकरण है, जिसका एक कारण ग्रामीण जनसंख्या का रोजगार की सुविधा तथा जीवनोपयोगी सेवाओं का लाभ मिलने की वजह से नगरों में आकर बसना है। वर्तमान में देश के बड़े-बड़े बृहत् महानगरों में जनसंख्या की आकार वृद्धि में इस तरह के प्रवास का महत्वपूर्ण योगदान है।

4. नगर से नगर को प्रवास:-

        भारत के कुल आन्तरिक प्रवास में नगर से नगर की ओर प्रवास का योगदान लगभग 12% रहता है। इस प्रकार का प्रवास प्रायः छोटे नगरों से बड़े नगरों की ओर होता है। लोग बड़े-बड़े नगरों में नौकरी, व्यापार, प्रशासकीय कार्यालयों की सुविधा, आदि के कारण, वहाँ आकर बस जाते हैं। दिल्ली, मुम्बई, बंगलौर, कोलकाता, हैदराबाद, चेन्नई जैसे महानगरों में लोग अनेक छोटे-छोटे नगरों से आकर बस गए हैं। चण्डीगढ़ नगर इसी प्रकार के प्रवास का उदाहरण है। यहाँ की सारी जनसंख्या आन्तरिक प्रवास के फलस्वरूप बसी है। अनेक समीपवर्ती नगरों से लोग यहाँ आकर बस गए।

5. नगर से समीपवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों को प्रवास:-

     नगरों में जब जनसंख्या इतनी बढ़ जाती है कि लोगों का वहाँ रहना दूभर हो जाता है, क्योंकि वहाँ पर्यावरण का प्रदूषित होना, भूमि व मकानों की कीमतों में भारी वृद्धि होना, आदि समस्याएँ पनप जाती हैं। जिनके कारण नगर के लोग नगर की बाहरी सीमा पर स्थित ग्रामीण क्षेत्र के खुले वातावरण में रहना पसन्द करते हैं। यह क्षेत्र नगर के समीप भी होते हैं तथा समस्या रहित होते हैं। लोग यहाँ भूमि सस्ती होने के कारण मकान बनाकर रहने लगते हैं। धीरे-धीरे ऐसे मकानों का समूह एक उपनगर का रूप ले लेता है और समय के साथ नगर का अंग बन जाता है।

6. सम्बद्धताजन्य प्रवास:-

        जब एक व्यक्ति ग्रामीण क्षेत्र से नगर में जाकर बस जाता है तो वह अपने आश्रितों को अपने पास बुला लेता है। यह आश्रित तथा उसके परिवार से सम्बन्धित सभी सदस्य नगर में शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार, परिवहन, मनोरंजन, आदि की सुविधा के कारण वहाँ रहने लगते हैं, तो ऐसे प्रवास को सम्बद्धताजन्य प्रवास कहते हैं।

      भारत में कृषि के विकास ने कृषक परिवारों में इस प्रकार की भावना उत्पन्न कर दी है कि उनके एक परिवार का मुखिया नगर में मकान बनाकर रहने लगता है तथा अन्य मुखिए गाँव में खेती का कार्य देखते हैं। इन सब मुखियों के आश्रित नगर में उपरोक्त आकर्षण के कारण रहने लगते हैं। इस प्रका के प्रवास का प्रचलन वर्तमान में तीव्र गति के साथ बढ़ हा है।

6. प्रवास अथवा प्रव्रजन को प्रभावित करने वाले कारक

6. प्रवास अथवा प्रव्रजन को प्रभावित करने वाले कारक

प्रवास अथवा प्रव्रजन

     प्रवास को प्रभावित करने वाले अनेक कारक हैं। इनमें समय, स्थान व परिस्थितियों के अनुसार कभी कोई तत्व प्रभावशाली रहता है, तो कभी कोई दूसरा। वास्तव में प्रवास को प्रभावित करने में आकर्षण व प्रत्याकर्षण का महत्व होता है। एक स्थान से लोग दूसरे स्थान को तभी प्रवास करते हैं, जब उनके अपने स्थान में कोई आकर्षण नहीं होता है। इस प्रकार प्रवास को प्रभावित करने वाले कारकों को मुख्य रूप से निम्नलिखित दो श्रेणियों में रखा जा सकता है-

(1) आकर्षक कारक (Pull factors)

(2) प्रत्याकर्षण कारक (Push factors)

(1) आकर्षक कारक

       लोगों का कम विकसित क्षेत्रों, ग्रामों, आदि से ऐसे क्षेत्रों में जाना, जहाँ उनको उन्नति के अधिक अवसर मिलते हैं। ऐसे अवसरों को आकर्षक कारक के रूप में रखा जाता है। यह अवसर निम्नलिखित प्रकार के होते हैं-

(i) आर्थिक प्रगति के अधिक अवसर,

(ii) रोजगार के अवसर,

(iii) उच्च शिक्षा प्राप्ति का अवसर,

(iv) वैज्ञानिक व सांस्कृतिक परम्पराओं के अवसर,

(v) सुरक्षा व न्याय के अवसर,

(vi) जीवन स्तर सुधारने के अवसर,

(vii) राजनीतिक स्थायित्व होना,

(viii) स्वास्थ्यप्रद वातावरण में रहने के अवसर।

       प्रवास को आकर्षित करने वाले कारकों में प्रवाहित क्षेत्र की विकसित होती हुई अर्थव्यवस्था, अनुकूल आवास कानून, कृषि भूमि की उपलब्धता, आदि महत्वपूर्ण हैं। जापान में श्रमिकों की कमी ने बड़ी संख्या में प्रवासियों को अपने यहाँ आवासित होने के लिए आकर्षित किया है। इन आवासियों में अधिकांश लोग कम वेतन पर ऐसे खतरे वाले काम करते हैं जिन कामों को जापान के मूल निवासी नहीं करते हैं।

(2) प्रत्याकर्षण कारक

    जब लोग अपने निवास स्थान में रहना नहीं चाहते। वहाँ उन्हें अपना जीवन निराशाजनक लगता है। ऐसा निम्नलिखित परिस्थितियों में सम्भव होता है।
(i) रोजगार सुविधाओं का अभाव,

(ii) स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव,

(iii) गरीबी, निम्न जीवन स्तर का होना,

(iv) सुरक्षा व न्याय की कम सुविधाएं,

(v) राजनीतिक अलगाववाद का प्रभाव और गृह भूमि पर युद्ध की आशंका,

(vi) उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा सुविधा का अभाव,

(vii) परम्परावादी व रूढ़िवादी संस्कृति का प्रभाव,

(vii) रोजगार की कठिन परिस्थितियों का होना,

(viii) प्राकृतिक आपदाओं का प्रभाव (सूखा एवं अकाल)।

     1929-1939 की अवधि में संयुक्त राज्य अमेरिका में आया महान मंदी का दौर (Great Depression) प्रत्याकर्षण का सर्वोत्तम उदाहरण है। इस दौर में संयुक्त राज्य अमेरिका में आवासन की अपेक्षा प्रवसन अधिक हुआ। इसी प्रकार 1980-90 के दशक में अकाल एवं युद्ध के कारण हजारों अफ्रीकन लोग अपने मूल स्थान से प्रवासित होकर पड़ोसी देशों में आवासित होने को मजबूर हुए।

     सामान्य तौर पर प्रवास को प्रभावित करने वाले कारकों में निम्नलिखित महत्व होते है:-

1. प्राकृतिक कारक (Natural Factors)-

       प्राकृतिक आपदाएँ जैसे भूकम्प, ज्वालामुखी, बाड़, सूखा, तूफान, भूस्खलन, जलवायु की कठोरता, आदि के कारण लोग एक स्थान से दूसरे स्थान को प्रवास कर जाते हैं। विश्व के विभिन्न भागों में मौसमीय प्रवास (Transhumance) मानवीय समूहों द्वारा जलवायु की कठोरता के दुष्प्रभाव से बचने तथा रोजगार जुटाने के उद्देश्य से किया जाता है। समुद्रतटीय भागों में तूफान से प्रभावित क्षेत्रों तथा नदियों के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों से लोग सुरक्षित स्थलों पर प्रवास कर जाते हैं। वास्तव में वह क्षेत्र जो किसी भी प्रकार की प्राकृतिक आपदा की आशंका से ग्रस्त होते हैं, लोग सुरक्षित क्षेत्रों पर प्रवास कर जाते हैं।

2. आर्थिक कारक (Economic Factors)-

      विश्व के अधिकांश प्रवासों को प्रभावित करने में आर्थिक कारकों का योगदान अत्यन्त महत्वपूर्ण रहा है। नए-नए क्षेत्रों में कृषि का विस्तार, नई-नई खानों का पता लगना, उद्योग धन्धों का विस्तार होना, यातायात सुविधाओं में सुधार होना, आदि विशेषताएं रोजगार के नए-नए अवसर प्रदान करने में महत्वपूर्ण सिद्ध होती हैं। इसी कारण लोग रोजगार के नए क्षेत्रों में आकर बस जाते हैं। पिछली तीन शताब्दियों में यूरोपीय लोगों का विश्व के विभिन्न भागों में रोजगार की तलाश में वहाँ जाकर बसना, वर्तमान में अनेक भारतीयों का अमेरीका तथा विश्व के अन्य भागों में रोजगार के कारण बस जाना, बिहार के श्रमिकों का पंजाब, पश्चिम उत्तर प्रदेश में मजदूरी कार्यों के लिए प्रवास करना, आर्थिक कारकों का ही परिणाम है।

3. सामाजिक व सांस्कृतिक कारक (Social and Cultural Factors)-

      सामाजिक रीति-रिवाज, धार्मिक व सामाजिक स्वतंत्रता, सामाजिक व सांस्कृतिक सम्पर्क, धर्म प्रचार, आदि ऐसे सामाजिक कारक हैं, जिनके कारण लोग अपना जन्म स्थान छोड़ने को बाध्य हो जाते हैं। धार्मिक श्रद्धा लोगों को धर्म स्थल पर बसने के लिए प्रेरित करती है। धार्मिक आयोजन मेले व विशेष पर्व पर लोग प्रवास करते हैं।

       लाखों हज यात्री प्रतिवर्ष मक्का व मदीना धार्मिक स्थलों की यात्रा करते हैं। उच्च व तकनीकी शिक्षा की प्राप्ति, उच्च चिकित्सा हेतु भी लोग प्रवास करते हैं। खेलों का आयोजन, जैसे क्रिकेट, हॉकी टूर्नामेन्ट, कुम्भ मेला, विशेष तिथि पर लगने वाले बड़े-बड़े मेले, नौचन्दी मेला, वैष्णो देवी के दर्शनों के लिए प्रतिवर्ष लाखों भक्तजनों का जाना, आदि ऐसे कारक हैं, जो किसी न किसी रूप में अस्थायी प्रवास के साथ-साथ स्थायी प्रवास को बढ़ावा देते हैं।

4. राजनीतिक कारक (Political Factors)-

      इतिहास इस बात का गवाह है कि राजनीतिक कारकों ने प्रवास को सबसे अधिक प्रभावित किया है तथा प्रवास की आवश्यक मजबूरी बनाया है। भारत-पाक विभाजन, दो देशों के बीच युद्ध की स्थिति, पड़ोसी देश से राजनीतिक सम्बन्धों में बिगाड़ के कारण सीमा क्षेत्र पर युद्ध स्थिति बने रहना, आदि तत्व जनसंख्या प्रवास को प्रभावित कर रहे हैं।

       वर्तमान में लंका में जातीय संघर्ष के कारण श्रीलंकाई तमिल भारत के तमिलनाडु तट में आकर बस रहे हैं। तिब्बत से बौद्ध लोगों का भारत आकर बसना भी राजनीतिक प्रवास का उदाहरण है। 18वीं व 19वीं शताब्दी में संयुक्त राज्य अमेरीका व ब्रिटेन के लोगों ने दक्षिण अफ्रीका, आस्ट्रेलिया व न्यूजीलैण्ड, आदि देशों के मूल निवासियों को बलपूर्वक वहाँ से खदेड़ दिया तथा वहाँ पर नए राष्ट्रों की स्थापना की।

     कई बार सरकारी नीतियाँ भी प्रवास को आकर्षित करती हैं। उदाहरण के लिए मध्य-पूर्व के देशों ने आवास को प्रोत्साहन देने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की है। इसी प्रकार आस्ट्रेलिया में आवासीय लोगों को मुफ्त में कृषि योग्य भूमि प्रदान की गई है। 1990 में जापान ने लेटिन अमेरिका से आए लोगों को रोजगार के अधिकार एवं आवासीय सुविधाएं प्रदान की।

5. जनांकिकी कारक (Demographic Factors)-

      इसके अन्तर्गत कृषि भूमि पर बढ़ता हुआ जनसंख्या का दबाव, कृषि क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों की कमी के कारण बेरोजगारी की समस्या, नगर के भीतरी भाग से नगर के बाहरी छोरों पर लोगों का बसना, उच्च घनत्व वाले क्षेत्रों से कम घनत्व वाले क्षेत्रों की ओर लोगों का जाकर बसना, आदि तत्व शामिल हैं। इनके अलावा साक्षरता की दर, विशेष जाति या धर्म के लोगों को कहीं अधिक प्रोत्साहन मिलना, असन्तुलित लिंग अनुपात, आदि बातें भी प्रवास को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीके से प्रभावित करती हैं। आस्ट्रेलिया व दक्षिण अफ्रीका की रंग भेदी नीतियों ने काले लोगों के प्रवास पर रोक लगा दी थी।

       वर्तमान में रूस व यूक्रेन के बीच युद्ध, इजराइल व फिलीस्तीन के बीच मतभेद, आदि जनांकिकी प्रवास को किसी न किसी रूप में प्रभावित कर रहे हैं। एक राज्य का दूसरे राज्य के लोगों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार भी जनसंख्या प्रवास को प्रभावित कता है।

प्रश्न प्रारूप

1.  प्रवास अथवा प्रव्रजन को प्रभावित करने वाले कारकों की विवेचना कीजिये।



5. प्रवास अथवा प्रव्रजन (Migration)

5. प्रवास अथवा प्रव्रजन (Migration)



प्रव्रजन

         मानव का वह कार्यकलाप, जिसके द्वारा वह अपने निवास स्थान से कहीं अन्यत्र स्थान पर एक निश्चित लम्बी अवधि लिए कुछ विशेष उद्देश्य के साथ बस जाता है, तो उसे स्थानान्तरण कहते हैं।

     इसमें मानव का अस्थायी रूप से अन्य स्थान पर जाना, मौसम के अनुसार स्थान परिवर्तन करना, नगर में रोजाना अन्य नगरों व उपान्त क्षेत्रों से आना जाना, श्रमिकों का फसल मौसम में एक स्थान से दूसरे स्थानों पर जाना, नगर के भीतर निवास परिवर्तन, आदि को स्थानान्तरण की श्रेणी में नहीं रखा जाता है। यह सभी अस्थाई प्रवास संचरण (Circulation) की श्रेणी में शामिल किए जाते हैं।

     जनसंख्या स्थानान्तरण की विशेषताओं को इस प्रकार रखा जा सकता है:

(1) निवास स्थान व नवीन स्थान के बीच समुचित दूरी होना।

(2) नवीन स्थान पर रुकने की अवधि दीर्घकालिक होना।

(3) नवीन स्थान पर किसी विशेष उद्देश्य से जाकर बसना।

(4) नवीन बसे स्थान के कार्यकलापों का निवास-स्थान के कार्यकलापों से भिन्न होना।

(5) नवीन स्थान पर बसने वाले लोगों का अपने आपको बेहतर स्थिति में अनुभव करना।

प्रवास के प्रकार (TYPES OF MIGRATION)

     प्रवास को वर्गीकृत करने के अनेक आधार हैं। इन आधारों में समय, दूरी, स्थान, उद्देश्य उल्लेखनीय हैं।

(1) दूरी के आधार पर

⇒ जब स्थानान्तरण थोड़ी-सी दूरी के लिए होता है, तो उसे छोटी दूरी (short distance) स्थानान्तरण कहते हैं।

⇒ जब स्थानान्तरण लम्बी दूरी के प्रवास से जुड़ता है तो उसे लम्बी दूरी (long distance) स्थानान्तरण कहते है।

(2) क्षेत्र के आधार पर

1. राष्ट्रीय प्रवास:-

       इसे आन्तरिक प्रवास भी कहते हैं। यह प्रवास एक राष्ट्र के भीतर किसी भी स्थान के लिए बिना किसी रोकटोक के होता है। यह आन्तरिक प्रवास चार वर्गों में बांटा जा सकता है-

(i) गांवों से नगरों की ओर प्रवास,

(ii) नगरों से गांवों की ओर प्रवास,

(iii) गांवों से गांवों की ओर प्रवास,

(iv) नगरों से नगरों की ओर प्रवास।

        इनमें गांवों से नगरों की ओर तथा छोटे नगरों से महानगरों की ओर लोगों का प्रवास अधिक संख्या में होता है।

2. अन्तर्राष्ट्रीय प्रवास:-

      इसे बाह्य प्रवास भी कहते हैं। इसमें प्रवास एक राष्ट्र से दूसरे राष्ट्र के लिए होता है। यह प्रवास स्थानान्तरण किए जाने वाले राष्ट्र की प्रवास नीतियों पर निर्भर करता है।

(3) समय या काल के आधार पर

       प्रवास अध्ययन के काल पक्ष के अन्तर्गत प्रवासन या आवासन समय को महत्वपूर्ण माना गया है। इस दृष्टि से इसका अध्ययन निम्नांकित रूप में किया जा सकता है।

(i) दीर्घकालीन प्रवास:-

      इसमें प्रव्रजन की कालिक प्रवृत्ति दीर्घकालीन होती है। ऐसे प्रव्रजन प्रायः अन्तर्महाद्वीपीय व अन्तर्राष्ट्रीय हुआ करते हैं। 18-19वीं शताब्दी में यूरोप महाद्वीप से उत्तरी अमेरिका व दक्षिणी अमेरिका, आदि महाद्वीपों में जाकर बसे एवं विकास कार्य किए। कुछ देशों में भी लोग राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक, सामाजिक, आदि कारणों से दीर्घकालीन प्रवास व आवासन करते रहते हैं।

(ii) अस्थायी या मौसमी प्रवास:-

      अस्थायी प्रव्रजन अल्पकालिक होता है इसके अन्तर्गत जनसंख्या किसी देश अथवा स्थान में स्थायी रूप से बसती नहीं है। बल्कि अपने उद्देश्यों की पूर्ति के पश्चात् पुनः अपने मूल स्थान को प्रत्यावर्तित हो जाती है। इसी के अन्तर्गत एक अन्य तरह का प्रवास होता है जिसे मौसमी प्रवास (Transhumance) की संज्ञा दी जाती है। ऐसे प्रवास क्षेत्रीय उच्चावच व जलवायु से प्रभावित होते हैं।

       इस प्रकार के प्रवास का सुन्दर उदाहरण भारत के पर्वतीय क्षेत्रों के बकरवाल, भोटिया, बछी आदि पशुचारकों से लिया जा सकता है जो ग्रीष्म ऋतु में पर्वतों पर जाकर पशुचारण करते हैं तथा शीत ऋतु में मैदानी भागों की ओर वापस आ जाते हैं। ऐसे उदाहरण विश्व के अनेक क्षेत्रीय पशुचारक जन-जातियों से ग्रहण किए जा सकते हैं।

(iii) दैनिक प्रवास:-

      इस प्रकार का प्रव्रजन पूर्णरूपेण अस्थायी होता है। ऐसे प्रव्रजन के अन्तर्गत बड़े-बड़े नगरों, कस्बों, आदि में ग्रामीण क्षेत्रों से मजदूरी करने, दूध, शाक-सब्जी बेचने एवं अध्ययन अध्यापन व अन्य कार्यों से आना जाना होता है जिसकी अवधि मात्र दिनभर की होती है।

(4) उद्देश्य के आधार पर

       स्थानान्तरण जिस उद्देश्य से किया जाता है, वह निम्न चार प्रकार का होता है-

(i) आर्थिक प्रवास,

(ii) सामाजिक प्रवास,

(iii) धार्मिक प्रवास,

(iv) राजनीतिक प्रवास।

       एक राष्ट्र से दूसरे राष्ट्र में जाने वाले व्यक्ति को आप्रवासी या आगन्तुक (Immigrants) कहते हैं। जिस राष्ट्र से वह व्यक्ति दूसरे राष्ट्र को जाता है, उस राष्ट्र की दृष्टि से यह बहिर्गन्तुक (Emmigrants) या प्रवासी कहलाता है।

       ब्राइडे ने अपनी पुस्तक ‘Human Geography : Principles, Processes and Pattern’ में प्रवास को दो प्रमुख वर्गों में रखा है:

1. अन्तर्महाद्वीपीय प्रवास (Inter-continental migra tion)-

      विश्व में एक देश से दूसरे देश अथवा एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप के देशों की प्रवास अन्तर्महाद्वीपीय प्रवास कहलाता है।

2. आन्तरिक प्रवास (Internal migration)-

      यह चार प्रकार के होते हैं:

(a) अन्तप्रदेशीय प्रवास (Inter-regional migration)-

      जब किसी देश के एक भाग से दूसरे भाग में लोग काम की तलाश में जाकर बस जाते हैं, तो ऐसे प्रवास को अन्तप्रदेशीय प्रवास कहते हैं। सामान्यतया कम विकसित क्षेत्रों से लोग विकसित क्षेत्रों की ओर प्रवास कर जाते हैं।

(b) सामयिक या मौसमी प्रवास (Periodic or seasonal migration)-

     जब प्रवास किसी समय विशेष पर आधारित हो। जैसे शीतकाल में चरवाहे लोग ऊंचे पहाड़ी भागों से निम्न भू-भागों में चले जाते हैं और ग्रीष्मकाल में पुनः वापस पहाड़ी भागों में आ जाते हैं।
(c) ग्रामीण-नगरीय प्रवास (Rural-urbanmigration)-

      वह प्रवास जिसमें लोग रोजगार की तलाश में ग्रामीण क्षेत्र से नगरों में जाकर बस जाते हैं।

(d) कार्य-यात्रा प्रवास (Work-travel migration)-

       जब लोग एक स्थान से दूसरे स्थान को काम कने के लिए रोजाना इधर से उधर आते जाते हैं, तो इसे कार्य यात्रा प्रवास कहते हैं। सैकड़ों कार्यकर्ता रोजाना सुबह बड़े महानगरों में विभिन्न साधनों से जाते हैं औ शाम वापिस अपने घरों को लौट जाते हैं।

प्रश्न प्रारूप

1. प्रवास अथवा प्रव्रजन (Migration) किसे कहते है? प्रवास के प्रमुख प्रकारों की विवेचना कीजिये।



4. जनसंख्या भूगोल की परिभाषा एवं विषय क्षेत्र

जनसंख्या भूगोल की परिभाषा एवं विषय क्षेत्र


प्रश्न प्रारूप

1. जनसंख्या भूगोल को परिभाषित करते हुए इसके विषय क्षेत्र की विवेचना कीजिये।

जनसंख्या भूगोल की

       जनसंख्या भूगोल मानव भूगोल की एक शाखा है, जिसमें मानव संख्या के मात्रात्मक एवं गुणात्मक पहलुओं का और इनके वितरण से सम्बन्धित विभिन्न पक्षों का अध्ययन किया जाता है। वस्तुतः जनसंख्या भूगोल मानव का अध्ययन है, चूंकि मानव ही किसी क्षेत्र की विशेषताएँ एवं विभिन्नताएँ प्रदान करता है, अतः जनसंख्या भूगोल में मानव संख्या के वितरण में व्याप्त क्षेत्रीय असमानताओं का अध्ययन एवं समीक्षा कारण सहित की जाती है।

⇒ जे. आई. क्लार्क के अनुसार जनसंख्या भूगोल में जनसंख्या के वितरण, संघटन, प्रवास और वृद्धि में पायी जाने वाली स्थानिक भिन्नताओं का अध्ययन किया जाता है। साथ ही ये स्थानिक भिन्नताएं क्षेत्र विशेष की प्रकृति में पायी जाने वाली स्थानिक भिन्नताओं से किस प्रकार से सम्बन्धित होती हैं, का भी अध्ययन किया जाता है।

       इस प्रकार जनसंख्या भूगोल का सम्बन्ध स्थानिक भिन्नताओं के साथ-साथ क्षेत्र के भौतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक घटकों से है। क्लार्क के अनुसार जनसंख्या भूगोल जनसंख्या में प्रादेशिक अन्तरों को उसके भौतिक, सांस्कृतिक तथा आर्थिक सन्दर्भ में समझने का प्रयास करता है।

⇒ विल्वर जेलिंस्की के अनुसार जनसंख्या भूगोल एक ऐसा विज्ञान है जो किसी क्षेत्र की जनसंख्या के विविध पहलुओं का अध्ययन उस क्षेत्र की प्राकृतिक परिस्थितियों के संदर्भ में करता है। इनके अनुसार जनसंख्या के विभिन्न लक्षणों के क्षेत्रीय वितरण का जनसंख्या के क्षेत्रीय वितरण में पायी जाने वाली समानताओं एवं असमानताओं हेतु उत्तरदायी कारकों का और जनसंख्या की दृष्टि से क्षेत्रों का वर्तमान भौगोलिक स्वरूप कैसे बना है, इन सभी का अध्ययन जनसंख्या भूगोल में किया जाता है।

⇒ जे. व्युजे गारनियर ने फ्रांसीसी भाषा में लिखी गई अपनी पुस्तक जिसका अनुवाद बीवर ने Geography of Population के नाम से किया है, में लिखा है कि जनसंख्या भूगोल वर्तमान वातावरण के सन्दर्भ में जनांकिकी तथ्यों का वर्णन है। साथ ही जनांकिकी तथ्यों के कारणों, मूलभूत विशेषताओं और संभावित परिणामों का अध्ययन भी जनसंख्या भूगोल में किया जाता है।

⇒ जी. जे. डैम्को ने अपने द्वारा सम्पादित पुस्तक Population Geography : A Reader में लिखा है कि जनसंख्या भूगोल, भूगोल की वह शाखा है जिसमें किसी क्षेत्र के जनांकिकी लक्षणों के क्षेत्रीय वितरण का विश्लेषण किया जाता है। इसके अतिरिक्त क्षेत्रीय दशाओं की आपसी क्रिया-प्रतिक्रिया से उत्पन्न सामाजिक और आर्थिक प्रतिफलों का अध्ययन भी किया जाता है। इन सभी पक्षों पर चूंकि समय का अत्यधिक प्रभाव पड़ता है इसलिए समयानुसार जनसंख्या वितरण के क्षेत्रीय प्रारूप को प्रभावित करने वाली प्रक्रियाओं का भी अध्ययन किया जाता है। डैम्को ने ऐसे मॉडल विकसित करने पर भी जोर दिया। जिनके द्वारा किसी क्षेत्र के समस्त जनसंख्या लक्षणों को निर्धारित करने वाली प्रक्रियाओं को भली-भांति समझा जा सके।

      निष्कर्षतः जनसंख्या का अध्ययन भौगोलिक अध्ययन का मुख्य केन्द्र बिन्दु है। वस्तुतः मानव (जनसंख्या) वह संदर्भ बिन्दु अथवा केन्द्र बिन्दु है जिसको केन्द्र में रखते हुए क्षेत्रीय लक्षणों का अवलोकन और निर्धारण किया जाता है। ज्ञातव्य है। कि मानव (जनसंख्या) से ही अन्य भौगोलिक तत्वों को अर्थ एवं महत्व मिलता है।

       उदाहरण के लिए मानव के संदर्भ में ही किसी स्थान विशेष की जलवायु को अर्थपूर्ण नाम एवं महत्व मिल पाता है। इसी प्रकार से किसी भी प्राकृतिक पदार्थ की संसाधनता भी मानव उपयोगिता के संदर्भ में ही अस्तित्व में आ पाती है। जनसंख्या भूगोल में जनांकिकी प्रक्रियाओं और इन प्रक्रियाओं के परिणामों का अध्ययन पर्यावरणीय संदर्भ में किया जाता है।

     स्पष्टतः जनसंख्या भूगोल में जनसंख्या की संरचना, वृद्धि और स्थानान्तरण में मिलने वाली स्थानिक विभिन्नताओं (Spatial Variation) का अध्ययन और इन स्थानिक विभिन्नताओं के सामाजिक एवं आर्थिक प्रभावों का अध्ययन किया जाता है।

जनसंख्या भूगोल का अध्ययन क्षेत्र (Scope of Population Geography)

       जनसंख्या भूगोल के अध्ययन क्षेत्र को निम्न वर्गों में रखा जा सकता है:

⇒ भूतकाल की जनसंख्या सम्बन्धी विशेषताओं का अध्ययन।
⇒ जनसंख्या के वितरण के अध्ययन के अन्तर्गत महाद्वीपों तथा उसके विभिन्न क्षेत्रों में जनसंख्या वितरण प्रतिरूप, विश्व में बसे हुए और बिना बसे हुए क्षेत्रों का वितरण, जनसंख्या का अन्तर्प्रदेशीय और अन्तर्सामयिक वितरण, बस्तियों का आकार, वितरण एवं उनमें परस्पर दूरियों का अध्ययन।

⇒ जनसंख्या के घनत्व के अध्ययन में विभिन्न प्रकार के घनत्व, स्थानीय स्तर से लेकर विश्व स्तर तक जनघनत्व की विशेषताएं, घनत्व वितरण का स्थानिक प्रतिरूप तथा उनको प्रभावित करने वाले कारक, प्रवास के नियम एवं परिणाम तथा शिक्षित एवं योग्य मानव श्रम का कम विकसित देशों से अधिक विकसित देशों को स्थानान्तरण आदि का अध्ययन।

⇒ जनसंख्या वृद्धि के अन्तर्गत जनसंख्या वृद्धि का मापन, जन्म-दर, मृत्यु-दर, जनसंख्या वृद्धि पर प्रभाव डालने वाले कारक, वृद्धि प्रतिरूप का वितरण, जनसंख्या वृद्धि के सिद्धान्त तथा जनसंख्या वृद्धि भावी अनुमान आदि का अध्ययन।

⇒ जनसंख्या के संघटन के अन्तर्गत जाति, धर्म, भाषा, आयु, लिंग, कार्यकर्ता-आश्रित तथा कार्यशील जनसंख्या की व्यावसायिक संरचना का अध्ययन।

⇒ जनसंख्या के लक्षणों के अन्तर्गत जनसंख्या की साक्षरता एवं साक्षरता के स्तर को प्रभावित करने वाले कारकों तथा विश्व में साक्षरता का प्रतिरूप आदि का अध्ययन।

⇒ ग्रामीण एवं नगरीय जनसंख्या की सभी प्रकार की विशेषताएँ एवं लक्षण, नगरीकरण की प्रक्रिया एवं उस पर प्रभाव डालने वाले कारक तथा विश्व एवं उसके राष्ट्रों में नगरीकरण का प्रतिरूप का अध्ययन।

⇒ जनसंख्या संसाधन अनुपात में जनसंख्या वृद्धि तथा संसाधन विकास, जनसंख्या का बढ़ता दबाव, संसाधन एवं जनसंख्या अनुपात, संसाधनों पर आधारित जनसंख्या के सिद्धान्त, संसाधन एवं जनसंख्या प्रतिरूप, जनसंख्या क्षमता, अधिकतम जनसंख्या, अल्प जनसंख्या, अनुकूलतम जनसंख्या आदि का अध्यय


3. जनसांख्यिकीय संक्रमण का सिद्धांत

3. जनसांख्यिकीय संक्रमण का सिद्धांत


जनसांख्यिकीय संक्रमण का सिद्धांत⇒ 

            जनसंख्या वृद्धि एक जैविक प्रक्रिया है जो समय और स्थान के संदर्भ में प्रभावित होता है। जनसंख्या वृद्धि का संबंध जन्म दर और मृत्यु दर से है। जन्म दर और मृत्यु दर का संबंध किसी भी देश के सामाजिक-आर्थिक स्थितियों से जुड़ा हुआ है। जन्म दर एवं मृत्यु दर का सामाजिक-आर्थिक स्थितियों के बीच मिलने वाला सह-संबंध का अध्ययन “जनसांख्यिकीय संक्रमण का सिद्धांत” कहलाता है। इस सिद्धांत का प्रतिपादन अमेरिकी समाजशास्त्री के विलियम थॉम्पसन ने 1929 ई० में और 1945 ई० में नोटेस्टीन ने इसमें संशोधित किया। जबकि 1975 ई० में क्लार्क महोदय ने और 1978 ई0 में हेगेट महोदय ने इस सिद्धांत को जनसंख्या वृद्धि का विश्लेषण करने वाला एक यथार्थवादी सिद्धांत बताया।

                थाम्पसन और नोटेस्टीन ने बताया कि जनसंख्या वृद्धि तथा किसी भी देश का सामाजिक आर्थिक दर एक ही सिक्के के दो पहलू है। जैसे-अगर किसी देश के जनसंख्या वृद्धि दर उच्च है तो इसका तात्पर्य है कि वहाँ का आर्थिक-सामाजिक स्तर विकासशील या अति पिछड़े दौड़ से गुजर रहा है। दूसरी ओर यदि जनसंख्या वृद्धि दर अति न्यून है तो इसका तात्पर्य है कि उस देश का आर्थिक सामाजिक स्तर काफी विकसित अवस्था में है। 

              थॉम्पसन और नोटेस्टीन ने बताया कि जनसंख्या वृद्धि एक गत्यात्मक पहलू है जो कि समय और स्थान के संदर्भ में परिवर्तित होते रहता है।
      उपरोक्त मान्यताओं को तार्किक ढंग से प्रस्तुत करते हुए इन्होंने समय और स्थान के संदर्भ में चार अवस्थाओं का उल्लेख किया है-

(i) प्रथम अवस्था⇒ इस अवस्था में उच्च विलचन की प्रवृति पायी जाती है। जन्म दर 40-50 व्यक्ति/हजार, मृत्यु दर 40-50 व्यक्ति / हजार और प्राकृतिक जनसंख्या वृद्धि दर -10 से +10 तक हो सकता है।

       प्रथम अवस्था से गुजरने वाले देश की आर्थिक-सामाजिक स्थिति काफी पिछड़ी होती है। ऐसे देशों में निरक्षरता, गरीबी, बेरोजगारी, रुढ़िवादी धर्म, परम्परागत सामाजिक विशेषता का बोलवाला होता है।

            अधिकतर देश वर्तमान समय में प्रथम अवस्था से मुक्त हो चुके हैं। फिर भी मध्य अफ्रीकी देश रुवान्डा, बुरुण्डी, युगाण्डा, द०-पूर्व एशिया के कम्बोडिया एवं लाओस में यह अवस्था पायी जाती है। यद्यपि भारत इस अवस्था में शामिल नहीं है तथापि भारत के कई क्षेत्र आज भी इस अवस्था के दौर से गुजर रहे हैं। जैसे- भारत के कई जनजातीय समूह, इसी अवस्था से गुजर रहे हैं।

(ii) दूसरा अवस्था⇒ दूसरा अवस्था को जनसंख्या विस्फोट की अवस्था भी कहते है। इस अवस्था में जन्म दर 30-40 व्यक्ति प्रति हजार, मृत्यु दर 15-20 व्यक्ति/हजार और जनसंख्या वृद्धि दर 15 से 25 व्यक्ति प्रति हजार प्रतिवर्ष होता है।

         दूसरा अवस्था विकासशील देशों के आर्थिक-सामाजिक परिस्थितियों का उल्लेख करता है। ये वे देश हैं जिन्होंने मृत्यु दर पर नियंत्रण स्थापित कर लिया है लेकिन सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन के कारण जन्मदर पर संतोषजनक नियंत्रण स्थापित नहीं किया है।

        अधिकतर द० एशियाई देश, द०-पूर्वी एशिया के देश, लेटिन अमेरिका और अधिकतर अफ्रीकी देश इसके उदाहरण है। थॉम्पसन ने यह भी बताया था कि इस अवस्था में वैसे देशों को रखा जाना चाहिए जिनका जनसंख्या वृद्धि दर 2% से अधिक है। अगर भारत के सन्दर्भ में विश्लेषण किया जाय तो स्पष्ट होता है कि भारत में जन्म दर और मृत्यु दर दूसरी अवस्था के अनुकूल है। जबकि वार्षिक जनसंख्या वृद्धि दर 1.64% हो गया है। इससे स्पष्ट होता है कि भारत जनसांख्यिकी संक्रमण सिद्धांत के तीसरी अवस्था के चौखट पर खड़ा है।

(iii) तीसरी अवस्था⇒ तीसरी अवस्था को जनसंख्या वृद्धि में क्रमिक परिवर्तन की अवस्था कहते है। तीसरा अवस्था में जन्मदर 16-20 व्यक्ति / हजार, मृत्युदर 10-15 व्यक्ति/हजार, जनसंख्या वृद्धि दर 1-10 व्यक्ति प्रति हजार प्रतिवर्ष होता है।

            तीसरी अवस्था में वैसे देशों को शामिल किया जाता है जिन्होंने जन्म दर और मृत्यु दर पर संतोषजनक नियंत्रण स्थापित कर लिया है तथा हाल के वर्षों में तीव्र गति से आर्थिक विकास का कार्य किया है। तीसरी अवस्था में पूर्वी यूरोपीय देश, मध्य एशियाई देशों को शामिल करते हैं। इसके अलावे ताईवान, द. अफ्रीका, पूर्तगाल, क्यूबा, द. कोरिया इत्यादि इसी अवस्था के उदहारण है। कुछ विद्वान भारत और श्रीलंका को भी इसी अवस्था में शामिल करते हैं।

(iv) चौथी अवस्था⇒ चौथी अवस्था को निम्न विचलन की अवस्था कहते हैं। चौथी अवस्था में जन्म दर 6-8, मृत्यु दर से 6 से 8 और प्राकृतिक जनसंख्या वृद्धि दर 0-2 व्यक्ति / हजार प्रतिवर्ष होता है।
                चौथी अवस्था में उन देशों को शामिल करते हैं जहाँ सामाजिक-आर्थिक अवस्था काकी उन्नत है, साक्षरता 100% पहुंच चुका है। औद्योगिकीकाण तथा नगरीकरण बड़े पैमाने पर हुआ है। इस अवस्था में पश्चिमी यूरोप, पुर्तगाल को छोड़कर आंग्ल अमेरिका, USA और कनाडा, अस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, सिंगापूर, जापान को शामिल करते हैं। अर्थात ये विकसित होते हैं।

             जनसांख्यिकी संक्रमण सिद्धांत का प्रशंसा करते हुए क्लार्क महोदय ने एक पाँचवी अवस्था का भी उल्लेख किया है। उनके अनुसार पाँचवी अवस्था अति विकसित देशों की अवस्था है। इस अवस्था में वैसे देशों को शामिल करते हैं जहाँ जन्म दर की तुलना में मृत्यु दर अधिक है तथा जन्म दर और मृत्यु दर अति न्यून है। वैसे सामाजों में परिवार एवं विवाह, जैसी संस्थाएँ कमजोर हो चुकी है।

            समाज पूर्ण रूप से भौतिकतावादी बन चुका है। जनसंख्या वृद्धि दर ऋणात्मक हो चुका है। इस अवस्था को क्लार्क महोदय ने प्रजातीय संहार की अवस्था से सम्बोधित किया है। पश्चिमी जर्मनी, स्वीडेन, नार्वे, आइसलैण्ड, स्वीटजरलैण्ड इसी अवस्था से गुजर रहे हैं। क्लार्क ने ऐसे देशों को चेतावनी देते हुए कहा कि आप जल्द से जल्द जनसंख्या वृद्धि के लिए अनुकूल कार्यक्रम चलाये।
                हेगेट महोदय ने जनसांख्यिकीय संक्रमण सिद्धांत को एक मॉडल से समझाने का प्रयास किया है।

जनसांख्यिकीय संक्रमण का

जनसांख्यिकी मॉडल (हेगेट)

 BR- जन्म दर, DR- मृत्यु दर

अवस्था- समय का द्योतक है।

       ऊपर के तथ्यों एवं मॉडल के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि जनसांख्यिकी संक्रमण का सिद्धांत स्थान और समय के संदर्भ में दिया गया है और बताया गया है कि जन्म दर, मृत्यु दर और जनसंख्या वृद्धि दर सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों से संबंधित है। इसे कुछ उदाहरण से समझा जा सकता है। जैसे-1750-1760 ई० तक ब्रिटेन प्रथम अवस्था से, 1760-1850 ई० तक द्वितीय अवस्था से 1850-1900 ईo तक तृतीय अवस्था से और 1900 ई० के बाद यह चौथी अवस्था के दौर से गुजर रहा है।

                 भारत के संदर्भ में अशोक मिश्रा ने विश्लेषण करते हुए कहा है कि भारत 1931 ई० तक प्रथम अवस्था में, 1931 से 1991 ई० तक द्वितीय अवस्था में और 1991 के बाद तृतीय अवस्था से गुजार रहा है।

जनसांख्यिकी संक्रमण सिद्धांत की अलोचना

             जनसांख्यिकी संक्रमण सिद्धांत की कई आधार पर आलोचना की गई है। जैसे-

(1) अगर चीन के सामाजिक-आर्थिक परिस्थिति को देखा जाय तो वह अभी भी दूसरी अवस्था के दौर से गुजर रहा है। लेकिन प्रशासनिक प्रतिबद्धता को दिखाते हुए जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण कर तृतीय अवस्था में पहुँच चुका है। इसका तात्पर्य है कि जन्म दर और मृत्यु दर एवं जनसंख्या वृद्धि दर का संबंध न केवल आर्थिक सामाजिक परिस्थितियों से है बल्कि अन्य कारकों से भी है।

(2) मध्य-पूर्व के पेट्रोलियम उत्पादक देश के संदर्भ में अगर इस सिद्धांत की विवेचना की जाय तो पाते है कि ये देश सामाजिक दृष्टिकोण से अभी भी मध्ययुगीन, रुढ़िवादी एवं बर्बर की अवस्था से गुजर रहे हैं। लेकिन पेट्रो डॉलर के कारण आर्थिक स्थिति विकसित देशों से कम नहीं है। अत: ऐसे देशों को किस अवस्था में रखा जाय स्पष्ट रूप से व्याख्या नहीं किया जा सकता।

(3) पूर्वी यूरोपीय जैसे देशों में भी यह मॉडल सही ढंग से लागू नहीं हो पाया क्योंकि यहाँ की आर्थिक स्थिति तीसरा अवस्था का घोत्तक और जनसंख्या वृद्धि चौथी अवस्था का घोत्तक है।

(4) इसकी आलोचना इस आधार पर भी की जाती है कि वर्तमान समय मे विश्व का कोई भी देश नहीं है जो प्रथम अवस्था की दौर से गुजर रहा है।

निष्कर्ष:

    उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि इस सिद्धांत की आलोचना कई आधारों प की गई है। इसके बावजूद यह सिद्धांत विश्व के अधिकतर देशों प लागू होता है। इस तरह इस सिद्धांत की मौलिकता आज भी बनी हुई है।

 

2. मार्क्स का जनसंख्या सिद्धांत (Marx’s population theory)

2. मार्क्स का जनसंख्या सिद्धांत

(Marx’s population theory)


मार्क्स का जनसंख्या सिद्धांत ⇒मार्क्स का जनसंख्या सिद्

                मार्क्स को साम्यवादी चिन्तन का जन्मदाता माना जाता है। इन्होंने 1867 ई० में जनसंख्या पर अपना विचार प्रकट किया था। मार्क्स के पहले जितने भी विद्वान थे उन्होंने जनसंख्या वृद्धि को जैविक प्रक्रिया मानते थे। जबकि मार्क्स ने पहली बार जनसंख्या वृद्धि को सामाजिक संकल्पना पर आधारित माना।

             कार्ल मार्क्स अपने साम्यवादी चिन्तन में कहा था कि पूरी दुनिया दो वर्गों में विभाजित है- “एक अमीर वर्ग और दूसरा गरीब वर्ग”। उनके अनुसार अमीरों का वर्ग हमेशा सम्पति एकत्रित में लगा रहता है। अमीर वर्ग कम से कम श्रमिक का उपयोग कर अधिक से अधिक उत्पादन करना चाहता है। तकनीक के प्रयोग पर अधिक से अधिक जोर देता है। वह श्रमिकों को कम-से-कम मजदूरी देकर अधिक औद्योगिक उत्पादन कर अधिक से अधिक लाभ कमाना चाहता है। इस तरह उसके पास समय अभाव के कारण जनसंख्या वृद्धि का मौका नहीं मिल पाता है।

            दूसरी तरफ समाज का वह वर्ग जो गरीबी से गुजर रहा है। उनमें निराशा का वातावरण होता है। जीविका उपार्जन हेतु श्रम के अलावे कोई दूसरा उपाय नहीं दिखता है। अत: गरीब वर्ग ज्यादा से ज्यादा धन एकत्रित करने हेतु श्रम का एकत्रीकरण शुरू कर देता है। फलतः जनसंख्या वृद्धि स्वाभाविक रूप से बढ़ते रहती है।
                मार्क्स ने मजदूरी और जन्म दर एवं मृत्यु दर के बीच प्रतिकूल सह सम्बन्ध पाया है।

मजदूरी ∝ 1 ⁄  जन्म एवं मृत्यु दर
                 उपरोक्त सूत्र के आधार पर उन्होंने बताया कि कम मजदूरी भी जनसंख्या विस्फोट की स्थिति उत्पन्न करती है। जब जनसंख्या का विस्फोट हो जाता है तो उस विस्फोटित जनसंख्या के सामने चार प्रकार की समस्या उत्पन्न होती है-
(1) बेरोजगारी
(2) कुपोषण
(3) गरीबी और
(4) कष्टकर जीवन

                   उपरोक्त समस्याएँ गरीब एवं श्रमिक वर्ग को बेचैन कर देती है, जिसके कारण वर्ग संघर्ष प्रारंभ हो जाता है। मार्क्स ने बताया कि वर्ग संघर्ष से ही सभी आर्थिक, सामाजिक समस्याओं का समाधान होता है। धन सही रूप से समाज में वितरण हो जाता है। वर्ग संघर्ष में कई लोग मारे जाते हैं जिससे जनसंख्या में कमी आती है।

मार्क्स का जनसंख्या सिद्धांत का आलोचना

                   मार्क्स के द्वारा प्रस्तुत जनसंख्या वृद्धि सिद्धांत की कई आधारों पर आलोचना की गई है। जैसे:-

(1) मार्क्स ने धर्म, विश्वास एवं जैविक प्रक्रिया को जनसंख्या वृद्धि का प्रमुख कारण नही माना है। जबकि क्लार्क महोदय के अनुसार जनसंख्या वृद्धि का प्रमुख कारण धर्म है, जबकि जननांकी संक्रमण सिद्धांत के अनुसार जनसंख्या वृद्धि का मूल कारण जैविक प्रक्रिया है।

(2) मार्क्स के अनुसार बढ़ती जनसंख्या से मजदूरी में सापेक्षिक कमी आती है। जबकि वास्तव में यह एक गलत अवधारणा है, क्योंकि लोक कल्याणी राज्यों में मजदूरी का निर्धारण लोग स्वयं नहीं करते हैं, यह सरकार के द्वारा किया जाता है।

(3) मार्क्स के अनुसार निजी सम्पत्ति और पूँजीपति समाज का विकास ही अप्रत्यक्ष रूप से जनसंख्या विस्फोट का कारण है लेकिन पश्चिमी यूरोप के संदर्भ में यह अवधारणा गलत साबित होती है।

(4) ड्यू मॉन्ट (फांसीजी)⇒

        द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कल्याणकारी राज्य की अवधारणा में अभिवृद्धि हुई है। इसके साथ ही साक्षरता में भी वृद्धि हुई है। समाज में चाहे अमीर हो या गरीब यह भावना पनपी है कि नियोजित और छोटा जीवन अधिक से अधिक खुशहाली ला सकता है। इससे स्पष्ट होता है कि जनसंख्या वृद्धि अमीरी & गरीबी से जुड़ी हुई नहीं है।

(5) अधिकतर विकासशील देशों में ऐसा देखने से लगता है कि अप्रत्याशित जनसंख्या वृद्धि का संबंध निम्न मजदूरी है। लेकिन यह वास्तव में यह निम्न मजदूरी से जुड़ा हुआ नहीं है बल्कि निम्न स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ा हुआ है अर्थात् निम्न स्वास्थ्य का स्तर होने के कारण बच्चों के जीवित रहने की गारंटी नहीं होती है। फलत:, सामान्य व्यक्ति अधिक से अधिक बच्चा चाहता है।

निष्कर्ष :

           उपरोक्त आलोचनाओं के बावजूद इनकी अवधारणा उचित जान पड़ती है क्योंकि कहीं न कहीं गरीबी, बेरोजगारी और जनसंख्या में सह-संबंध है। एडम स्मिथ ने कहा है कि गरीबी जनसंख्या वृद्धि के लिए उपयुक्त वातावरण निर्माण करती है। मार्क्स के द्वारा व्यक्त यह विचार व्यक्त किया गया कि बढ़ती हुई जनसंख्या राष्ट्र की संपत्ति होती है। यह भी सापेक्षिक रूप से सही प्रतीत होता है। जैसे -भात में ही कुछ समय पहले तक जनसंख्या वृद्धि को एक अभिशाप के रूप में माना जाता था। जबकि Out Soursing, BPO, सूचना क्रांति के आगमन ने भातीय जनसंख्या को संसाधन के रूप में बदल दिया है।

 

1. माल्थस का जनसंख्या सिद्धांत (Malthusian Population Theory) 

1. माल्थस का जनसंख्या सिद्धांत

(Malthusian Population Theory)



माल्थस का जनसंख्याप्रश्न प्रारूप 

1. जनसंख्या वृद्धि से संबंधित सिद्धांतों का आलोचनात्मक व्याख्या करें। वर्तमान समय में उनकी उपयोगिता को भी स्पष्ट करें।

         जनसंख्या वृद्धि एक जैविक प्रक्रिया है, जो समय और स्थान के संदर्भ में अलग-2 प्रवृत्ति रखता है। बदलते हुए इन प्रवृतियों को ध्यान  में रखकर कई भूगोलवेत्ताओं एवं अर्थशास्त्रियों ने जनसंख्या वृद्धि से संबंधित सिद्धांत प्रस्तुत किया।  इनमें से चार सिद्धांत प्रमुख है।:-

(i) माल्थस का जनसँख्या सिद्धांत 

(ii) मार्क्स का जनसंख्या सिद्धांत 

(iii) जननांकी संक्रमण का सिद्धांत

(iv) अनुकूलतम जनसंख्या का सिद्धांत

माल्थस का जनसंख्या सिद्धांत   

      माल्थस एक ब्रिटिश अर्थशास्त्री और जननांकी विशेषज्ञ थे। उन्होंने 1798 ई० में लिखित पुस्तक “An Esay On Priciple of Population” नामक पुस्तक में जनसंख्या का सिद्धांत प्रस्तुत किया

मन्यताएँ

       माल्थस का सिद्धांत दो आधारभूत मान्यताओं पर आधारित है।

(i) जनसंख्या वृद्धि सदैव ज्यामितीय रीति से होती है। जैसे- 1, 2, 4, 8, 16, 32, . . . . . . . . . . . . . .।

(ii) खाद्यान्न पदार्थों की वृद्धि अंक गणितीय विधि से होती है। जैसे:- 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, . . . . .।

      माल्थस के अनुसार जनसंख्या वृद्धि और खाद्यान्न उत्पादन की वृद्धि की अलग-अलग प्रवृत्ति होती है। अर्थात् जनसंख्या की बढ़ोतरी तेजी से होती है, उसके अनुपात में खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि मंद गति से होती है।

       अगर किसी देश की जनसंख्या वृद्धि अधिक हो और खाद्यान्न का उत्पादन दर निम्न हो तो वह देश खाद्यान्न की समस्या से ग्रसित होगा।

      माल्थस के अनुसार जनसंख्या वृद्धि की दर अगर उच्च हो तो किसी भी जनसंख्या आकार को दोगुना बना देती है। 

विश्लेषण:

      माल्थस के अनुसार जनसंख्या का आकार 25 वर्ष में दुगुना हो जाता है। माल्थस का सिद्धांत उस समय आया जब औद्योगिक क्रांति के प्रभाव से अनेक बीमारियों तथा महामारियों पर नियंत्रण स्थापित किया जा रहा था। इसके कारण मृत्युदर में तो कमी आ रही थी लेकिन जनसंख्या वृद्धि में किसी भी प्रकार की कमी नहीं आ रही थी जिसके परिणामस्वरूप लगभग सम्पूर्ण यूरोप में जनसंख्या वृद्धि तीव्र गति से हो रही थी।

      अत: उन्होंने बताया कि आनेवाले समय में पूरे विश्व को खाद्य संकट और जनसंख्या दबाव जैसी गंभीर समस्या का सामना करना होगा। माल्थस ने खाद्यान्न संकट से निपटने हेतु जनसंख्या नियंत्रण अनिवार्य बताया। इसके लिए उन्होंने दो उपाय बताये। जैसे:-

(i) साकारात्मक उपाय

(ii) नाकारात्मक उपाय

       साकारात्मक उपाय के अन्तर्गत उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी समाज के ऊपर डाला। उन्होंने कहा कि युद्ध, गरीबी, महामारी, खाद्यान्न पदार्थों की कमी जैसे कारक स्वतः प्राकृतिक रूप से जनसंख्या पर नियंत्रण स्थापित करते हैं।

        दूसरे शब्दों में प्रकृति और समाज जनसंख्या का स्वयं नियंत्रक होता है। लेकिन यह विधि काफी कष्टकर होता है। अत: उन्होंने ये सलाह दिया कि आप जनसंख्या का नियंत्रण निषेधात्मक विधि से करे

निषेधात्मक उपाय के अन्तर्गत उन्होंने नैतिक आचरण की चर्चा की है। उनके अनुसार:-

(i) मनुष्य को विवाह स्वयं देरी से करनी चाहिए।

(ii) प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में कार्यों का महात्व देना चाहिए।

(ii) युवावस्था में ब्रह्मचर्य जीवन का पालन करना चाहिए। इससे उनकी आर्थिक आय सुनिश्चित होगी।

      माल्थस का यह विचार प० यूरोप के लिए एक नवीन चिंतन था जिस चिन्तन को अधिकतर देश के सरकारों ने पसन्द किया। यहाँ तक कि ब्रिटिश सरकार ने उनके पुस्तकों का सस्ते दर में प्रकाशित कर वितरण किया तथा राजनीतिक क्षेत्रों में उनके पुस्तकों एवं सिद्धांतों का हवाला दिया गया।

आलोचना

      माल्थस का सिद्धांत जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में एक चिरसम्मतकालीन सिद्धांत हैं। इसके बावजूद भी इनकी आलोचना कई आधारों पर की गई है। जैसे:-

(i) किसी भी परिवार में एक शिशु का आगमन होना एक जैविक प्रक्रिया मात्र है (माल्थस के अनुसार), लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह जैविक प्रक्रिया के साथ-2 सामाजिक प्रक्रिया भी है।

(ii) जनसंख्या और खाद्य वृद्धि के संबंध में माल्थस जो मत प्रतिपादित किया है, वह भी गलत है क्योंकि जहाँ एक ओर राजनीतिक एवं प्रशासनिक प्रतिबद्धता के आधार पर जनसंख्या वृद्धि दर को नियंत्रित किया जा रहा वहीं जैव तकनीक एवं विभिन्न प्रकार के कृषि क्रांतियों के द्वारा खाद्यान्न का उत्पादन बढ़ाया जा रहा है।

(iii) माल्थस के अनुसार कोई भी जनसंख्या का आकार 25 वर्षों में दुगुना हो जाता है, लेकिन यूनाइटेड किंगडम में 280 वर्ष में, जापान 270 वर्ष में, USA में 99 वर्ष में, रूस, जर्मनी, स्वीडन में 300 वर्ष में, इसी तरह भारत में स्वतंत्रता के बाद 35 वर्ष में जनसंख्या का आकार दुगुना हुआ जो स्पष्ट है कि माल्थस के विचार के प्रतिकूल है।

(iv) माल्थस के द्वारा जनसंख्या नियंत्रण के उपायों में नकारात्मक उपाय को अधिक बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया गया और निषेधात्मक उपाय व्यावहारिक कम काल्पनिक अधिक लगती है। वस्तुतः कोई भी समाज जनसँख्या नियंत्रण के लिए नियोजित तरीके से निषेधात्मक उपाय का पालन नहीं कर सकती है।

(v) क्लार्क महोदय माल्थस  का आलोचना करते हुए कहा है कि उन्होंने जनसंख्या के नियंत्रण में गर्भ निरोधकों की भूमिका को नजर अंदाज किया है।

(vi) माल्थस का सिद्धांत मूलतः प० यूरोप के संदर्भ में दिया गया था न कि पूरे विश्व के संदर्भ में।

       यद्यपि माल्थस के विचारों की आलोचाना कई आधारों पर की जाती है, फिर भी इनके दो विचारों की अवहेलना नहीं की जा सकती हैं-

(i) यद्यपि अधिकतर विकासशील देशों मे जनसंख्या वृद्धि ज्यामितीय तरीके से नहीं हो रहा है लेकिन यह भी स्पष्ट हो रहा है कि अंकगणितीय विधि से नहीं हो रहा है लेकिन विकासशील देशों के जनसंख्या वृद्धि की प्रवृति देखते हुए ज्यामीतीय प्रकृति का आभाव होता है।

(ii) नवीन आलोचना में कहा गया है कि जनसंख्या नियंत्रण के साकारात्मक उपाय कम महत्वपूर्ण है। लेकिन विकासशील देशों में जनसंख्या वृद्धि वाले क्षेत्रों में अधिकतर आकाल, महामारी, जातीय एवं प्रजातीय दंगे एवं प्राकृतिक विपदाएँ आती हैं। इससे जनसंख्या नियंत्रण के कार्यों की पुष्टि होती है।

निष्कर्ष:

     अतः स्पष्ट है कि माल्थस का विचार एक ऐतिहासिक अवधारणा है। वर्तमान समय में यह सिद्धांत विकसित एवं साक्षर देशों प भले ही लागू नहीं होता हो परन्तु विकासशील देशों प स्पष्ट रूप से लागू होता है।

2. भारत के जनसंख्या वितरण एवं घनत्व (Distribution and Density of Population of India)

2. भारत के जनसंख्या वितरण एवं घनत्व

(Distribution and Density of Population of India)


भारत के जनसंख्या वितरण एवं घनत्व⇒

परिचय –

     किसी देश में उत्पत्ति के संसाधनों में जनसंख्या का अधिक महत्व होता है। प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग और देश की आर्थिक एवं व्यापारिक उन्नति वहाँ पाए जाने वाले जनसंख्या के वितरण, उसके घनत्व एवं लोगों के स्वभाव पर निर्भर करती है। अतः जनसंख्या के वितरण एवं घनत्व को जानना अति आवश्यक है। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की कुल जनसंख्या 121.2 करोड़ है तथा औसतन जनसंख्या घनत्व 382 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है। वास्तव में वर्तमान में भारत विश्व का सघन बसे देशों की श्रेणी में सम्मिलित है। संपूर्ण विश्व के कुल क्षेत्रफल का 2.4%  भाग भारत के पास है अर्थात क्षेत्रफल की दृष्टि से विश्व में सातवाँ परंतु जनसंख्या की दृष्टि से भारत विश्व में चीन के बाद दूसरा स्थान रखता है। भारत में विश्व की 17.5 % से अधिक जनसँख्या निवास करती है।     

    भारत में जनसंख्या का वितरण बहुत ही असमान है। देश की 16.51% जनसंख्या अकेले उत्तर प्रदेश में निवास करती है। यह जनसंख्या जापान की कुल जनसंख्या के बराबर है। जनसंख्या वितरण का सही ज्ञान जनसंख्या घनत्व से  होता है। प्रति इकाई क्षेत्र पर निवास करने वाली व्यक्तियों की संख्या को जनसंख्या घनत्व कहा जाता है। दूसरे शब्दों में जनसंख्या घनत्व संपूर्ण जनसंख्या एवं क्षेत्रफल का अनुपात है तथा इसके माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों में जनसंख्या दबाव का तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है।

      भारत में जनसंख्या का घनत्व सदैव एक समान नहीं रहा है। यह क्रमशः बढ़ता ही जा रहा है। निम्नलिखित तालिका से इस बात की भली-भांति पुष्टि हो जाती है।

  भारत में जनसंख्या घनत्व (1921-2011)

वर्ष जनसँख्या घनत्व

(प्रति वर्ग किलोमीटर)

1921 81
1931 90
1941 103
1951 117
1961 142
1971 177
1981 216
1991 274
2001 324
2011 382

     इस दृष्टि से देखा जाए तो भारत के जनसंख्या घनत्व में तीव्र गति से वृद्धि हुई है। 1931 से 1991 तक छह दशकों में जनसंख्या घनत्व 3 गुना हो गया है। 1951 से 2011 के बीच जनघनत्व में चार गुनी वृद्धि हुई है। उल्लेखनीय है कि उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही है। विगत दशक में घनत्व 58 व्यक्ति प्रति किलोमीटर बढ़ा है जो 1921 से 1951 के मध्य तीन दशकों में हुई कुल 36  से भी अधिक है । 1991 की जनगणना के अनुसार देश में जनसंख्या घनत्व 267 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर था जो  2001 में 324 तथा 2011 में 382 हो गई। यह एक ओर  बांग्लादेश, नीदरलैंड, जापान जैसे देशों से कम है तो दूसरी ओर कनाडा, संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन और विश्व की तुलना में बहुत अधिक है। देश के विभिन्न भागों में जनसंख्या घनत्व में असमानता है। यह असमानता देश, राज्य और जिला स्तर पर देखने को मिलता है।

       प्रति वर्ग किलोमीटर जनसंख्या घनत्व एक ओर अरुणाचल प्रदेश में 17 व्यक्ति का है तो दूसरी ओर दिल्ली का जनघनत्व 11320 है। पहला पर्वतीय क्षेत्र है जहां मानव बसाव की परिस्थितियां सर्वथा प्रतिकूल है जबकि दूसरा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र है जहाँ मानव बसाव की परिस्थियाँ अनुकूल है। बिहार, पश्चिम बंगाल, केरल, उत्तर प्रदेश,  हरियाणा उच्च जनघनत्व वाला राज्य है जबकि कई राज्यों में जनसंख्या का घनत्व राष्ट्रीय औसत से भी कम है।

     जनसख्या घनत्व के इस असमान वितरण के लिए कई कारण उत्तरदायी होते है–

1. प्राकृतिक या भौगोलिक कारक

2. मानवीय कारक

1. प्राकृतिक या भौगोलिक कारक

    जनसंख्या के वितरण घनत्व को प्रभावित करने वाले भौगोलिक कारक

  • धरातलीय संरचना
  • जलवायु
  • मिट्टी का उपजाऊपन
  • जलापूर्ति
  • खनिज पदार्थ

(i) धरातलीय संरचना-

        समतल मैदानी भाग पठारी भूतल की अपेक्षा घने बसे होते हैं, क्योंकि यहां उत्तम जलवायु व कृषि की सुविधाएं, परिवहन सुविधा और व्यापारिक सुविधा अधिक होती है जैसे- सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र। इसके अलावा पर्वतीय तथा पठारी क्षेत्रों में जनसंख्या कम होती है, क्योंकि यहां ऊंची नीची और कम उपजाऊ मिट्टी होती है। जैसे दक्कन का पठार पर्वतीय प्रदेशों में है यहां जनसंख्या बहुत कम है।

(ii) जलवायु-

      अनुकूल जलवायु परिस्थितियों वाले क्षेत्र घनी आबादी वाले हैं जबकि रेगिस्तान जैसे चरम जलवायु परिस्थितियों वाले क्षेत्र काफी कम आबादी वाले क्षेत्र हैं। इसलिए, मुंबई और तमिलनाडु शहर जैसे मध्यम जलवायु का अनुभव करने वाले तटीय क्षेत्र घनी आबादी वाले हैं जबकि थार रेगिस्तान और लेह और लद्दाख क्षेत्र मामूली या कम आबादी वाले हैं।

(iii) मिट्टी का उपजाऊपन-

         जहाँ की मिट्टी उपजाऊ होती है वहां मनुष्य को भोजन, वस्त्र, आवास आदि की सुविधाएं प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हो जाती है। इसीलिए उपजाऊ मिट्टी वाले भूभाग घने बसे होते हैं इसके विपरीत जहां की मिट्टी कम उपजाऊ होती है वहां कम जनसंख्या पाई जाती है। यही कारण है कि गंगा के मैदान वाले क्षेत्रों में आबादी बहुत घनी है जबकि पश्चिमी राजस्थान और पश्चिमी गुजरात कम आबादी वाले क्षेत्र हैं।

(iv) जल-आपूर्ति-

       जिन भू-भागों में पर्याप्त जल उपलब्ध होते हैं वह सघन बसे होते हैं। इसके विपरीत शुष्क एवं जल आभाव वाले क्षेत्रों में जनसंख्या कम निवास करती है। प्राय: यह देखा गया है कि भारत में नदियों की घाटियों एवं डेल्टाई भागों में अधिकांश जनसंख्या निवास करती है। इसका प्रमुख कारण स्वच्छ जल की उपलब्धता ही है। शुष्क एवं पर्वतीय भागों में, जहाँ भूमिगत जल की प्राप्ति में अधिक कठिनाई होती है, जनसंख्या विरल मिलती है।

(v) खनिज पदार्थ-

         खनिज पदार्थों की उपलब्धता जनसंख्या के घनत्व को बढ़ाती है, इसलिए जहां खनिज पदार्थ की उपलब्धता अधिक होगी वहां जनसंख्या भी अधिक होगी। क्योंकि खनिजों के खनन से अनेकों उद्योग का विकास होता है। छोटानागपुर क्षेत्र में खनिज उपलब्धता के कारण ही जनसंख्या का अधिक जमाव पाया जाता है।

2. मानवीय कारक

      जनसंख्या के वितरण घनत्व को प्रभावित करने वाले मानवीय कारक

  • नगरीकरण
  • परिवहन साधनों का विकास
  • औद्योगिकरण
  • सामाजिक एवं धार्मिक कारण
  • कृषि  योग्य भूमि की उपलब्धता
  • धान क्षेत्र
  • राजनीतिक कारक
  • सरकार की नीतियां

(i)  नगरीकरण- 

     नगरीकरण का मुख्य कारण सुरक्षा, रोजगार, परिवहन, शिक्षा आदि सुविधाओं का नगरों में पाया जाना है। नगर वाणिज्य व्यापार उद्योग तथा प्रशासन के भी केंद्र होते हैं। अतः नगरों में जनसंख्या की अधिक वृद्धि हुई है।

(ii) परिवहन साधनों का विकास- 

       परिवहन साधनों के विकास के साथ-साथ जनसंख्या में भी वृद्धि होती जाती है। जैसे सड़कों के किनारे कस्बों और नगरों एवं औद्योगिक प्रतिष्ठानों की स्थापना हो जाने से जनसंख्या बढ़ती है।

(iii) औद्योगिकरण- 

    औद्योगिक दृष्टि से विकसित प्रदेशों में जनसंख्या का घनत्व उच्च पाया जाता है क्योंकि इन प्रदेशों में रोजगार के अवसर विद्यमान होते हैं। जैसे- जमशेदपुर, भिलाई, तथा दुर्गापुर आदि का उदाहरण दिया जा सकता है। इसके अतिरक्त देश के महानगरों में जनसंख्या का अत्यधिक दबाव अन्य कारणों की अपेक्षा वहाँ पर स्थगित औद्योगिक भू-दृश्यों के करण भी होता है ।

(iv) सामाजिक एवं धार्मिक कारण- 

    जन-घनत्व के वितरण में सामाजिक, सांस्कृतिक  एवं धार्मिक कारकों की भी अहम भूमिका होती है । पर्वतीय एवं आदिवासी क्षेत्रों में सांस्कृतिक अलगाव की प्रवृति एवं धार्मिक कारणों से स्थानांतरण पर प्रतिबन्ध मिलता है । अत: इन भागों में जनसँख्या की विरलता मिलती है । जैसे पूर्वोत्तर भारत, झारखंड, छतीसगढ़ आदि राज्यों में ।

(v) कृषि योग्य भूमि की उपलब्धता-

       कृषि योग्य भूमि की उपलब्धता भारत में जनसँख्या घनत्व को प्रभावित करने वाला एक सर्वप्रमुख कारक है। भारत एक कृषि प्रधान देश है, जिसकी लगभग 70 प्रतिशत जनसंख्या अपनी जीविका के लिए कृषि पर निर्भर रहती है। अत: देश के ऐसे भू-भाग जहाँ कृषि योग्य भूमि की अधिक उपलब्धता है, साथ ही कृषि भूमि के उपजाऊ होने के साथ-साथ अन्य भौगोलिक दशाएँ कृषि कार्यों के लिए अनुकूल है तो उन क्षेत्रों में जनसंख्या का दबाव अधिक मिलता है। गंगा-यमुना का का मैदानी भाग, पूर्वी तटीय भाग तथा मालाबार तट देश के अति सघन बसे भाग है। यह क्षेत्र कृषि के लिए देश के सर्वोत्तम क्षेत्र माने जाते है, जबकि देश के पर्वतीय भाग समतल भूमि की अनुपलब्धता के कारण विरल आबादी वाले है।

(vi) धान क्षेत्र-

         इस अनाज क्षेत्र में अधिक लोगों के जीवन-निर्वाह करने की बेजोड़ क्षमता है । गंगा का मैदान तथा पूर्वी समुद्र तटीय भाग धान के ही क्षेत्र है। यही कारण है कि यहाँ अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक जनसँख्या मिलती है। पूर्वी भारत तथा दक्षिणी भारत (झारखण्ड, बंगाल, ओडिशा, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना) के लोगों का मुख्य आहार चावल है। बिहार और केरल में भी घनी आबादी का यही कारण है।

(vii) राजनीतिक कारक- 

       राजनितिक उथल-पुथल, असुरक्षा, असंतोष आदि राजनितिक कारकों ने देश में जनसंख्या वितरण में असमानता उत्पन्न करने में प्रमुख भूमिका निभाई है। सीमावर्ती क्षेत्रों में आतंकवाद बढ़ने के कारण स्थानान्तरण दर में तीव्र वृद्धि भी जनसंख्या वितरण में असमानता का कारण बन गई है। जम्मू-कश्मीर, पंजाब व असम में आतंकवाद के कारण ही विरल जनसंख्या पाई जाती है।

         जनसंख्या घनत्व की दृष्टि से भारत को तीन भागों में बांटा जा सकता है-

जनसंख्या घनत्व की दृष्टि से भारत के तीन भाग

1. उच्च घनत्व के क्षेत्र-

      इसके अन्दर पूरे देश के लगभग 1/4 जिलें आते हैं। इसका विस्तार बिहार, पश्चिमी बंगाल, केरल,  उत्तर प्रदेश और हरियाणा में है। यहाँ जनसंख्या का घनत्व (Population Density) 500 व्यक्ति प्रतिवर्ग किमी से अधिक मिलता है। ये क्षेत्र भारतीय कृषि के प्रमुख क्षेत्र हैं। 

2. मध्यम घनत्व के क्षेत्र-

        भारत में लगभग 130 जिलों में 300-500 व्यक्ति प्रतिवर्ग किमी घनत्व पाया जाता है। भारत में मध्यम घनत्व के क्षेत्र उत्तरी भारत के उच्च घनत्व के निकटवर्ती क्षेत्र जैसे महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना, आंध्र के तटवर्ती भाग, छोटा नागपुर के पठार आदि हैं। इन क्षेत्रों में धरातल की विषमता और जल की कमी पाई जाती है। इसलिए ये क्षेत्र कृषि में महत्त्वपूर्ण भूमिका नहीं निभाते. इसलिए इन क्षेत्रों में कम जनसंख्या पाई जाती हैं। पर यहाँ खनिजों का भण्डार है जिससे ये क्षेत्र औद्योगिक और आर्थिक रूप से विकसित हैं। पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में कृषि तथा लघु उद्योगों के विकास के कारण मध्यम घनत्व के कुछ क्षेत्र विकसित हुए हैं। 

3. निम्न घनत्व के क्षेत्र-

      भारत के लगभग 150 जिलों में 300 व्यक्ति प्रतिवर्ग किमी से भी कम जनसंख्या का घनत्व मिलता है। उत्तर-पूर्व हिमालयी क्षेत्र में और पश्चिमी भारत में कमी और जनसंख्या का अल्प घनत्व मिलता है। मध्य प्रदेश और उड़ीसा के पठारी और जनजातीय क्षेत्रों, कर्नाटक के पूर्वी भाग और आंध्र प्रदेश के मध्यवर्ती भाग में भौतिक बाधाओं और कृषि के अविकसित होने के चलते कम जनसंख्या पाई जाती है। कच्छ के दलदल वाले क्षेत्र भी निम्न घनत्व वाले क्षेत्र हैं।

2011 के जनगणना के अनुसार सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व वाले पाँच राज्य है-

  1. बिहार – 1106
  2. पश्चिम बंगाल – 1028
  3. केरल – 860
  4. उत्तर प्रदेश – 829
  5. हरियाणा – 573

2011 के जनगणना के अनुसार न्यूनतम जनसंख्या घनत्व वाले पाँच राज्य है-

  1. अरुणाचल प्रदेश –17
  2. मिजोरम – 52
  3. सिक्किम – 86
  4. नागालैंड- 119
  5. हिमाचल प्रदेश –123

2011 के जनगणना के अनुसार सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व वाले पाँच केंद्रशासित राज्य है-

  1. राष्ट्रीय  राजधानी क्षेत्र दिल्ली –11320
  2. चंडीगढ़ – 9258
  3. पुद्दुचेरी – 2547
  4. दमन एवं द्वीप – 2191
  5. लक्षद्वीप – 2149

          जबकि क्षेत्रीय आधार पर भी भारत को तीन जनसंख्या वर्गों में विभाजित किया गया है-

1. उत्तर का मैदानी भाग: 

       भारत में उत्तर का मैदानी भाग सर्वाधिक जनसंख्या रखने वाला क्षेत्र है जिसमें सन् 2011 में देश की लगभग 52 करोड़ जनसंख्या (42.7 प्रतिशत) निवासित थी। उत्तर के मैदानी क्षेत्रों में उत्तर प्रदेश (19.96 करोड़), बिहार (10.38 करोड़), प. बंगाल (9.13 करोड़), राजस्थान (6.86 करोड़), पंजाब (2,77 करोड़) तथा हरियाणा (2.54 करोड़) नामक राज्य देश में सवार्धिक जनसंख्या वाले राज्य हैं।

2. दक्षिण के पठारी भाग:

         जनसंख्या की दृष्टि से दक्षिण के पठारी भाग का दूसरा स्थान है। महाराष्ट्र (11.24 करोड़), मध्य प्रदेश (7.26 करोड़), कर्नाटक (6.11 करोड़) तथा आन्ध्र प्रदेश (8.47 करोड़) दक्षिण के पठारी भाग पर विस्तृत राज्य हैं जिनमें सन् 2011 में देश की 27.3 प्रतिशत जनसंख्या निवासित थी।

3. तटवर्ती,पर्वतीय तथा मरुस्थलीय भाग:

       जनसंख्या की दृष्टि से दक्षिण के पठारी भाग का तिसरा स्थान है। देश के सभी तटीय क्षेत्रों, उत्तरी-पूर्वी पर्वतीय राज्यों तथा राजस्थान के पश्चिमी मरुस्थलीय भागों में प्राकृतिक एवं धरातलीय विषमता के कारण जनसंख्या कम निवासित है।

2011 के जनगणना के अनुसार सर्वाधिक जनसंख्या वाले पाँच राज्य है–

(i)   उत्तर प्रदेश – 16.51%

(ii)   महाराष्ट्र – 9.28%

(iii)  बिहार – 8.6%

(iv)  पश्चिम बंगाल – 7.54%

(v)   आंध्रप्रदेश – 6.99%

2011 के जनगणना के अनुसार सबसे कम जनसंख्या वाले पाँच राज्य है–

(i)  सिक्किम – 0.05%

(ii)   मिजोरम – 0.09%

(iii)  अरुणाचल प्रदेश – 0.11%

(iv)   गोवा – 0.12%

(v)   नागालैंड  – 0.16%

निष्कर्ष :

       निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि भारत में जनसंख्या वितरण व घनत्व सभी क्षेत्रों में एक सामान नहीं है। भारत में लगभग 50 प्रतिशत आबादी मात्र पांच राज्यों उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र,  बिहार,  पश्चिम बंगाल व आंध्रप्रदेश में निवास कती है जबकि 4 प्रतिशत उतरी एवं उत्तरी पूर्वी 10 पर्वतीय राज्यों  में निवास करती है।  साथ ही भारत के जन-घनत्व में 1901 से 2011 तक हमेशा वृद्धि ही  हुआ है।



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