1. Measurement of Central Tendency (केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप) : Mean (माध्य)
Measurement of Central Tendency(केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप) : Mean (माध्य) |
परिचय:
केन्द्रीय प्रवृत्ति (Central Tendency) सांख्यिकी का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है, जिसके माध्यम से किसी भी आँकड़ा-समूह (data set) का प्रतिनिधि या केंद्रीय मान ज्ञात किया जाता है। सरल शब्दों में, यह बताता है कि दिए गए आंकड़ों का “मध्य” या “औसत” मान क्या है, जिसके आसपास अधिकांश मान केंद्रित होते हैं।
जब किसी क्षेत्र, जनसंख्या, तापमान, वर्षा या उत्पादन आदि से संबंधित बहुत सारे आँकड़े एकत्र किए जाते हैं, तो उन्हें समझना कठिन हो सकता है। ऐसे में केन्द्रीय प्रवृत्ति का माप उन सभी मानों को एक संक्षिप्त और अर्थपूर्ण रूप में प्रस्तुत करता है।
केन्द्रीय प्रवृत्ति के तीन मुख्य माप हैं-
1. माध्य (Mean) – सभी मानों का औसत।
2. माध्यिका (Median) – मध्य का मान।
3. बहुलक (Mode) – सर्वाधिक बार आने वाला मान।
भूगोल में केन्द्रीय प्रवृत्ति का उपयोग औसत तापमान, औसत वर्षा, जनसंख्या घनत्व, साक्षरता दर आदि के अध्ययन में किया जाता है। यह क्षेत्रीय तुलना, विकास स्तर के विश्लेषण तथा प्रवृत्तियों को समझने में अत्यंत सहायक है।
इस प्रकार, केन्द्रीय प्रवृत्ति जटिल आँकड़ों को सरल और सारगर्भित रूप में प्रस्तुत करने का एक प्रभावी साधन है।
माध्य वह मान है जो किसी चर राशि के सभी मानों के कुल योग को उनकी संख्या से विभाजित करने पर प्राप्त होता है। इसे सामान्य भाषा में औसत (Average) भी कहा जाता है। इसे अंकगणितीय माध्य या समान्तर माध्य भी कहते हैं।
Croxton & Cowden के अनुसार– “औसत समंकों के विस्तार के अंतर्गत स्थित एक ऐसा मान है जिसका प्रयोग श्रेणी के सभी मूल्यों का प्रतिनिधित्व करने के लिए किया जाता है।”
किसी समंक श्रेणी के विस्तार के मध्य में स्थित होने के कारण औसत को केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप भी कहा जाता है। औसत या माध्य का सांख्यिकी में विशेष महत्व है। डा. एल. एल. बाउले ने सांख्यिकी को ‘माध्यों’ का विज्ञान’ कहकर संबोधित किया है।
समान्तर माध्य या औसत की गणना :
समान्तर माध्य की गणना करने हेतु निम्नलिखित दो विधियाँ होती हैं-
(1) प्रत्यक्ष विधि: जब किसी समंक श्रेणी में पद-मूल्यों की संख्या कम हो तथा उनके मान दशमलव में न हो तो इस विधि का प्रयोग श्रेयस्कर होता है। इस विधि द्वारा माध्य ज्ञात करने के निम्नलिखित सूत्र हैं:
(i) व्यक्तिगत श्रेणी x̄ = ΣΧ/ N
(ii) खण्डित श्रेणी x̄ = ΣfΧ /N
(iii) अखण्डित श्रेणी x̄ = ΣfΧ /N
जहाँ, x̄ = समान्तर माध्य या औसत,
ΣΧ = पद-मूल्यों का योग
ΣfX = वर्गान्तरों के मध्य मूल्यों तथा आवृत्तियों के गुणनफलों का योग
N = पदों की कुल संख्या
(2) लघु विधि : इस विधि का प्रयोग उस समय करने में सरलता होती है जब समंक-श्रेणी में पद मूल्य अधिक हों तथा उनके मानों में अधिक अंतर न हो। इस विधि में सर्वप्रथम कल्पित माध्य चुन लेते हैं तत्पश्चात् इस कल्पित माध्य से पद-मूल्यों का विचलन ज्ञात कर निम्न सूत्रों का प्रयोग करते हैं-
जहाँ,
x̄ = माध्य
A = कल्पित माध्य
N = पदों की संख्या
ΣdX = कल्पित माध्य से विचलनों का योग
ΣfdX = आवृत्तियों तथा विचलनों के गुणनफलों का योग
(1) व्यक्तिगत श्रेणी में समान्तर माध्य की गणना :
उदाहरण (1) : किसी कारखाने के 10 श्रमिकों के मासिक वेतनों के आधार पर समान्तर माध्य की गणना कीजिए-

हल: (a) प्रत्यक्ष विधि:
| श्रमिक | मासिक वेतन (रु०) |
| A | 840 |
| B | 860 |
| C | 855 |
| D | 880 |
| E | 890 |
| F | 905 |
| G | 945 |
| H | 960 |
| I | 925 |
| J | 980 |
| N = 10 | ΣX = 9040 |
x̄ = ΣΧ/ N
= 9040/10
= 904 रु०
(b) लघु विधि:
माना कि कल्पित माध्य = 890
| श्रमिक |
मासिक वेतन (रु०) X |
कल्पित माध्य (A = 890) से विचलन
अर्थात् X-A dX |
| A | 840 | 840-890=-50 |
| B | 860 | 860-890 = -30 |
| C | 855 | 855-890 = -35 |
| D | 880 | 880-890 = -10 |
| E | 890 | 890-890 = 0 |
| F | 905 | 905-890 = +15 |
| G | 945 | 945-890 = +55 |
| H | 960 | 960-890 = +70 |
| I | 925 | 925-890 = +35 |
| J | 980 | 980-890 = +90 |
| N = 10 | ΣdX = +140 |
x̄ = A+ΣdX/N
= 890+140/10
= 9040/10
= 904
∴ वेतनों का समांतर माध्य = 904 रु०।
Mean के गुण (Merits):
Mean की सीमाएँ (Demerits):
भूगोल में व्यावहारिक उपयोग:
निष्कर्ष:
भूगोल में माध्य (Mean) सांख्यिकीय विश्लेषण का एक महत्वपूर्ण उपकरण है। यह किसी क्षेत्र की जलवायु, जनसंख्या, कृषि उत्पादन आदि के औसत स्तर को समझने में सहायता करता है। हालाँकि, असामान्य मानों की स्थिति में केवल Mean पर निर्भर रहना उचित नहीं है; Median एवं Mode का भी उपयोग आवश्यक है।
