Unique Geography Notes हिंदी में

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GEOGRAPHY OF INDIA(भारत का भूगोल)PG SEMESTER-3

12. Cropping Pattern in India / भारत में फसल प्रतिरूप

Cropping Pattern in India 

भारत में फसल प्रतिरूप

परिचय:

     भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहाँ लगभग 45–46% कार्यशील जनसंख्या प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। देश की विविध जलवायु, मिट्टी, स्थलाकृति, वर्षा तथा सिंचाई सुविधाओं के कारण विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग प्रकार की फसलें उगाई जाती हैं। किसी क्षेत्र में एक निश्चित समय पर उगाई जाने वाली फसलों के प्रकार, उनका क्षेत्रीय वितरण तथा उनके अंतर्गत आने वाले क्षेत्रफल की व्यवस्था को फसल प्रतिरूप (Cropping Pattern) कहा जाता है।

     फसल प्रतिरूप कृषि भूगोल की एक महत्वपूर्ण अवधारणा है, जो किसी क्षेत्र की कृषि विशेषताओं, संसाधनों के उपयोग तथा कृषि विकास के स्तर को स्पष्ट करती है। भारत में फसल प्रतिरूप प्राकृतिक एवं सामाजिक-आर्थिक दोनों प्रकार के कारकों से प्रभावित होता है।

परिभाषा:

     फसल प्रतिरूप (Cropping Pattern) से तात्पर्य किसी क्षेत्र में एक निश्चित अवधि के दौरान विभिन्न फसलों के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रफल, उनके अनुपात तथा स्थानिक वितरण से है।

Spedding (1979) के अनुसार-

   “Cropping pattern refers to the yearly sequence and spatial arrangement of crops on a given area of land.”

भारत में फसल प्रतिरूप की प्रमुख विशेषताएँ

(Major Characteristics of Cropping Pattern in India)

1. कृषि की क्षेत्रीय विविधता (Regional Diversity in Agriculture):-

    भारत की जलवायु, मिट्टी, स्थलाकृति एवं वर्षा में अत्यधिक विविधता होने के कारण प्रत्येक क्षेत्र का फसल प्रतिरूप भिन्न-भिन्न है। उत्तर भारत में गेहूँ, पूर्वी भारत में धान, पश्चिमी भारत में कपास तथा दक्षिण भारत में चाय, कॉफी एवं मसालों जैसी फसलें प्रमुख हैं। यह विविधता भारत की कृषि प्रणाली को विशिष्ट बनाती है।

2. खाद्यान्न फसलों का प्रभुत्व (Dominance of Food Crops):-

     भारत में खाद्य सुरक्षा की आवश्यकता तथा विशाल जनसंख्या के कारण धान, गेहूँ, मक्का, ज्वार, बाजरा एवं दालों जैसी खाद्यान्न फसलें कृषि क्षेत्र के बड़े भाग में उगाई जाती हैं। विशेष रूप से गंगा के मैदानी क्षेत्रों में धान एवं गेहूँ का प्रभुत्व स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

3. मानसून पर निर्भरता (Dependence on Monsoon):-

     भारत की कृषि का एक बड़ा भाग आज भी दक्षिण-पश्चिम मानसून पर निर्भर है। समय पर एवं पर्याप्त वर्षा होने पर अच्छी फसल प्राप्त होती है, जबकि कम या अनियमित वर्षा से उत्पादन प्रभावित होता है। इसलिए मानसून की अनिश्चितता भारत के फसल प्रतिरूप एवं कृषि उत्पादन दोनों को प्रभावित करती है।

4. बहुफसली कृषि (Multiple Cropping System):-

     सिंचाई सुविधाओं, उन्नत बीजों एवं आधुनिक कृषि तकनीकों के विकास से अनेक क्षेत्रों में वर्ष में दो या तीन फसलें उगाई जाती हैं। इससे भूमि का अधिकतम उपयोग होता है, कृषि उत्पादन बढ़ता है तथा फसल सघनता (Cropping Intensity) में वृद्धि होती है। पंजाब, हरियाणा एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

5. व्यावसायिक कृषि का विस्तार (Expansion of Commercial Agriculture):-

    बढ़ती बाजार मांग, कृषि तकनीक के विकास तथा बेहतर परिवहन सुविधाओं के कारण फल, सब्जियाँ, गन्ना, कपास, चाय, कॉफी, रबर, मसाले एवं बागवानी फसलों का क्षेत्र लगातार बढ़ रहा है। इससे किसानों की आय में वृद्धि हुई है तथा भारतीय कृषि धीरे-धीरे व्यावसायिक स्वरूप ग्रहण कर रही है।

6. क्षेत्रीय विशिष्टीकरण (Regional Specialization):-

    भारत के विभिन्न क्षेत्रों में प्राकृतिक एवं आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार विशिष्ट फसलों का संकेन्द्रण पाया जाता है। उदाहरण के लिए, असम चाय उत्पादन, केरल रबर एवं मसालों, कर्नाटक कॉफी, पंजाब गेहूँ तथा महाराष्ट्र कपास उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। यह क्षेत्रीय विशिष्टीकरण कृषि नियोजन, कृषि व्यापार एवं क्षेत्रीय विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

भारत में फसल प्रतिरूप को प्रभावित करने वाले प्राकृतिक कारक

(Natural Factors Affecting Cropping Pattern in India)

(A) प्राकृतिक कारक

1. जलवायु (Climate):-

    जलवायु फसल प्रतिरूप का सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक कारक है। तापमान, वर्षा, आर्द्रता, सूर्य का प्रकाश तथा बढ़वार अवधि (Growing Season) विभिन्न फसलों की उपयुक्तता निर्धारित करते हैं। अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में धान, चाय एवं जूट जैसी फसलें उगाई जाती हैं, जबकि कम वर्षा वाले क्षेत्रों में गेहूँ, ज्वार, बाजरा एवं दलहन की खेती अधिक होती है। इसी प्रकार तापमान एवं आर्द्रता के अंतर के कारण भारत के विभिन्न भागों में फसल प्रतिरूप में स्पष्ट क्षेत्रीय भिन्नता दिखाई देती है।

2. मिट्टी (Soil):-

     मिट्टी का प्रकार, उसकी उर्वरता, बनावट, जलधारण क्षमता तथा पोषक तत्व फसल प्रतिरूप को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं। विभिन्न प्रकार की मिट्टियाँ अलग-अलग फसलों के लिए उपयुक्त होती हैं। उदाहरण के लिए, जलोढ़ मिट्टी धान, गेहूँ एवं गन्ने के लिए उपयुक्त है, काली मिट्टी कपास के लिए, लाल मिट्टी मोटे अनाज एवं दलहनों के लिए तथा लेटराइट मिट्टी चाय, कॉफी एवं रबर जैसी बागानी फसलों के लिए उपयुक्त मानी जाती है।

3. स्थलाकृति (Relief or Topography):-

    किसी क्षेत्र की ऊँचाई, ढाल तथा भौतिक संरचना भी फसल प्रतिरूप को प्रभावित करती है। समतल एवं उपजाऊ मैदानों में कृषि करना आसान होता है, इसलिए वहाँ धान, गेहूँ, गन्ना एवं अन्य खाद्यान्न फसलें प्रमुख होती हैं। इसके विपरीत पर्वतीय एवं ढाल वाले क्षेत्रों में सीढ़ीनुमा खेती (Terrace Farming) की जाती है, जहाँ चाय, कॉफी, फल एवं बागवानी फसलों का अधिक विकास हुआ है। इस प्रकार स्थलाकृति कृषि पद्धति एवं फसल चयन दोनों को प्रभावित करती है।

4. जल उपलब्धता (Availability of Water):-

    जल की उपलब्धता फसल प्रतिरूप का एक प्रमुख निर्धारक कारक है। जिन क्षेत्रों में सिंचाई सुविधाएँ विकसित हैं, वहाँ वर्ष में दो या तीन फसलें उगाई जाती हैं तथा धान, गन्ना एवं सब्जियों जैसी अधिक जल की आवश्यकता वाली फसलें सफलतापूर्वक उगाई जाती हैं। इसके विपरीत वर्षा-आश्रित क्षेत्रों में कम जल की आवश्यकता वाली फसलें, जैसे ज्वार, बाजरा, चना एवं दालें प्रमुख होती हैं। इसलिए सिंचाई सुविधाओं के विस्तार से फसल प्रतिरूप में महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिलता है।

(B) सामाजिक एवं आर्थिक कारक (Socio-Economic Factors)

1. जनसंख्या दबाव (Population Pressure):-

   जनसंख्या किसी भी क्षेत्र के फसल प्रतिरूप को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण सामाजिक कारक है। जिन क्षेत्रों में जनसंख्या घनत्व अधिक होता है, वहाँ खाद्यान्न फसलों जैसे धान, गेहूँ एवं मक्का को प्राथमिकता दी जाती है ताकि स्थानीय खाद्य आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके। दूसरी ओर, कम जनसंख्या वाले क्षेत्रों में व्यावसायिक एवं नकदी फसलों की खेती का विस्तार अपेक्षाकृत अधिक होता है।

2. बाजार (Market):-

   बाजार की मांग एवं मूल्य (Price) फसल प्रतिरूप को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करते हैं। जिन फसलों की बाजार में अधिक मांग एवं अच्छा मूल्य मिलता है, किसान उनकी खेती को प्राथमिकता देते हैं। शहरी क्षेत्रों के निकट फल, सब्जियाँ, फूल तथा डेयरी से संबंधित फसलों का उत्पादन अधिक होता है, जबकि औद्योगिक क्षेत्रों में कपास, गन्ना एवं तंबाकू जैसी नकदी फसलों का विस्तार देखा जाता है।

3. परिवहन एवं संचार (Transport and Communication):-

    विकसित परिवहन एवं संचार सुविधाएँ कृषि उत्पादों को शीघ्र एवं सुरक्षित रूप से बाजार तक पहुँचाने में सहायता करती हैं। सड़क, रेल एवं शीत-श्रृंखला (Cold Chain) जैसी सुविधाओं के विकास से शीघ्र नष्ट होने वाली फसलों, जैसे फल, सब्जियाँ एवं फूलों की खेती को बढ़ावा मिलता है। इसलिए बेहतर परिवहन व्यवस्था वाले क्षेत्रों में व्यावसायिक कृषि का अधिक विकास होता है।

4. सरकारी नीतियाँ (Government Policies):-

     सरकार की कृषि नीतियाँ फसल प्रतिरूप को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), कृषि सब्सिडी, फसल बीमा, सिंचाई योजनाएँ, उर्वरक सहायता, कृषि ऋण तथा विभिन्न सरकारी योजनाएँ किसानों को विशेष फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहित करती हैं। इसके परिणामस्वरूप कई क्षेत्रों में फसल प्रतिरूप में परिवर्तन देखने को मिलता है।

5. तकनीकी विकास (Technological Development):-

    आधुनिक कृषि तकनीकों ने भारत के फसल प्रतिरूप में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए हैं। उच्च उपज देने वाली किस्में (HYV Seeds), रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक, कृषि यंत्रीकरण, ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई तथा आधुनिक कृषि उपकरणों के उपयोग से उत्पादकता में वृद्धि हुई है। इन तकनीकों के कारण किसान पारंपरिक फसलों के स्थान पर अधिक लाभदायक एवं व्यावसायिक फसलों की खेती अपनाने लगे हैं, जिससे कृषि का आधुनिकीकरण एवं फसल विविधीकरण दोनों को बढ़ावा मिला है।

भारत की प्रमुख फसल ऋतुएँ
फसल ऋतु बुवाई कटाई प्रमुख फसलें
खरीफ जून–जुलाई सितंबर–अक्टूबर धान, मक्का, बाजरा, कपास, सोयाबीन
रबी अक्टूबर–नवंबर मार्च–अप्रैल गेहूँ, चना, सरसों, जौ
जायद मार्च–अप्रैल जून तरबूज, खरबूज, खीरा, सब्जियाँ

भारत में प्रमुख फसल प्रतिरूप

1. धान प्रधान प्रतिरूप- पश्चिम बंगाल, बिहार, असम, ओडिशा, छत्तीसगढ़

2. गेहूँ प्रधान प्रतिरूप- पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश,

3. कपास प्रतिरूप- महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना

4. गन्ना प्रतिरूप- उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक

5. चाय प्रतिरूप- असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु,

6. कॉफी प्रतिरूप- कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु

भारत में फसल प्रतिरूप की समस्याएँ (Problems of Cropping Pattern in India)

1. मानसून पर अत्यधिक निर्भरता (Excessive Dependence on Monsoon):-

    भारत के लगभग आधे कृषि क्षेत्र आज भी वर्षा आधारित (Rainfed) कृषि पर निर्भर हैं। यदि मानसून समय पर न आए या वर्षा कम अथवा असमान हो, तो फसल उत्पादन प्रभावित होता है। इससे फसल प्रतिरूप में अस्थिरता आती है तथा किसानों को आर्थिक हानि उठानी पड़ती है।

2. भूमि जोतों का छोटा आकार (Small and Fragmented Land Holdings):-

    भारत में अधिकांश किसानों के पास छोटे एवं बिखरे हुए कृषि जोत हैं। छोटी जोतों के कारण आधुनिक कृषि तकनीकों का उपयोग, यंत्रीकरण तथा फसल विविधीकरण कठिन हो जाता है। परिणामस्वरूप किसान पारंपरिक फसलों की खेती तक सीमित रह जाते हैं।

3. सिंचाई सुविधाओं का असमान वितरण (Unequal Distribution of Irrigation Facilities):-

     देश के सभी क्षेत्रों में सिंचाई सुविधाएँ समान रूप से उपलब्ध नहीं हैं। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में सिंचाई का व्यापक विकास हुआ है, जबकि पूर्वी एवं मध्य भारत के अनेक क्षेत्र आज भी वर्षा पर निर्भर हैं। इससे विभिन्न क्षेत्रों के फसल प्रतिरूप में असमानता उत्पन्न होती है।

4. मृदा क्षरण एवं उर्वरता में कमी (Soil Erosion and Declining Soil Fertility):-

    लगातार एक ही फसल की खेती (Monocropping), रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग, वनों की कटाई तथा जल एवं वायु अपरदन के कारण मिट्टी की उर्वरता कम होती जा रही है। इससे कृषि उत्पादकता घटती है और फसल प्रतिरूप पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

5. जलवायु परिवर्तन (Climate Change):-

     तापमान में वृद्धि, अनियमित वर्षा, सूखा, बाढ़ तथा अन्य प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती घटनाएँ फसल प्रतिरूप को प्रभावित कर रही हैं। बदलती जलवायु के कारण कई क्षेत्रों में पारंपरिक फसलें कम उपयुक्त होती जा रही हैं, जिससे किसानों को नई फसलों की ओर जाना पड़ रहा है।

6. नकदी फसलों पर बढ़ती निर्भरता (Increasing Dependence on Cash Crops):-

   अधिक लाभ प्राप्त करने की इच्छा से किसान खाद्यान्न फसलों की अपेक्षा गन्ना, कपास, तंबाकू, गन्ना, सोयाबीन एवं अन्य नकदी फसलों की खेती को प्राथमिकता देने लगे हैं। इससे कई क्षेत्रों में खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित होता है तथा खाद्य सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

7. कृषि लागत में वृद्धि (Rising Cost of Cultivation):-

     बीज, उर्वरक, कीटनाशक, डीज़ल, बिजली, सिंचाई तथा कृषि मशीनों की बढ़ती लागत के कारण खेती महँगी होती जा रही है। सीमांत एवं छोटे किसानों के लिए नई फसलें अपनाना कठिन हो जाता है, जिससे फसल प्रतिरूप में संतुलित परिवर्तन नहीं हो पाता और कृषि की लाभप्रदता भी प्रभावित होती है।

निष्कर्ष:

    भारत का फसल प्रतिरूप प्राकृतिक संसाधनों, जलवायु, मिट्टी, सिंचाई, बाजार, तकनीकी विकास तथा सरकारी नीतियों का संयुक्त परिणाम है। हरित क्रांति, सिंचाई विस्तार एवं कृषि आधुनिकीकरण के कारण इसमें महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। वर्तमान समय में फसल विविधीकरण, जल संरक्षण, सतत कृषि एवं जलवायु-अनुकूल कृषि प्रणाली को अपनाकर भारत के फसल प्रतिरूप को अधिक संतुलित, उत्पादक एवं टिकाऊ बनाया जा सकता है। यह खाद्य सुरक्षा, किसानों की आय वृद्धि तथा ग्रामीण विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है।

I ‘Dr. Amar Kumar’ am working as an Assistant Professor in The Department Of Geography in PPU, Patna (Bihar) India. I want to help the students and study lovers across the world who face difficulties to gather the information and knowledge about Geography. I think my latest UNIQUE GEOGRAPHY NOTES are more useful for them and I publish all types of notes regularly.

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