11. Crop Combination and Crop Diversification / फसल संयोजन एवं फसल विविधीकरण
Crop Combination and Crop Diversificationफसल संयोजन एवं फसल विविधीकरण |
परिचय:
कृषि भूगोल (Agricultural Geography) में फसलों के वितरण, उत्पादन तथा कृषि पद्धतियों का अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण है। किसी क्षेत्र में एक से अधिक फसलों की खेती की जाती है, जिनका अनुपात एवं वितरण अलग-अलग होता है। इसी आधार पर फसल संयोजन (Crop Combination) तथा फसल विविधीकरण (Crop Diversification) की अवधारणाएँ विकसित हुई हैं। ये दोनों अवधारणाएँ कृषि प्रदेशों के निर्धारण, कृषि नियोजन तथा संसाधनों के समुचित उपयोग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
फसल संयोजन (Crop Combination):
किसी क्षेत्र में एक साथ उगाई जाने वाली प्रमुख फसलों के समूह को फसल संयोजन कहते हैं। दूसरे शब्दों में, किसी कृषि क्षेत्र में जिन फसलों का संयुक्त रूप से सर्वाधिक क्षेत्रफल होता है, उन्हें उस क्षेत्र का फसल संयोजन कहा जाता है।
परिभाषा:
वीवर (J. C. Weaver, 1954) के अनुसार-
“किसी क्षेत्र में सर्वाधिक भूमि पर उगाई जाने वाली फसलों का समूह ही उस क्षेत्र का फसल संयोजन कहलाता है।”
फसल संयोजन की विशेषताएँ (Characteristics of Crop Combination)
1. अनेक फसलों का संयुक्त वितरण (Combined Distribution of Crops):-
फसल संयोजन की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि किसी क्षेत्र में एक से अधिक प्रमुख फसलें एक साथ उगाई जाती हैं। ये फसलें कुल कृषि क्षेत्र के अधिकांश भाग पर फैली होती हैं तथा उस क्षेत्र की कृषि संरचना एवं कृषि व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करती हैं। फसलों का यह संयुक्त वितरण कृषि भूगोल के अध्ययन का आधार बनता है।
2. कृषि प्रदेशों के निर्धारण का आधार (Basis for Delineation of Agricultural Regions):-
फसल संयोजन कृषि प्रदेशों के वैज्ञानिक वर्गीकरण का महत्वपूर्ण आधार है। जिन क्षेत्रों में समान प्रकार की प्रमुख फसलें उगाई जाती हैं, उन्हें एक ही कृषि प्रदेश में शामिल किया जाता है। इससे कृषि की क्षेत्रीय विशेषताओं का अध्ययन तथा कृषि नियोजन अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकता है।
3. प्राकृतिक कारकों से प्रभावित (Influenced by Physical Factors):-
फसल संयोजन मुख्यतः जलवायु, वर्षा, तापमान, मिट्टी, स्थलाकृति तथा जल संसाधनों जैसे प्राकृतिक कारकों पर निर्भर करता है। इन कारकों में परिवर्तन होने पर फसलों का प्रकार एवं उनका क्षेत्रफल भी बदल जाता है। इसलिए प्रत्येक क्षेत्र का फसल संयोजन उसकी प्राकृतिक परिस्थितियों के अनुरूप विकसित होता है।
4. कृषि विशेषीकरण का द्योतक (Indicator of Agricultural Specialization):-
फसल संयोजन किसी क्षेत्र की कृषि विशेषता एवं उत्पादन प्रवृत्ति को स्पष्ट करता है। इससे यह ज्ञात होता है कि उस क्षेत्र में कौन-सी फसलें प्रमुख हैं तथा कृषि किस दिशा में विशेषीकृत (Specialized) है। उदाहरण के लिए, पंजाब गेहूँ उत्पादन तथा असम चाय उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है।
5. क्षेत्रीय एवं स्थानिक भिन्नता (Regional and Spatial Variation):-
फसल संयोजन में स्थानिक (Spatial) एवं क्षेत्रीय (Regional) भिन्नता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। प्रत्येक क्षेत्र का फसल संयोजन उसकी भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग होता है। इसलिए एक ही देश में विभिन्न प्रकार के फसल संयोजन पाए जाते हैं।
6. कृषि नियोजन एवं संसाधन प्रबंधन में उपयोगी (Useful for Agricultural Planning and Resource Management):-
फसल संयोजन का अध्ययन कृषि विकास, भूमि उपयोग नियोजन, सिंचाई प्रबंधन, फसल चक्र, उर्वरक उपयोग, कृषि निवेश तथा क्षेत्रीय कृषि योजनाओं के निर्माण में अत्यंत उपयोगी है। इसके आधार पर संसाधनों का संतुलित उपयोग, कृषि उत्पादकता में वृद्धि तथा सतत कृषि विकास (Sustainable Agricultural Development) को बढ़ावा दिया जा सकता है।
फसल संयोजन को प्रभावित करने वाले कारक (Factors Affecting Crop Combination)
1. जलवायु (Climate):-
जलवायु फसल संयोजन का सबसे महत्वपूर्ण निर्धारक है। किसी क्षेत्र का तापमान, वर्षा, आर्द्रता, सूर्यप्रकाश तथा फसल वृद्धि अवधि (Growing Season) यह निर्धारित करते हैं कि वहाँ कौन-सी फसलें सफलतापूर्वक उगाई जा सकती हैं। उदाहरण के लिए, अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में धान तथा कम वर्षा वाले शुष्क क्षेत्रों में बाजरा, ज्वार एवं दालों की खेती प्रमुख होती है। इसलिए जलवायु में परिवर्तन होने पर फसल संयोजन भी बदल जाता है।
2. मिट्टी (Soil):-
मिट्टी का प्रकार, उर्वरता, बनावट, जलधारण क्षमता एवं पोषक तत्व फसल संयोजन को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करते हैं। प्रत्येक फसल के लिए विशिष्ट प्रकार की मिट्टी उपयुक्त होती है। उदाहरणतः जलोढ़ मिट्टी में धान एवं गेहूँ, काली मिट्टी में कपास, लाल मिट्टी में दलहन एवं तिलहन तथा लेटराइट मिट्टी में चाय एवं रबर जैसी फसलों की खेती अधिक सफल होती है।
3. सिंचाई सुविधाएँ (Irrigation Facilities):-
सिंचाई फसल संयोजन का एक प्रमुख निर्धारक है। जहाँ नहर, ट्यूबवेल, कुएँ एवं अन्य सिंचाई साधनों की पर्याप्त व्यवस्था होती है, वहाँ किसान वर्ष में दो या तीन फसलें उगाने में सक्षम होते हैं। पर्याप्त सिंचाई वाले क्षेत्रों में गेहूँ, धान, गन्ना एवं सब्जियों जैसी अधिक जल की आवश्यकता वाली फसलें प्रमुख होती हैं, जबकि वर्षा आधारित क्षेत्रों में सूखा-सहिष्णु फसलें अधिक उगाई जाती हैं।
4. बाजार एवं परिवहन (Market and Transportation):-
बाजार की मांग, कृषि उत्पादों का मूल्य तथा परिवहन सुविधाओं का विकास फसल संयोजन को प्रभावित करता है। जिन क्षेत्रों में बाजार एवं परिवहन की सुविधाएँ बेहतर होती हैं, वहाँ किसान अधिक लाभदायक नकदी फसलें, फल, सब्जियाँ, फूल एवं बागवानी फसलें उगाने के लिए प्रेरित होते हैं। शहरी क्षेत्रों के निकट व्यावसायिक कृषि का विकास इसी कारण अधिक देखा जाता है।
5. आधुनिक तकनीक (Modern Technology):-
आधुनिक कृषि तकनीक जैसे उच्च उपज देने वाले बीज (HYV Seeds), रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक, कृषि यंत्रीकरण, ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई तथा वैज्ञानिक कृषि पद्धतियाँ फसल संयोजन में महत्वपूर्ण परिवर्तन लाती हैं। इन तकनीकों से कृषि उत्पादकता बढ़ती है, उत्पादन लागत कम होती है तथा किसान नई एवं अधिक लाभदायक फसलों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित होते हैं। इसके परिणामस्वरूप कृषि का आधुनिकीकरण एवं फसल संयोजन में विविधता आती है।
फसल संयोजन के प्रमुख सिद्धांत
(Major Theories of Crop Combination)
1. वीवर का न्यूनतम विचलन सिद्धांत (Weaver’s Minimum Deviation Method, 1954):-
अमेरिकी भूगोलवेत्ता जे. सी. वीवर (J. C. Weaver) ने 1954 में फसल संयोजन निर्धारण की सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं वैज्ञानिक विधि प्रस्तुत की। इस विधि में किसी क्षेत्र की विभिन्न फसलों के वास्तविक क्षेत्रफल प्रतिशत (Observed Percentage) की तुलना सैद्धांतिक प्रतिशत (Theoretical Percentage) से की जाती है। जिस संयोजन में वास्तविक एवं सैद्धांतिक प्रतिशत के बीच न्यूनतम विचलन (Minimum Deviation) प्राप्त होता है, वही उस क्षेत्र का वास्तविक फसल संयोजन माना जाता है। कृषि भूगोल में यह विधि सबसे अधिक प्रचलित है।
2. डोई की संशोधित विधि (Doi’s Modified Method):-
डोई (Doi) ने वीवर की न्यूनतम विचलन विधि में सुधार करते हुए एक संशोधित पद्धति प्रस्तुत की। इस विधि में गणना अपेक्षाकृत सरल होती है तथा फसल संयोजन का निर्धारण अधिक व्यावहारिक एवं सटीक रूप से किया जा सकता है। विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहाँ अनेक फसलें समान अनुपात में उगाई जाती हैं, वहाँ यह विधि अधिक उपयोगी मानी जाती है। इसलिए इसे वीवर विधि का उन्नत रूप माना जाता है।
3. रफीउल्लाह विधि (Rafiullah Method):-
रफीउल्लाह ने भारतीय कृषि परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए फसल संयोजन निर्धारण की एक संशोधित विधि विकसित की। इस पद्धति में भारतीय कृषि की क्षेत्रीय विविधता, बहुफसली कृषि तथा फसलों के वास्तविक वितरण को अधिक महत्व दिया गया है। भारतीय कृषि भूगोल के अध्ययन, कृषि प्रदेशों के निर्धारण तथा क्षेत्रीय कृषि विश्लेषण में इस विधि का व्यापक उपयोग किया जाता है। यह भारतीय परिस्थितियों के लिए अधिक उपयुक्त एवं व्यावहारिक मानी जाती है।
फसल संयोजन का महत्व (Importance of Crop Combination)
1. कृषि प्रदेशों का निर्धारण:-
फसल संयोजन किसी क्षेत्र की प्रमुख फसलों की पहचान करने में सहायता करता है। इसके आधार पर समान कृषि विशेषताओं वाले क्षेत्रों का वैज्ञानिक वर्गीकरण (Agricultural Regionalization) किया जाता है, जिससे कृषि प्रदेशों का निर्धारण सरल हो जाता है।
2. कृषि नियोजन में सहायता:-
फसल संयोजन का अध्ययन कृषि विकास योजनाओं, सिंचाई, उन्नत बीज, उर्वरकों तथा कृषि तकनीकों के उचित वितरण में सहायक होता है। इससे संसाधनों का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित किया जा सकता है।
3. भूमि उपयोग विश्लेषण:-
यह किसी क्षेत्र में विभिन्न फसलों के भूमि उपयोग प्रतिरूप (Land Use Pattern) को स्पष्ट करता है। इसके आधार पर भूमि की उत्पादकता का मूल्यांकन तथा उपयुक्त फसल चयन किया जाता है।
4. कृषि उत्पादन में वृद्धि:-
फसल संयोजन के अध्ययन से क्षेत्र की जलवायु एवं मिट्टी के अनुसार उपयुक्त फसलों का चयन किया जा सकता है, जिससे कृषि उत्पादन और किसानों की आय में वृद्धि होती है।
5. क्षेत्रीय कृषि विकास का अध्ययन:-
फसल संयोजन विभिन्न क्षेत्रों की कृषि संरचना, उत्पादन क्षमता तथा विकास स्तर को समझने में सहायक होता है। इससे क्षेत्रीय असमानताओं की पहचान कर संतुलित कृषि विकास की योजनाएँ बनाई जा सकती हैं।
फसल संयोजन (Crop Combination) का उदाहरण
फसल विविधीकरण(Crop Diversification) |
परिचय:
जब किसान केवल एक या दो फसलों पर निर्भर न रहकर अनेक प्रकार की खाद्यान्न, दलहन, तिलहन, बागवानी एवं नकदी फसलों की खेती करता है, तो इसे फसल विविधीकरण कहा जाता है।
परिभाषा:
फसल विविधीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें कृषि जोखिम कम करने तथा आय बढ़ाने के उद्देश्य से विभिन्न प्रकार की फसलों की खेती की जाती है।
उद्देश्य:
✍️ किसानों की आय बढ़ाना।
✍️ कृषि जोखिम कम करना।
✍️ भूमि की उर्वरता बनाए रखना।
✍️ खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना।
✍️ बाजार की मांग को पूरा करना।
भारत में हरित क्रांति के बाद गेहूँ एवं धान का प्रभुत्व बढ़ा, किन्तु वर्तमान में बागवानी, फल, सब्जी, दलहन, तिलहन, औषधीय पौधे तथा व्यावसायिक फसलों की ओर विविधीकरण तेजी से बढ़ रहा है। पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात तथा बिहार में भी फसल विविधीकरण को प्रोत्साहन दिया जा रहा है।
फसल संयोजन एवं फसल विविधीकरण में अंतर
| आधार | फसल संयोजन | फसल विविधीकरण |
| अर्थ | प्रमुख फसलों का समूह | अनेक प्रकार की फसलों की खेती |
| उद्देश्य | कृषि प्रदेशों का निर्धारण | आय एवं जोखिम प्रबंधन |
| आधार | क्षेत्रीय वितरण | कृषि प्रणाली में परिवर्तन |
| प्रमुख विद्वान | जे. सी. वीवर | आधुनिक कृषि नीति |
| उपयोग | कृषि भूगोल | कृषि विकास एवं नियोजन |
फसल संयोजन एवं फसल विविधीकरण कृषि भूगोल की दो महत्वपूर्ण अवधारणाएँ हैं। फसल संयोजन किसी क्षेत्र की प्रमुख फसलों के वितरण एवं कृषि विशेषीकरण को दर्शाता है, जबकि फसल विविधीकरण कृषि को अधिक लाभकारी, टिकाऊ एवं जोखिम-मुक्त बनाने की प्रक्रिया है। वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन, खाद्य सुरक्षा तथा किसानों की आय बढ़ाने के लिए फसल विविधीकरण अत्यंत आवश्यक माना जाता है। वहीं फसल संयोजन कृषि प्रदेशों के वैज्ञानिक वर्गीकरण एवं क्षेत्रीय कृषि नियोजन का आधार प्रदान करता है।

