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26. अनुप्रस्थ काट (Cross Section)

26. अनुप्रस्थ काट (Cross Section)



अनुप्रस्थ काट

        किसी समोच्च मानचित्र में अंकित किसी रेखा के सहारे त्रिमितीय धरातल का द्विमितीय (लम्बाई एवं ऊंचाई) पार्श्व चित्र ही अनुप्रस्थ काट (Cross Section) कहलाता है।

       अनुप्रस्थ काट सामान्यतः निम्नलिखित विधियों से खींचें जाते हैं।

⇒ सीधी रेखा के सहारे (Along a Straight Line)-

(i) लम्ब डालकर, एवं

(ii) कागज की पट्टी विधि।

(i) लम्ब डालकर (By drawing perpendiculars):-

       मानचित्र पर समोच्च रेखाएँ इस विधि द्वारा बनायी जाती है। समोच्च मानचित्र में एक AB रेखा को बाह्य सीमा के समानान्तर खीचा। मानचित्र के बाहर नीचे की ओर AB के समानान्तर एवं बराबर लम्बी CD रेखा खींच लें।

        अब जितनी समोच्च रेखाओं को AB रेखा काटती है, उतनी ही लम्बवत् रेखाएँ नीचे की CD रेखा की ओर अनुकूल दूरी पर खींच लें। CD के दोनों ओर लम्ब डालकर उसे पेन्सिल से AB से मिला दें। अब इस लम्बवत् AC रेखा के निचले भाग के बाहर की ओर धरातल की प्रकृति के अनुसार एवं समोच्च रेखाओं के फैलाव या मान के अनुसार ऊँचाइयाँ अंकित कर CD के समानान्तर या आड़ी रेखाएँ खीच लें।

     अतः वह रेखा जिसके सहारे अनुप्रस्थ काट का पार्श्व चित्र (Cross Section) खींचा जाता है, उसे अनुदैर्ध्य रेखा (Line of Profile) कहते हैं। AB रेखा समोच्च रेखाओं को जिन बिन्दुओं पर काटती हुई जाती है, उनसे CD की ओर कटी हुई रेखाओं की तरह लम्ब डालते हुए उन्हें सम्बन्धित ऊँचाई वाली आड़ी रेखा पर मिलाया।

       इस विधि से जो बिन्दु मानचित्र के नीचे के रेखाचित्र पर आये, उन्हें एक गहरी रेखा द्वारा मिला दें। यही आकृति AB रेखा के सहारे आने वाली समोच्च आकृति का अनुप्रस्थ काट है। इसमें मानचित्र एवं अनुप्रस्थ काट दोनों ही की रेखाएँ समानान्तर एवं बराबर लम्बी होने से शुद्ध होगी। इससे आसानी से क्षैतिज और लम्बवत् दोनों ही मापनियों का अनुपात निश्चित किया जा सकता है। प्रायः लम्बवत् मापनी क्षैतिज मापनी से कई गुना अधिक होती है।

(ii) कागज की पट्टी विधि द्वारा (By Strip Mehtod):-

        व्यवहार में समोच्च रेखाओं से बनी आकृतियों का अनुप्रस्थ काट प्रायः तिर्यक् या तिरछी रेखा खींचकर बनाना होता है। ऐसे मानचित्रों का अनुप्रस्थ काट यदि तिरछी रेखा पर ही लम्ब डालकर खींचा जायेगा तो वहाँ दूरी सिकुड़ जाने से पूर्णतः गलत होगा।

        इसमें धरातल की समानुपातिक लम्बाई भी सही-सही नहीं बताई जा सकती। अतः ऐसी तिरछी या तिर्यक रेखा के सहारे आने वाले धरातल का सही अनुप्रस्थ काट खींचने के लिये एक मुड़ी हुई साफ कागज की पट्टी लेकर उसे चित्र (B) की भाँति तिर्यक रेखा के सहारे सटाते हुए इस प्रकार रखेंगे कि यह पट्टी पूरी रेखा पर आ जाय।

        इस पट्टी को जिस ऊँचाई की समोच्च रेखा जहाँ-जहाँ पर छूती है, वहाँ-वहाँ पर छोटे-छोटे चिह्न पट्टी पर अंकित कर उन पर बीच-बीच में ऊँचाई लिख दी जाती है। चोटियों व सबसे निम्न भागों में सुविधा के लिए ढाल के अनुसार तीर खींच दें।

      अब मानचित्र के बाहर सुविधाजनक स्थान पर कागज की पट्टी के दोनों पर्श्वीय बिन्दुओं की लम्बाई के बराबर सीधी रेखा खींचकर उसके दोनों किनारे पर लम्ब डाल दें। इन लम्बों पर 1″ या सुविधाजनक दूरी लेकर ऊँचाइयाँ अंकित करने हेतु तल रेखा के समानान्तर अन्य रेखाएँ खींच लें।

       अब जिस पट्टी पर ऊँचाइयाँ अकित की गई है, उस कागज की पट्टी को पुनः तल रेखा पर रखकर उस पर अंकित चिह्नों की ऊँचाई के अनुसार ऊपर की ओर लम्ब खींचे। इन लम्बों के शीर्ष बिन्दुओं को जोड़ते हुए एक गहरी रेखा खींच लें, इस रेखा को खींचते समय शीर्ष और निम्न स्थल के पास लगे तीरों को ध्यान में रखना चाहिये। अतः यही तिर्यक रेखा के सहारे खींचा गया सही अनुप्रस्थ काट है। यहाँ इस आकृति की आधार रेखा की लम्बाई तिर्यक अनुदैर्ध्य रेखा के बराबर है।

⇒ लम्बवत् मापनी एवं लम्बवत् अभिवृद्धि (Vertical Scale and Vertical Exaggeration):-

      समोच्च मानचित्र में धरातल जटिल बना रहता है, अतः इससे अनुप्रस्थ काट (Cross Section) बनाते समय लम्बवत् मापनी की ओर भी ध्यान रखा जाना चाहिये। क्षैतिज विस्तार एवं लम्बवत् अभिवृद्धि के बीच मापनी के आधार पर अन्तः सम्बन्ध रहता है। इसमें धरातल के स्वरूप- मैदान, पहाड़ी, पठार, पर्वत, आदि के ढाल को ध्यान में खा जाता है।

अनुप्रस्थ काट

अन्य उदहारण


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25. खनिजों के भौतिक गुण एवं पहचान (Properties and Identification of Minerals)

25. खनिजों के भौतिक गुण एवं पहचान

(Properties and Identification of Minerals)


      खनिजों की पहचान उनकी भौतिक विशेषताओं या गुणों के आधार पर कर सकते हैं। खनिजों के मुख्य गुण इस प्रकार हैं-

1. रंग (Colour)

2. चमक (Lustre )

3. विशिष्ट गुरुत्व (Specific gravity)

4. कठोरता (Hardness)

5. दरार (Cleavage)

6. धारी (Streak)

7. विशेष गुण (Special characteristics)

1. रंग (Colour):-

    किसी खनिज का सबसे स्पष्ट गुण उसका रंग है। खनिजों के रंग का निर्धारण उनकी परमाणविक संरचना से तथा कुछ में अशुद्धियों के कारण होता है। वैसे तो कई खनिजों का रंग एक जैसा होता है। उदाहरण के लिए, कई खनिज हरे रंग के होते हैं। जैसे- ओलिवाइन, एपिडोट और एक्टिनोलाइट आदि। लेकिन यदि रासायनिक संरचना में अशुद्धियाँ हैं, जैसे कि क्वार्ट्ज तो एक खनिज कई अलग-अलग रंग ले सकता है, जो स्पष्ट, धुएँ के रंग का गुलाबी, बैंगनी या पीला हो सकता है।

       खनिजों के रंग का विशिष्ट निदान नहीं होने का एक कारण यह है कि क्रिस्टल संरचना और संरचना के कई घटक हैं जो रंग उत्पन्न कर सकते हैं। लौह जैसे कुछ तत्वों की उपस्थिति से सदैव एक रंगीन खनिज बनता है, लेकिन लौह अपने ऑक्सीकरण की स्थिति के आधार पर विभिन्न प्रकार के रंग उत्पन्न कर सकता है। ये रंग आमतौर पर काला, लाल या हरा होता है।

       कुछ खनिजों की क्रिस्टल संरचना में रंग-उत्पादक तत्व होते हैं। जैसे ओलिवाइन (Fe2SiO4), जबकि अन्य उन्हें क्वार्ट्स (SiO2) जैसी अशुद्धियों के रूप में शामिल करते हैं। यह सारी परिवर्तनशीलता किसी खनिज की पहचान के लिए केवल रंग का उपयोग करना कठिन बना देती है। हालाँकि, क्रिस्टल रूप जैसे अन्य गुणों के संयोजन में, रंग संभावनाओं को कम करने में सहायता कर सकता है। उदाहरण के लिए, हॉर्नब्लेंड, बायोटाइट एवं मस्कोवाइट सभी आमतौर पर ग्रेनाइट जैसी चट्टानों में पाए जाते हैं।

       हॉर्नब्लेंड और बायोटाइट दोनों काले हैं, लेकिन उन्हें उनके क्रिस्टल रूप से उनकी पहचान आसानी से की जा सकती है क्योंकि बायोटाइट शीट में होता है, जबकि हॉर्नब्लेंड मजबूत प्रिज्म बनाता है। मास्कोवाइट और बायोटाइट दोनों शीट में बनते हैं, लेकिन वे अलग-अलग रंग के होते हैं। वास्तव में मस्कोवाइट रंगहीन होता है।

2. चमक या आभा (Lustre):-

    प्रत्येक खनिज की अपनी चमक होती है, जैसे- मेटैलिक, रेशमी, ग्लॉसी आदि। चमक या आभा शब्द से तात्पर्य प्रकाश की मात्रा एवं गुणवत्ता से है जो किसी खनिज की बाहरी सतहों से परावर्तित होती है। चमक इस बात का आंकलन प्रदान करती है कि खनिज सतह कितनी ‘चमकती’ है।

       किसी खनिज की चमक वह तरीका है जिससे वह प्रकाश को प्रतिबिंबित करता है। एक खनिज जो कांच की तरह प्रकाश को परावर्तित करता है, उसमें काँच (Vitreous) जैसी या ग्लासी चमक होती है।

      एक खनिज जो क्रोम की तरह प्रकाश को परावर्तित करता है उसमें धात्विक (Metallic) चमक होती है। चमक के लिए विभिन्न प्रकार की अन्य संभावनाएँ भी हैं, जिनमें मोती (pearly), मोमी (waxy) एवं राल (resinous) शामिल है। जो खनिज हीरे की तरह अदम्य या शानदार परावर्तक होते हैं उनमें अदम्य चमक होती है। थोड़े से प्रयास से, चमक को आसानी से पहचाना जा सकता है साथ ही यह अत्यन्त विशिष्ट होते हैं। विशेषकर उन खनिजों के लिए जो जैसे कई रंगों में होते हैं।

(i) धात्विक या चमकदार (Metallic or splendent):-

        खनिजों में पॉलिश धातु की चमक होती है और आदर्श सतहें परावर्तक सतहों के रूप में काम करती है, जैसे गैलेना, पाइराइट एवं मैग्नेटाइट।

(ii) विट्रियस (Vitreous):-

     यह शब्द लैटिन भाषा के ग्लास, विट्रियम से लिया गया है। यह चमक का एक ऐसा प्रकार है जो खनिजों में सबसे अधिक देखा जाता है और अपेक्षाकृत कम अपवर्तक सूचकांक वाले पारदर्शी या पारभासी खनिजों में होती है। जैसे- कैल्साइट, क्वार्ट पुखराज, बेरिल, टूमलाइन और फ्लोराइट आदि।

(iii) रालयुक्त (Resinous):-

      रालयुक्त चमक की सतह पर राल जैसी चमक होती है। ऐसी सामग्रियों का अपवर्तनांक 2.0 से अधिक होता है। स्पैलेराइट (ZnS) एक रालयुक्त चमक प्रदर्शित करता है।

(iv) फीके या मटमैले (Dull or Earthy):-

   फीके या मटमैले चमक वाले खनिज, प्रकाश को बहुत खराब तरीके से परावर्तित करते हैं एवं चमकते नहीं हैं। ऐसी चमक अक्सर उन खनिजों में देखी जाती है जो छोटे-छोटे दानों के समूह से बने होते हैं।

(v) मोती (Pearly):-

   मोती की चमक इंद्रधनुषी, ओपेलेसेंट या मोती जैसी दिखाई देती है। यह सामान्यतः खनिज सतहों द्वारा प्रदर्शित होता है जो पूर्ण दरार के विमानों के समानांतर होते हैं। टैल्क जैसे परत सिलिकेट अक्सर दरार वाली सतहों पर मोती जैसी चमक प्रदर्शित करते हैं।

(vi) चिकनाई (Greasy):-

     एक सतह जिसमें चिपचिपी चमक होती है वह तेल की एक पतली परत से ढकी हुई प्रतीत होती है। एक प्रकाश प्रकीर्णन सतह जो थोड़ी खुरदरी होती है, चिकनाई वाली चमक प्रदर्शित कर सकती है, जैसे- नफाइना।

(vii) रेशमी (Silky):-

     जब प्रकाश बारीक समानांतर रेशों के समुच्चय से परावर्तित होता है तो उत्पन्न चमक रेशमी चमक होती है। मैलाकाइट और सर्पेन्टाइन दोनों रेशमी चमक प्रदर्शित कर सकते हैं।

(viii) एडमैंटाइन या ब्रिलियंट (Adamantine or brilliant):-

      हीरे का चमकदार प्रतिबिंब एडमेंटाइन के रूप में जाना जाता है। एडामेंटाइन चमक वाले खनिजों में उच्च अपवर्तक सूचकांक (1.9-2.6) होते हैं और ये अत्यधिक फैलाव वाले और पारभासी होते हैं।

3. कठोरता (Hardness):-

      खनिज कठोर एवं कोमल दोनों प्रकार के होते हैं, लेकिन अधिकांश खनिज कठोर ही होते हैं। कठोरता की डिग्री तुलानात्मक रूप से आसानी या कठिनाई को देखकर निर्धारित की जाती है किसी खनिज की कठोरता का परीक्षण कई तरीकों से किया जा सकता है। आमतौर पर खरोंच परीक्षण का उपयोग करके खनिजों की तुलना ज्ञात कठोरता की वस्तु से की जाती है।

       उदाहरण के लिए यदि कोई कील क्रिस्टल को खरोंच सकती है, तो कील उस खनिज की तुलना में कठोर है। 1800 के दशक की शुरुआत में लगभग 1812 में प्रसिद्ध भूविज्ञानी और खनिजविज्ञानी फ्रेंडरिक मोहस ने स्क्रैच परीक्षण के आधार पर एक सापेक्ष कठोरता पैमाना विकसित किया। उन्होंने प्रत्येक खनिज को पूर्णांक संख्याएँ दी, जहाँ 1 सबसे नरम और 10 सबसे कठोर है।

     यद्यपि इनका यह पैमाना रैखिक नहीं है (कोरंडम वास्तव में क्वार्ट्ज की तुलना में 4 गुना अधिक कठोर है), और अन्य तरीकों ने अब कठोरता के अधिक कठोर माप प्रदान किए हैं। मोहस पैमाने में सटीकता की कमी के बावजूद, यह आज भी उपयोगी बना हुआ है क्योंकि यह सरल याद रखने में आसान एवं परीक्षण करने में आसान है।

     पॉकेटनाइफ का स्टील (भूवैज्ञानिकों के लिए क्षेत्र में ले जाने के लिए एक सामान्य उपकरण) लगभग ठीक मध्य में पड़ता है, इसलिए ऊपरी आधे हिस्से को निचले आधे से अलग करना आसान होता है। उदाहरण के लिए, क्वार्ट्ज और कैल्साइट बिल्कुल एक समान दिखते हैं। दोनों रंगहीन एवं पारभासी हैं, और विभिन्न प्रकार की चट्टानों में पाए जाते हैं। लेकिन एक साधारण स्क्रैच परीक्षण उन्हें अलग बता सकता है।

      कैल्साइट को पॉकेटनाइफ या पत्थर के हथौड़े से खरोंचा जाएगा और क्वार्ट्ज को नहीं। जिप्सम भी काफी हद तक कैल्साइट जैसा दिख सकता है, लेकिन यह इतना नरम होता है कि इसे नाखून से खरोंचा जा सकता है। कठोरता में भिन्नता खनिजों को विभिन्न प्रयोजनों के लिए उपयोगी बनाती है।

       कैल्साइट की कोमलता इसे मूर्तिकला के लिए, एक लोकप्रिय सामग्री बनाती है (संगमरमर पूरी तरह से कैल्साइट से बना होता है) जबकि हीरे की कठोरता का मतलब है कि इसका उपयोग चट्टान को चमकाने के लिए अपघर्षक के रूप में किया जाता है।

खनिज कठोरता
Tak 1
Gypsum 2
Calcite 3
Fluorite 4
Apatite 5
Feldspar 6
Quartz 7
Topaz 8
Corundum 9
Diamond 10

4. क्रिस्टल रूप (Crystal form):-

    किसी खनिज क्रिस्टल अर्थात् कणों का ब्राह्मरूप (बाहरी आकार या उसका क्रिस्टल रूप) बहुत सीमा तक उसकी आंतरिक परमाणु संरचना द्वारा निर्धारित होता है, जिसका अर्थ है कि यह गुण अत्यधिक नैदानिक हो सकता है। खनिजों के कण घनाकार, अष्टभुजाकार या षट्भुजाकार भी हो सकते हैं। विशेष रूप से, क्रिस्टल के रूप को क्रिस्टल चेहरों के बीच कोणीय सम्बन्धों द्वारा परिभाषित किया जाता है। कुछ खनिज, जैसे हेलाइट (NaCl या नमक) और पाइराइट (FeS) का घन रूप (cubic form) होता है।

     अन्य जैसे टूमलाइन प्रिज्मीय (prismatic) है। कुछ खनिज जैसे अजुराइट और मैलाइट, जो दोनों ताँबे के अयस्क हैं, नियमित क्रिस्टल नहीं बनाते हैं, और अनाकार (amorphous) होते हैं।

   दुर्भाग्य से, हमें सदैव क्रिस्टल का रूप देखने को नहीं मिलता। हम पूर्ण क्रिस्टल तभी देख पाते हैं जब उन्हें किसी गुहा में विकसित होने का अवसर मिलता है, जैसे कि जियोड में। हालांकि, जब ठंडा मैग्मा के संदर्भ में क्रिस्टल बढ़ते हैं, तो वे अन्य सभी क्रिस्टल के साथ जगह के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे होते हैं जो बढ़ने का प्रयास कर रहे होते हैं और वे जितनी भी जगह भर सकते हैं, भर लेते हैं। क्रिस्टल का आकार उपलब्ध स्थान की मात्रा के आधार पर काफी भिन्न हो सकता है, लेकिन क्रिस्टल फेस के मध्य का कोण सदैव समान रहता है।

5. घनत्व (Density):-     

       खनिजों का घनत्व व्यापक रूप से लगभग 1.01 ग्राम / सेमी से लेकर लगभग 17.5 ग्राम/सेमी तक भिन्न होता है। पानी का घनत्व 1 ग्राम / सेमी है, शुद्ध लोहे का घनत्व 7.6 ग्राम/सेमी है, शुद्ध सोने का घनत्व 17.65 ग्राम सेमी है। इसलिए, खनिज पानी एवं शुद्ध सोने के मध्य घनत्व की सीमा पर होते हैं।

       किसी विशिष्ट खनिज के घनत्व को मापने के लिए समय लेने वाली तकनीकों की आवश्यकता होती है, और अधिकांश भूवैज्ञानिकों ने “सामान्य” घनत्व क्या है, इसके आकार के लिए असामान्य रूप से भारी क्या है, और असामान्य रूप से हल्का क्या है। इसके लिए अधिक सहज ज्ञान विकसित किया है। किसी चट्टान को “तौल” करके अनुभवी भूविज्ञानी आमतौर पर अनुमान लगा सकते हैं कि चट्टान किन खनिजों से बनी है।

6. दरार (विदलन) और फ्रैक्चर (Cleavage and Fracture):-

        खनिज विज्ञान में क्रिस्टलीय सामग्रियों की निश्चित क्रिस्टलोग्राफिक संरचनात्मक विमानों के साथ विभाजित होने की प्रवृत्ति है। सापेक्ष कमजोरी के ये स्तर क्रिस्टल में परमाणुओं और आयनों के नियमित स्थान का परिणाम हैं, जो चिकनी दोहराव वाली सतह बनाते हैं जो माइक्रोस्कोप और नग्न आँखों दोनों में दिखाई देते हैं। दरार क्रिस्टलोग्राफिक विमानों के समानांतर बनती है।

        इसे ऐसे भी समझा जा सकता है, कि अधिकांश खनिजों में उनकी परमाणु संरचनाओं के भीतर अंतर्निहित कमजोरियाँ होती हैं एक ऐसा तल जिसके साथ बंधन की ताकत आसपास के बंधनों से कम होती है। जब हथौड़े से मारा जाता है या अन्यथा तोड़ दिया जाता है, तो खनिज पहले से मौजूद कमजोरी के उस स्तर पर टूट जाएगा। इस प्रकार के टूटने को दरार कहा जाता है, और दरार की गुणवत्ता बंधन की ताकत के साथ बदलती रहती है।

         खनिजों में विदलन प्रकृति दिशा द्वारा निश्चित होती है। खनिज एक या अनेक दिशाओं में एक-दूसरे से कोई भी कोण बनाकर टूट सकते हैं। 

(i) बेसल या पिनाकोइडल दरार तब होती है जब केवल एक दरार तल होता है, जैसे-ग्रेफाइट, अभ्रक (Mica) (मास्कोवाइट या बायोटाइट)। यही कारण है कि अभ्रक को छीलकर पतली शीट में बदला जा सकता है।

(ii) क्यूबिक दरार तब होता है जब तीन दरार तल 90 डिग्री पर एक-दूसरे को काटते हैं। जैसे- हेलाइट, गैलेना।

(iii) अष्टफलकीय बिदलन तब होता है जब एक क्रिस्टल में चार विदलन तल होते हैं। अर्धचालकों के लिए अष्टफल्कीय विदलन सामान्य है। जैसे-हीरा, फ्लोराइट।

(iv) रौम्बोहेड्रल दरार तब होती है जब तीन दरार तल ऐसे कोणों पर एक-दूसरे को काटते हैं जो 90 डिग्री नहीं होते हैं जैसे-कैल्साइट।

(v) प्रिज्मीय दरार तब होती है जब एक क्रिस्टल में दो दरार तल होते हैं, जैसे- स्पोडुमिन।

(vi) डोडेकाहेड्रल दरार तब होती है जब एक क्रिस्टल में छह दरार तल होते हैं, जैसे स्पेलराइट।

7. खनिज वर्गीकरण प्रणाली (Mineral Classification Systems):-

       मध्य युग से 1800 के दशक के मध्य तक खनिजों के वर्गीकरण के लिए भौतिक गुण मुख्य आधार थे। खनिजों को कठोरता के अनुसार समूहीकृत किया गया था, जिसमें हीरा एवं कोरन्डम खनिज एक ही वर्ग में थे। जैसे-जैसे खनिजों की रासायनिक संरचना निर्धारित करने की क्षमता विकसित हुई, वैसे-वैसे एक नई वर्गीकरण प्रणाली भी विकसित हुई हैं।

      कई वैज्ञनिकों ने खनिज रासायनिक सूत्रों की खोज में योगदान दिया, लेकिन 1850 से 1892 तक येल विश्वविद्यालय के खनिज विज्ञानी जेम्स ड्वाइट डाना ने रासायनिक संरचना के आधार पर खनिजों के लिए वर्गीकरण प्रणाली विकसित को जो आज तक चल रही है। उन्होंने खनिजों को उनके आयनों के अनुसार समूहीकृत किया। एक रासायनिक वर्गीकरण प्रणाली का मतलब था कि जिन खनिजों को सैद्धांतिक रूप से एक साथ समूहीकृत किया गया था, वे भी चट्टानों में एक-दूसरे के साथ दिखाई देते थे क्योंकि वे समान भू-रासायनिक परिस्थितियों में विकसित होते थे।

        अभी भी भौतिक गुण खनिजों की पहचान के लिए मुख्य साधन हैं, हालांकि, अब उनका उपयोग खनिजों को समूहित करने के लिए नहीं किया जाता है। एक संरचना आधारित समूहन कुछ सामान्य खनिज संघों पर प्रकाश डालता है जो भूवैज्ञानिकों को एक त्वरित नजर से भी इस बारे में शिक्षित अनुमान लगाने की अनुमति देता है कि चट्टान में कौन से खनिज मौजूद हैं।

     अब तक सबसे आम खनिज सिलिकेट हैं, जो पृथ्वी की परत का 90% भाग बनाते हैं। सैकड़ों नामित सिलिकेट खनिजों में से केवल आठ ही सामान्य हैं, जिनमें से एक क्वार्ट्ज है। हालांकि, असामान्य खनिज महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि उनमें आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण जैसे गैलेना, जो सीसा के लिए प्राथमिक अयस्क हैं, और ऐपेटाइट, फॉस्फोरिक एसिड के लिए खनन किया जाने वाला फॉस्फेट शामिल हैं, जिसे उर्वरकों में जोड़ा जाता है।

8. धारियाँ ( Streak):-

      खनिजों में विभिन्न रंगों के मिश्रण के कारण धारियाँ होती हैं। किसी खनिज की धारियाँ उस पाउडर के रंग की होती है जो तब उत्पन्न होता है जब इसे किसी अपक्षयित सतह पर खींचा जाता है। किसी खनिज के स्पष्ट रंग के विपरीत, जो अधिकांश खनिजों के लिए काफी भिन्न हो सकता है, बारीक पिसे हुए पाउडर के निशान में आमतौर पर अधिक सुसंगत विशेषता वाला रंग होता है और इस प्रकार यह खनिज पहचान में एक महत्वपूर्ण नैदानिक उपकरण है। यदि कोई लकीर बनी नहीं दिखती है, तो खनिज की लकीर सफेद या रंगहीन मानी जाती है। अपारदर्शी और रंगीन सामग्रियों के निदान के रूप में स्ट्रीक विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है।

(i) कुछ खनिज अपने प्राकृतिक रंगों के समान एक धारियाँ छोड़ते हैं, जैसे सिनेबार और लाजुराइट।

(ii) अन्य खनिज आश्चर्यजनक रंग छोड़ते हैं, जैसे फ्लोराइट, जिसमें हमेशा एक सफेद लकीर होती है। हालांकि यह बैंगनी, नीले, पीले या हरे क्रिस्टल में दिखाई दे सकता है।

(iii) हेमेटाइट, जो दिखने में काला होता है, एक लाल लकीर या चेरी लाल छोड़ता है जो इसके नाम का कारण बनता है, जो ग्रीक शब्द “हैमा” से आया है जिसका अर्थ है “रक्त”

(iv) गैलेना, जो दिखने में हेमेटाइट के समान हो सकता है, अपनी भूरे रंग की लकीर से आसानी से पहचाना जा सकता है।

खनिज संसाधनों को उपयोग (Uses of Mineral Sources)-

      खनिज संसाधनों के उपयोग में से कुछ हैं-

1. भवनों, पुलों एवं आवास निर्माण के उपयोग किया जाता है।

2. उद्योगों एवं मशीनरी के विकास में इसका उपयोग किया जाता है।

3. मुख्य रूप से कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस का उपयोग ऊर्जा उत्पादन के लिए किया जाता है।

4. रक्षा उपकरणों के विकास के लिए उपयोग किया जाता है।

5. टेलीफोन, तार, केबल, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण आदि जैसे संचार के क्षेत्र में उपयोग किया जाता है।

6. विभिन्न प्रयोजनों के लिए मिश्र धातुओं का निर्माण।

7. आभूषणों के निर्माण के लिए उपयोग किया जाता है जैसे सोना, हीरा, चाँदी आदि के आभूषण।

8. उर्वरकों, कवकनाशी आदि के संश्लेषण के लिए उपयोग किया जाता है।


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23. रूढ़ चिन्ह और संकेत

23. रूढ़ चिन्ह और संकेत

(Conventional Signs and Symbols)


रूढ़ चिन्ह और संकेत

          स्थलाकृति मानचित्र पर भौगोलिक एवं सांस्कृतिक लक्षणों को एक विशिष्ट चिन्ह के द्वारा प्रदर्शित किया है, जो रूढ़ चिन्ह कहे जाते है। भारतीय सर्वेक्षण विभाग द्वारा इन संकेतों का मापनीकरण किया जा चुका है। भारतीय स्थलाकृति मानचित्र में प्रयुक्त संकेत को अंतर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त है। प्राय: 1:50,000 और 1:25000 मापनी वाले पत्रक में रूढ़ चिन्ह समरूपी होते है। कुछ रूढ़ चिन्ह निम्नांकित है-

        यह मुख्यत: दो प्रका के होते है-

1. मौसम विज्ञान के लिए

2. स्थलाकृतिक पत्रक के लिए

 रूढ़ चिन्ह और संकेत

 


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20. हीदरग्राफ, क्लाइमोग्राफ, मनारेख और अरगोग्रफ

20. हीदरग्राफ, क्लाइमोग्राफ, मनारेख और अरगोग्रफ


हीदरग्राफ

       हीदरग्राफ का निर्माण सर्वप्रथम टेलर महोदय ने किया था।

⇒ हीदरग्राफ में जलवायु के आँकड़े को प्रदर्शित किया जाता है।

⇒ हीदरग्राफ में X-अक्ष पर वर्षा और Y-अक्ष पर तापमान को दिखाया जाता है।

⇒ हीदरग्राफ का प्रयोग औपनिवेशिक काल में अँग्रेज लोग बड़े पैमाने पर किया करते थे।

⇒ हीदरग्राफ पर बहुत अधिक गर्म, बहुत अधिक ठण्डा, बहुत अधिक सूखा और बहुत अधिक आर्द्रता के साथ-2 अधिवासित होने के लिए उपयुक्त क्षेत्र को प्रदर्शित किया जाता था।

हीदरग्राफ

 

 

क्लाइमोग्राफ

       Climograph का आविष्कार सर्वप्रथम ग्रिफिथ टेलर महोदय ने किया था।

⇒ Climograph X-अक्ष पर Relative Humidity (सापेक्षिक आर्द्रता) को और Y-अक्ष पर Wet Bulb Temperature (आर्द्र बल्ब तापमान) को ध्यान में रखकर मानचित्र या ग्राफ बनाया जाता है।

⇒ इंग्लैण्ड के निवासी औपनिवेशिक काल में Climograph का उपयोग वैश्विक स्तर पर निवास करने योग्य स्थान के निर्धारण में किया कर‌ते थे।

⇒ जबकि हीदरग्राफ का प्रयोग स्थानीय स्तर पर निवास करने योग्य स्थान का निर्धारण किया करते थे।

⇒ टेलर ने कुछ विशेष प्रकार की जलवायु को भी दर्शाया है जो क्लाइमोग्राफ के चारों कोनों पर होता है। इसके चार प्रकार हैं:

1. झुलसता हुआ (SCORCHING):-

        NW कोने पर, आर्द्र बल्ब तापमान 60° F से अधिक तथा सापेक्षिक आर्द्रता 40% से कम अर्थात् उष्ण-शुष्क जलवायु।

2. उमसदार (MUGGY):-

       NE कोने पर तापमान 60° F से अधिक तथा सापेक्षिक आर्द्रता 70% से अधिक अर्थात् उष्णार्द्र जलवायु।

3. शीतार्द्र (RAW):-

      SE कोने पर, तापमान 40° F से कम तथा सापेक्षिक आर्द्रता 70% से अधिक अर्थात् ठंडी आर्द्र जलवायु।

4. शीत-शुष्क (KEEN):-

       SW कोने पर, तापमान 40° F से कम तथा सापेक्षिक आर्द्रता 40% से कम अर्थात् शीत व शुष्क जलवायु।

 

Cartogram (मानारेख)

        मानारेख में किसी क्षेत्र की मूल आकृति को किसी विशेष उद्देश्य से विकृत कर सांख्यिकीय आंकड़ों का आरेखी विधि से मानचित्र पर प्रदर्शन किया जाता है। यह एक अति सारगर्भित एवं सरल मानचित्र होता है तथा आधुनिक भूगोल में काफी लोकप्रिय है।

⇒ इरविन रेख ने मानारेख को परिभाषित करते हुए कहा कि-“किसी एकल विचार को आरेखी ढंग से दिखाने के लिए बनाया गया अमूर्त और सरलीकृत मानचित्र को मानारेख कहते हैं।”

       मानारेख चार प्रकार का होता है:-

(1) क्षेत्र मूल मानारेख

        क्षेत्र मूल मानारेख में संसार अथवा किसी महाद्वीप, देश अथवा राज्य के क्षेत्रफल को आयत चित्र के रूप में प्रदर्शित किया जाता है।

क्षेत्र मूल मानारेख

(2) यातायात परिवहन मानारेख (Traffic flow Cartogram)

        वैसा मानारेख जिस पर सड़‌क पर चलने वाली गाड़ियों के भार को प्रदर्शित किया जाता है। इसे Star Diagram भी कहते हैं।

⇒ Star Diagram पर नियत समय में दिशा के अनुरूप चलने वाली वायु को प्रदर्शित किया जाता है।

⇒ इस आरेख में  शांत दिनों की संख्या को केन्द्र में लिख दिया जाता है या नहीं तो Calm Days लिख दिया जाता है। ऐसे Diagram को Wind Diagram कहते है।

यातायात परिवहन मानारेख

(3) Isochronic Diagram (समकालीन मानारेख)

         किसी निश्चित बिन्दु से समान समय में पहुँच वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा को समकालीन रेखा कहते हैं।

⇒ जब परिवहन मार्ग पर समकालीन रेखा को प्रदर्शित किया जाता है तो Isochronic Diagram का निर्माण होता है।

Isochronic Diagram

(4) समान मूल्य दूरी मानारेख

         किसी भी क्षेत्र के संदर्भ में सड़क अथवा रेलमार्ग पर तय की जाने वाली समान दूरी अन्तराल पर खींचे जाने वाली क्रमिक ट्रैफिक को प्रदर्शित करने वाले मानचित्र को समान मूल्य दूरी मानारेख कहते है।

⇒ समान मूल्य दूरी मानारेख पर दूरी एवं परिवहन के भार को साथ-2 प्रदर्शित किया जाता है।

समान मूल्य दूरी मानारेख

अरगोग्राफ

       अरगोग्राफ का निर्माण सर्वप्रथम गेडिज महोदय ने किया था।

⇒ अरगोग्राफ कृषकों के लिए काफी उपयोगी है।

⇒ अरगोग्राफ प तापमान, वर्षा, फसलों की संख्या और उत्पादन को एक साथ प्रदर्शित किया जाता है।


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3. मानचित्र प्रक्षेपों का वर्गीकरण

3. मानचित्र प्रक्षेपों का वर्गीकरण


मानचित्र प्रक्षेपों का वर्गीकरण

      प्रकाश या ज्यामितीय विधि द्वारा समतल सतह पर निर्मित अक्षांश व देशांतर रेखाओं के जाल या भू-ग्रिड को मानचित्र प्रक्षेप कहा जाता है। गोलाकार पृथ्वी अथवा इसके किसी बड़े भू-भाग का समतल सतह पर मानचित्र बनाने के लिए मानचित्र प्रक्षेप का प्रयोग किया जाता है। अक्षांश एवं देशांतर रेखाओं के जाल को Graticule, Net या Mesh के नाम से भी जाना जाता है।

मानचित्र प्रक्षेपों

           पृथ्वी की आकृति का यथार्थ चित्रण केवल ग्लोब के द्वारा ही संभव है एवं कोई भी मानचित्र प्रक्षेप आकार, क्षेत्रफल एवं दिशा, तीनों ही दृष्टि से सही नहीं होता है। परन्तु समक्षेत्र, यथाकृतिक अथवा शुद्ध दिशा के गुणों में से किसी विशेष गुण का प्रक्षेप बनाना संभव है। अतः मानचित्र के उद्देश्य को ध्यान में रखकर उपयुक्त प्रक्षेप का चयन किया जाता है।

    मानचित्र प्रक्षेप को तीन आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।

(1) प्रकाश के प्रयोग के आधार पर

(2) गुण के आधार पर

(3) रचना विधि के आधार पर

(I) प्रकाश के प्रयोग के आधार पर

            प्रकाश के प्रयोग के आधार पर प्रक्षेप दो प्रकार के होते हैं:-

(1) संदर्श मानचित्र-प्रक्षेप (Perspective Map Projection or Geometrical Projection):-

         यह एक ऐसा Projection है जिसमें ग्लोब पर स्थित भूग्रिड को समतल कागज पर प्रकाश के माध्यम से प्रक्षेपित करते हैं।

        इस प्रक्षेप में प्रकाश के स्रोत की तीन स्थिति हो सकती है। जैसे-

(1) केन्द्र में,

(2) पृथ्वी के परिधि पर और

(3) अनन्त पर।

          इन तीनों स्थितियों के आधार पर प्रक्षेप तीन प्रकार के होते हैं:-
(i) केन्द्रक प्रक्षेप (Gnomonic Projection)

⇒ इसमें प्रकाश स्रोत ग्लोब के केंद्र में होता है।

(ii) त्रिविम प्रक्षेप (Stereograophic Projection)

इसमें प्रकाश स्रोत ग्लोब के परिधि पर होता है।

(iii) लम्ब-कोणीय प्रक्षेप (Orthographic Projection)

इसमें प्रकाश स्रोत अनंत पर होता है।

(2) असंदर्श मानचित्र प्रक्षेप (Non-Perspective Map Projection):-

          इसमें गणितीय विधि के आधार पर भूग्रिड को समतल कागज पर प्रक्षेपित किया जाता है। इस विधि में प्रकाश स्रोत को केन्द्र में स्थिर कर दिया जाता है और समतल कागज को अलग-2 स्थितियों में बदलकर प्रक्षेपण का कार्य किया जाता है। इसके आधार पर यह Projection तीन प्रकार का होता है-

(i) Polar Zenithal Projection (ध्रुवीय खमध्य प्रक्षेप)

⇒ इसमें समतल कागज को ग्लोब के ध्रुव पर फैलाकर रखा जाता है।

(ii) Equatorial Zenithal Projection (विषुवतीय खमध्य प्रक्षेप)

⇒ इसमें समतल कागज विषुवत रेखा को स्पर्श करता है।
(iii) Oblique Zenithal Projection (तिर्यक खमध्य प्रक्षेप)

⇒ इसमें समतल कागज ध्रुव और विषुवत रेखा के बीच के किसी स्थान को स्पर्श करता है।

(II) गुण के आधार पर 

             गुण के आधार पर प्रक्षे तीन प्रकार के होते हैं:-

(1) यथाआकृति प्रक्षेप (Orthomorphic Projection)

(2) समक्षेत्र प्रक्षेप (Homolographic Projection or Equal Area Projection)

(3) शुद्ध दिशा प्रक्षेप (Azimuthal Projection)

(III) रचना विधि के आधार पर

           इसमें गणित और प्रकाश दोनों का सहारा अपने सुविधा के अनुसार लिया जाता है।

⇒ रचना विधि के आधार पर प्रक्षेप कई प्रकार के होते हैं:-
(1) शंकु प्रक्षेप (Conical Projection)

      शंकु प्रक्षेप चार प्रकार का होता है-

(i) One Standard Parallel Conical Projection (एक मानक अक्षांश वाला शंकु-प्रक्षेप)

(ii) Two Standard Parallel Conical Projection (दो मानक अक्षांशों वाला शंकु प्रक्षेप)

(iii) Bonne’s Projection (बोन प्रक्षेप)

(iv) Polyconic Projection (बहुशंकुक प्रक्षेप)

(2) बेलनाकार प्रक्षेप (Cylindrical Projection)

(i) Cylindrical Equi-Distance Projection (समदूरस्थ बेलनाकार प्रक्षेप)

(ii) Cylindrical Equal-Area Projection (बेलनाकार समक्षेत्र प्रक्षेप)

(iii) Mercator’s Projection (मर्केटर प्रक्षेप या यथाकृति प्रक्षेप)

(iv) Gall Projection (गॉल प्रक्षेप)

(3) Zenithal Projection (खमध्य प्रक्षेप)
              प्रकाशीय स्थिति के आधार पर खमध्य प्रक्षेप तीन प्रकार का होता है:-

(1) Gnomonic Projection (केन्द्रक नोमॉनिक प्रक्षेप)

(ii) Stereograophic Projection (त्रिविम प्रक्षेप)

(ii) Orthographic Projection (लम्बकोणीय प्रक्षेप)

             खमध्य प्रक्षेप कागज तल स्थिति के आधार पर तीन प्रकार का होता है:-

(i) Polar Zenithal Projection (ध्रुवीय खमध्य प्रक्षेप)

(ii) Oblique Zenithal Projection (तिर्यक प्रक्षेप)

(iii) Equatorial Zenithal Projection (विषुवतीय खमध्य प्रक्षेप)

(4) रूढ़ प्रक्षेप (Conventional Porojection)

(i) मॉलवीड प्रक्षेप (Mollveide Projection)

(ii) ज्यावक्रीय या सिनुसॉयडल प्रक्षेप (Sinusoidal or Sanson Flamstead Projection)

(iii) गोलाकार प्रक्षेप (Globular Projection)

(iv) विच्छिन्न मॉलवीड प्रक्षेप (Interrupted Mollveide Projection)

(v) विच्छिन्न सैन्सन फ्लैम्स्टीड या सिनुसॉयडल प्रक्षेप (Interrupted Sinusoidal or Sanson Flamstead Projection)

मानचित्र प्रक्षेपों का वर्गीकरण


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19. आरेख का प्रकार एवं उपयोग

आरेख का प्रकार एवं उपयोग

(Diagram: Types & uses or Statistical Representation of Data)


आरेख का प्रकार एवं उपयोग

         द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद भूगोल के विषयवस्तु एवं विधि तंत्र में मात्रात्मक क्रांति का आगमन हुआ। इसी मात्रात्मक क्रान्ति का यह प्रभाव था कि भूगोल में अनेक प्रकार के भौगोलिक तत्वों का निरूपण हेतु आरेख (Diagram) का निर्माण किया जाने लगा।

⇒ मात्रात्मक क्रान्ति- भूगोल में गणितीय विधि का प्रयोग करना।

भौगोलिक तत्वों को ग्राफ या चित्रों के माध्यम से प्रदर्शित करने की विधि को आरेख (Diagram) कहते हैं।

⇒ भूगोल में प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक वातावरण के किसी तत्व का वितरण प्रदर्शित करने वाले मानचित्र को वितरण मानचित्र कहते है।

⇒ वितरण मानचित्र को दो भागों में बाँटते हैं-

(1) अमात्रात्मक विधि के द्वारा निर्मित वितरण मानचित्र या गुण प्रधान वितरण मानचित्र

(2) मात्रात्मक विधि पर आधारित वितरण मानचित्र या सांख्यिकी मानचित्र

गुण प्रधान मानचित्र /वितरण मानचित्र

       गुण प्रधान मानचित्र मोटे तौर पर चार प्रकार का होता है:-

(1) रंगारेखा विधि (Choro-Chromatic Method)

(2) सामान्य छाया विधि (Sketching Map) पर आधारित मानचित्र

(3) चित्रीय विधि (Pictorial Map) पर आधारित मानचित्र

(4) वर्ण प्रतीकी विधि पर आधारित मानचित्र (Choros-Chematic Map)

मात्रात्मक मानचित्र

      मात्रात्मक मानचित्र भी चार प्रकार का होता है-

(i) वर्णमात्री विधि पर आधारित मानचित्र

(ii) सममान प्रतीक विधि पर आधारित मानचित्र

(iii) बिन्दु विधि पर आधारित मानचित्र

(iv) आरेखी विधि आधारित मानचित्र

(1) रंगारेखी विधि मानचित्र (Colour patch Map)

⇒ इसे Colour Map या Choro-Chromatic Map भी कहते हैं।

⇒ प्राकृतिक, राजनीतिक एवं प्रशासकीय ने प्रदेशों के विस्तार, भूमि उपयोग, मिट्टी एवं वनस्पतियों के प्रकार का वितरण प्रदर्शित करने के लिए इस विधि का प्रयोग किया जाता है।

⇒ रंगारेखी मानचित्र पर अलग-2 भौगोलिक तत्वों को अलग-2 रंग से प्रदर्शित करते हैं।

(2) Sketching Map (सामान्य छाया विधि)

⇒ sketching Map में एक भौगोलिक तत्व के उपविभाग को एक ही रंग से अलग-2 तीव्रता (Intensity) प्रदर्शित करते हैं।

(3) चित्रीय विधि पर आधारित मानचित्र

        किसी देश के दर्शनीय स्थान, पर्यटन केन्द्र, वेष-भूषा एवं ऐतिहासिक इमारतों के चित्रों के माध्यम से मानचित्र परम प्रस्तुत करना चित्रीय मानचित्र कहलाता है।

(4) वर्ण प्रतीकी मानचित्र

        वैसा मानचित्र जिस पर कई तत्त्वों के वितरण को एक ही मानचित्र पर दिखाया जाता है।

⇒ वर्ण प्रतीकी मानचित्र पर खनिजों का वितरण, औद्योगिक वितरण एवं फसल उत्पादन के वितरण प्रदर्शित करते हैं और Index बनाकर इसमें संकेत के रूप प्रदर्शित कर देते हैं।

⇒ कभी-2 Index का निर्माण कर सीधे-2 भौगोलिक तत्व के पहला अक्षर को मिलने वाले स्थान पर लिख दिया जाता है। ऐसे मानचित्र को नामांकन विधि मानचित्र कहते है।

मात्रात्मक विधि

       जब भौगोलिक तत्वों जैसे वस्तुओं के मूल्य, मात्रा, घनत्व इत्यादि को भौगोलिक मानचित्र पर या सांख्यिकी विधि द्वारा प्रकट किया जाता है तो उसे मात्रात्मक विधि घर आधारित आरेख (मानचित्र) कहते हैं।

यह कई प्रकार का होता है। जैसे-

(1) वर्णमात्री विधि (Choropleth)

        ऐसे मानचित्र में भिन्न-2 घनत्त्व वाली भौगोलिक तत्त्वों को मानचित्र पर प्रति इकाई औसत या प्रतिशत के मूल में प्रदर्शित करते हैं। जैसे- जनघनत्व (प्रति इकाई क्षेत्रफल पर निवासित जनसंख्या), कृषि भूमि का प्रतिशत, उत्पादकता (kg प्रति इकाई क्षेत्रफल) को दिखाया जाता है।

⇒ इसमें मूल्यों के बढ़ने के साथ रंगों के गहराई में भी वृद्धि होते जाती है।

(2) सममान रेखा विधि (Isopleth Map)

          मानचित्र पर किसी वस्तु के समान मूल्य या धनत्व को मिलाने वाली रेखा को Isopleth रेखा कहते हैं।

⇒ Isopleth जलवायु के तत्वों को दिखलाने के लिए काफी उपयोगी है। इसके अलावे इस पर निम्नलिखित तत्त्वों को प्रदर्शित किया जा सकता है। जैसे- समताप रेखा, सममेघ रेखा, समवर्षा रेखा, समदाब रेखा इत्यादि।

1. आइसोनीफ (Isonif)⇒ समान हिम वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा को आइसोनीफ कहते है।

2.  सममेघ रेखा या आइसोनेफ (Isoneph)⇒ समान मेघ आच्छादन वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा को आइसोनेफ कहते है।

3. आइसो बाथ (Isobath)⇒ समुद्र के अंदर समान गहराई वाले स्थानों को मिलाकर खींचे जाने वाली रेखा को आइसो बाथ कहते है।

4. आइसो ब्रांट (Isobront)⇒ एक समान समय पर तूफान आने वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

5. समपवनवेग रेखा या आइसोटैक (Isotach)⇒ मौसम मानचित्र पर पवन की समान गति वाले स्थानों को मिलाकर खींची गई रेखा।

6. समताप रेखा (Isotherm)⇒ समान तापमान वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

7. आइसोपैच (Isopach)⇒ हिमानी अथवा चट्टानों के समान मोटाई वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

8.  समकाल रेखा या आइसोक्रोन (Isochrone)⇒ किसी बिंदु से एक समान समय में तय कि गई दूरी वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

(3) बिन्दु विधि (Dot Method)

          इसे बनाने से पूर्व चार तथ्यों पर ध्यान देना पड़ता है-

(i) बिन्दुओं के आकार को निश्चित करना पड़ता है।

(ii) बिन्दु मूल्य सुनिश्चित करना पड़ता है।

⇒ बिन्दुओं के मूल्य का निर्धारण दो आधार पर होता है:

(a) क्षेत्रीय या स्टिल जेन बोअर विधि (क्षेत्रफल के लिए)

(b) आयतनी या स्टेनडी गीयर विधि (आयतन के लिए)

(iii) बिन्दुओं को अंकित करना- यह भी दो प्रकार का हो सकता है:-

(a) समवितरण प्रणाली पर आधारित

(b) असमवितरण प्रणाली पर आधारित

(iv) एक समान बिन्दु बनाना।

⇒ बिन्दु विधि या आधारित मानचित्र में केवल एक वस्तु का विवरण दिखाते हैं। जैसे:- जनसंख्या,पालतू पशु

क्षेत्रीय या स्टिल जेन बोअर विधि

⇒ यह बिन्दु विधि वितरण मानचित्र का एक संशोधित रूप है।

⇒ इस विधि के द्वारा ग्रामीण एवं नगरीय जनसंख्या को स्पष्ट रूप से दिखाया जा सकता है।

⇒ इस विधि में ग्रामीण जनसंख्या को बिंदु के द्वारा और नगरीय जनसंखा को अनुपातिक वृत के द्वारा दिखाया जाता है।

इसमें आनुपातिक वृत को क्षेत्रफल के रूप में प्रदर्शित करते हैं।

⇒ वृतों की त्रिज्या सम्बंधित जनसंख्या का वर्गमूल निकालकर बिन्दु के आकार से गुणा करके प्राप्त किया जाता है।

आयतनी या स्टेनडी गीयर विधि

⇒ इसमें भी ग्रामीण एवं नगरीय जनसंख्या के वितरण को मानचित्र पर दिखाया जाता है।

⇒ बोअर विधि में कभी-2 नगरीय केन्द्र की जनसंख्या अधिक होने पर आकार बहुत बड़ा हो जाता है, जिसके कारण वृत नगर सीमा के बाहर चली जाती है।

⇒ अत: इस समस्या से निपटने हेतु नगरीय जनसंख्या को समानुपातिक गोला के रूप में प्रदर्शित किया जाता है। 

⇒ गोला का अर्द्ध व्यास जनसंख्या के घनमूल निकालकर ज्ञात करते हैं।

⇒ स्टेन डी गियर विधि में ग्रामीण जनसंख्या को बिन्दुओं एवं नगरीय जनसंख्या को गोलों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।

(4) आरेखी विधि पर आधारित मानचित्र

         वैसा मानचित्र जिसमें भौगोलिक तत्वों को सरल रेखा, वृत, दण्ड इत्यादि के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। उसे आरेख कहते हैं।

आरेख चार प्रकार के होते हैं-

(i) दण्डारेख (Bar Diagram)

(ii) वृत आरेख (Pie Diagram)

(iii) रेखीय आरेख (Line Graph)

(iv) त्रिविम आरेख (Three Dimensional)

(i) दण्डारेख (Bar Diagram)

        दण्ड-आरेख पा पिछले शताब्दी के जनसंख्या को प्रदर्शित किया जा सकता है। इसमें समय को x-axis पर और जनसंख्या को Y-axis पर दिखाया जाता है।

      वस्तुतः दण्डारेख दो प्रकार का होता है:-

(a) साधारण दण्ड आरेख (Simple Bar Diagram):- साधारण दण्ड आरेख में कुल मात्रा को एक दण्ड के रूप में प्रदर्शित करते है।

साधारण दण्ड आरेख

(b) मिश्रित दण्ड आरेख (Compound Bar Diagram):- यदि दिया गया डाटा सतत (Continuous) हो तो दण्डारेख आयत चित्र के रूप में बनते है। 

मिश्रित दण्ड आरेख

(c) बहुदण्ड आरेख (Multiple Bar Diagram):- इसमें दो या अधिक वस्तुओं के आँकड़े एक साथ प्रदर्शित किये जाते हैं। तुलनात्मक अध्ययन में ये विशेष रूप से महत्वपूर्ण होते हैं।

बहुदण्ड आरेख

(ii) वृत आरेख (Pie Diagram)

                  यह आँकड़ों को प्रदर्शित करने की एक सरल ज्यामितीय विधि है। वृत्तारेख में वृत्त का कुल क्षेत्रफल आँकड़ों का कुल योग तथा विभिन्न त्रिज्याखंड आँकड़ों के प्रत्येक घटक को प्रदर्शित करते हैं। वृत्तारेख बनाने के लिए सर्वप्रथम सुविधानुसार कोई अर्द्धव्यास से वृत्त खींचकर आँकड़ों के योग को प्रदर्शित करते हैं। इसके बाद आँकड़ों के विभिन्न घटकों या उपविभागों के अंशों में मान निम्न प्रकार ज्ञात करते हैं:

आरेख का प्रकार एवं उपयोग

            इस प्रकार ज्ञात किये गये कोणों को वृत्त में कहीं भी अर्द्धव्यास खींचकर बनाया जा सकता है, परन्तु उत्तर दिशा से प्रारंभ करके घड़ी की सूई की दिशा में तथा अवरोही क्रम में बनाये गये कोण अधिक श्रेयस्कर होते हैं।

वृत आरेख

(iii) रेखीय आरेख (Line Graph)

              Line Diagram प्रवृति का द्धोतक है। Line Diagram से जनसंख्या वृद्धि, Market Price, Index को पर्दर्शित करते है। 

Line Diagram

(iv) त्रिविम आरेख (Three Dimensional)

               जैसा कि नाम से पता चलता है, इन आरेखों के तीन आयाम होते हैं, अर्थात लंबाई, चौड़ाई और गहराई। घनीय और गोलाकार आरेख त्रिविम या त्रिआयामी आरेखों के मुख्य उदाहरण हैं। त्रिवि या त्रिआयामी रेखाचित्रों का आयतन उनके द्वारा दर्शायी जाने वाली मात्राओं के समानुपाती होता है, और इसीलिए उन्हें आयतन आरेख भी कहा जाता है। यह आरेख द्विविम या द्विआयामी आरेखों की तुलना में बहुत कम जगह घेरते हैं। इस प्रकार, वे विशेष रूप से उपयोगी होते हैं जब दिए गए मात्राओं के मूल्य बहुत भिन्न होते हैं। इन आरेखों को वितरण मानचित्रों पर स्थित आरेखों के रूप में भी उपयोग किया जाता है।

त्रिविम आरेख

त्रिविम आरेख


पिरामिड आरेख (Piramidal Diagram) 

                     पिरामिड Diagram द्वारा दो विपरीत भौगोलिक आंकड़ों को विरूपित किया जाता है। जैसे- पुरुष-महिला के लिंगानुपात, आयात-निर्यात, औसत आयु (स्त्री- पुरुष) को दिखाते है।

पिरामिड आरेख

पट्टिका-ग्राफ (Band Graph)

             जब किसी उत्पादन का आंकड़ा कई वर्षों का और कई देशों का उपलब्ध हो तो उसे Band Graph के माध्यम से प्रदर्शित करते है।

पट्टिका-ग्राफ

Poly Graph 

⇒ Poly Graph  का प्रयोग जनसँख्या भूगोल में किया जाता है

⇒ Poly Graph  पर मृत्यु दर, जन्म दर और प्राकृतिक वृद्धि दर को प्रदर्शित किया जाता है

Poly Graph 


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18. आलेखी / रैखिक विधि (Graphical or Linear Method)

आलेखी / रैखिक विधि (Graphical or Linear Method)



आलेखी / रैखिक विधि⇒

            आलेखी विधि का प्रयोग कर मानचित्र पर की दूरी को और धरातल के वास्तविक दूरी को मापने हेतु एक रेखा खींचकर उस पर मापनी अंकित कर दिया जाता है।

गुण एवं उपयोगिता के आधार पर रेखीय मापनी निम्नलिखित प्रकार के होते हैं-

(1) साधारण रेखीय मापक (Simple Linear Seale)

       यह मानचित्र पर दूरी मापने का सर्वोत्तम Scale है। इस मापनी को मानचित्र के एक भाग में एक साधारण रेखा खींचकर दो भागों में बाँट देते हैं। एक भाग प्राथमिक पैमाना कहलाता है और दूसरा भाग द्वितीयक पैमाना कहलाता है। प्राथमिक पैमाना को हमेशा दाईं ओर प्रदर्शित करते हैं। जबकि द्वितीयक पैमाना को हमेशा बाईं ओर प्रदर्शित करते हैं।          

आलेखी

साधारण रेखीय मापक

       प्राथमिक मापनी में केवल एक उपविभाग होता है जबकि द्वितीयक मापनी में दस उपविभाग होता है। इसका तात्पर्य है कि साधारण मापनी से 1km के 10वें भाग के दूरी को भी ज्ञात कर सकते हैं।

(2) तुलनात्मक मापनी (Comaprative Scale)

        तुलनात्मक मापनी को बनाने के पीछे उद्देश्य यह है कि मानचित्र की विभिन्न मापों के मापकों जैसे- मील और किमी०, मीटर और गज, फैदम और मीटर इत्यादि में एक साथ दूरियाँ ज्ञात कर ली जाय।

       रचना के दृष्टि से तुलनात्मक मापनी भी साधारण मापनी के समान होता है। लेकिन इसमें एक ही स्थान पर दो मापनी अलग-2 इकाई के बना दिये जाते हैं।

तुलनात्मक मापनी

तुलनात्मक मापनी

⇒ तुलनात्मक मापक दो साधारण मापकों का समिश्रण है।

⇒ दोनों साधारण मापक समान लम्बाई के होते हैं।

⇒ दोनों साधारण मापक का मापन एक ही प्रदर्शक भिन्न पर निर्मित किये जाते हैं।


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17. विकर्ण तथा वर्नियर स्केल (Vernier and Diagonal Scale)

17. विकर्ण तथा वर्नियर स्केल

(Diagonal and Vernier Scale)



विकर्ण मापनी (Diagonal Scale)⇒

        विकर्ण मापनी एक ऐसा मापनी है जिसके माध्यम से तीन इकाई तक दूरियों का मापन कर सकते हैं। या इसी शब्दों में यह कहा जा सकता है कि इसके द्वारा दशमलव के बाद दो अंकों तक (100वाँ भाग तक) की दूरी को ज्ञात किया जा सकता है।

       इस मापनी में विकर्णों की सहायता से द्वितीयक मापनी को पुन: और छोटे-2 भागों में विभाजित कर दिया जाता है। इसे नीचे के चित्र में देखा जा सकता है।

विकर्ण मापनी

विकर्ण मापनी

 

वर्नियर स्केल (Vernier Scale)⇒

वर्नियर स्केल

वर्नियर स्केल

         वर्नियर स्केल एक ऐसा यंत्र है जिसके माध्यम से सूक्ष्म दूरियों को पढ़ा जा सकता है। 

⇒ सर्वेक्षण कार्य के दौरान और वायुयान के पायलट अपने पास वर्नियर स्केल रखते है, ताकि सूक्ष्मतम स्तर तक दूरियों का मापन कर सके।

⇒ वर्नियर पैमाना का आविष्कार पियरे वर्नियर ने किया था।

⇒ सर्वेक्षण के दौरान थियोडोलाइट नामक उपकरण के साथ इसका प्रयोग किया जाता है।

⇒ भारत में वार्नियर स्केल का निर्माण मुजफ्फरनगर के मोती झील (मुहल्ला) में किया जाता है।

⇒ वर्नियर मापनी के द्वारा मापा जाने वाला सबसे छोटी दूरी को Least Count (लीस्ट काउंट) कहते हैं।

Least Count = 1/N XP

यहाँ, P = प्राथमिक मापनी के सबसे छोटे भाग का मान

N = वर्नियर मापनी में बनाए गए भागों की कुल संख्या।

⇒ वर्नियर पैमाना में दो प्रकार का स्केल होता है।

(1) प्राथमिक/प्रधान पैमाना,

(2) वर्नियर पैमाना

⇒ जर्मनी में निर्मित वर्नियर में 0 के स्थान पर “तीर” का  प्रयोग होता है। 

⇒ किसी गोल पृष्ठ वाले सतह का सूक्ष्मतम मोटाई या वक्रता का मापन स्फैरोमीटर के द्वारा करते हैं। 


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21. जनसंख्या मानचित्र के प्रकार एवं प्रदर्शन की विधियाँ

21. जनसंख्या मानचित्र के प्रकार एवं प्रदर्शन की विधियाँ


जनसंख्या मानचित्र के प्रकार एवं प्रदर्शन की विधियाँ⇒

           जनसंख्या वितरण एवं घनत्व मानचित्रों का भूगोल के अध्ययन में विशेष महत्व है। इन मानचित्रों के अध्ययन से स्पष्ट हो जाता है कि धरातल, जलवायु तथा अन्य प्राकृतिक परिस्थितियों का मनुष्य के घनत्व एवं वितरण के ऊपर क्या प्रभाव पड़ता है। समय अथवा स्थान परिवर्तन के साथ-साथ किस प्रकार मनुष्य की भौतिक तथा सामाजिक परिस्थिति परिवर्तित होती है तथा इस परिवर्तन का मनुष्य के वितरण एवं घनत्व पर क्या प्रभाव पड़ता है, इन सभी प्रश्नों का उत्तर जनसंख्या-मानचित्र के अध्ययन से प्राप्त होता है।

जनसंख्या मानचित्र के प्र

जनसंख्या मानचित्र के प्रकार

             जनसंख्या मानचित्रों के निम्नलिखित तीन मुख्य प्रकार होते हैं:- 

1. जनसंख्या वितरण मानचित्र (Maps Showing Population Distribution):-

           इस प्रकार के मानचित्रों से जनसंख्या के वितरण का चित्रण किया जाता है। यह चित्रण वास्तविक आंकड़ों (Absolute Figures) के आधार पर किया जाता है। इस प्रकार के जनसंख्या वितरण मानचित्र जनसंख्या के वितरण का शुद्ध एवं सजीव चित्रण प्रस्तुत करते हैं। इस प्रकार के मानचित्रों द्वारा किसी क्षेत्र की ग्रामीण एवं शहरी जनसंख्या का सांख्यिकीय वितरण भी प्रस्तुत किया जा सकता है।

2. जनसंख्या घनत्व मानचित्र (Maps Showing Relative Density of Population or Choropleth Maps):-

           इस प्रकार के मानचित्रों द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में जनसंख्या के औसत घनत्व को प्रदर्शित किया जाता है। इस प्रकार मानचित्रों द्वारा क्षेत्र की भौगोलिक एवं अन्य परिस्थितियों का जनसंख्या के घनत्व पर क्या प्रभाव पड़ता है इत्यादि प्रश्नों का उत्तर प्राप्त होता है। रेखा द्वारा छाया देकर विभिन्न घनत्व प्रदर्शित किए जाते हैं।

3. परिमाणविहीन मानचित्र (Non-Statistical Population Maps or Chorochromatic Maps):-   

           इस प्रकार के मानचित्र द्वारा जनसंख्या सम्बन्धी ऐसी दशाओं का वितरण प्रस्तुत होता है, जिनमें आंकड़ों की आवश्यकता नहीं होती, जैसे—धर्म, भाषा, जाति, आदि का वितरण। परिमाणविहीन मानचित्रों में नामांकन विधि, चित्रात्मक विधि तथा रंगछाया-विधि द्वारा जनसंख्या सम्बन्धी दशाओं का क्षैतिज वितरण प्रस्तुत किया जाता है।

             जनसंख्या के वितरण एवं घनत्व को निम्नलिखित विधियों द्वारा मानचित्र पर प्रदर्शित किया जाता है।

1. समान बिन्दु विधि (Uniform Dot Method):-

             मापनी के अनुसार एक-समान गोलाई के बिन्दुओं द्वारा क्षेत्र की जनसंख्या का क्षेत्रीय वितरण प्रदर्शित किया जाता है। बिन्दुओं को भरने में विशेष सावधानी की आवश्यकता पड़ती है। इसका उल्लेख पहले ही किया जा चुका है। इस विधि द्वारा जनसंख्या वितरण के प्रदर्शन का मुख्य दोष यह है कि ग्रामीण अथवा शहरी जनसंख्या का अलग-अलग प्रदर्शन इस विधि द्वारा सम्भव नहीं है।

2. आनुपातिक बिन्दु तथा वृत्त विधि (Proportional Dot and Circle Method):-

              इस विधि द्वारा जनसंख्या के वितरण आदि का प्रदर्शन मापनी के अनुसार मानचित्र के विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार के बिन्दु तथा वृत्त बनाकर किया जाता है। इस विधि का दोष यह है कि कभी-कभी वृत्त एक-दूसरे को ढंक लेते हैं तथा मानचित्र स्पष्ट (Clear) आंकड़े प्रदर्शित नहीं करता।

3. बिन्दु एवं वृत्त विधि (Dot and Circle Method):-

               इस विधि को स्टिलजेनबौर विधि (Stilgenbaur’s Method) भी कहते हैं। इस विधि द्वारा ग्रामीण जनसंख्या बिन्दुओं द्वारा तथा नगर जनसंख्या वृत्तों द्वारा प्रदर्शित की जाती है। नगरों की विभिन्न जनसंख्या विभिन्न क्षेत्रफल वाले वृत्तों द्वारा प्रदर्शित की जाती है। इस विधि के आंकड़ों के प्रदर्शन हेतु बनाए गए वृत्तों तथा बिन्दुओं के अर्द्धव्यास में महान असमानताएं होने के कारण यह विधि अधिक प्रचलित नहीं है। उदाहरण के लिए, यदि 1/20 इंच के अर्द्धव्यास का बिन्दु 103 जनसंख्या प्रदर्शित करता है तो 10,00,000 जनसंख्या वाले नगर के लिए 5 इंच के अर्द्धव्यास का वृत्त खींचा जाएगा जो अत्यन्त असंगत होगा। इस दोष को दूर करने के लिए गोलीय आरेखों (Spherical Diagrams) का प्रयोग बिन्दु विधि साथ करते हैं। बिन्दु एवं वृत्त विधि में वृत्तों का अर्द्धव्यास वर्गमूल सूत्र विधि द्वारा निकाला जाता है।

4. बिन्दु एवं गोला विधि (Dot and Sphere Method):-

               इस विधि को स्टेन डी गियर विधि (Sten De Geer Method) भी कहते हैं। इस विधि द्वारा ग्रामीण जनसंख्या बिन्दुओं द्वारा तथा नगरीय जनसंख्या गोलों द्वारा प्रदर्शित की जाती है। गोलों के अर्द्धव्यास विभिन्न नगरों की जनसंख्या के आंकड़ों की सहायता से परिकलित (Calculate) किए जाते हैं। बिन्दु समान अर्द्धव्यास के होते हैं तथा नगरों की जनसंख्या का प्रदर्शन करने वाले गोले मापनी के अनुसार ही अर्द्धव्यास के होते हैं। इनकी मापनी भी बिन्दुओं की मापनी के अनुसार होती है। गोलों का अर्द्धव्यास निकालने के लिए घनमूल मापनी विधि प्रयोग में लाते हैं।

5. आनुपातिक बिन्दु विधि (Multiple Dot Method):-

            इस विधि द्वारा जनसंख्या प्रदर्शन में बिन्दुओं का आकार जनसंख्या के साथ घटता-बढ़ता रहता है। अधिक जनसंख्या प्रदर्शित करने के लिए बड़े आकार के बिन्दु मानचित्र में भरे जाते हैं तथा छोटे आकार के बिन्दु कम जनसंख्या प्रदर्शित करते हैं।

जनसंख्या घनत्व प्रदर्शन विधियाँ

             जनसंख्या घनत्व मानचित्र मनुष्य तथा भूमि का साधारण आनुपातिक सम्बन्ध प्रदर्शित करते हैं। इस प्रकार के सम्बन्ध को गणितीय घनत्व (Arithmetric Density) भी कहते है। इस घनत्व का यह अर्थ समझा जाता है कि प्रति वर्ग किमी भूमि पर कितने मनुष्य रहते हैं।

             कृषि योग्य भूमि तथा जनसंख्या के घनत्व के सम्बन्ध को भी मानचित्रों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। इस प्रकार का घनत्व (Physiological Density) जनसंख्या तथा कृषि योग्य भूमि का आनुपातिक घनत्व कहलाता है। इसी प्रकार जनसंख्या का खेतिहर घनत्व (Agricultural Density) अथवा आर्थिक घनत्व (Economic Density) अथवा पौष्टिक घनत्व (Nutrition Density) आदि का भी प्रदर्शन जनसंख्या घनत्व प्रदर्शन मानचित्रों द्वारा प्रस्तुत किया जा सकता है।

              इस प्रकार के मानचित्रों में विभिन्न घनत्व प्रदर्शन के लिए साधारण रेखा छाया विधि (Simple Shading Method or Choropleth Method) का प्रयोग करते हैं। इस विधि द्वारा जनसंख्या घनत्व प्रदर्शन की सीमाओं का उल्लेख पहले ही किया जा चुका है।

            जनसंख्या घनत्व प्रदर्शन के लिए समरेखा विधि (Isopleth Method) का भी उपयोग कर सकते हैं, परन्तु यह विधि इस कार्य के लिए अधिक रुचिकर नहीं है तथा प्रचलित भी नहीं है।

              अन्य प्रकार के मानचित्र, जैसे Stock Maps, आदि में बिन्दु विधि तथा छाया विधि प्रयोग में लाते हैं। यही विधि कृषि मानचित्रों (Crop Maps) में क्षेत्रफल अथवा पैदावार की मात्रा प्रदर्शन के लिए प्रयोग की जाती है। फसलों अथवा विशेष क्षेत्रफल के अनुपात के लिए वृत्त चित्रों का प्रयोग करते हैं। जलवायवीय मानचित्रों में समरेखा विधि (Isopleth Method) का प्रयोग करते हैं तथा अन्य प्रकार के मानचित्रों में अन्य यथायोग्य विधियों का प्रयोग करते हैं।

             जनसंख्या की वृद्धि रैखिक आरेख (Line Graph) द्वारा आयु तथा लिंग-भेद (Age and Sex Structure) पिरामिड विधि द्वारा तथा व्यावसायिक विशेषताएँ (Occupational Structure) चक्राकार आरेख (Wheel Diagrams) अथवा दण्डारे (Bar Diagrams) द्वारा प्रदर्शित करते हैं।


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16. रूढ़ प्रक्षेप, मॉलवीड प्रक्षेप, सिनुस्वायडल प्रक्षेप

16. रूढ़ प्रक्षेप, मॉलवीड प्रक्षेप, सिनुस्वायडल प्रक्षेप



रूढ़ प्रक्षेप (Conventional Projection)

⇒ किसी निश्चित उद्देश्य की पूर्ति हेतु स्वेच्छा के अनुसार छाटे गये सिद्धांतों पर निर्मित प्रक्षेप को रूढ़ प्रक्षेप कहते हैं।

⇒ रूढ़ प्रक्षेप पर समस्त संसार की मानचित्र बनायी जाती है।

⇒ रूढ़ प्रक्षेप इतना संशोधित प्रक्षेप है कि इसे न तो शंकु, न बेलनाकार, न खमध्य प्रक्षेप के वर्ग में रखते हैं। अत: यह पूर्णतः गणितीय विधि पर आधारित है।

⇒ रूढ़ प्रक्षेप मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं:-

(1) मॉलवीड प्रक्षेप

(2) सिनुस्वायडल प्रक्षेप

(1) मॉलवीड प्रक्षेप  (Mollweide’s Projection)

⇒ मॉलवीड प्रक्षेप का निर्माण 1805 ई० में जर्मन मानचित्रकार ब्रेडन मॉलवीड ने किया था।

⇒ मॉलवीड प्रक्षेप में समक्षेत्र प्रक्षेप का गुण पाया जाता है।

⇒ रूढ़ प्रक्षेप में समक्षेत्र प्रक्षेप का गुण उत्पन्न करने के लिए दो प्रकार के संशोधन किये जाते हैं:

(i) मॉलवीड प्रक्षेप में 90° पूर्वी और 90° पश्चिमी देशान्तर रेखा को एक वृत्त मानते हुए दिखाया जाता है जिसका अर्द्धव्यास (त्रिज्या) √2 x R होता है।

(ii) भूमध्यरेखा की लम्बाई केन्द्रीय मध्याहन रेखा की दुगनी होती है अर्थात् प्रक्षेप में बनाये गये वृत्त के अर्द्धव्यास का चार गुणा (4 x√2 x R) के बराबर भूमध्यरेखा होती है।

⇒ मॉलवीड प्रक्षेप पृथ्वी के वास्तविक अर्द्धव्यास को भी घटाकर निर्मित होता है।

⇒ सभी अक्षांश वृत्त सरल और समान्तर रेखाओं की तरह होते हैं। लेकिन भूमध्यरेखा से ध्रुव की ओर जाने पर अक्षांश रेखाओं के बीच की दूरी कम होती जाती है।

⇒ 90° पूर्वी और 90° पश्चिमी देशान्तर रेखा केन्द्रीय मध्याहन रेखा होती है। यही रेखा एक सरल देशान्तर रेखा होती है। जबकि शेष देशान्तर देखा दीर्घवृताकार होती है।

⇒ केवल केन्द्रीय मध्याहन रेखा अक्षांश को समकोण पर काटती है, शेष देशान्तर रेखा अक्षांश को तिरछी काटती है।

⇒ मॉलवीड प्रक्षेप में केन्द्रीय मध्याहन रेखा की लम्बाई भूमध्यरेखा की आधी रहती है।

⇒ केन्द्रीय मध्याहन रेखा से पूरब या पश्चिम की ओर जाने पर देशान्तर रेखाओं के बीच की दूरी घटते जाती है।

⇒ मॉलवीड प्रक्षेप विश्व मानचित्र बनाने हेतु, फसलों के उत्पादन दिखाने हेतु उपयोगी होता है। अत: यह संसार के वितरण मानचित्र बनाने के लिए सबसे उपयोगी है।

रूढ़ प्रक्षेप

मॉलवीड प्रक्षेप

(2) सैन्सन-फ्लैम्स्टीड या सिनुस्वायडल प्रक्षेप (Sanson-Flamsteed or Sinusoidal Projection)

सिनुस्वायडल प्रक्षेप का निर्माण 1650 ई० में निकोलस सैन्सन ने किया तथा बाद में जॉन फ्लैम्स्टीड ने इसमें संशोधन किया।

⇒ इसीलिए इसे सैन्सन-फ्लैम्स्टीड प्रक्षेप कहते है।

सिनुस्वायडल प्रक्षेप वास्तव में शंक्क्वाकार प्रक्षेप या बोन प्रक्षेप का एक भाग है।

सिनुस्वायडल प्रक्षेप पर क्षेत्रफल शुद्ध होता है।

सिनुस्वायडल प्रक्षेप में भूमध्यरेखा की लम्बाई 2πR के बराबर रखा जाता है। इसलिए भूमध्यरेखा पर लम्बाई शुद्ध होता है।

सिनुस्वायडल प्रक्षेप पर भूमध्यरेखा की लम्बाई πR के बराबर होता है।

⇒ सिनुस्वायडल प्रक्षेप की रचना में Sine Curve (ज्या वक्र) का प्रयोग होता है। इसलिए इसे ज्यावक्रीय या सिनुस्वायडल प्रक्षेप भी कहते हैं।

सिनुस्वायडल प्रक्षेप में सभी अक्षांश रेखायें सीधी, समान्तर और समान दूरी पर स्थित होते हैं।

⇒ विषुवत रेखा मानक अक्षांश रेखा का कार्य करता है।

⇒ केन्द्रीय मध्याहन रेखा एक लम्बवत एवं सरल रेखा होती है। लेकिन शेष सभी देशान्तर रेखाएँ मिश्रित वक्र होती है।

⇒ लेकिन एक ही अक्षांश रेखा पर दो देशान्तर रेखा के बीच की दूरी नियत रहती हैं। 

⇒ केवल केन्द्रीय मध्याहन रेखा विषुवतीय अक्षांश को समकोण पर काटती है और शेष को तिरछे काटती है।

⇒ केन्द्रीय मध्याहन रेखा पर मापनी शुद्ध होती है लेकिन अन्य देशान्तर रेखाओं पर अशुद्ध होती है।

सिनुस्वायडल प्रक्षेप पर सीमावर्ती भागो में आकृति काफी विकृत हो जाती है।

सिनुस्वायडल प्रक्षेप वैसे महाद्वीपों के लिए उपयोगी है जो विषुवत रेखा के दोनों ओ स्थित है। जैसे- अफ्रीका, द० अमेरिका।

उदाहरण 1. विश्व का मानचित्र बनाने के लिए एक सिनुस्वायडल प्रक्षेप की रचना कीजिए जिसकी मापनी 1:250000000 तथा प्रक्षेपान्तर 30 हो।

रचना विधि-

(i) मापनी के अनुसार आंकलित ग्लोब का अर्द्धव्यास, अर्थात

RR = 250000000/2500000000

= 1″

(ii) भूमध्य रेखा की लम्बाई = 2πR

= 2× 22/7 × 1″

= 6.28″

(iii) केन्द्रीय मध्याह्न रेखा की लम्बाई = 2πR/2

= 6.28″/2

= 3.14″

रूढ़ प्रक्षेप

सिनुस्वायडल प्रक्षेप

         उपरोक्त  चित्र A के अनुसार 1″ का अर्द्धव्यास लेकर वृत्त के चतुर्थांश ABO की रचना करते हैं। OB रेखा के O बिन्दु पर 30 के अन्तराल पर कोण बनाती हुई OC तथा OD रेखायें खींचते हैं।

    फिर BC की चापीय दूरी से O बिन्दु से एक चाप लगाते हैं जो OC तथा OD कोणिक रेखाओं को क्रमशः E तथा F बिन्दुओं पर काटता है। E तथा F बिन्दुओं से OA रेखा पर EE’ तथा FF’ लम्ब डालते हैं (अर्थात् OB के समान्तर रेखा खींचते हैं)। यही क्षैतिज दूरियाँ प्रक्षेप में सम्बन्धित अक्षांशों पर देशान्तरों के मध्य की दूरी को प्रकट करेंगी।

   अब चित्र B के अनुसार 6.28″ लम्बी क्षैतिज रेखा खींचते हैं जो भूमध्यरेखा कहलाती है। इस रेखा को BC की चापीय दूरी 2πR x Interval/360 से 360/ 30 = 12 समान भागों में विभाजित करते हैं।

   तत्पश्चात् इस रेखा के मध्यवर्ती बिंदु से ऊपर तथा नीचे दोनों ओर NS लम्ब डालते हैं, जिसकी लम्बाई भमध्यरेखा की आधी होती है। अर्थात् NS रेखा पर BC की चापीय दूरी से भूमध्यरेखा के ऊपर तथा नीचे तीन-तीन चिह्न अंकित करते हैं तथा इन चिन्हों से भूमध्यरेखा के समान्तर रेखायें खींचते हैं। ये समान्तर रेखायें क्रमशः 30 तथा 60 उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांश वृत्त होंगे और N व S बिन्दु क्रमशः उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुव होंगे।

     देशान्तर रेखायें बनाने के लिए 30° तथा 60 उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांश वृत्तों पर केन्द्रीय मध्याह्न रेखा के दायें-बायें दोनों ओर क्रमशः EE’ एवं FF’ दूरी से छः छः चिह्न लगाते हैं।

     तदुपरान्त अक्षांश वृत्तों पर अंकित समान देशान्तरीय मान वाले इन चिन्हों को ध्रुवों (N तथा S बिन्दुओं) से फ्रेंच कर्व द्वारा मिला कर देशान्तर रेखाओं की रचना पूर्ण करते हैं। चित्र की भांति केन्द्रीय मध्याह्न रेखा को 0° की देशान्तर मान कर शेष देशान्तर रेखाओं पर उनके अंशों में मान अंकित करते हैं।



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15. मर्केटर एवं गॉल प्रक्षेप में तुलना (Comparison Between Mercator’s and Gall Projection)

15. मर्केटर एवं गॉल प्रक्षेप में तुलना



मर्केटर एवं गॉल प्रक्षेप में तुलना⇒

मर्केटर प्रक्षेप  गॉल प्रक्षेप 
(1) मर्केटर प्रक्षेप में भूमध्य रेखा की लम्बाई 2πr होती है। (1) गॉल प्रक्षेप में भूमध्यरेखा की लम्बाई 45° अक्षांश के बराबर होती है।
(2) मर्केटर प्रक्षेप में ध्रुव को नहीं दिखाया जा सकता। (2) गॉल प्रक्षेप में ध्रुव को दिखाया जा सकता है।
(3) मर्केटर प्रक्षेप में प्रकाश का स्रोत केन्द्र पर होता है। (3) गॉल प्रक्षेप में प्रकाश का स्रोत विषुवत रेखा के ठीक  180 पर होता है।
(4) इसमें आकृति और दिशा शुद्ध होता है। (4) गॉल प्रक्षेप में आकृति, दिशा और क्षेत्रफल तीनों अशुद्ध होती है।
(5) सभी देशान्तर रेखाएँ Great Circle होती है। (5) इसमें यह गुण नहीं होता है।
(6) मर्केटर में रम्ब लाइन खींचा जाता है। (6) गॉ में रम्ब लाइन नहीं खींचा जाता है।
(7) मर्केटर प्रक्षेप नौसंचालन के लिए उपयुक्त है। (7) गॉल प्रक्षेप राजनीतिक मानचित्र के लिए उपयुक्त है।

मर्केटर एवं गॉल प्रक्षेप


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14. गॉल प्रक्षेप (Gall’s Projection)

14. गॉल प्रक्षेप (Gall’s Projection)



गॉल प्रक्षेप⇒

⇒ गॉल एक संशोधित बेलनाकार प्रक्षेप है।

⇒ इसे गॉल का त्रिविम प्रक्षेप भी कहते हैं क्योंकि इसमें प्रकाश के स्रोत विषुवत रेखा के ठीक 180 पर रहता है।

⇒ गॉल प्रक्षेप में समतल कागज का खोखला बेलन इस प्रकार रखा जाता है कि ग्लोब के 45ºN और 45°S अक्षांश को एक साथ काटता है। अतः इसमें भूमध्यरेखा की लम्बाई पृथ्वी की 45º अक्षांश रेखा के बराबर बनायी जाती है।

⇒ गॉल प्रक्षेप में अक्षांश वृत की लम्बाई एक समान, सीधी एवं समानान्तर होती है।

⇒ प्रत्येक अक्षांश रेखाओं की लम्बाई 45º अक्षांश वृत्त के लम्बाई (2πR Cos45) के बराबर होती है।

⇒ भूमध्यरेखा से ध्रुव की ओर जाने पर अक्षांश रेखाओं के बीच की दूरी बढती है, लेकिन मर्केटर प्रक्षे के तुलना में कम बढ़ती है।

⇒ सभी अक्षांश रेखाओं की लम्बाई 45° अक्षांश रेखा के बराबर होती है।

⇒ सभी देशान्तर रेखाएँ सीधी और समानान्तर होती हैं।

⇒ देशान्तर और अक्षांश रेखाएँ एक-दूसरे के समकोण पर काटती है।

⇒ केवल 45ºN से 45ºS अक्षांश पर मापनी शुद्ध होती है।

⇒ 45º अक्षांश से विषुवत रेखा की ओर जाने पर मापनी छोटी और ध्रुव की ओर जाने पर मापनी बढ़ी हुई होती है।

⇒ गॉल प्रक्षेप पर आकृति, क्षेत्रफल और दिशा तीनों अशुद्ध होती है।

⇒ गॉल प्रक्षेप पर राजनीतिक मानचित्र या दीवारी मानचित्र का निर्माण विशेष तौर पर किया जाता है।

उदाहरण 1. विश्व का मानचित्र बनाने के लिए एक गॉल्स प्रक्षेप की रचना कीजिए जिसकी मापनी 1 : 250000000 तथा प्रक्षेपान्तर 15 हो।

रचना विधि-

(i) मापनी के अनुसार आंकलित ग्लोब का अर्द्धव्यास, अर्थात

RR = 250000000/2500000000

= 1″

(ii) 45º अक्षांश वृत्त की लम्बाई = 2πR Cos45

= 2× 22/7 × 1″ x 0.71

= 4.46″

(iii) Interval Distance (अन्तरालीय दूरी)

= 45º अक्षांश वृत्त की लम्बाई x Interval ÷ 360

= 4.46″ x 15 ÷ 360

= 4.46″ / 24

= .186″

     RF के अनुसार Reduce Radius (RR) = 1″ पर वृत्त NESQ खींचा। केन्द्र O से EQ पर क्रमशः 15°, 30°, 45°, 60°, 75° के कोण बनाती हुई रेखाएं खींची। 45° की रेखा तथा परिधि के कटाव बिन्दु से ध्रुवीय अक्ष से समानान्तर रेखा खींची। सभी अक्षांशों व परिधि व कटान बिन्दु से E को मिलाया। ये रेखाएं अथवा इनके बढ़ाये हुए भाग जहाँ अक्ष के समानांतर खींची गई रेखा से मिलते हैं वह विषुवत रेखा से अक्षांशों की दूरी हुई।

    अतः विषुव अक्ष EQ को आगे बढ़ाया तथा 45° की रेखा पर अन्तरालीय दूरी (.186″) के अनुसार इस पर 24 भाग काट लिए। बिन्दुओं से विषुवत रेखा पर लम्बवत रेखाएं खींचा तथा पूर्व निर्मित रेखा पर प्राप्त कटान बिन्दुओं से विषुवत रेखा के समानान्तर रेखाएं खींचीं जो अक्षांश रेखाएं हैं। इस प्रकार रेखा-जाल तैयार हो जायेगा।

गॉल प्रक्षेप

गॉल प्रक्षेप



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