बेलनाकार प्रक्षेप(Cylindrical Projection) |
बेलनाकार प्रक्षेप (Cylindrical Projection)⇒
⇒ बेलनाकार प्रक्षेप में प्रकाश के स्रोत को ग्लोब के केन्द्र में स्थिर रखा जाता है और कागज को ग्लोब पर खोखले बेलन के रूप में लपेटकर अक्षांश एवं देशान्तर रेखाओं के रेखाजाल को समतल कागज पर उतारने का प्रयास किया जाता है।
⇒ सामान्य दशा में कागज का खोखला बेलन भूमध्यरेखा को स्पर्श करता है। ऐसी स्थिति में पृथ्वी के ध्रुवीय अक्ष और खोखले बेलन का अक्ष एक ही हो जाता है।
⇒ बेलनाकार प्रक्षेप में सभी अक्षांश वृत की लम्बाई एक समान होती है तथा सीधी एवं समान्तर रेखा के रूप में होती है।
⇒ बेलनाकार प्रक्षेप पर मध्य अक्षांशीय क्षेत्र और ध्रुवीय क्षेत्र में विवर्धन का गुण पाया जाता है।
⇒ सभी देशान्तर रेखाएँ समान लम्बाई वाली सरल एवं समान्तर रेखाओं के समान होती है तथा देशान्तर रेखाओं के बीच की दूरी भी एक समान होती है।
⇒ प्रत्येक अक्षांश रेखा देशान्तर को समकोण पर काटती है।
⇒ बेलनाकार प्रक्षेप में गणितीय विधि से सुधार लाकर अलग-अलग प्रक्षेप बनाये जाते हैं। जैसे-समदूरस्थ बेलनाकार प्रक्षेप, बेलनाकार समक्षेत्र प्रक्षेप।
| (1) समदूरस्थ बेलनाकार प्रक्षेप
(Cylindrical Equi-Distance Projection) |
इस प्रक्षेप में आक्षांश वृत्त एवं देशांतर रेखाएँ परस्पर समान दूरी के अंतर पर बनायी जाती है। इसीलिए इसे समदूरस्थ बेलनाकार प्रक्षेप के नाम से पुकारा जाता है।
⇒ चूँकि समदूरस्थ बेलनाकार प्रक्षेप को सर्वप्रथम प्लेट कैरी ने बनाया था। इसलिए इसे प्लेट कैरी प्रक्षेप भी कहा जाता है।
⇒ यह एक बेलनाकार प्रक्षेप का उदाहरण है, इसलिए इसमें सभी समदूरस्थ का गुण होता है।
⇒ अक्षांश वृत और देशान्तर रेखाओं के बीच की दूरी नियत रहती है। जिसके कारण दो क्रमबद्ध अक्षांश और दो क्रमबद्ध देशांतर रेखाओं के बीच का क्षेत्र एक वर्ग के समान दिखाई देती है।
⇒ सभी अक्षांश रेखाओं की लम्बाई भूमध्यरेखा के बराबर होती है।
⇒ सभी अक्षांश रेखाएँ सीधी एवं समान्तर होती है।
⇒ देशान्तर रेखाएँ भी सीधी एवं समान्तर होती है। लेकिन देशान्तर रेखाओं की लम्बाई भूमध्यरेखा की आधी होती है।
⇒ खोखला बेलनाकार कागज केवल विषुवत रेखा को स्पर्श करता है। इसलिए उस पर मापनी शुद्ध होती है।
⇒ सभी देशान्तर रेखाओं पर मापनी शुद्ध होती है।
⇒ इसमें ध्रुव भूमध्यरेखा के लम्बाई के बराबर प्रदर्शित किया जाता है।
⇒ भूमध्यरेखा से ध्रुव की ओर जाने पर अक्षांश वृत्तों की लम्बाई वास्तविक लम्बाई से बढ़ती जाती है।
⇒ सम्दूरस्थ बेलनाकार प्रक्षेप न तो यथाकृति और न ही समक्षेत्र का गुण होता है।
⇒ विषुवत रेखा के आस-पास क्षेत्रों को प्रदर्शित करने के लिए उपयोगी है अर्थात् इस पर विषुवतीय प्रतिरोधी जलधारा, विषुवतीय पछुवा हवा इत्यादि प्रदर्शित कर सकते है।
उदाहरण 1. 1:370,000,000 मापनी एवं 30º अंतराल पर संसार का मानचित्र बनाने के लिए एक समदूरस्थ बेलनाकार प्रक्षेप बनाइए।
रचना विधि :
प्रश्न के अनुसार,
1. पृथ्वी के लघुकृत गोले का अर्द्धव्यास,
R(RR) = 635000000/370000000 = 1.72cm
2. भूमध्यरेखा की लंबाई = 2πR = 2 x 22 x 1.72/7 = 10.81 cm
3. दो देशांतर रेखाओं के बीच की दूरी
= 2πR x अंतराल (अंश)/360 = 10.81×30/360 = 0.90 cm

अब 10.81 cm लंबी AB सरल रेखा खींचिए। यह प्रक्षेप में भूमध्यरेखा होगी। इस रेखा के A बिन्दु पर CD तथा B बिन्दु पर EF लंब उठाइए। अब 0.90 cm दूरी के अंतराल पर AB रेखा को 12 समान भागों में विभाजित कीजिए तथा विभाजक बिन्दुओं से CD के समान भूमध्य रेखा के दोनों ओर लंब खीचिए। ये लंब प्रक्षेप में देशांतर रेखाओं को प्रकट करेंगे। A बिन्दु के दोनों ओर CD रेखा पर 0.90 cm के अंतर पर 3-3 चिह्न लगाइए एवं इन चिह्नों से भूमध्यरेखा के समानांतर रेखाएँ खींचकर आक्षांश वृत्त पूर्ण कीजिए।
उदाहरण 2. 1:300,000,000 मापनी एवं 15º अंतराल पर संसार का मानचित्र बनाने के लिए एक समदूरस्थ बेलनाकार प्रक्षेप बनाइए।
रचना विधि :
प्रश्न के अनुसार,
1. पृथ्वी के लघुकृत गोले का अर्द्धव्यास,
R(RR) = 635000000/300000000 = 2.1cm
2. भूमध्यरेखा की लंबाई = 2πR = 2 x 22 x 2.1/7 = 13.2 cm
3. दो देशांतर रेखाओं के बीच की दूरी
= 2πR x अंतराल (अंश)/360 = 13.2×15/360 = 0.55 cm
पहचान (Identification):-
1. इस प्रक्षेप में अक्षांश वृत्त एवं देशांतर रेखाएँ समान दूरी पर स्थित होती हैं, जिससे पूरा रेखाजाल वर्गाकार (Grid Pattern) दिखाई देता है।
2. सभी अक्षांश वृत्तों की लंबाई भूमध्य रेखा के बराबर होती है। इसलिए सभी अक्षांश वृत्त सरल, सीधी एवं समानांतर रेखाओं के रूप में प्रदर्शित किए जाते हैं।
3. देशांतर रेखाएँ भी सीधी एवं समानांतर होती हैं तथा वे सभी अक्षांश रेखाओं को समकोण (90°) पर प्रतिच्छेद करती हैं।
4. इस प्रक्षेप में प्रत्येक देशांतर रेखा की लंबाई भूमध्य रेखा की आधी होती है, जो इसकी एक विशिष्ट पहचान है।
गुणधर्म (Properties):-
1. सभी अक्षांश वृत्त भूमध्य रेखा से वास्तविक दूरी पर अंकित किए जाते हैं, इसलिए देशांतर रेखाओं पर मापनी (Scale) सही रहती है।
2. भूमध्य रेखा (Equator) वह मानक अक्षांश है जहाँ प्रक्षेपण बेलन (Cylinder) पृथ्वी को स्पर्श करता है, इसलिए भूमध्य रेखा पर मापनी पूर्णतः शुद्ध होती है।
3. भूमध्य रेखा को छोड़कर अन्य सभी अक्षांश वृत्त अपनी वास्तविक लंबाई से अधिक बड़े प्रदर्शित होते हैं। परिणामस्वरूप उन पर मापनी अशुद्ध हो जाती है। यह अशुद्धता भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर क्रमशः बढ़ती जाती है, अर्थात् उच्च अक्षांशों में विकृति अधिक होती है।
4. इस प्रक्षेप में दोनों ध्रुवों को भूमध्य रेखा के बराबर लंबी सीधी रेखाओं के रूप में प्रदर्शित किया जाता है, जिससे उच्च अक्षांशों पर मापनी एवं आकृति की विकृति स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
उपयोग (Uses):-
यह प्रक्षेप न तो यथाकृतिक (Conformal) है और न ही समक्षेत्र (Equal-Area) है। फिर भी भूमध्य रेखा के समीप स्थित क्षेत्रों की आकृति एवं क्षेत्रफल अपेक्षाकृत कम विकृत दिखाई देते हैं। इसलिए इसका उपयोग मुख्यतः भूमध्यरेखीय क्षेत्रों के सामान्य मानचित्रों के निर्माण में सीमित रूप से किया जाता है।
उच्च अक्षांशों में विकृति अधिक होने के कारण ध्रुवीय क्षेत्रों तथा संपूर्ण विश्व के मानचित्र (World Maps) बनाने के लिए यह प्रक्षेप उपयुक्त नहीं माना जाता।
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य: इस प्रक्षेप में भूमध्य रेखा पर मापनी शुद्ध, जबकि ध्रुवों की ओर विकृति क्रमशः बढ़ती जाती है, इसलिए इसका उपयोग केवल निम्न अक्षांशीय (Equatorial) क्षेत्रों के मानचित्रण तक ही सीमित रहता है।
| (ii) बेलनाकार समक्षेत्र प्रक्षेप
(Cylindrical Equal Area Projection) |
⇒ बेलनाकार समक्षेत्र प्रक्षेप को सर्वप्रथम लैम्बर्ट महोदय ने बनाया था। इसलिए इसे लैम्बर्ट या Equal Area Projection भी कहते हैं।
⇒ इसमें अक्षांश वृत्त सीधा एवं समान्तर रेखा के समान होता है।
⇒ सभी अक्षांश वृत की लम्बाई भूमध्यरेखा के लम्बाई के बराबर होता है। लेकिन भूमध्यरेखा से ध्रुवों की ओर जाने पर अक्षांश रेखाओं के बीच की दूरी कम होते जाती है।
⇒ देशान्तर रेखाएँ सीधी, समान्तर और समान दूरी पर स्थित होती है।
⇒ इसमें भी ध्रुव को भूमध्यरेखा के लम्बाई के बराबर प्रदर्शित किया जाता है।
⇒ भूमध्यरेखा पर मापनी शुद्ध होती हैं लेकिन अक्षांश रेखाओं पर अशुद्ध होती है।
⇒ बेलनाकार समक्षेत्र प्रक्षेप में देशान्तर रेखाओं को पृथ्वी ध्रुवीय व्यास के बराबर बनायी जाती है। जिसके कारण देशान्तर रेखाओं के मापनी अशुद्ध हो जाते हैं।
⇒ विषुवत रेखा से ध्रुवा की ओर जाने पर आकृति विकृत होने लगता है।
⇒ इसका प्रयोग कभी-2 वितरण मानचित्र को प्रदर्शित करने में किया जाता है।
⇒ विषुवत रेखा से ध्रुव की ओर जाने पर आकृति विकृत होने के कारण इसे “Wrinkal Projection” भी कहते हैं।
उदाहरण (Example)-
1 : 350,000,000 की मापनी तथा 30° के अक्षांश–देशांतर अंतराल पर संसार का एक बेलनाकार समक्षेत्र प्रक्षेप (Cylindrical Equal-Area Projection) निर्मित कीजिए।
आलेखी विधि (Graphical Method):
दिए गए पैमाने के अनुसार पृथ्वी के लघुकृत गोले का अर्द्धव्यास (R) होगा-
(1) R = 635000000/350000000
=1.8 सेमी
(2) भूमध्य रेखा की लंबाई = 2πR
= 2×22/7×1.8
= 11.3 सेमी
(3) 30° के अंतराल पर दो क्रमागत देशांतर रेखाओं के बीच की दूरी
= 11.3×30/360
अब सबसे पहले किसी सुविधाजनक बिंदु O को केंद्र मानकर 1.8 सेमी त्रिज्या का एक अर्द्धवृत्त (ABC) बनाइए। इसमें AC रेखा वृत्त का ध्रुवीय व्यास (Polar Diameter) होगी।
इसके बाद O और B बिंदुओं को मिलाकर रेखा को आगे बढ़ाइए तथा इस बढ़ी हुई रेखा पर B से 11.3 सेमी लंबाई लेकर D बिंदु निर्धारित कीजिए। BD रेखा प्रक्षेप की भूमध्य रेखा (Equator) होगी।
अब B तथा D बिंदुओं पर BD के लंबवत क्रमशः EF तथा GH रेखाएँ खींचिए। ये दोनों रेखाएँ प्रक्षेप में 180° पश्चिम तथा 180° पूर्व देशांतर रेखाओं का प्रतिनिधित्व करेंगी।
अब O बिंदु से 30° के अंतराल पर ऊपर की ओर OI तथा OJ तथा नीचे की ओर OK एवं OL रेखाएँ खींचिए।
इसके बाद A, J, I, K, L तथा C बिंदुओं से BD के समानांतर रेखाएँ खींचिए। ये रेखाएँ क्रमशः- 90° N, 60° N, 30° N, 30° S, 60° S, तथा 90° S अक्षांश वृत्तों को प्रदर्शित करेंगी।
BD रेखा को 0.94 सेमी के समान अंतराल पर विभाजित कीजिए। वैकल्पिक रूप से इसे 360° ÷ 30° = 12 समान भागों में भी विभाजित किया जा सकता है।
इन सभी विभाजन बिंदुओं से EF के समानांतर लंबवत रेखाएँ खींचिए। यही रेखाएँ 30° के अंतराल पर देशांतर रेखाओं का प्रतिनिधित्व करेंगी।
अंत में सभी अक्षांश एवं देशांतर रेखाओं पर उनके संबंधित अंश (Degrees) अंकित कर प्रक्षेप को पूर्ण कीजिए।

पहचान (Identification):-
1. इस प्रक्षेप में अक्षांश वृत्त सीधी एवं समानांतर रेखाओं के रूप में प्रदर्शित किए जाते हैं तथा प्रत्येक अक्षांश वृत्त की लंबाई भूमध्य रेखा के बराबर होती है।
2. अक्षांश वृत्तों के बीच की दूरी भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर क्रमशः कम होती जाती है, जिससे यह प्रक्षेप आसानी से पहचाना जा सकता है।
3. देशांतर रेखाएँ भी सीधी एवं परस्पर समानांतर होती हैं तथा उनके बीच की दूरी पूरे प्रक्षेप में समान रहती है।
4. सभी अक्षांश एवं देशांतर रेखाएँ एक-दूसरे को समकोण (90°) पर प्रतिच्छेद करती हैं।
5. ध्रुव, जो पृथ्वी पर एक बिंदु होता है, इस प्रक्षेप में भूमध्य रेखा के बराबर लंबी सीधी रेखा के रूप में प्रदर्शित किया जाता है।
गुणधर्म (Properties):-
1. भूमध्य रेखा (Equator) अपनी वास्तविक लंबाई के बराबर प्रदर्शित होती है, इसलिए भूमध्य रेखा पर मापनी (Scale) पूर्णतः शुद्ध रहती है।
2. भूमध्य रेखा को छोड़कर अन्य सभी अक्षांश वृत्त अपनी वास्तविक लंबाई से बड़े बनाए जाते हैं, जिसके कारण उन पर मापनी शुद्ध नहीं रहती।
3. इस प्रक्षेप में देशांतर रेखाओं की लंबाई पृथ्वी के लघुकृत गोले के ध्रुवीय व्यास के बराबर रखी जाती है। परिणामस्वरूप वे अपनी वास्तविक लंबाई से छोटी हो जाती हैं, जिससे देशांतर रेखाओं पर मापनी में अशुद्धि उत्पन्न होती है।
4. यह समक्षेत्र (Equal-Area) प्रक्षेप है, इसलिए क्षेत्रफल सही प्रदर्शित होता है, किंतु भूमध्य रेखा से दूर जाने पर आकृतियों (Shapes) में विकृति (Distortion) तेजी से बढ़ने लगती है।
उपयोग (Uses):-
यद्यपि इस प्रक्षेप का उपयोग कभी-कभी विश्व के वितरण मानचित्र (World Distribution Maps) तैयार करने में किया जाता है, फिर भी यह भूमध्य रेखा के निकट स्थित क्षेत्रों के वितरण मानचित्रों के लिए अधिक उपयुक्त माना जाता है।
जलवायु, वनस्पति, मृदा, कृषि तथा जनसंख्या वितरण जैसे विषयगत (Thematic) मानचित्रों में इसका प्रभावी उपयोग किया जाता है, विशेषकर जब क्षेत्रफल की शुद्धता (Equal Area) आवश्यक हो।
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य: इस प्रक्षेप की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि क्षेत्रफल (Area) शुद्ध रहता है, जबकि भूमध्य रेखा से दूर जाने पर आकृतियों में विकृति बढ़ती जाती है। यही इसकी प्रमुख पहचान एवं उपयोगिता है।
Read More:
- 1.Cartography / मानचित्रावली
- 2. मानचित्र के प्रकार
- 3. मानचित्र प्रक्षेपों का वर्गीकरण
- 4. प्रमुख भौगोलिक यंत्र
- 5. भौगोलिक सूचना तंत्र क्या है?
- 6.भूगोल में मापनी एवं मापनी के प्रकार
- 7. मानचित्र का विवर्धन एवं लघुकरण
- 8. मानचित्र प्रक्षेप (Map Projection)
- 9. शंकु प्रक्षेप (Conical Projection)
- 10. बोन तथा बहुशंकुक प्रक्षेप (Bonne’s and Polyconic Projection)
- 11. बेलनाकार प्रक्षेप (Cylindrical Projection)
- 12. Zenithal Projection (खमध्य प्रक्षेप)
- 13. Mercator’s Projection (मर्केटर प्रक्षेप)
- 14. गॉल प्रक्षेप (Gall Projection)
- 15. मर्केटर एवं गॉल प्रक्षेप में तुलना (Comparison Between Mercator’s and Gall Projection)
- 16. रूढ़ प्रक्षेप, मॉलवीड प्रक्षेप, सिनुस्वायडल प्रक्षेप
- 17. विकर्ण तथा वर्नियर स्केल (Vernier and Diagonal Scale)
- 18. आलेखी / रैखिक विधि (Graphical or Linear Method)
- 19. आरेख का प्रकार एवं उपयोग /Diagram: Types & uses
- 20. हीदरग्राफ, क्लाइमोग्राफ, मनारेख और अरगोग्रफ
- 21. जनसंख्या मानचित्र के प्रकार एवं प्रदर्शन की विधियाँ
Leave a Reply