Archives November 2023

30. भूगोल एक क्षेत्र-वर्णनी विज्ञान (Chorological Science) है। विवेचना कीजिये।

30. भूगोल एक क्षेत्र-वर्णनी विज्ञान (Chorological Science) है। विवेचना कीजिये।


           भूगोल एक ‘क्षेत्र-वर्णनी विज्ञान’ (Chorological Science) है, भूगोल के इस स्वरूप को प्रतिपादित करने का मुख्य श्रेय जर्मनी के दो प्रमुख निम्न भूगोलवेत्ताओं को जाता है:

1. वॉन रिचथोफेन (Von Richthofen)

2. अल्फ्रेड हैटनर (A. Hettner)

     इन दोनों भूगोलवेत्ताओं ने भूगोल के अध्ययक्ष क्षेत्र (scope) की व्याख्या भी की थी और अन्य क्रमबद्ध विज्ञानों (systematic science) के साथ भूगोल के सम्बन्धों का विश्लेषण (analysis) और संश्लेषण (synthesis) भी किया था।

1. वॉन रिचथोफेन (Von Richthofen 1833-1905):-

        यद्यपि रिचथोफेन की शिक्षा भूगर्भ विज्ञान या भौमिकी (Geology) में हुई थी, परन्तु यह एक प्रसिद्ध भौतिक भूगोलवेत्ता (Physiographer) थे और साथ ही उन्होंने भूगोल के मानवीय पक्ष का भी ध्यान रखा था। वे बोन, लीपजिंग तथा बर्लिन विश्वविद्यालयों में प्राध्यापक भी रहे थे। सर्वप्रथम उनके अन्वेषण आल्पस क्षेत्र में आस्ट्रिया के टिरोल (Tyrol) प्रदेश में हुए थे तत्पश्चात् वह ट्रांसिल्वानिया तक बढ़ा और पूर्वी चीन में जाकर रहा।

        चीन में उसने व्यापक विस्तृत क्षेत्र अध्ययन करके सन् 1882 में ‘चीन का भूगोल’ नामक पुस्तक तथा उसकी मानचित्रावली (Atlas) प्रकाशित की। रिचथोफेन ने चीन के शान्टुग और किआओचाऊ क्षेत्रों में कोयले के भण्डारों को बताया था। वह संयुक्त राज्य अमेरिका में कैलीफोर्निया भी गया था जहाँ उसने सोने के भण्डारों की भी खोज की थी।

     रिचथोफेन चीन में भू-विज्ञानी (Geologist) होकर गया था और वहाँ से भूगोलवेत्ता (Geographer) बनकर लौटा था। चीन के भूगोल पर रिचथोफेन की ग्रन्थमाला कुछ उसके जीवनकाल में और कुछ उसकी मृत्यु के बाद सन् 1877 से 1912 तक प्रकाशित हुई थी उसमें 5 ग्रन्थ थे। इस ग्रन्थमाला के प्रकाशन से रिचथोफेन विश्वविख्यात हो गया था। प्रथम ग्रन्थ पर ही उसको ‘Royal Geographical Society’ के संस्थापक का पदक मिला था। जर्मनी में वापस आने के बाद बोन विश्वविद्यालय में और फिर लीपजिग विश्वविद्यालय में भूगोल के प्रोफेसर के पद पर नियुक्ति हुई। तत्पश्चात् वह बर्लिन विश्वविद्यालय में प्रोफेसर नियुक्त हुए थे।

    कई वर्षों तक वह ‘Berlin Geographical Society’ के अध्यक्ष भी रहे थे। उन्होंने महासागरीय संस्थान (Oceanographical Institute of Berlin) को ठोस वैज्ञानिक आधार पर स्थापित किया था।

       रिचथोफेन का मुख्य कार्य भौतिक भूगोल में विशेष भू-आकृति विज्ञान (Geomorphology) के क्षेत्र में है। सर्वप्रथम उसने रिया तटों (Ria Coasts) और फियोर्ड (Fiord Coasts) का अन्तर समझाया था। बाद में उसने प्रदेशों का अध्ययन करके सामान्य तुलनात्मक भूगोल (General Comparative Geography) की स्थापना की थी।

      जर्मनी में रिचथोफेन का निकटतम शिष्य अल्ब्रेट पेंक (Albrecht Penck) था। जर्मनी से बाहर उसके ग्रन्थों की प्रशंसा ब्लाश ने बहुत अधिक की, परन्तु उसका सबसे अधिक प्रमुख सहायक कार्यकर्ता अमेरिकन भौतिक भूगोलशास्त्री डेविस (W. M. Davis) था।

     वॉन रिचथोफेन ने भूगोल को ‘क्षेत्र-वर्णनी विज्ञान’ (Chorological Science) सिद्ध किया था अर्थात् भूगोल में पृथ्वीतल की क्षेत्रीय विभिन्नताओं (Areal Variations) का अध्ययन होता है। उसने अपने लेखों में कहा था कि भूगोल की अध्ययन सामग्री में अनेक प्रकार के तथ्यों की बहुत बड़ी संख्या होती है, उस सब तथ्यों को मिलाकर एक विषय के अन्तर्गत अध्ययन करने के लिए अध्ययन की विधि को तय करना बहुत अधिक आवश्यक है। इस दृष्टिकोण से भूगोल क्षेत्रीय भिन्नता (Areal diversity) का विषय है। रिचथोफेन के अनुसार भौगोलिक अध्ययन में क्षेत्रीय सिद्धान्त (Areal principle) अनिवार्य था।

       “इस प्रकार भूगोल को ‘क्षेत्रीय विज्ञान’ का स्वरूप देने का मुख्य श्रेय वॉन रिचथोफेन को ही है।”

2. अल्फ्रेड हैटनर (Alfred Hettner 1859-1941):-

      हैटनर महोदय बीसवीं शती के अग्रगण्य रीति-विधायक (Methodologist) माने जाते हैं। हैटनर ने अन्य भूगोलवेत्ताओं की अपेक्षा सबसे अधिक मात्रा में भूगोल को दार्शनिक तथा वैज्ञानिक आधार प्रदान किया था। उसने भूगोल की एक प्रमुख अनुसन्धान पत्रिका (Research Journal) को प्रकाशित किया था। साथ ही कई ग्रन्थ भी लिखे, जिनमें प्रमुख ग्रन्थ भूगोल के विधि तंत्र (Methodology) पर और प्रादेशिक भूगोल पर थे और लगभग 30 व्यक्तियों को डाक्ट्रेट की उपाधि के लिए शोधकार्य कराया था।

भूगोल एक क्षेत्र
      हैटनर भूगोल के ही विद्यार्थी थे। वे रिचथोफेन तथा रेटजेल के शिष्य थे। उनकी नियुक्ति हाइडिलबर्ग विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के पद पर थी। वह मूलतः भौतिक भूगोलवेत्ता तथा प्रादेशिक भूगोलवेत्ता थे। उन्होंने बहुत सी भौगोलिक यात्राएं भी की थीं।

        भौतिक भूगोल पर उसके बहुत से शोध पत्र (Research papers) भी प्रकाशित हुए थे जो 1919 से आगे के वर्षों में 4 खण्डों में छपे थे। यूरोप के भूगोल की पुस्तक 1907 में छप चुकी थी, परन्तु उसका संशोधित संस्करण शेष विश्व के भूगोल के साथ सन् 1923 में प्रकाशित हुआ था। हैटनर की विशेष ख्याति भौगोलिक विधि तंत्र(Geographical methodology) पर लिखे गए ग्रन्थ द्वारा हुई थी जो सन् 1927 में प्रकाशित हुआ था।

      हैटनर ने अपने लेखों में काण्ट द्वारा प्रस्तुत भूगोल की परिभाषा का पुनरावर्तन किया और उस ढांचे के अन्दर हम्बोल्ट, रेटजेल एवं पेशेल के द्वारा लिखे गए क्रमबद्ध अध्ययन (Systematic Study) को तथा रिचथोफेन, रिटर एवं मार्थे के द्वारा लिखे गए प्रादेशिक अध्ययनों को परस्पर शामिल करके भूगोल को एक समबद्ध पूर्ण (Coherent whole) विषय बना दिया है।

     उसने एक भौगोलिक पत्रिका ‘Geographische Zeitschrift’ सन् 1895 में प्रकाशित की थी। वास्तव में हैटनर की विचारधारा का प्रकाशन उस पत्रिका की प्रस्तावना में, उसके बाद सन् 1898 में भूगोल का प्रोफेसर होने के प्रारम्भिक भाषण में, तत्पश्चात् भौगोलिक विधि-तंत्र पर प्रकाशित पुस्तक में हुआ है।      

   अलफ्रेड हैटनर के अनुसार भूगोल सामान्य भू-विज्ञान नहीं है, वरन् पृथ्वी तल का क्षेत्रीय विज्ञान है। “Geography is a Chorological Scinece of the earth’ Surface.”

      इसका सम्बन्ध प्रमुख रूप से प्रकृति और मनुष्यों के बीच पारस्परिक क्रियाओं से होता है इसके अन्तर्गत स्थानिक सम्बन्धों का मूल्यांकन भी होता है। भूगोल का प्राथमिक रूप से उद्देश्य क्षेत्रों या प्रदेशों का अध्ययन करना है। हैटनर ने सामान्य भूगोल एवं विशेष भूगोल अथवा प्रादेशिक भूगोल के अन्तर को भी समझाया है। सामान्य भूगोल के अन्तर्गत भूतल पर विभिन्न भौगोलिक परिघटनाओं (Phenomena) के वितरण का क्रमबद्ध (Systematic) वर्णन होता है। दूसरे विशेष या प्रादेशिक भूगोल (Landerkunde) के अन्तर्गत प्रदेशों के भौगोलिक तत्वों का अध्ययन होता है।

       सन् 1905 में हैटनर ने भूगोल की परिभाषा में कहा, कि भूगोल पृथ्वी का क्षेत्रीय विज्ञान है, जिसमें क्षेत्रों का अध्ययन उनकी विभिन्नताओं और स्थानिक सम्बन्धों के प्रसंग में होता है।

       क्षेत्रों (Area) के अध्ययन में हैटनर ने प्रकृति और मनुष्य दोनों को सम्मिलित किया है। इन दोनों को अलग-अलग नहीं किया जा सकता।

   अलफ्रेड हैटनर के भौगोलिक विधि तंत्र (Methodology) पर लिखे गए शोध प्रबन्ध, जिनको वह विधि विहार (Methodological rambles) कहकर सम्बोधित करते थे तथा जलवायु एवं उच्चावचन (relief) पर उनके विवेचन आज भी भौगोलिक ज्ञान और प्रस्तुतीकरण (Presentation) में उच्च स्थान पर हैं। उसने अपनी भौगोलिक पत्रिका ‘Geographische Zetschrift’ का लेखन सम्पादन निरन्तर नियमित रूप से किया था। सन् 1905 में सोवियत संघ के भूगोल पर एक श्रेष्ठ पुस्तक, सन् 1907 में यूरोप का भूगोल और सन् 1915 में ब्रिटेन का मूल्यांकन हैटनर महोदय ने प्रकाशित कराया था।

        उसने अपनी भौगोलिक पत्रिका में, पुस्तक के रूप में अपने भू-प्राकृतिक अध्ययन- महाद्वीपों की स्थलाकृति (The terrain Features of the continents) और विश्व के सांस्कृतिक भूगोल (The march of culture over the world) की पुस्तकें भी छपवाई थीं।

प्रश्न प्रारूप

1. भूगो एक क्षेत्र-वर्णनी विज्ञा (Chorological Science) है। विवेचना कीजिये।


29. भूगोल में क्षेत्रीय विभेदन अथवा विभिन्नता (Areal Differentiation) की संकल्पना

 29. भूगोल में क्षेत्रीय विभेदन अथवा विभिन्नता (Areal Differentiation) की संकल्पना



            क्षेत्रीय विभेदन भूगोल की आत्मा स्वरूप है। अन्तर्सम्बन्ध की प्रक्रिया तो मात्र यह स्पष्ट करती है कि पृथ्वी पर पाए जाने वाले तथ्य कैसे एक जैविक इकाई की तरह परस्पर ससंजित एवं क्रियाशील हैं, लेकिन इन तथ्यों की जिनमें प्राकृतिक वातावरण एवं मनुष्य आते हैं, अपनी अलग विशेषताएँ होती हैं।

     यदि हम पृथ्वी की सतह को देखें तो पृथ्वी की सतह का दो-तिहाई हिस्सा जल है एवं एक-तिहाई भाग थल है। थल पर मिट्टी की असमान परत है तथा अनेक भू-आकृतियाँ हैं, जैसे-पर्वत, पठार, मैदान, घाटियाँ एवं उसके विविध रूप। जल भी अनेक छोटे-बड़े सागरों, नदियों, झीलों में विभक्त है। थल पर नदियाँ, हिमानी, झरने, भूमिगत जल, अन्तरादेशीय प्रवाह प्रणालियाँ, जंगल, घास के मैदान, पशुजीवन, मरुस्थल, कृषि क्षेत्र आदि दृष्टव्य हैं।

       जल की सतह पर कोरल रीफ, जल से प्राप्त पदार्थ, थल से प्राप्त पदार्थ, जलीय वनस्पतियाँ, मछलियाँ, कछुए आदि अनेक जीव हैं। वायुमण्डल भी पृथ्वी की सतह का अंग है। पृथ्वी अपनी धुरी पर 23°30′ अंश झुकी है एवं सूर्य की परिक्रमा करती है। वायुमण्डल भी उसके साथ घूमता है। पृथ्वी की सतह पर सूर्यताप का वितरण असमान है जो सूर्य से सापेक्ष स्थिति के अनुसार बदलता है। इससे पृथ्वी की जलवायु में विविधता आती है। इस तरह वैभिन्न्य पृथ्वी की सतह की मूल विशेषता है।

      दूसरी ओर मनुष्य हैं। मनुष्य अकेला नहीं होता। वह वस्तुतः समाज में रहता है। आज भी पृथ्वी की सतह पर आदिवासी जनजातियाँ हैं जो परस्पर युद्धरत रहती हैं। पशुचारण करने वाले समूह भी हैं। उन्नत समाज स्थायी कृषि करते हैं और उद्योग, व्यापार परिवहन में रत रहते हैं। उनके अधिवास हैं जो कहीं बिखरे हैं तो कहीं सघन हैं, ग्राम एवं नगर हैं, ये सब भी स्थान घेरते हैं।

     उपरोक्त दोनों तथ्य कैसे एक-दूसरे से एक जीव की तरह अन्तर्सम्बन्धित हैं, यह ऊपर विवेचित है। इस तरह यह अन्तर्सम्बन्धित वैविध्य पृथ्वी की सतह पर पहचाना जा सकता है तथा इसके छोटे-बड़े क्षेत्र दृष्टव्य होते हैं। उदाहरणार्थ ध्रुवीय क्षेत्र के एस्किमों निवासियों को अपना स्पष्ट क्षेत्र है, तो अफ्रीका के पिग्मी एवं कलाहारी के बुशमैन का अपना रहन-सहन एवं स्पष्ट क्षेत्र है।

        इतना ही नहीं असम घाटी में धान की खेती, कनाडा में गेहूँ की खेती के विस्तृत क्षेत्र, अर्जेन्टाइना में पशुचारक प्रदेश, संयुक्त राज्य अमेरिका एवं जापान में औद्योगिक प्रदेश सब वैभिन्य से परिपूर्ण होते हुए भी क्षेत्रीय इकाइयों के रूप में पहचाने जाते हैं। इस तरह, समाज एवं वातावरण के अन्तर्सम्बन्ध की परिणति क्षेत्रीय इकाई में होती है। ऐसी क्षेत्रीय इकाइयों का अध्ययन भूगोल का उद्देश्य है।

    यहीं से भूगोल में प्रदेश (Region) की संकल्पना का समावेश होता है। पृथ्वी की सतह के क्षेत्रीय वैभिन्न्य का विषम स्वरूप पृथ्वी को विभिन्न प्रखण्डों में बांट देता है। उदाहरण के लिए, गंगा के मैदान का धरातल, जलप्रवाह, मिट्टियाँ, मानव अधिवास, आदि मिलकर एक विशिष्ट जीवन पद्धति का गठन करते हैं। यह कृषि प्रधान क्षेत्र कहा जा सकता है, सीमांकित किया जा सकता है, क्योंकि इस प्रदेश में जीवन पद्धति की एकरूपता या समरूपता मिलती है। इस समरूपता के आधार पर इसे गंगा-यमुना प्रदेश के नाम से जाना जाता है।

       इसी तरह, पहाड़ी प्रदेश, पर्वतीय क्षेत्र, भूमध्यसागरीय प्रदेश, भूमध्यरेखीय प्रदेश आदि सब एक-दूसरे से भिन्न होते हुए भी अपने आन्तरिक क्षेत्रीय विस्तार में एक रूप होते हैं। इसलिए इन्हें प्रदेश कहते हैं।

     प्रदेश की संकल्पना भूगोल का क्रोड है। प्रदेश की परिभाषा, प्रदेश की पहचान एवं सीमांकन आदि सब अपने आप में विवेचना की विषय-वस्तु हैं। प्रदेश भौगोलिक भी होते हैं तथा प्रदेश की पहचान कराने वाले एक या अधिक तत्वों पर आधारित भी होते हैं। इस तरह प्रदेश अतिव्यापित भी हो सकते हैं।

     भूगोल के सैद्धान्तिक स्वरूप के उपरोक्त दोनों तत्व एक-दूसरे से सम्बन्धित हैं। अन्तर्सम्बन्ध पृथ्वी की सतह के तथ्यों को संसंजित करता है तथा क्षेत्रीय वैभिन्न्य भौगोलिक तथ्यों के स्थानिक प्रसार एवं उनके भौगोलिक व्यक्तित्व एवं अन्तर्निहित समरूपता को स्थापित करता है।

प्रश्न प्रारूप

1. भूगोल में क्षेत्रीय विभेद अथवा विभिन्नता (Areal Differentiation) की संकल्पना को विवेचित कीजिए।

28. स्थानिक या भूवैन्यासिक संगठन (Spatial Organisation) की संकल्पना

28. स्थानिक या भूवैन्यासिक संगठन (Spatial Organisation) की संकल्पना



        मानव समाज के स्थानिक या भूवैन्यासिक संगठन का अध्ययन आर्थिक एवं सामाजिक भूगोल में अध्ययन की मुख्य विषय-वस्तु है। पृथ्वी सतह पर या उसके साथ विभिन्न मानव समाजों की होने वाली अन्तर्क्रिया ही स्थानिक व्यवस्था का आधार है। स्थानिक विश्लेषण का मुख्य उद्देश्य इस स्थानिक व्यवस्था की संरचना और क्रियाविधि का परीक्षण करते हुए मानवीय गतिविधियों के स्थानिक प्रारूपों एवं प्रक्रियाओं को पहचानना है।

         मानवीय गतिविधियों के फलस्वरूप उत्पन्न स्थानिक प्रारूपों को तीन वर्गों में रखा जा सकता है, यथा:

(i) अवस्थिति- जो पृथ्वी सतह पर बिन्दु के रूप में है।

(ii) अन्तर्क्रिया- जो संचरण की रेखाएँ हैं जिनके सहारे माल, मनुष्य, विचारों और सेवाओं का वहन होता है।

(iii) प्रदेश- जो पृथ्वी सतह के समरूपी विशेषता वाले स्वरूपी या कर्मोपलक्षी क्षेत्र हैं।

      इन प्रारूपों को जन्म देने वाली स्थानिक प्रक्रियाएँ बड़ी जटिल हैं जिन्हें स्थानिक अन्तर्क्रिया द्वारा स्पष्ट किया जाता है। इन स्थानिक अन्तर्क्रियाओं में माल और सेवाओं का प्रवाह, प्रवसन, अल्पकालीन संचरण (जैसे- खरीददारी, वासस्थल से कार्यस्थल तक की यात्रा), सामाजिक संचरण, सूचनाओं का प्रसरण, आदि को सम्मिलित किया जाता है।

      इन प्रक्रियाओं के स्पष्टीकरण में मानवीय व्यवहार के अध्ययन पर विशेष जोर दिया जा रहा है। विशेषकर इस बात पर कि मानव व्यवहार उन माध्यमों से कैसे प्रभावित होता है। जिन माध्यमों से उसने अपने स्थान का अवबोध या प्रत्यक्षीकरण किया है। इस प्रकार के प्रारूप एवं प्रक्रियाएँ स्थानिक पर्यावरण में उत्पन्न होते हैं, जो बढ़ती दूरी के साथ घटते प्रभाव के कारण स्थानिक अन्तर्क्रिया को बाधित या नियंत्रित करते हैं, लेकिन जिस स्थान में मानव अपनी गतिविधियों को संचालित करता है, वह स्थान सापेक्षिक है, क्योंकि यह स्थान दूरियों पर आधारित है और दूरी सापेक्षिक होती है तथा निरन्तर परिवर्तनशील है।

        स्थानिक संगठन एक जटिल प्रक्रिया है। मानव प्रतिदिन अपने आवास स्थल से अपने कार्यस्थल को जाता है। यह कार्यस्थल खेत हो सकता है, कार्यालय हो सकता है, कोई कारखाना या शिक्षण संस्थान या व्यावसायिक प्रतिष्ठान आदि हो सकता है। इस संचरण (Movement) के फलस्वरूप मार्गों का निर्माण होता है। इस प्रकार, मनुष्य के आवास एवं कार्यस्थल में पारस्परिक रूप से कर्मोपलक्षी अन्तर्प्रक्रिया प्रारम्भ होती है। कृषि कार्य का क्षैतिज प्रसार अधिक होता है अतः ग्रामीण क्षेत्रों का स्थानिक संगठन ग्रामीण संस्कृति से प्रभावित होता है। उद्योग या व्यापार केन्द्राधारित (Nodal) होते हैं। इन केन्द्रों पर मनुष्य का गमनागमन एक भिन्न प्रतिरूप को जन्म देता है। मार्ग संगम बिन्दुओं पर केन्द्रस्थलों (Central Places) की स्थापना होती है।

           केन्द्रस्थल तृतीयक क्रियाकलापों के केन्द्र होते हैं तथा भूवैन्यासिक संगठन में इनकी प्रमुख भूमिका होती है। गमनागमन के मार्ग पगडंडी, कच्ची सड़क, पक्की सड़क, राज्य मार्ग, राष्ट्रीय राजमार्ग, आदि स्तरों के होते हैं। इनके संगम बिन्दुओं पर स्थापित केन्द्र स्थल भी अपने कर्मोपलक्षी रूप में छोटे एवं बड़े होते हैं। इसे केन्द्र स्थलों का पदानुक्रम (Hierarchy) कहते हैं। यह स्थानिक संगठन की संरचना का आधार होता है। उपभोक्ता अपनी आवश्यकतानुसार किसी केन्द्र स्थल पर आता-जाता है। इसे उपभोक्ता व्यवहार कहते हैं।

           उपभोक्ता किसी केन्द्र स्थल के चयन का निर्णय मनोवैज्ञानिक, सामाजिक एवं आर्थिक दृष्टिकोण से करता है। इसके साथ ही निवास या कार्यस्थल से केन्द्र स्थल की दूरी का प्रभाव भी उपभोक्ता व्यवहार एवं गमनागमन प्रतिरूप पर पड़ता है। यह सार्वभौमिक प्रवृत्ति होती है कि मानव न्यूनतम श्रम (लागत) से अधिकतम लाभ प्राप्त करना चाहता है। साथ ही बढ़ती दूरी के अनुरूप ही केन्द्र स्थलों का प्रभाव घटता भी जाता है। इस प्रकार स्थानिक या भूवैन्यासिक संगठन के मूल तत्व कार्यस्थल, गमनागमन, परिवहन मार्ग, अन्तर्सम्बन्ध, केन्द्र स्थल, पदानुक्रम, दूरी क्षय, आदि हैं।

     स्थानिक संगठन की संरचना गमनागमन की बारम्बारता, केन्द्र स्थल के पदानुक्रमीय वर्ग एवं इनके बीच होने वाली अन्योन्याश्रित प्रक्रिया से सम्बन्धित है। उल्लेखनीय है कि केन्द्र स्थल कर्मोपलक्षी रूप से छोटे एवं बड़े होते हैं। केन्द्र स्थलों का पदानुक्रमीय महत्व गमनागमन प्रतिरूप एवं बारम्बारता को प्रभावित करता है। इसी आधार पर प्रत्येक केन्द्र स्थल के प्रभाव क्षेत्र का निर्धारण किया जाता है। केन्द्र स्थल सिद्धान्त के अनुसार ये कर्मोपलक्षी प्रदेश षटकोणीय होते हैं तथा न्यूनतम श्रम से अधिकतम लाभ के सिद्धान्त का अनुपालन करते हैं। किसी भी क्षेत्र का स्थानिक संगठन वहाँ की भूमि के मूल्य से प्रभावित होता है।

      स्थानिक संगठन की प्रथम अवस्था में कोई गाँव या नगर दूरी पर स्थित होता है। धीरे-धीरे जनसंख्या बढ़ने से उसका प्रमुख कार्यक्षेत्र नगर के मध्य में स्थित होता है तथा जनसंख्या का बहाव बाहर की तरफ बढ़ता जाता है। इससे संलग्न ग्रामीण क्षेत्र की भूमि का उपयोग नगरीय कार्यों में होने लगता है, अतः इसका मूल्य बढ़ने लगता है। मानव अपनी बुद्धि चातुर्य के द्वारा परिवहन और संचार साधनों का विकास कर स्थानिक पर्यावरण को विशिष्टता प्रदान करता है।

        परिवहन और संचार साधनों के विकास द्वारा पृथ्वी सतह पर माल, सेवाओं, मनुष्यों और सूचनाओं के वहन में वृद्धि हुई है। समय और लागत दूरी को कम करके आपूर्ति एवं माँग के क्षेत्रों को समीप लाकर आर्थिक स्थानों में समन्वय स्थापित किया जा सकता है। इसी प्रकार दूरसंचार और शिक्षा द्वारा स्थान के सम्बन्ध में किए गए अवबोधों में विद्यमान अन्तरों में समन्वय स्थापित किया जा सकता है।

     इस प्रकार भूवैन्यासिक संगठन के संकल्पना सूत्र से भौगोलिक चिन्तन को न केवल सुनिश्चित दिशा मिली वरन् भौगोलिक अध्ययन मात्र वर्णनात्मक न रहकर प्रक्रिया विश्लेषण, सामान्यीकरण तथा सिद्धान्त प्रतिपादन के सोपानों से बढ़ता हुआ भविष्य के प्रक्षेपण (Projection) तथा पुनर्गठन के स्तर तक पहुँच गया। सभी गुण किसी विषय के सही अर्थ में वैज्ञानिक होने के दावे को स्थापित करते हैं। स्वाभाविक है कि इस स्तर तक पहुँचने में परम्परागत मानचित्र विवेचन के साथ-साथ सशक्त सांख्यिकीय विश्लेषण एवं प्रक्रियात्मक विवेचन की विधि बड़े पैमाने पर अपनाई गई। अतएव भूगोलवेत्ता क्षेत्रीय आयामयुक्त व्यावहारिक समस्याओं का निराकरण तथा समन्वित क्षेत्रीय विकास में अन्य विशेषज्ञों के साथ हाथ बंटाने में अधिक आत्मविश्वास के साथ अग्रसर हुए।

प्रश्न प्रारूप

1. स्थानिक या भूवैन्यासिक संगठन (Spatial Organisation) की संकल्पना का संक्षिप्त में विवण दीजिए।


27. अमेरिकन भौगोलिक विचारधाराओं पर प्रकाश डालिए।

27. अमेरिकन भौगोलिक विचारधाराओं पर प्रकाश डालिए।



     अमेरीका में स्कूल व कॉलेजों में भूगोल का अध्ययन मध्य उन्नीसवीं सदी में यूरोपियनों द्वारा प्रारम्भ किया गया। हार्वर्ड , डार्टमाउथ, याले, मेरी, कोलम्बिया, प्रिन्स्टन व पेंसिलवेनिया आदि विश्व विद्यालयों में गणितीय भौतिक व ऐतिहासिक भूगोल की शिक्षा वैसे 1795 से दी जाने लगी थी। आरनोल्ड गुयोट (Arnold Guyot) अमेरीका में भूगोल का प्रथम प्रोफेसर था।

     अमेरीकी भूगोलवेत्ताओं ने भूगोल के जिन क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान किया है, वे संक्षेप में इस प्रकार हैं:-

(i) मानव भूगोल (Human Geography):-

        मानव भूगोल के क्षेत्र में अमेरीकी भूगोलवेत्ताओं का विशेष योगदान है। अमेरीका में सैम्पुल (E. C. Semple), हंटिंगटन (E. Huntington), बोमैन (I. Bowman), ग्रिफिथ टेलर (G. Tailor) जैसे दिग्गज मानव भूगोलवेत्ता हुए हैं। इन्होंने मानव भूगोल की परिभाषा दी व उसका विषय-क्षेत्र निर्धारित किया।

        सैम्पुल की सबसे प्रसिद्ध पुस्तक Influence of Geographical Environment सन् 1911 में प्रकाशित हुई। यह पुस्तक वातावरण निश्चयवाद का कट्टर समर्थन करती थी। पुस्तक का प्रारम्भ ही इन शब्दों से हुआ है:-

“मनुष्य का जन्म पृथ्वी से हुआ है और वह पृथ्वी का शिशु मात्र ही नहीं है, अर्थात् वह पृथ्वी की धूल का एक पुतला मात्र ही नहीं है वरन् पृथ्वी उसकी माता है, जिसने उसे मातृत्व दिया है, उसका लालन-पालन किया है, उसको भोजन दिया है, उसके कार्यों को नियत किया है, उसके विचारों को निर्देशित किया है, उसके सामने कठिनाइयाँ प्रस्तुत की हैं, जिससे उसका शरीर सुदृढ़ हुआ है तथा उसकी बुद्धि कुशाग्र हुई है।”

      हटिंगटन की प्रसिद्ध पुस्तक Principles of Human Geography है। पुस्तक में हंटिंगटन ने मानव भूगोल की परिभाषा व विषय क्षेत्र निर्धारित करने का प्रयास किया है। साथ ही मानव भूगोल के अन्य पक्षों का भी वर्णन किया है। हंटिंगटन वातावरण निश्चयवाद के समर्थक थे।

   ग्रिफिथ टेलर को मानव भूगोल के क्षेत्र में नव-निश्चयवाद (Neo-Determinism) का प्रवर्तक माना जाता है। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘बीसवीं सदी में भूगोल’ (Geography in the Twentieth Century) है।

(ii) भौतिक भूगोल (Physical Geography):-

        भौतिक भूगोल के क्षेत्र में अमेरीकी भूगोलवेत्ता डेविस (William Morris Davis) का नाम प्रसिद्ध है। डेविस ने अपरदन चक्र की संकल्पना (Concept of Cycle of Erosion) का प्रतिपादन किया। यह संकल्पना काफी समय तक आदर्श मानी जाती रही। परन्तु पेंक ने इसकी भारी आलोचना की। फिर भी इस संकल्पना के महत्व को नकारा नहीं जा सकता। रोलिन सैलिसबरी, वेलेस स्टाउड भी उच्चकोटि के भौतिक भूगोलवेत्ता थे।

(iii) जलवायु विज्ञान (Climatology):-

      अमेरीका में जलवायु विज्ञान के क्षेत्र में प्रमुख कार्य जलवायु के वर्गीकरण व जलवायु प्रदेशों के मानचित्र तैयार करने से सम्बन्धित रहा है। थार्नथ्वेट ने 1918 में कोपेन द्वारा प्रस्तुत जलवायु विभाजन की आलोचना की तथा नवीन जलवायु वर्गीकरण प्रस्तुत किया। जलवायु विज्ञान के क्षेत्र में नए वैज्ञानिक यंत्रों से मदद ली गई।

(iv) स्थानीयकरण सिद्धान्त (Locational Theories):-

       कई अमेरीकी भूगोलवेत्ताओं ने स्थानीयकरण सिद्धान्तों में योगदान किया है। सर्वप्रथम 1909 में व्हाइटवेक ने एक शोध पत्र के माध्यम बताया था कि चीनी मिट्टी बर्तनों के उद्योग के लिए मिट्टी की स्थानीय उपलब्धता आवश्यक नहीं। वाल्डर टावर ने 1911 में औद्योगिक स्थानीयकरण को प्रभावित करने वाले कारकों की विवेचना की । हूवर ने वेबर के सिद्धान्त में संशोधन किया।

(v) राजनीतिक भूगोल (Political Geography):-

          राजनीतिक भूगोल में भी अमेरीकी भूगोलवेत्ताओं ने विशेष रुचि प्रदर्शित की। स्कूलों व कॉलेजों में इसे स्थान दिया गया। जार्ज क्रेसी, प्रेस्टन ई. जेम्स, राबर्ट एस. प्लाट व ईसा बोमैन प्रमुख राजनीतिक भूगोलवेत्ता थे।

         ईसा बोमैन की पुस्तक The New World में विभिन्न देशों के आपसी राजनीतिक सम्बन्धों की चर्चा थी। डी. व्हिटलसी ने एक पुस्तक The Earth and State प्रकाशित कराई। वाल्केनबर्ग की पुस्तक Elements of Political Geography में राजनीतिक भूगोल के विषय क्षेत्र की व्याख्या की गई थी।

(vi) कृषि भूगोल (Agricultural Geography):-

      कृषि भूगोल के क्षेत्र में अमेरीका में विशेष कार्य हुआ है। इस दिशा में सर्वप्रथम बरनर सी. फिंच और ओ. ई. वेकर ने महत्वपूर्ण प्रयास किए। 1917 में इन्होंने ‘संसार का कृषि भूगोल’ एटलस प्रकाशित की। वेकर ने 1921 में ‘संयुक्त राज्य अमेरिका के कृषि उत्पादन के अन्तर पर भौतिक कारकों के प्रभाव का महत्व’ लेख प्रकाशित किया।

1936 में व्हिटलसी ने संसार को कृषि प्रदेशों में विभक्त किया। कृषि व डेरी उद्योग से सम्बन्धित अनेक शोध कार्य किए गए।

(vii) नगरीय-भूगोल (Urban Geography):–

      मार्क जैफरसन (Mark Jafferson) प्रथम अमेरीकी-भूगोलवेत्ता थे जिन्होंने नगरों की स्थिति (Location) व जनसंख्या पर कार्य किया। उनकी “प्रधान नगर नियम’ संकल्पना” (Law of Primate City, 1939) ने अनेक विद्वानों को आकर्षित किया। सी. डी. हैरिस तथा उल्मान ने अमरीकी नगरों का कार्यात्मक वर्गीकरण किया।

प्रश्न प्रारूप

1. अमेरिकन भौगोलिक विचाधाराओं प प्रकाश डालिए।


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