5. The Concept of Sustainable Development (शाश्वत विकास की अवधारणा) 

5. The Concept of Sustainable Development

(शाश्वत विकास की अवधारणा)



        Sustainable Development

          विश्व में प्रादेशिक विकास की अवधारणा को समय-समय पर राजनीतिक विचारकों ने सर्वाधिक प्रभावित किया है। वर्तमान समय में प्रादेशिक विकास का जो स्वरूप उभड़ा है, वह विश्वव्यापी राजनीति से ओतप्रोत है। औपनिवेशिक राष्ट्रों का शोषण, अविकसित देशों के संसाधनों का दोहन, विनिर्माण प्रक्रिया एवं सम्पत्ति का शक्तिशाली राष्ट्रों में समूह प्रादेशिक विकास की आड़ में तथा विकास मॉडलों के अविवेकपूर्ण अध्यारोपण से प्रादेशिक विकास के परिणाम प्रभावित हुए हैं। पाकिस्तान आज भी आर्थिक विकास हेतु पराश्रित है । बंगलादेश भी स्वतंत्र होकर उसी दुश्चक्र का अंग बन गया है।

        नेपाल भारत की विरासत एक होते हुए भी नेपाल को अपने प्रच्छन्न व्यक्तित्व के प्रति आगाह करते हुए भारतीय उपमहाद्वीप के प्रादेशिक विकास को बाधित करने से 20वीं शताब्दी के अंत में सर्वत्र प्रादेशिक विकास एक खोखला नारा बनकर रह गया है। यही हाल ब्राजील, अर्जेण्टाइना, कैरेबियन राष्ट्र तथा अफ्रीकी देशों का है।

         विकास का अंतिम उत्पाद विनाश के रूप में प्रकट हो रहा है। इससे संसाधन विदोहन है। जन संसाधन का दुरुपयोग हुआ है। पर्यावरण की गुणवत्ता का ह्रास हुआ है तथा हुआ विकास के प्रति अरुचि उत्पन्न हुई हैं। इस परिप्रेक्ष्य में शाश्वत विकास या अक्षुण्ण विकास की प्रक्रिया का उल्लेख आवश्यक प्रतीत होता है।

       शाश्वत विकास की संकल्पना भौगोलिक संकल्पना है, जिसमें मानवीय और पारिस्थितिकीय तत्त्वों के अन्तर्क्रियात्मक सम्बन्धों को इस प्रकार व्यवस्थित एवं नियोजित करने पर बल दिया जाता है, जिससे आर्थिक विकास प्रतिरूप वर्तमान की आवश्यकताओं को पूरा करते हुए आगामी पीढ़ियों की आवयकताओं को पूर्ण कर सके।

       पहले यह स्पष्ट किया जा चुका है कि विकास या भौगोलिक सन्दर्भ में प्रादेशिक विकास मानव और उसकी विभिन्न विशेषताओं तथा प्राकृतिक पर्यावरण के तथ्यों के पारस्परिक कार्यात्मक सम्बन्धों का परिणाम है। विकास की प्रक्रिया में कुछ क्षेत्रों में मानवीय क्षमता के अत्यधिक निवेश से पर्यावरण के तथ्यों का अधिकाधिक शोषण हुआ। मनुष्य ने वहाँ कम समय में चरण विकास के लक्ष्य को प्राप्त कर लिया। वहाँ पुनः विकास के लिए संसाधनों की कमी सामने आने लगी है। दूसरी ओर विभिन्न पर्यावरणीय तथ्यों के अत्यधिक ह्रास से पारिस्थितिकीय संतुलन भी बिगड़ने लगा, जिससे मनुष्य के लिये खतरा उत्पन्न हो गया। इसी तरह दूसरे बहुत से क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों के अवैज्ञानिक शोषण से भी पारिस्थितिकीय सन्तुलन प्रभावित होने लगा।

        इस विषम परिस्थिति से निजात पाने के लिये ही वर्तमान समय में शाश्वत विकास की संकल्पना का जन्म हुआ है। यह एक विश्वव्यापी नारे के रूप में प्रचलित होती जा रही है जिसमें पारिस्थितिकीय संतुलन को बनाये रखना और जैवीय विविधता की सुरक्षा पर विशेष बल दिया जा रहा है। सातवें दशक के अंत में और 1992 में हुए पृथ्वी सम्मेलन में इस संकल्पना को व्यापक आधार मिला है।

        पारिस्थितिकीय शाश्वत विकास (Ecologically Sustainable Development) का सामान्य हिन्दी अनुवाद पारिस्थितिकीय दृष्टिकोण से उपयुक्त दीर्घकाल तक अक्षुण्ण रहने वाला विकास है। अर्थात् इसमें विकास निर्वाह योग्य माना गया है, जो वर्तमान पीढ़ियों की आववश्यकता को पूर्ण करते हुए भविष्य के लिये भी बना रहे। इसके अन्तर्गत सम्मिलित पारिस्थितिकी है, जो जैव समुदाय और उनके पर्यावरण के पारस्परिक अन्तर्सम्बन्धों का अध्ययन है। यह ग्रीक शब्द ‘Oikos’ से बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ ‘Living Place’ होता है।

        अर्थात् विभिन्न जैव समुदाय और पर्यावरण के बीच कैसा सन्तुलन विकसित हो, जिससे दोनों का अस्तित्व अनवरत रूप से बना रहे। यह संकल्पना भूगोल विज्ञान के अभिन्न अंग के रूप में परम्परागत रूप से रही है, क्योंकि पहले से ही भूगोल मानव और प्रकृति के परिवर्तनशील अन्तर्सम्बन्धों का अध्ययन करता रहा है। इसलिये विकास हेतु विभिन्न पर्यावरणीय तथ्यों का मानव द्वारा इस प्रकार उपयोग किया जाय कि पारिस्थितिकीय सन्तुलन भी बना रहे और मानव अपना विकास भी करता रहे।

       दूसरा शब्द ‘शाश्वतता’ (Sustainability) है, जिसका अर्थ अनवरत रूप से दीर्घकाल तक बना रहना है अर्थात् ऐसा आर्थिक विकास जो दीर्घकाल तक जारी रहे इसे अक्षय विकास भी कह सकते हैं या दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि यह सामाजिक-आर्थिक प्रत्यावर्तन की ऐसी प्रक्रिया है, जिसके परिणाम समान रूप से वर्तमान और भावी पीढ़ियों के लिये उपलब्ध होते रहें, अर्थात् यह उत्पादन के कारकों और उपभोग के तत्त्वों के बीच संतुलन के स्तर की ओर इंगित करती है।

          सन्तुलन का स्तर इस प्रकार का होना चाहिये कि जिसमें विकास प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले सभी चर एक साथ बिना एक-दूसरे से आगे निकले हुए एक-दूसरे के पूरक के रूप में योगदान देते रहें, जब तक क्रमिक रूप में ये चर एक-दूसरे के साथ विकासात्मक रूप से योगदान देते रहेंगे तब तक किसी भी चर का कोई ऋणात्मक प्रभाव नहीं दिखाई देगा।

       इसके विपरीत विभिन्न चरों की पारस्परिक विकासात्मक प्रवृत्ति में यदि कोई एक चर आगे निकल जायेगा अथवा अत्यधिक ह्रास होगा तो सम्पूर्ण सन्तुलन सम बिगड़ जायेगा, जिसका परिणाम भौतिक पर्यावरण पर दृष्टिगोचर होगा। इससे विकास प्रतिरूप भी दीर्घकाल तक नहीं बना रह पायेगा। अर्थात् ‘शाश्वतता’ के अन्तर्गत दो संकल्पनाएँ अन्तर्निहित हैं-

1. मूलभूत आवश्यकता की संकल्पना:-

           इसके अन्तर्गत माना जाता है कि मनुष्य की न्यूनतम मौलिक आवश्यकता को पूर्ण करना ही विकास हैं। वर्तमान समाज की आवश्यकताओं को पूर्ण करते हुए भावी पीढ़ियों के लिये भी संसाधनों को सुरक्षित छोड़ देना ही शाश्वत विकास है।

         यहाँ यह उल्लेखनीय है कि विभिन्न क्षेत्रों के मानव समाज में कुछ मूलभूत आवश्यकताएँ समान रूप से हैं, यथा- भोजन, वस्त्र, आवास, स्वास्थ्य सुविधा आदि लेकिन कई समाजों के उपभोग की परिवर्तनशील प्रवृत्ति और उसको पूरा करने के लिये संसाधनों का अंधाधुंध शोषण जारी रहने पर संसाधनों में ह्रास होगा और उनके दीर्घकालीन तक चलते रहने की संभावना भी समाप्त होगी। इसलिये उपभोग के तत्त्वों के प्रयोग पर नियंत्रण अथवा उनका परिमार्जन इस प्रकार किया जाना चाहिये ताकि विकास को प्रभावित करने वाला चर समाप्त न हो या उसका कोई दुष्प्रभाव न पड़े।

          पश्चिमी देशों की उपभोक्ता संस्कृति इसका उदाहरण है। जहाँ उपभोग हेतु कई जैव प्रजातियों का अस्तित्व ही समाप्त कर दिया गया है। इससे विश्व में जैव सन्तुलन को खतरा उत्पन्न हो गया है। या यों कह सकते हैं कि विकसित औद्योगिक देशों द्वारा ही उत्सर्जित अपशिष्टों से ओजोन परत को हानि हो रही है। इसलिये शाश्वत के अन्तर्गत मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करते हुए उपभोग स्तर को भी नियोजित करना सम्मिलित है। 

2. प्राविधिक स्तर:-

       इसके अन्तर्गत विभिन्न उत्पादनों हेतु प्रयुक्त तकनीकी स्तर हैं। बहुत से देशों में तकनीकी स्तर अत्यन्त उच्च स्तरीय हैं, जिससे वे कम लागत पर विभिन्न साधनों का शोषण करके अपने उपभोग स्तर में वृद्धि करते हैं और इतना ही नहीं वे इसका विपणन भी करते हैं, जबकि अन्य देश अपनी देशी व परम्परागत तकनीक के प्रयोग से धीरे-धीरे यही कार्य करते हैं। भौगोलिक रूप में उत्पादन कार्यों के लिये इस प्रकार की तकनीकों का प्रयोग होना चाहिए, जिससे विकास के अन्य चरों को हानि न पहुँचे।

        तीसरे शब्द का अर्थ है, जैसा पहले विश्लेषित किया जा चुका है कि विकास एक समन्वित प्रक्रिया है, जिससे मानव जीवन के अस्तित्व का एक निश्चित स्तर प्राप्त किया जा सकता है अर्थात् इसमें मानव और प्रकृति के मध्य उत्पादक, व्यवधान रहित और शोषण मुक्त चरों का समन्वित प्रतिरूप सम्मिलित है। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि शाश्वत विकास के अन्तर्गत पारिस्थितिकीय तंत्र के विभिन्न चरों का संरक्षण, अभिरक्षण, सुरक्षा एवं अक्षुण्ण रूप से निर्वहन सम्मिलित है।

         इस तरह अक्षुण्ण अर्थात् शाश्वत विकास अर्थव्यव्सथा के विभिन्न प्रतिरूपों (प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक) में समन्वय पर बल देते हुए इन्हें पारिस्थितिकी तंत्र से बाँधे रखने पर बल देता है। इस तंत्र को संरक्षित एवं पोषित करने की आवश्यकता है, ताकि विकास प्रक्रिया शाश्वत रूप से जारी रहे। भूगोल में शाश्वत विकास की संकल्पना वर्तमान समय में दो कारणों से आयी है-

1. मानव और पर्यारण तंत्र के असंगत सम्बन्ध ने पारिस्थितिकीय सन्तुलन को झकझोर दिया है। वर्तमान मानव समाज के सम्मुख भोजन, जल, शुद्ध वायु और समुचित जगह आदि अनेक समस्याएँ स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों के तीव्र शोषण से अस्तित्व में आयी हैं। वनों और मिट्टियों का उत्पादक कार्यों में इतनी तीव्र गति से प्रयोग से हो रहा है, जिससे वे तेजी से घटते जा रहे हैं। परिणाम यह है कि मनुष्य के लिये वे अनुपयोगी होते जा रहे हैं। क्योंकि प्रकृति द्वारा वे शीघ्रता से निर्मित नहीं किये जा सकते हैं। पशुचारण और अत्यधिक शस्योत्पादन से अर्थव्यवस्था का स्रोत नष्ट होता जा रहा है। ऊर्जा साधनों का औद्योगीकरण के कारण तेजी से ह्रास हो रहा है।

        आर्थिक विकास के लिये आवश्यक ये तत्त्व प्रकृति द्वारा लाखों करोड़ों वर्षों में निर्मित किये गये हैं। इनको शीघ्रता से पुनर्नवीकृत नहीं किया जा सकता है। परमाणु ऊर्जा से निःसृत रेडियोधर्मिता से जल व वायु प्रदूषित होकर मानव के लिये हानिकारक सिद्ध हो रहे हैं। अनियंत्रित कृषि और तीव्र औद्योगीकरण से धरातल, जल और वायु भी प्रदूषित हो रहे हैं। महासागर जो भावी जनसंख्या के लिये भोजन के स्रोत हैं। एक तरह से कूड़े कचरे के गड्ढे में परिवर्तित हो रहे हैं। जनसंख्या वृद्धि और पर्यावरण के उपयोग की कोई सीमा नहीं है।

         यह अनुमान किया जा सकता है कि सन् 2050 तक विश्व की 75 प्रतिशत आबादी नगरों में निश्वस करने लगेगी। इससे वर्तमान न समस्याएँ घनीभूत होंगी तथा मलिन बस्तियों का फैलाव होगा। ये सभी तथ्य मानव पर्यावरण के असंगत सम्बन्ध के परिणाम हैं। वर्तमान विकास की संकल्पना इसलिए प्राकृतिक और मानवीय चरों के पारस्परिक विकासात्मक अन्तर्सम्बन्ध को नियोजित करने को प्रेरित करती है।

2. दूसरे कारण में विकास का मात्र उद्देश्य धन का एकत्रीकरण है क्योंकि धन या पूँजी ही मानव के तीव्र सामाजिक-आर्थिक विकास को प्रभावित करती है लेकिन वास्तव में विकास के स्थायित्व के लिये अत्यधिक धन या पूँजी प्राप्त करना ही ध्येय नहीं होना चाहिये, क्योंकि जॉन पुश्किन के अनुसार छलपूँजी (illth) जो धनसंचय का परिणाम है- एक ऋणात्मक धन है। यह एक ऐसी पूँजी है जो मानव के लिये पृथ्वी की उपयोगिता समाप्त कर देती है इसलिये प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि अथवा येनकेन राष्ट्रीय आय में वृद्धि ही विकास का लक्ष्य नहीं होना चाहिये।

         इसलिए अधिक धन संचय, अधिक उत्पादन और अधिक उप का दुष्चक्र भौतिक विकास का आधार है। इस विकास की कोई अन्तिम सीमा नहीं इसकी न्यूनतम सीमा तो मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने तक मानी जा सकती लेकिन ऊपरी सीमा अदृश्य है। इसी अदृश्य सीमा को प्राप्त करने के लिये पश्चिमी समाज संसाधनों का अंधाधुंध शोषण कके पर्यावरण सन्तुलन को विकृत कर हा है। इसके प्रतिकार के लिए ही शाश्वत विकास की संकल्पना का अस्तित्व संभव हुआ है।

प्रश्न प्रारूप 

1. शाश्वत विकास की अवधारणा पर प्रकाश डालें।

6. The Concept of Regional Development (प्रादेशिक विकास की अवधारणा)

6. The Concept of Regional Development

(प्रादेशिक विकास की अवधारणा)



        Regional Development

             भूगोल की संकल्पना में प्रदेश अन्तर्निहित है। वास्तव में प्रदेश भूगोल की आत्मा है। प्रदेश का गठन, उसका संगठन, गत्यात्मकता और विकास ऐसे शब्द हैं, जिनकी उल्लेख भूगोल की प्रत्येक शाखा में किया गया है। कहीं यह उल्लेख प्रत्यक्ष होता है, तो कहीं परोक्ष।

         एक क्षेत्रीय विज्ञान के नाते तथा पृथ्वी सतह से सम्बन्धित होने के कारण भूगोल में मनुष्य एवं पर्यावरण के अन्तर्सम्बन्ध का अध्ययन किया जाता है। कहीं प्रदेश विधि अथवा उपागम के रूप में स्पष्ट होता है, कहीं किसी प्रदेश का क्रमबद्ध विधि से अध्ययन होता है अथवा क्रमबद्ध अध्ययन का आधार ही प्रदेश है। अतः भूगोल एवं प्रादेशिक विकास एक-दूसरे के पूरक हैं।

         पर्यावरण के विभिन्न तथ्यों के विस्तृत विवरण का अध्ययन करने पर यह निष्कर्ष निकलता है कि सभी भौतिक तथ्य धरातल पर असमान रूप में वितरित है। जिन क्षेत्रों में प्राकृतिक तथ्य मानव निवास के अनुकूल हैं, उन्हीं क्षेत्रों में मानव सृजित वातावरण के तथ्य आसानी से केन्द्रित हो जाते हैं। इस तरह वहाँ मानवीय और भौतिक तथ्यों के बीच अल्पावधि में अन्तर्क्रिया सम्पन्न होती हैं। अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा विकास वहाँ पहले दृष्टव्य होता है।

            इसका तात्पर्य यह नहीं है कि जिन क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधन नहीं हैं, वहाँ विकास प्रक्रिया प्रारम्भ नहीं होगी, ऐसे क्षेत्रों में भी मानवीय कारकों की प्रधानता रहने पर विकास प्रक्रिया प्रारम्भ अवश्य होगी लेकिन संसाधन सम्पन्न क्षेत्रों की तुलना में यह प्रक्रिया अपेक्षाकृत देर से प्रारम्भ होगी।

         यही कारण है कि विकास में क्षेत्रीय असमानता मिलती है। भूगोल में इसलिए विकास या आर्थिक विकास को प्रादेशिक विकास कहा जाता है। भौगोलिक रूप में इसको परिभाषित करते हुए कहा जा सकता है कि “प्रादेशिक विकास मानवीय क्षमता और प्राकृतिक तथ्यों के गत्यात्मक अन्तर्क्रियात्मक अन्तर्सम्बन्धों के परिणामस्वरूप घटित क्षेत्रीय संरचनात्मक प्रत्यावर्तन से सम्बन्धित हैं।” यह प्रत्यावर्तन मात्रात्मक एवं गुणात्मक दोनों स्तरों पर घटित होता है।

           स्पष्ट है कि क्षेत्रीय पक्ष प्रादेशिक आर्थिक विकास का मौलिक पक्ष है। इसलिये यह भौगोलिक अध्ययन का विषय है। लेकिन 20वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक भूगोलवेत्ताओं ने इस ओर कोई रुचि नहीं ली थी। वास्तव में उस समय भूगोल का उद्देश्य विभिन्न देशों एवं क्षेत्रों की विशिष्टताओं को स्पष्ट करना ही था। इसी विशिष्ट वर्णनात्मक उपागम के कारण भूगोलवेत्ताओं का मुख्य उद्देश्य क्षेत्रीय विभिन्नता का वर्णन करना था। भूगोलवेत्ताओं ने आर्थिक विकास का अध्ययन द्वितीय महायुद्ध के बाद करना प्रारम्भ किया।

       इस समय लगभग साम्राज्यवाद और औपनिवेशीकरण समाप्त हो गया था। विभिन्न स्वतंत्र देश अपने संसाधनों के आधार पर आर्थिक विकास कर रहे थे। यूरो-अमेरिकी देश अपेक्षाकृत अधिक विकसित हो रहे थे, जबकि नये स्वतंत्र देश विकास प्रक्रिया को प्रारम्भ कर रहे थे।

          ऐसे समय ही विकसित देश विश्व का ‘विकसित’, ‘विकासशील’ और ‘अविकसित’ वर्गों में विभाजन करके विभिन्न विषयों का अध्ययन करने लगे। तत्कालीन भूगोलवेत्ताओं ने भी विकसित और अवकिसित देशों के मध्य विकास प्रतिरूप में अन्तर के कारणों को जानने हेतु आर्थिक विकास का अध्ययन प्रारम्भ किया।

          डडले स्टैम्प, नार्टन गिन्सबर्ग आदि भूगोलवेत्ताओं ने सर्वप्रथम आर्थिक विकास और प्राकृतिक पर्यावरण के अन्तर्सम्बन्धों का अध्ययन प्रस्तुत किया। कालान्तर में नार्टन गिन्सबर्ग ने ‘भूगोल एवं आर्थिक विकास’ (Essays on Geography and Economic Development) नामक ग्रन्थ प्रकाशित किया। यह विभिन्न चरों पर आधारित विश्वस्तरीय आर्थिक विकास का प्रादेशिक वर्गीकरण था।

        इसी तरह अन्य भूगोलवेत्ताओं ने प्रारम्भिक स्तर पर आर्थिक विकास पर पर्यावरण के समग्र प्रभाव का भी वर्णन किया। आर्थिक विकास को निर्धारित करने वाले विभिन्न चरों के वितरण प्रकृति के आधार पर सामान्यीकरण एवं सिद्धान्त निरूपण केवल कुछ ही भूगोलवेत्ताओं ने किया, जिसमें गिन्सबर्ग, उलमान और हार्टशोर्न उल्लेखनीय हैं। तदुपरांत भारत के भूगोलवेत्ताओं ने आर्थिक विकास के विभिन्न आयामों का भौगोलिक वर्णन करके सामान्यीकरण और मॉडल निर्माण करना प्रारम्भ किया है।

      भारतीय भूगोलवेत्ताओं में आर० पी० मिश्रा, के० वी० सुन्दरम, वी० एल०एस० प्रकाशराव, मुनीस रजा, एल० के० सेन, डी० के० सिंह, जे०के० राउतराय, सुधीर वनमाली, पी०आर० चौहान, वी० के० श्रीवास्तव, नंदेश्वर शर्मा आदि ने भी आर्थिक विकास के विभिन्न पक्षों का विश्लेषणात्मक अध्ययन किया है।

आर्थिक विकास एवं प्राकृतिक- मानवीय तथ्य

       आर्थिक विकास का अध्ययन करते समय भूगोलवेत्ताओं का उद्देश्य उन कारकों का वर्णन करना होना चाहिये, जिससे विकास में असमानता होती है। ऐसे तत्त्वों में सर्वप्रथम प्राकृतिक तत्त्वों यथा- भूमि, जलवायु, खनिज, ऊर्जा संसाधन, वनस्पति आदि में क्षेत्रीय अन्तर मिलता है। ये सभी प्राकृतिक तत्त्व किसी भी क्षेत्र के आर्थिक विकास के लिये उत्तरदायी हैं लेकिन मात्र इन्हीं के क्षेत्रीय वर्णन से विकास की असमानता का विश्लेषण नहीं किया जा सकता।

        विश्व में क्षेत्रीय आधार पर वितरित विभिन्न संस्कृति और सभ्यताएँ तंत्र और संसाधनों के दोहन का उद्देश्य प्राकृतिक तत्त्वों की अपेक्षा अधिक सशक्त रूप से विकास की असमानता को स्पष्ट करते हैं। बल्कि भौगोलिक रूप से सच यह है कि प्राकृतिक तत्त्व तो निर्जीव रूप से स्थिर हैं। मानवीय विशेषताएँ ही इन तत्त्वों के दोहन का प्रतिरूप निर्धारित करके विकास प्रतिरूप को अस्तित्व में लाती है। इसलिये भूगोल में आर्थिक विकास के निर्धारकों में प्राकृतिक तत्त्वों से अधिक महत्त्व मानवीय तत्त्वों को दिया जाना चाहिये।

       हार्टशोर्न के अनुसार क्षेत्रीय आधार पर अन्तर इन्हीं तत्त्वों के कारण उत्पन्न होता है। यही कहा जा सकता है कि किसी क्षेत्र विशेष की भौतिक स्थिति, आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक संगठन, वहाँ निवास करने वाली जनसंख्या की क्षमता को उसकी आवश्यकताओं और उद्देश्यों को पूरा करने के लिये निर्देशित करते हैं। इसलिये भूगोल में विकास का अध्ययन उत्पादन और प्राकृतिक संसाधनों के सन्दर्भ में न करके उत्पादन और जनसंख्या के सन्दर्भ में ही करना चाहिये, क्योंकि आर्थिक विकास का अन्तिम उद्देश्य भी मानव कल्याण हैं।

      विकास प्रतिरूप का भौगोलिक अध्ययन करते समय प्राकृतिक तत्त्वों के साथ-साथ मानव की भौतिक आवश्यकताओं और उनके प्रति उसके दृष्टिकोण का भी अध्ययन होना चाहिए। क्षेत्रीय आधार पर मानव समूहों की कुछ समान आवश्यकताएँ हैं, जैसे- भोजन, वस्त्र, आवास, स्वास्थ्य आदि। इनकी पूर्ति मानव के हर कार्य का मुख्य उद्देश्य है। इसको प्राप्त करने के लिये मनुष्य संसाधनों से अन्तर्क्रिया करता है। इससे विकास घटित होता है। चूँकि मानव की इच्छाओं, आवश्यकताओं और उसकी क्षमताओं में पर्याप्त वैभिन्य है। इसलिये विकास प्रतिरूप में भी विभिन्नता का मिलना स्वाभाविक है।

       अतः अन्तर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय, क्षेत्रीय, स्थानीय अथवा मानवीय समूह यहाँ तक कि नितान्त व्यक्तिगत स्तर पर विकास का अर्थ अलग-अलग होना अपरिहार्य है। मालकम आदिशेषैया ने सही कहा है कि एक पूर्ण विकसित औद्योगिक समाज में और पारम्परिक समाज में विकास का अभिप्राय अलग-अलग होना निश्चित है क्योंकि दोनों समाजों के मनुष्यों की आवश्यकताएँ, इच्छाएँ, जीवनयापन का ढंग, प्राविधिक स्तर अलग-अलग प्रकार के हैं। आवश्यकताओं एवं इच्छाओं में यह अन्तर विकास हेतु भी विभिन्न प्रकार की तकनीक पर आधारित है। यह तकनीक भी क्षेत्र विशेष की भौतिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों पर आधारित होती है।

       भौगोलिक विश्लेषण से यह भी स्पष्ट होता है कि प्राकृतिक तत्त्वों के अतिरिक्त विकास प्रतिरूप को निर्धारित करते हैं। भौतिक (पदार्थगत) तत्त्वों में परिवहन, वित्त, शक्ति के साथ-साथ संसाधन (कच्चे माल) हैं, जबकि अभौतिक तत्त्वों में श्रम, विपणन, उद्यम आदि हैं। ये सभी एक-दूसरे से अन्तर्सम्बन्धित होकर ही विकास प्रतिरूप को निर्धारित करते हैं।

      यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि किन्हीं एक या दो तत्त्वों के अभाव से क्षेत्र का विकास प्रभावित नहीं होगा, क्योंकि ऐसे तत्त्वों को आयात करके या उनका विकल्प खोलकर विकास किया जा सकता है। इसीलिये हार्टशोर्न का मत है कि विकास में अन्तर का मिलना प्राकृतिक संसाधनों में अन्तर का ही परिणाम नहीं है बल्कि मानवीय या अभौतिक कारक इस अन्तर के लिये अधिक उत्तरदायी है।

      उपर्युक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि भूगोल में आर्थिक विकास की संकल्पना क्षेत्रीय संदर्भ लेकर ही की जा सकती है। इस तरह प्रादेशिक विकास के रूप में आर्थिक विकास का एक मात्र उद्देश्य भूगोल में प्रति व्यक्ति आय अथवा राष्ट्रीय आय में वृद्धि ही नहीं है बल्कि इसमें भौतिक और अभौतिक कारकों द्वारा समन्वित रूप में मानव के सन्दर्भ में किया जाने वाला आर्थिक विकास सम्मिलित है। भूगोल का उद्देश्य इन कारकों के वितरण अन्तर, अन्तर्सम्बन्ध और पारस्परिक अन्तरक्रिया का विश्लेषण करके विकास के सम्बन्ध सामान्यीकरण करना होना चाहिये।

निष्कर्ष

      विकास की प्राचीन अवधारणा से लेकर द्वितीय महायुद्धोत्तरकालीन संकल्पना और भूगोल में विकास की संकल्पना के उपर्युक्त विश्लेषण से निम्नलिखित निष्कर्ष निकलते हैं:-

(i) विकास अन्तर्विषयक, अन्तरप्रखण्डीय और बहुआयामी शब्द हैं।

(ii) मौलिक रूप में विकास का अभिप्राय आर्थिक विकास ही है। यह आर्थिक विकास भी क्षेत्रीय सन्दर्भ में सामाजिक न्याय और सहभागिता की विशेषता से युक्त है।

(iii) विकास की संकल्पना आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक सन्दर्भों में एक देश से दूसरे देश, एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र, एक समाज से दूसरे समाज अथवा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के सन्दर्भ में अलग-अलग होती हैं।

(iv) विकास के सन्दर्भ में एक उल्लेखनीय तथ्य यह है कि किसी क्षेत्र का संसाधन आधार ही उसके विकास का एक मात्र कारण नहीं है बल्कि मानवीय तत्त्व की प्रकृति एवं प्रतिरूप अधिक उत्तरदायी हैं।

(v) क्षेत्र विशेष में विद्यमान राजनीतिक तंत्र विकास को निश्चित दिशा देकर उसे नियोजित करते हैं।

(vi) विकास का सर्वप्रमुख उद्देश्य मानव कल्याण है और यह मानव कल्याण भी सम्पूर्ण मानव समुदाय के सन्दर्भ में होना चाहिये इसलिये विकास तभी तक  उपयुक्त एवं प्रासंगिक है, जब तक कि उसमें असमानता न्यूनतम स्तर पर रहती है।

(vii) विकास की संकल्पना गत्यात्मक है। अविकसित और पिछड़े समाज या क्षेत्र के विपरीत विकसित अथवा औद्योगिक समाज के सन्दर्भ में, इसकी संकल्पना अलग-अलग है, क्योंकि दोनों की आवश्यकताओं एवं क्षमताओं में पर्याप्त अन्त मिलता है। इसलिये सामाजिक प्रत्यावर्तन के साथ ही साथ विकास की संकल्पना भी परिवर्तित होती जाती है।

प्रश्न प्रारूप

 1. प्रादेशिक विकास की अवधारणा प प्रकाश डालें।

 4. The problem of regional imbalances into India (भारत के विकास में क्षेत्रीय असन्तुलन की समस्या)

4. The problem of regional imbalances into India

(भारत के विकास में क्षेत्रीय असन्तुलन की समस्या)



        problem of regional

           भारत में क्षेत्रीय असन्तुलन बड़े पैमाने पर पाया जाता है, हमारे देश में गरीबी एक अभिशाप है किन्तु इससे भी बुरी बात है-आय का असमान वितरण, आर्थिक विकास प्रयत्नों ने जहाँ आय की विषमता को बढ़ाया है, वहीं नियोजित विकास के द्वारा असंतुलन को कम करने के प्रयास भी किये हैं।

        योजनाओं का अन्तिम लक्ष्य समाजवाद की स्थापना करना, किन्तु योजनाओं के कार्यक्रमों का आधार क्रियान्वयन की विधि व संगठन तंत्र इस प्रकार के रहे कि सामाजिक लक्ष्यों की उपलब्धि सम्भव न हो सकी, प्रमुख असफलता आय के वितरण के रूप में सामने आयी, रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया द्वारा किये गये सर्वेक्षण अनुसार ग्रामीण क्षेत्र में निम्नतम 20 प्रतिशत जनसंख्या की कुल आय का 9 प्रतिशत प्राप्त होता है, जबकि 5 प्रतिशत की कुल आय का 17 प्रतिशत, जनसंख्या के उच्चतम अर्द्धभाग को कुल आय का 60 प्रतिशत, जबकि निम्नतम अर्द्धभाग को कुल आय का केवल 31 प्रतिशत प्राप्त होता है।

      हमारे देश में जनसंख्या का वितरण बहुत असमान है, यहाँ जनसंख्या घनत्व में भी बहुत असमानता है। देश का जनघनत्व 325 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है। जनघनत्व की दृष्टि से पश्चिम बंगाल प्रथम स्थान पर है, जहाँ जनघनत्व 903 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है, जबकि अरुणाचल प्रदेश में जनघनत्व 13 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है। इसी भाँति यहाँ जनसंख्या का लिंगानुपात तथा साक्षरता में भी बहुत असमानता पायी जाती है।

       लिंगानुपात की दृष्टि से प्रथम स्थान पर केरल है, जहाँ लिंगानुपात 1058 है, जबकि राजस्थान में लिंगानुपात सबसे कम है, जो 922 है, साक्षरता की दृष्टि से केरल प्रथम स्थान पर है, जहाँ साक्षरता 90.92 प्रतिशत है, इसके विपरीत सबसे कम साक्षरता वाला राज्य बिहार है, जहाँ साक्षरता 47.0 प्रतिशत है।

        यहाँ कृषि, उद्योग, परिवहन, व्यापार आदि में भी पर्याप्त असन्तुलन पाया जाता है। देश में व्याप्त असन्तुलनों से अनेकानेक सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक समस्याएँ उत्पन्न होती है, जिसे निम्नलिखित रूप में देख सकते हैं-

सामाजिक समस्याएँ:

        क्षेत्रीय असन्तुलन के कारण विभिन्न प्रकार की सामाजिक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं जो अग्रलिखित हैं-

(1) आय एवं सम्पत्ति की असमानता:-

      क्षेत्रीय असन्तुलन से ग्राम एवं नगरों के मध्य आय तथा सम्पत्ति वितरण में असमानता बहुत है। यह असमानता राज्यों में भी बहुत है। अखिल भारत की प्रति व्यक्ति आय 29,642 (वर्तमान कीमतों पर) रुपये है, जबकि गोवा 70,112 रुपये, दिल्ली में 61,676 रुपये, महाराष्ट्र में 37,081 रुपये है।

       राष्ट्रीय औसत से अधिक आय वाले राज्य केन्द्रशासित गोआ, अरुणाचल प्रदेश, दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, हाराष्ट्र मिजोरम एवं पंजाब, चण्डीगढ़, केरल आदि राज्य है, जबकि शेष राज्यों के प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से कम है।

(2) असामाजिक कृत्यों को बढ़ावा:-

       क्षेत्रीय असन्तुलन से असामाजिक कृत्यों को बढ़ावा मिलता है, क्योंकि जब लोग समाजिक नहीं होते हैं अर्थात् उनमें ऊँच-नीच दिखाई देती है, तो स्वाभाविक है कि असामाजिक कृत्यों को बढ़ावा मिलता है।

      क्षेत्रीय असन्तुलनों से किसी क्षेत्र विशेष की ओर श्रमिकों का प्रवास बढ़ने लगता है, जिससे भीड़-भाड़ की समस्या, आवास व्यवस्था की समस्या, जलापूर्ति समस्या, बिजली की समस्या तथा गन्दी बस्ती समस्या उत्पन्न होती है। सभी लोगों को रोजगार न मिलने से उनमें रोष व्याप्त होता है, जिससे असामाजिक कृत्यों को बढ़ावा मिलता है।

(3) सामाजिक लागतों में वृद्धि:-

         क्षेत्रीय असन्तुलन होने से किसी क्षेत्र विशेष में औद्योगीकरण अधिक होता है, जबकि किसी में बहुत कम। ऐसी स्थिति में जहाँ औद्योगीकरण अधिक होता है, वहाँ प्रदूषण की समस्या भी उत्पन्न हो जाती है। प्रदूषण वाले क्षेत्रों में निवास करने वाले श्रमिकों में विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ होने लग जाती हैं, जिसके उपचार हेतु अतिरिक्त लागत वहन करनी पड़ती है।

आर्थिक समस्याएँ:

        क्षेत्रीय असन्तुलन से निम्न प्रकार की आर्थिक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं-

(1) साधनों का अपूर्ण उपयोग:-

       क्षेत्रीय असन्तुलन की सबसे बड़ी समस्या यह रहती है कि इससे देश के संसाधनों का पूर्ण उपयोग नहीं हो पाता है। इसका कारण यह है कि जहाँ विकास होता है, वहाँ के संसाधनों का उपयोग हो जाता है किन्तु अनेकानेक दुर्गम क्षेत्र के संसाधनों का उपयोग नहीं हो पाता है।

(2) बेरोजगारी में वृद्धि:-

       सभी क्षेत्रों में सन्तुलित विकास न होने से कुछ क्षेत्रों में तो रोजगार के अवसर अच्छे होते हैं, जबकि अन्य क्षेत्रों में रोजगार का अभाव पाया जाता है। यदि सभी क्षेत्रों में समान रूप से विकास हो तो रोजगार के अवसर भी समान रूप से मिलेंगे, फलतः बेरोजगारी कम होगी।

(3) साधनों का अनुचित उपयोग:-

       प्राकृतिक संसाधन सीमित मात्रा में होते हैं। अतः उनका उपयोग विवेकपूर्ण ढंग से करना चाहिए तथा उनके संरक्षण पर भी ध्यान देना चाहिए। औद्योगिक विकास होने से संसाधनों का अधिकाधिक उपयोग हो जाता है, जिससे संसाधनों के समाप्त होने की समस्या उत्पन्न हो रही है।

(4) जीवन स्तर में भिन्नता:-

     क्षेत्रीय असन्तुलन से कुछ क्षेत्रों के लोगों की आय अधिक होती है, जबकि अन्य बहुत कम आय वाले होते हैं। ऐसी स्थिति में उनके जीवन-स्तर में पर्याप्त भिन्नता देखने को मिलती है। क्षेत्रीय असन्तुलन होने से यह बहुत गम्भीर समस्या उत्पन्न होती है।

राजनैतिक समस्याएँ:

        क्षेत्रीय असन्तुलन से निम्नांकित राजनैतिक समस्याएँ उत्पन होती हैं-

(1) राजनीतिक अस्थिरता:-

       क्षेत्रीय असन्तुलन से राजनीति में भी स्थिरता नहीं है। जहाँ राजनीतिक अस्थिरता है, वहाँ असन्तुलन है, इस प्रकार दोनों का बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध है। 

(2) क्षेत्रवाद की समस्या:-

      जब किसी क्षेत्र का विकास अधिक तथा किसी का कम होता है तो विभिन्न प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, जिनमें क्षेत्रवाद की समस्या भी बहुत बड़ी है। ऐसे में क्षेत्रीय भावना जागृत होती है, जो किसी-न-किसी रूप में हानिकारक है।

(3) सुरक्षात्मक समस्या:-

      क्षेत्रीय असन्तुलन से सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है जो क्षेत्र अधिक विकसित हो जाते हैं, उन पर अन्य पिछड़े क्षेत्रों के गरीब व बेरोजगा हमला बोल देते हैं, वहाँ से धन प्राप्त कते हैं। इससे वहाँ का जन-जीवन असुरक्षित हो जाता है।

3. विकास केन्द्र और विकास ध्रुव / Growth Centre and Growth Pole 

3. विकास केन्द्र और विकास ध्रुव / Growth Centre and Growth Pole


विकास केन्द्र और विकास ध्रुव⇒

                  प्रादेशिक नियोजन हेतु कई विशिष्ट मॉडल विकसित किये गये हैं। उनमें से उपरोक्त दोनों मॉडल को विश्व व्यापी मान्यता प्राप्त है। यह मॉडल पदानुक्रमिक, समन्वित प्रादेशिक विकास की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कार्य माना जाता है। इस मॉडल का विकास 50 के दशक में पेरॉक्स महोदय ने किया था। लेकिन भौगोलिक संदर्भ में इसका सर्वप्रथम प्रयोग बोडोविले महोदय ने किया था। बोडोविले ने कहा है कि किसी भी प्रदेश के नियोजन या विकास हेतु मनुष्य की दो प्रवृतियों का अध्ययन आवश्यक है। प्रथम – अभिसारी प्रवृति और द्वितीय – अपसारी प्रवृत्ति। 

              अभिसारी प्रवृतियाँ किसी भी कार्यों का केन्द्रीयकरण करती है। जबकि अपसारी शक्तियाँ कार्यों का विकेन्द्रीकरण करती हैं। प्रादेशिक नियोजन के संदर्भ में यह देखना आवश्यक है कि किस प्रकार के कार्यों  का केन्द्रीयकरण किस केन्द्रीय स्थल पर हो रहा है। इसी के साथ यह भी देखना आवश्यक है कि किसी भी कार्यों का विकेन्द्रीयकरण आस -पास के क्षेत्रों में कैसे हो रहा है।

बोडोबिले –“प्रादेशिक नियोजन का महत्वपूर्ण आधार केन्द्रीय बस्तियों का पदानुक्रमिक नियोजन, है।” इस संदर्भ में उन्होंने केन्द्रीय बस्तियों के नियोजन हेतु चार पदानुक्रम निर्धारित किये हैं।

पदानुक्रम    केन्द्रीय स्थल 

(1)               विकास ध्रुव

(2)               विकास केन्द्र

(3)              विकास बिन्दु

(4)               सेवा केन्द्र

            विकास ध्रुव का तात्पर्य किसी वृहत प्रदेश के नियोजन से है। विकास केन्द्र का तात्पर्य मध्य स्तरीय प्रादेशिक नियोजन से है जबकि विकास बिन्दु और सेवा केन्द्र  का तात्पर्य लघु स्तरीय प्रादेशिक नियोजन से है।

           बोडोविले के अनुसार किसी प्रदेश के सर्वाधिक केन्द्रीय स्थल पर विकास ध्रुव का विकास होता है। जैसा कि नाम से स्पष्ट है कि ध्रुव सम्पूर्ण प्रदेश के लिए आकर्षण का केन्द्र होता है। विकास ध्रुव वह स्थान है जहाँ पर शिक्षा, स्वास्थ्य, बाजार के अतिरिक्त ऐसे विशिष्ट कार्यो को करता है जो उस प्रदेश के अन्य किसी केन्द्र पर संभव नहीं है। विकास ध्रुव नव-उत्पाद का केन्द्र होता है। विकास के अवयव इसी केन्द्र से विकेन्द्रीकृत होकर सम्पूर्ण केन्द्र में पहुँचते हैं। 

          दूसरे शब्दों में विकास ध्रुव किसी भी भौगोलिक प्रदेश का सबसे बड़ा नगर होता है। विकास ध्रुव को प्राथमिक नगर से ही सम्बोधित किया जा सकता है। प्रत्येक प्राथमिक नगर या विकास ध्रुव के सहयोग हेतु कई विकास केन्द्र का विकास होता है। विकास केन्द्र वह केन्द्रीय स्थल है जहाँ पर द्वितीयक एवं तृतीयक कार्यों का केन्द्र होता है। विकास केन्द्र के विकास के पीछे दो प्रमुख कारण है – 

(1) विकास ध्रुव वाले नगरों में कार्यों का अति केन्द्रीयकरण न हो और 

(2) ग्रामीण नगरीय जनसंख्या स्थानान्तरण को विकास केन्द्र में ही रोककर विकास ध्रुव के जनसंख्या को नियंत्रित किया जाय।

                  विकास बिन्दु भी रोजगारी उन्मुख केन्द्रीय स्थल है। लेकिन विकास केन्द्र से यह कई मायने में भिन्न है।:-

(1) विकास केन्द्र की तुलना में विकास बिन्दु का विकास कम महत्व वाले केन्द्रीय स्थल पर होता है। इसकी जनसंख्या के आकार काफी छोटा होता है और विकास केन्द्र के प्रति पूरक होता है।

(2) विकास केन्द्र में बड़े-बड़े उद्योग विकसित होते हैं तथा रोजगार प्रदान करने की अधिक क्षमता होती है जबकि विकास बिन्दु स्थानीय कच्चे माल पर आधारित उद्योगों का विकास होता है तथा कम लोगों को रोजगार प्रदान करते हैं।

          सेवा केन्द्र सबसे लघु आकार के केन्द्रीय बस्ती है। यहाँ पर प्राथमिक शिक्षा, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, प्राथमिक डाक संचार, लघु स्तर के बैंक एवं लघु स्तरीय प्रशासनिक सुविधा उपलब्ध होती है। ये सामान्यत: छोटे जनसंख्या आकार वाले होते हैं। आम लोगों के दैनिक आकर्षण का केन्द्र होता है। इसे नीचे के मॉडल से भी समझा जा सकता है –विकास केन्द्र और विकास ध्भारत के संदर्भ में

            भारत के प्रारंभिक नियोजन के दिनों में 5वीं पंचवर्षीय योजना तक नियोजन की विकेन्द्रीकरण की प्रक्रिया अपनाये जाने के कारण अंत: प्रादेशिक और अन्तर प्रादेशिक विषमता का जन्म हुआ। अत: छठी पंचवर्षीय योजना में यह अनुभव किया गया कि भारत की नियोजन प्रक्रिया को तीव्र करने के लिए विकास ध्रुव मॉडल को अपनाया जाना चाहिए। प्रो० R. P. मिश्रा, श्रो. सुन्दरम, प्रो० देश पाण्डेय और L.S.भट्ट जैसे भूगोलवेताओं ने अपने तर्कों से योजना आयोग को प्रभावित किया और विकास ध्रुव पर आधारित नियोजन को लागू करने के लिए तैयार किया। R. P. मिश्रा ने केन्द्रीय स्थलों के नियोजन हेतु 5 पदानुक्रम की आवश्यकता पर जोर दिया क्योंकि उन्होंने माना कि भारत एक गाँवों का एक देश है। बड़े- बड़े गाँवों में सेवा केन्द्र विकसित करने की आवश्यकता है और छोटे गाँवों में लघु सेवा केन्द्र विकसित करने की आवश्यकता है।

पदानुक्रम    केन्द्रीय स्थल 

(1)               विकास ध्रुव

(2)               विकास केन्द्र

(3)               विकास बिन्दु

(4)               सेवा केन्द्र

(5)               लघु सेवा केन्द्र

                बोडोबिल ने कहा था कि सेवा केन्द्र कोई भी गाँव या नगर हो सकता है। R.P. मिश्रा ने उनके विचारों  का समर्थन करते हुए कहा कि केन्द्रीय ग्रामीण बस्ती में विकास की प्रक्रिया को तीव्र करने हेतु लघु सेवा केन्द्र का विकसित किया जाना आवश्यक है। वर्तमान समय में योजना आयोग/नीतिआयोग R. P. मिश्रा के द्वारा बताये गये 5 पदानुक्रम पर आधारित नियोजन की प्रक्रिया अपना रही है। इसके लिए निम्नलिखित 5 पदानुक्रम और अनुकूल जनसंख्या का निर्धारण किया गया है। विकास केन्द्र और विकास ध्

            योजना आयोग ने भारत के सभी 35 महानगरों को विकास ध्रुव के रूप में मान्यता दिया है। योजना आयोग के अनुसार भारत में कम-से-कम 500 विकास केन्द्रों की स्थापना की योजना है। एक विकास केन्द्र में 12 लाख जनसंख्या को रखा जा रहा है। विकास केन्द्र को ही ध्यान में रखकर 1980 ई0 से औद्योगिक शंकुल की स्थापना की जा रही है। इसके अलावे महानगरों में बढ़ती जनसंख्या को ध्यान में रखकर महानगरों के बाहर विकास केन्द्र विकसित करने की योजना है। जब किसी भी विकास केन्द्र को विकसित किया जाता है तो निम्नलिखित तथ्यों पर गौर किया जाता है:-

(1) कितने लोग उस केन्द्र पर आते हैं और कितने लोग जाते हैं।

(2) किन-किन परिवहन साधनों का वहाँ विकास हुआ है।

(3) वर्तमान समय में उस स्थान का कार्यिक संरचना और संरचनात्मक सुविधाएँ क्या-क्या है 

(4) जनसंख्या वृद्धि का दर क्या है 

(5 ) औद्योगिक संसाधनों की विकसित होने की क्या संभवना है। 

             विकास बिन्दु का तात्पर्य उन स्थानों से है जो स्थानीय संसाधनों की मदद से लघु उद्योगों को विकसित कर सकते हैं। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में विकास बिन्दुओं की विशेष भूमिका हो सकती है। योजना आयोग भारत में 10 हजार विकास बिन्दुओं को पहचानकर उन्हें विकसित करने की प्रयास कर रही है। एक विकास बिन्दु को एक से दो लाख जनसंख्या को ध्यान में रखकर विकसित करने की प्रयास कर रही है।

            सेवा केन्द्रों का मूल उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में अनिवार्य आवश्यकताओं को पूरा करना है। भारत में लगभग 30 हजार सेवा केन्द्रों की पहचान कर उसे विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है। सामान्यतः प्रखण्ड स्तर पर सेवा केन्द्र विकसित करने की योजना है। सेवा केन्द्रों में Cold Storage, खाद्यान्न भण्डारण सुविधा, दैनिक बाजार इत्यादि विकसित करने की योजना है।

      ग्रामीण सेवा केन्द्र पंचायत स्तर पर विकसित करने की योजना है। भारत में 1 लाख गाँव को ग्रामीण सेवा केन्द्र के रूप में विकसित किया जा रहा है। ये सेवा केन्द्र निश्चित रूप से ग्रामीण विकास कार्यक्रम को त्वरित कर सकेंगे। 

निष्कर्ष 

          इस तरह उपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि विकास ध्रुव मॉडल के अन्तर्गत विकसित किये जा रहे सभी केन्द्रीय स्थल एक-दूसरे के पूरक के रूप में कार्य करेंगी जिससे अंतः और अन्तर प्रादेशिक विषमता दूर हो सकेगी। पिछले 20 वर्षों के दौरान विकास ध्रुव नीति पर आधारित नियोजन का कार्य किये जाने के बाद भी इसका लाभ कुछ सीमित क्षेत्रों को ही मिल पाया है। लेकिन इस मॉडल के अनुसार महानगरों का विकास तेजी से हो रहा है। ग्रामीण स्तर पर पंचायतों का नियमित चुनाव नहीं होने के कारण तथा उनके राजनीतिक अधिकार नहीं दिये जाने के कारण यह मॉडल पूर्ण से सफल नहीं हो सकता है।

➡वृद्धि केन्द्र = विकास केन्द्र

प्रश्न प्रारूप 

1. विकास ध्रुव सिद्धांत के आलोचनात्मक व्याख्या भारतीय नियोजन के संदर्भ में करे।

2. प्रदेशों का सीमांकन / प्रादेशीकरण / Regionalization / Delimitation of Regions

2. प्रदेशों का सीमांकन/प्रादेशीकरण

(Regionalization / Delimitation of Regions)



प्रदेशों का सीमांकन⇒प्रदेशों का सीमांकन

            भौगोलिक प्रदेशों का सीमांकन / प्रादेशीकरण एक जटिल कार्य है। प्रारंभ में यह कार्य अनुभावाश्रित विधि से किया जाता था। लेकिन वर्तमान समय में प्रदेशों का सीमांकन सांख्यिकी विधि के द्वारा किया जा रहा है। अनुभावाधित विधि के द्वारा प्रदेशों के सीमांकन से दो प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न होती है:-

(1) दो प्रदेशों के बीच में एक संक्रमण पेटी का विकास होता था।

(2) विकास एवं नियोजन के कार्य में कठिनाई उत्पन्न होती थी।

           द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद प्रदेशों के सीमांकन में सांख्यिकी विधि के साथ-साथ अनुभावाश्रित विधि को ध्यान में रखकर प्रादेशीकरण का कार्य किया जा रहा है। प्रदेशों के सीमांकन हेतु हेगेट महोदय ने Thiessen Polygon Model और न्यूनतम दूरी विधि (Minimum Distance Method) का विकास किया है।

       Thiessen polygon विधि केन्द्रीयता पर आधारित है। हेगेट का मानना है कि किसी भी भौगोलिक प्रदेश की कोई-न-कोई विशिष्टता होती है और उस विशिष्टताओं का कहीं-न-कहीं केन्द्रीयकरण होता है। उसी केन्द्रीय स्थान से विशिष्टता का मूल्यांकन करके सीमांकन का कार्य किया जाता है।

           कुछ भूगोलवेताओं ने प्रदेशों के सीमांकन हेतु गुरुत्वाकर्षण मॉडल का विकास किया है। इसके लिए उन्होंने निम्नलिखित सूत्र का विकास किया है।

p = MA x MB /d2

जहाँ:-

p = प्रदेश की सीमा है। 

MA और MB = दो प्रदेशों की विशिष्टता 

d = दो प्रदेशों के बीच की दूरी है।

       इस मॉडल के आधार पर 60 के दशक तक प्रदेशों का सीमांकन किया जाता था। उपर में बताये गये दोनों मॉडल विशिष्ट विशुद्ध रूप से सांख्यिकी पर साधारित थे। इसमें अनुभावाश्रित विधि का उपयोग कहीं नहीं किया गया था। यही कारण है कि 60 के दशक के मध्य से सांख्यिकी सह अनुभावाश्रित विधि के द्वारा प्रदेशों के सीमांकन का कार्य किया जाने लगा।

       यह मॉडल नियोजन प्रदेशों के सीमांकन हेतु उपयोगी मॉडल माना जाता है। इसी मॉडल के आधार पर राष्ट्रीय राजधानी प्रदेश का तथा भारत के अन्य महानगरीय प्रदेश के नियोजन का कार्य किया गया है।

       इस विधि के अंतर्गत प्रथमतः गुरुत्वाकर्षण मॉडल से पहले किसी भी प्रदेश का बाहरी सीमा का निर्धारण करते हैं। उसके बाद अनुभव के आधार पर प्रदेशों के सर्वेक्षण कार्य कर गुरुत्वाकर्षण मॉडल के द्वारा निर्धारित प्रदेशों के सीमा में संशोधन का कार्य किया जाता है। यही कारण है कि दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी प्रदेश का बाहरी सीमा सहारनपुर, भरतपुर, अलीगढ़ और सोनीपथ तक फैल चुका है।

निष्कर्ष 

         अतः ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि किसी भी भौगोलिक प्रदेश का सीमांकन उसकी विशिष्ट तथ्यों की पहचान कर की जाती है। वर्तमान भूगोल में प्रदेशों क सीमांकन नियोजन और विकास के लिए काफी उपयोगी है। प्रदेशों के सीमांकन का कार्य भूगोल में जहाँ एक ओ उपयोगिता लाता है वहीं अन्तरविषयक अध्ययन में भी मदद कता है।


1. प्रदेश की संकल्पना (Concept of Region)

1. प्रदेश की संकल्पना

(Concept of Region)



प्रदेश की संकल्पना⇒प्रदेश की संकल्पना

           ‘प्रदेश’ शब्द का विकास मूलत: भूगोल विषय के अन्तर्गत किया गया है। इस शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम यूनानी भूगोलवेता हेरोडोटस और रोमन भूगोलवेता स्ट्रेबो ने किया था। आधुनिक भूगोल में प्रदेश शब्द का प्रयोग जर्मन भूगोलवेता रीटर ने किया था। वस्तुतः रीटर ने ‘प्रदेश’ शब्द का उपयोग द्वैतवाद उपागम के रूप में किया था जिसके कारण भूगोल में “क्रमबद्ध बनाम प्रादेशिक भूगोल” की द्वैतवाद प्रारंभ हुआ था।

         साधारण शब्दों में प्रदेश का तात्पर्य स्थलखण्ड के उस इकाई से है जहाँ पर अधिकतर भौगोलिक तत्वों में समरूपता पायी जाती है। उसकी भौगोलिक परिस्थितियाँ उसके आस-पास के क्षेत्रों की परिस्थितियों से भिन्न होती है।

हर्बटशन ⇒ “प्रदेश पृथ्वी की सतह का वह क्षेत्र है, जहाँ भूमि, जल, वायु, वनस्पति, जीव-जन्तु तथा मानव के बीच क्षेत्रीय सह-संबंध होता है।”

डिक्सन ⇒ प्रदेश विशिष्ट आर्थिक समरूपता वाला क्षेत्र है। लेकिन इसका आधार भौतिक परिस्थितियों की समरूपता होती है। 

➡ अमेरिका के नियोजन समीति ने कहा है कि “प्रदेश एक ऐसा क्षेत्र है, जहाँ की परिवेश विशेष के संदर्भ में विशेष लक्षणों वाली मानवीय अभियोजना का स्वरूप विकसित हुआ है।”

➡ रूसी भूगोलवेता गैरीसीमोव ने संलिष्ट एकीकृत प्रदेश की संकल्पना प्रस्तुत की है जिसके अन्तर्गत आधुनिक नियोजन का कार्य और पारिस्थैतिक विकास की नीति/कार्य एक साथ की जाती है। ऐसे ही पारिस्थैतिकी पर आधारित नियोजन वाले क्षेत्र को प्रदेश कहते है।

प्रदेश की विशेषताएँ

            सामान्यतः भौगोलिक प्रदेश की निम्नलिखित विशेषताएँ होती है। जैसे:-

➡सभी प्रदेशों में मिलने वाले भौगोलिक घटकों के बीच सरूपता होती है।

➡कोई भी भौगोलिक प्रदेश दूसरे भौगोलिक प्रदेश की तुलना में विशिष्ट होता है और आस-पास के क्षेत्रों से भिन्न होता है।

➡किसी भी प्रदेश के भौगोलिक घटकों के बीच सह-संबंध एवं सह-अस्तित्व पाया जाता है। 

➡किसी भी प्रदेश में पदानुक्रमिक विभाजन की विशेषताएँ होती है। 

➡एक जैसे भौगोलिक प्रदेश में समस्याएँ भी एक सामान होती है।

➡प्रदेशों का सीमांकन उद्देश्य के आधार पर किया जाता है। 

➡दो प्रदेशों के बीच में सीमा खींचना एक कठिन कार्य है अर्थात् दो प्रदेशों के मिलन क्षेत्र में संक्रमण प्रदेश मिलने की संभावना होती है।

➡प्रदेशों के सीमांकन की दो विधियाँ है:- 

(i) अनुभावाश्रित विधि (Empirical method)

(ii) सांख्यिकी विधि (Statistical method)

➡ सांख्यिकी विधि के द्वारा प्रदेशों का सीमांकन करने पर संक्रमण क्षेत्र मिलने की संभावना नहीं रहती है। 

प्रदेश के प्रकार (प्रदेशों का वर्गीकरण

➡ किसी भौगोलिक प्रदेशों को तीन आधारों पर बाँटा जा सकता है:-

(i) एक कारक पर आधारित प्रदेश। जैसे:- जलवायु प्रदेश, मिट्टी प्रदेश, जैविक प्रदेश, इत्यादि।

(ii) बहुकारक आधारित प्रदेश। जैसे:- आर्थिक प्रदेश, सामाजिक प्रदेश

(iii) सम्पूर्ण कारकों पर आधारित प्रदेश। जैसे:- आर्थिक-सामाजिक नियोजन प्रदेश, संश्लिष्ट एकीकृत प्रदेश इत्यादि।

       आधुनिक भूगोल में किसी भी प्रदेश का कार्यिक महत्व बढ़ता जा रहा है। अतः पूरे विश्व में कार्यिक महत्व पर विशेष जोर दिया जा रहा है। कार्यों के आधार पर प्रदेशों का वर्गीकरण निम्न प्रकार से किया जाता है। जैसे:- नियोजन प्रदेश, नगरीय प्रदेश, कमांड क्षेत्र प्रदेश, महानगरीय प्रदेश, औद्योगिक प्रदेश इत्यादि। 

       लिंटन तथा व्हिटलसी महोदय ने प्रदेश के विशिष्ट गुणों के आधार पर वर्गीकृत करने का प्रयास किया है। लिंटन महोदय ने प्रदेशों का वर्गीकरण 7 पदानुक्रम में व्हिटलसी ने 4 पदानुक्रम में वर्गीकृत किया हैं:-

लिंटन के अनुसार

पदानुक्रम      प्रदेश

(1)               महाद्वीप

(2)              वृहत प्रदेश

(3)               प्रान्त 

(4)                खण्ड

(5)                ट्रैक्ट

(6)                 स्टो

(7)              बसाव स्थान 

व्हिटलसी   के अनुसार

पदानुक्रम    प्रदेश

(1)            प्रभामंडल

(2)            प्रान्त

(3)             जिला

(4)            स्थानीय

निष्कर्ष:-

         इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भूगोल में प्रदेशों का वर्गीकरण कई आधारों पर किया है। लेकिन उनमें से सर्वाधिक मान्यता कार्यों के आधार प प्रदेशों के वर्गीकरण को प्राप्त है।

प्रश्न प्रारुप

1. प्रदेश की अवधारणा को स्पष्ट कीजिये।

2. संक्षेप में प्रदेश के लक्षण बताइये।

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