3. What do you understand by environment? Discuss its components. (पर्यावरण से आप क्या समझते हैं? इसके प्रमुख घटक की विवेचना करें।)

3. What do you understand by environment? Discuss its components.

(पर्यावरण से आप क्या समझते हैं? इसके प्रमुख घटक की विवेचना करें।)



भूगोल परिभाषा कोश के अनुसार, “चारों ओर उन बाहरी दशाओं का योग, जिसके अन्दर एक जीव अथवा समुदाय रहता है या कोई वस्तु रहती है।”

ए. जी. टेन्सले के अनुसार, “प्रभावकारी दशाओं का सम्पूर्ण योग, जिसमें जीव रहते हैं, पर्यावरण कहलाता है”

विद्वान रॉस के अनुसार, “पर्यावरण वह बाह्य शक्ति है, जो प्रभावित करती हैं।”

भूगोलवेत्ता डडले स्टाम्प के अनुसार, “पर्यावरण प्रभावों का ऐसा योग है, जो जीव के विकास एवं प्रकृति को परिवर्तित तथा निर्धारित करता है ।”

हर्सकोविट्स के अनुसार, “वातावरण उन सब बाहरी दशाओं और प्रभावों का योग है, जो प्राणी के जीवन और विकास पर प्रभाव डालते हैं।”

        संक्षेप में हम कह सकते हैं कि पर्यावरण में वे सभी प्राकृतिक एवं मानव निर्मित कारक सम्मिलित हैं, जो चारों ओर से घेरे हुए हैं और प्रभावित करते हैं।

      दूसरे शब्दों में, पर्यावरण के अन्तर्गत भौतिक, सांस्कृतिक अथवा जैविक-अजैविक प्रभावशील घटकों को सम्मिलित किया जाता है, जो जीव की दशाओं और कार्यों को प्रभावित करता है। इस प्रकार भौतिक कारक के अलावा सांस्कृतिक कारकों के प्रभावों को भी सम्मिलित किया जाता है। इस प्रकार पर्यावरण को पाँच बिन्दुओं में विश्लेषित किया जा सकता है-

(1) पर्यावरण बाह्य शक्ति है।

(2) ये शक्तियाँ परस्पर संबंधित हैं।

(3) इन शक्तियों का संयुक्त प्रभाव पड़ता है।

(4) ये शक्तियाँ गत्यात्मक (परिवर्तनशील) हैं।

(5) इन शक्तियों का जीव पर प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है।

      पर्यावरण को दो प्रमुख प्रकारों में बाँटा जा सकता है-

1. भौतिक पर्यावरण (Physical Environment):-           

        भौतिक पर्यावरण प्रकृति का अनुपम उपहार है। इसका कोई विकल्प नहीं है। यह अमूल्य संसाधन सहज सभी को उपलब्ध है। भौतिक पर्यावरण से तात्पर्य उन भौतिक अथवा प्राकृतिक कारकों से है, जिन पर प्रकृति का सीधा नियंत्रण है, जिन्हें भगवान ने बनाया अर्थात् मानव का हस्तक्षेप इसके निर्माण में नहीं है।

        यदि मनुष्य को इस पृथ्वी से हटा लिया जाय, तो जिन क्रियाओं-प्रक्रियाओं और प्रतिक्रियाओं पर कोई अन्तर न आये, उन सब कारकों को भौतिक पर्यावरण के अन्तर्गत रखा जाता है। इसका आशय यह है कि जिसका निर्माण और नियंत्रण मनुष्य से परे है, जो प्रकृति प्रदत्त है, वह सब कुछ भौतिक पर्यावरण के अन्तर्गत आता है, जैसे- सूर्य ताप, ऋतु परिवर्तन स्थिति, भू-वैज्ञानिक संरचना, धरातल, भूकंप, ज्वालामुखी, खनिज, मिट्टियाँ, वनस्पति, जलराशियाँ, जीव-जन्तु ऐसे कारक हैं, जो प्रकृति जन्य हैं। इसलिए उक्त सभी कारकों को प्राकृतिक अथवा भौतिक पर्यावरण के अन्तर्गत रखा जाता है।

2. सांस्कृतिक पर्यावरण (Cultural Environment):-               

        सांस्कृतिक पर्यावरण मानव निर्मित होता है तथा मानव का इस पर पूर्ण नियंत्रण होता है। जैसे- संविधान, धर्म, दर्शन, संस्कृति, प्रतिमान, आदर्श मूल्य, सामाजिक परम्पराएँ, रीति-रिवाज, सामाजिक संबंध। इन अमूर्त तथ्यों के अलावा मूर्त कारक भी सांस्कृतिक पर्यावरण के अन्तर्गत आते हैं, जैसे- सड़कें, पुल, भवन, तालाब, आवास, शहर, सुरक्षा, चिकित्सा, शिक्षा केन्द्र, परिवहन स्थान, मनोरंजन स्थल आदि। मनुष्य पहले इनका निर्माण करता है और फिर इनसे प्रभावित होता है। नगरीय एवं औद्योगिक स्थलों पर सांस्कृतिक पर्यावरण विशेष प्रभावी होता है।

       शिक्षा केन्द्र और सुरक्षा केन्द्रों पर भी सांस्कृतिक कारक अत्यधिक प्रभावी होते हैं जबकि पर्यटन स्थलों पर भौगोलिक और सांस्कृतिक दोनों कारक प्रभावी होते हैं। सांस्कृतिक पर्यावरण वस्तुतः मनुष्य के भौतिक कारकों के प्रति अनुकूलन, समायोजन, संघर्ष आदि की प्रतिक्रिया-अनुक्रिया के परिणामस्वरूप जन्मा है; जो कृषि, उद्योग के साथ-साथ संस्कृति में भी देखा जा सकता है।

पर्यावरण के अवयव (घटक)

(Components of Environment)

      पर्यावरण अनेक अवयवों से मिलकर बना है। स्थूल रूप में अध्यात्म में इसे जड़ और चेतन कहा गया है। जिसे आधुनिक वैज्ञानिक अजैविक एवं जैविक कह कर विभाजित करते हैं। इसे भौतिक एवं अभौतिक अवयवों में विभक्त किया जा सकता है। इन घटनों की सर्वप्रथम वैज्ञानिक विवेचना 1948 में वनस्पतिशास्त्री ओस्टिंग ने की और निम्नलिखित प्रमुख घटकों में विभाजित किया-

1. पदार्थ (मिट्टी+पानी),

2. दशाएँ (ताप+प्रकाश)

3. बल (पवन+गुरुत्व)

4. जीव (जन्तु+वनस्पति)

5. काल (ऋतु+समय)।

      पर्यावरणविद् डौरेनमिर (1954) ने पर्यावरण के कारकों को सात वर्गों में विभाजित किया है-

1. मिट्टी,

2. हवा,

3. पानी,

4. आग,

5. ताप,

6. रोशनी,

7. जीव-जन्तु।

      संक्षेप में, पर्यावरण अध्ययन को सरल करते हुए पर्यावरण घटकों को दो वर्गों में विभक्त किया जा सकता है-

1. भौतिक कारक (Physical Factor)

A. पार्थिक कारक (Terrestrial factors):-

(i) भू रचना- (भूवैज्ञानिक संरचना खनिज, चट्टानें एवं मृदा)।

(ii) धरातल- (उच्चावच पर्वत, पठार, मैदान)।

(iii) स्थिति- (अवस्थिति, ज्यामिति परिस्थिति एवं क्षेत्र के संदर्भ में स्थिति)

2. सांस्कृतिक घटक (Cultural Factor):-

(i) आर्थिक घटक- कृषि, उद्योग, तथा व्यापार।

(ii) सामाजिक घटक-  संस्कृति, दर्शन, व्यवहार और आदर्श।

(iii) धार्मिक घटक- संस्कार तथा परम्पराएँ।

(iv) राजनैतिक घटक- नीतियाँ औ चेतना।


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2. Type of Ecosystem (पारिस्थितिकी तंत्र का प्रकार)

2. Type of Ecosystem

(पारिस्थितिकी तंत्र का प्रकार)


पारिस्थितिकी तंत्र का प्रकार⇒

Type of Ecosystem  

प्रश्न प्रारूप 

1. पारिस्थितिकी तंत्र के विभिन्न प्रकारों का विवरण उनकी प्रमुख विशेषताओं के आधार पर दीजिए।

             पारिस्थितिकी तंत्र का अध्ययन समय और स्थान के सन्दर्भ में किया जाता है। प्रत्येक तन्त्र, समय और स्थान के सन्दर्भ में जैविक व अजैविक घटकों के सकल योग को दर्शाता है। पारिस्थितिकी तन्त्र के विकास की विभिन्न अवस्थाओं को उनकी विशेषताओं के आधार पर चार प्रकारों में विभाजित किया जाता है:-

(A) प्रौढ़ पारिस्थितिकी तंत्र-

       यह पारिस्थितिकी तंत्र अनुकूल भौतिक पर्यावरण में लम्बे समय तक विकसित होता है। इस तन्त्र का जैवभार (Biomass) अधिक होता है। खाद्य श्रृंखला जटिल होकर खाद्य जाल का रूप ले लेती है, जिसमें पेड़-पौधों व जीव-जन्तुओं के साथ अपघटक (Decomposers) जीव भी होते हैं। ऐसे तंत्र में जीवों का जीवन-चक्र लम्बा एवं जटिल होता है। वन पारिस्थितिकी तंत्र इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। इसमें उत्पादक जीवों के साथ-साथ सभी श्रेणियों में उपभोक्ता जीव पाए जाते हैं। प्रौढ़ पारिस्थितिकी तंत्र में जैविक विविधता (Bio Diversity) अधिक पाई जाती है।

(B) अपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र-

      इस प्रकार के पारिस्थितिकी तंत्र में जैव-विकास की प्रारम्भिक अवस्था ही पायी जाती है। इसमें खाद्य शृंखला (Food Chain) छोटी एवं रैखिक (Linear) होती है। जैवभार कम तथा जीवों का जीवन-चक्र छोटा होता है। इस तंत्र में जैविक विविधता कम पायी जाती है। और उच्च श्रेणी के उपभोक्ताओं की कमी होती है। दलदली और छोटी घास वाली भूमि के पारिस्थितिकी तंत्रों में ये विशेषताएं पाई जाती हैं।

(C) मिश्रित पारिस्थितिकी तंत्र-

         इस प्रकार के पारिस्थितिकी तंत्र में प्रौढ़ और अपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्रों की विशेषताओं का मिश्रित रूप पाया जाता है। ऐसे पारिस्थितिकी तन्त्र में जैवभार सामान्य होता है। यद्यपि खाद्य श्रृंखला व्यवस्थित होती है, परन्तु खाद्य जाल (Food web) के रूप में परिवर्तित नहीं होती है। मिश्रित पारिस्थितिकी तंत्र का विकास पर्यावरण में परिवर्तन होने के कारण होता है। अपरदन चक्र में पुनर्योवन (Rejuvenation) के कारण भी मिश्रित पारिस्थितिकी तंत्र का विकास होता है। मानवीय क्रियाकलापों के फलस्वरूप वन पारिस्थितिकी तंत्र जब घास पारिस्थितिकी तंत्र बदल जाता है तो उसमें प्रौढ़ और अपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र की विशेषताओं का समावेश हो जाता है।

(D) निष्क्रिय पारिस्थितिकी तंत्र-

       भौतिक पर्यावरण की प्रतिकूलता के कारण जब पारिस्थितिकी तंत्र में जीवन नष्ट हो जाता है तब वह निष्क्रिय (Inert) हो जाता है। निष्क्रिय पारिस्थितिकी तंत्र का विकास ज्वालामुखी विस्फोट, भूकम्प, जलवायु परिवर्तन, हिमकाल के आगमन के कारण या तो अपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र या प्रौढ़ पारिस्थितिकी तंत्र में सम्पूर्ण जीवन नष्ट हो जाने के कारण होता है। मानवकृत स्रोतों द्वारा झील में प्रदूषण होने प जीवों का विनाश हो जाता है, जिससे तंत्र निष्क्रिय हो जाता है। प्रदूषण समाप्त होने पर तंत्र में पुनः जीवन प्रारम्भ हो जाता है।


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1. पारिस्थितिकी तंत्र की संरचना / Structure of Ecosystem

1. पारिस्थितिकी तंत्र की संरचना 

(Structure of Ecosystem)


पारिस्थितिकी तंत्र की संरचना

पारिस्थितिकी तंत्र की सं

प्रश्न प्रारूप

1. पारिस्थितिकी तंत्र की संरचना का वर्णन कीजिए।             

           प्रत्येक पारिस्थितिकी तंत्र की संरचना में पाए जाने वाले समस्त घटकों को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता-

(1) जैविक तत्व (Biotic Elements) तथा

(2) अजैविक तत्व (Abiotic Elements)

(1) जैविक तत्व (Biotic Elements)
        पारिस्थितिकी तंत्र के जैविक तत्वों में पेड़-पौधों व जीव-जन्तुओं की आबादी (Population) के समुदाय (Community) होते हैं। ये सभी जीव आपस में किसी-न-किसी प्रकार से एक-दूसरे से सम्बन्धित होते हैं। इन जीवों में परस्पर सम्बन्धों का मुख्य आधार भोजन है। अतः इन जीवों के भोजन प्राप्त करने के प्रकार के अनुसार जैविक तत्व को दो भागों में विभक्त किया गया है :-

(i) स्वपोषी या उत्पादक (Autotrophic or Producers)-

        पारिस्थितिकी तंत्र में जो जीव साधारण अकार्बनिक पदार्थों को ग्रहण कर सूर्य की प्रकाशीय ऊर्जा की उपस्थिति में प्रकाश-संश्लेषण (Photosynthesis) की क्रिया कर भोजन का निर्माण करते हैं, उन्हें स्वपोषी घटक (Autotrophic Component) कहते हैं। ये जीव अपने पोषण हेतु स्वयं भोजन का निर्माण करते हैं। स्थल पर उगने वाले सभी पौधे तथा जल में विद्यमान जलोद्भिद पौधे, शैवाल व सूक्ष्मदर्शी पौधे स्वपोषी जीवों के अन्तर्गत आते हैं। ये समस्त जीव कार्बोहाइड्रेट्स का निर्माण करते हैं जिसका उपयोग अन्य जीव प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से भोजन रूप में करते हैं। ये अपना भोजन स्वयं विशिष्ट प्रक्रिया द्वारा प्रकृति में मूल रूप में प्राप्य गैस व प्रकाश के माध्यम से सर्वप्रथम उत्पादित करते हैं, इसलिए उत्पादक (Producer) जीव कहलाते हैं।

(ii) परपोषित घटक अथवा उपभोक्ता (Heterotrophic or Consumers)-

     पारिस्थितिकी तंत्र में वे जीव जो प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से ऊपर वर्णित उत्पादकों द्वारा निर्मित भोजन पर निर्भर रहते हैं, परपोषित अथवा उपभोक्ता जीव कहलाते हैं। वस्तुतः वनस्पति उत्पादक है और हर जीव उपभोक्ता है। इन उपभोक्ता जीवों को पुनः दो श्रेणियों में विभाजित किया गया है:- 

(अ) वृहत् या गुरु उपभोक्ता (Macro Consumers) तथा

(ब) सूक्ष्म या लघु उपभोक्ता (Micro Consumers)

(अ) वृहत् या गुरु उपभोक्ता (Macro Consumers)-

       पारिस्थितिकी तंत्र में वे जीव जो अपना भोजन पौधों तथा जन्तुओं से प्राप्त करते हैं, वृहद् उपभोक्ता या भक्षकपोषी (Phagotroph) या बायोफेगस (Biophages) कहलाते हैं। ये उपभोक्ता जीव भोजन को ग्रहण कर अपने शरीर के अन्दर उसका पाचन करते हैं। शाकाहारी जीव अपने पोषण के लिए पौधों पर निर्भर रहते हैं; जैसे वन में हिरण भोजन के लिए प्रत्यक्ष रूप से पौधों पर निर्भर होता है तथा शेर अपने भोजन के लिए हिरण को खाता है।

      यहाँ पर हिरण और शेर दोनों ही उपभोक्ता हैं लेकिन हिरण अपने भोजन के लिए प्रत्यक्ष रूप से पेड़-पौधों पर निर्भर है जबकि शेर अप्रत्यक्ष रूप से। अतः इन उपभोक्ताओं की श्रेणियां अलग-अलग हैं। इस प्रकार उपभोक्ताओं को भी तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है:-

(1) प्रथम श्रेणी के उपभोक्ता या प्राथमिक उपभोक्ता (Consumers of First Order)

(2) द्वितीय श्रेणी के उपभोक्ता या द्वितीयक उपभोक्ता (Consumers of Second Order)

(3) तृतीय श्रेणी के उपभोक्ता या तृतीयक उपभोक्ता (Consumers of Third Order)

(1) प्रथम श्रेणी के उपभोक्ता या प्राथमिक उपभोक्ता (Consumers of First Order or Primary Con- sumers)-

        वे जीव जो भोजन की प्राप्ति के लिए प्रत्यक्ष रूप से हरे पौधों या स्वपोषी जीवों पर निर्भर होते हैं, प्राथमिक उपभोक्ता कहलाते हैं। ये मुख्य रूप से शाकाहारी (Herbivores) होते हैं। स्थलीय पारिस्थितिकी तन्त्र में रोडेण्ट्स (Rodents), कीट, गाय, भैंस, बकरी, खरगोश, भेड़, हिरण, चूहा इत्यादि प्राथमिक उपभोक्ता हैं। इसी प्रकार प्रोटोजोआ (Protozoans), क्रस्टेशियन्स (Crustaceans) व मोलस्कस (Molluscus) समुद्रों तथा तालाबों के प्राथमिक उपभोक्ता हैं।
(2) द्वितीय श्रेणी के उपभोक्ता या द्वितीयक उपभोक्ता (Consumers of Second Order or Secondary Con- sumers)-

             इस श्रेणी के उपभोक्ता अपना भोजन प्रथम श्रेणी के शाकाहारी उपभोक्ताओं से प्राप्त करते हैं। ये प्रायः मांसाहारी (Cornivores) या सर्वाहारी (Omnivores) होते हैं। जैसे- कौआ, मेंढक, लोमड़ी, कुत्ता, सांप, बिल्ली, आदि।

(3) तृतीय श्रेणी के उपभोक्ता या तृतीयक उपभोक्ता (Consumers of Third Order or Tertiary Con- sumers)-

          इस श्रेणी के उपभोक्ता अपना भोजन प्राथमिक एवं द्वितीयक श्रेणी के उपभोक्ताओं से प्राप्त करते हैं। ये उपभोक्ता सर्वाहारी जीवों का भी भक्षण करते हैं। पारिस्थितिकी तन्त्र में इस श्रेणी के अन्तर्गत वे ही जीव आते हैं जो स्वयं तो अन्य मांसाहारी जीवों को खा जाते हैं, किन्तु उन्हें कोई जीव नहीं खा सकता।

        इस प्रकार के उपभोक्ताओं को उच्च मांसाहारी या उपभोक्ता (Top consumers) कहा जाता है, जैसे- शेर, चीता, बाज (Hawk), गिद्ध (Vulture), इत्यादि। इन्हें सर्वोच्च (Top) या अन्तिम उपभोक्ता भी कहा जाता है क्योंकि इनका उपभोग करने वाला कोई अन्य जीव नहीं होता है।

सूक्ष्म या लघु उपभोक्ता
(ब) सूक्ष्म या लघु उपभोक्ता (Micro Consumers) – 

          पारिस्थितिकी तंत्र के लघु उपभोक्ताओं में कवक (Fungi), जीवाणु (Bacteria) तथा मृतोपजीवी (Saprotrophs) होते है, इन्हें अपघटक (Decomposers) वा आस्माट्राप्स (Osmotrophs) भी कहते हैं। ये जीव उत्पादक तथा उपभोक्त जीवों के मृत शरीरों पर क्रिया कर जटिल कार्बनिक पदार्थों को साधारण पदार्थों में परिवर्तित करते हैं। इस प्रक्रिया में ये स्वयं अपना पोषण करते हैं और अकार्बनिक पदार्थ पुनः उत्पादक हरे पौधों द्वारा उपयोग में ले लिए जाते हैं। ये अपघटक पारिस्थितिकी तन्त्र के अस्तित्व को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

(2) अजैविक तत्व (Abiotic Elements):-

        पारिस्थितिकी तन्त्र के अजैविक तत्वों में वे समस्त भौतिक कारक आते हैं जो जीवों के जीवन को बनाए रखते हैं। इन तत्वों का निर्माण भौतिक पर्यावरण की शक्तियों और प्रक्रियाओं से हुआ है। इन तत्वों को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है :-
(i) अकार्बनिक पदार्थ (Inorganic Substances)-

         अकार्बनिक पदार्थों के अन्तर्गत मिट्टी, जल, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, फॉस्फेट, आदि सम्मिलित हैं। जल और मिट्टी के माध्यम से इन अकार्बनिक पदार्थों का पारिस्थितिकी तन्त्र में चक्रीकरण होता है।
(ii) कार्बनिक पदार्थ (Organic Substances)- 

      इसमें वसा, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, ह्यूमस, क्लोरोफिल, लिपिड इत्यादि होते हैं।
(iii) जलवायविक कारक (Climatic Factors)-

         इसमें सौ प्रकाश, तापमान, आर्द्रता, पवन, वर्षा, इत्यादि भौतिक तत्व महत्वपूर्ण हैं। इन सभी भौतिक तत्वों में सौर ऊर्जा पारिस्थितिकी तन्त्र की क्रियाशीलता के लिए अति आवश्यक होती है।


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