Archives April 2023

19. आरेख का प्रकार एवं उपयोग

आरेख का प्रकार एवं उपयोग

(Diagram: Types & uses or Statistical Representation of Data)


आरेख का प्रकार एवं उपयोग

         द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद भूगोल के विषयवस्तु एवं विधि तंत्र में मात्रात्मक क्रांति का आगमन हुआ। इसी मात्रात्मक क्रान्ति का यह प्रभाव था कि भूगोल में अनेक प्रकार के भौगोलिक तत्वों का निरूपण हेतु आरेख (Diagram) का निर्माण किया जाने लगा।

⇒ मात्रात्मक क्रान्ति- भूगोल में गणितीय विधि का प्रयोग करना।

भौगोलिक तत्वों को ग्राफ या चित्रों के माध्यम से प्रदर्शित करने की विधि को आरेख (Diagram) कहते हैं।

⇒ भूगोल में प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक वातावरण के किसी तत्व का वितरण प्रदर्शित करने वाले मानचित्र को वितरण मानचित्र कहते है।

⇒ वितरण मानचित्र को दो भागों में बाँटते हैं-

(1) अमात्रात्मक विधि के द्वारा निर्मित वितरण मानचित्र या गुण प्रधान वितरण मानचित्र

(2) मात्रात्मक विधि पर आधारित वितरण मानचित्र या सांख्यिकी मानचित्र

गुण प्रधान मानचित्र /वितरण मानचित्र

       गुण प्रधान मानचित्र मोटे तौर पर चार प्रकार का होता है:-

(1) रंगारेखा विधि (Choro-Chromatic Method)

(2) सामान्य छाया विधि (Sketching Map) पर आधारित मानचित्र

(3) चित्रीय विधि (Pictorial Map) पर आधारित मानचित्र

(4) वर्ण प्रतीकी विधि पर आधारित मानचित्र (Choros-Chematic Map)

मात्रात्मक मानचित्र

      मात्रात्मक मानचित्र भी चार प्रकार का होता है-

(i) वर्णमात्री विधि पर आधारित मानचित्र

(ii) सममान प्रतीक विधि पर आधारित मानचित्र

(iii) बिन्दु विधि पर आधारित मानचित्र

(iv) आरेखी विधि आधारित मानचित्र

(1) रंगारेखी विधि मानचित्र (Colour patch Map)

⇒ इसे Colour Map या Choro-Chromatic Map भी कहते हैं।

⇒ प्राकृतिक, राजनीतिक एवं प्रशासकीय ने प्रदेशों के विस्तार, भूमि उपयोग, मिट्टी एवं वनस्पतियों के प्रकार का वितरण प्रदर्शित करने के लिए इस विधि का प्रयोग किया जाता है।

⇒ रंगारेखी मानचित्र पर अलग-2 भौगोलिक तत्वों को अलग-2 रंग से प्रदर्शित करते हैं।

(2) Sketching Map (सामान्य छाया विधि)

⇒ sketching Map में एक भौगोलिक तत्व के उपविभाग को एक ही रंग से अलग-2 तीव्रता (Intensity) प्रदर्शित करते हैं।

(3) चित्रीय विधि पर आधारित मानचित्र

        किसी देश के दर्शनीय स्थान, पर्यटन केन्द्र, वेष-भूषा एवं ऐतिहासिक इमारतों के चित्रों के माध्यम से मानचित्र परम प्रस्तुत करना चित्रीय मानचित्र कहलाता है।

(4) वर्ण प्रतीकी मानचित्र

        वैसा मानचित्र जिस पर कई तत्त्वों के वितरण को एक ही मानचित्र पर दिखाया जाता है।

⇒ वर्ण प्रतीकी मानचित्र पर खनिजों का वितरण, औद्योगिक वितरण एवं फसल उत्पादन के वितरण प्रदर्शित करते हैं और Index बनाकर इसमें संकेत के रूप प्रदर्शित कर देते हैं।

⇒ कभी-2 Index का निर्माण कर सीधे-2 भौगोलिक तत्व के पहला अक्षर को मिलने वाले स्थान पर लिख दिया जाता है। ऐसे मानचित्र को नामांकन विधि मानचित्र कहते है।

मात्रात्मक विधि

       जब भौगोलिक तत्वों जैसे वस्तुओं के मूल्य, मात्रा, घनत्व इत्यादि को भौगोलिक मानचित्र पर या सांख्यिकी विधि द्वारा प्रकट किया जाता है तो उसे मात्रात्मक विधि घर आधारित आरेख (मानचित्र) कहते हैं।

यह कई प्रकार का होता है। जैसे-

(1) वर्णमात्री विधि (Choropleth)

        ऐसे मानचित्र में भिन्न-2 घनत्त्व वाली भौगोलिक तत्त्वों को मानचित्र पर प्रति इकाई औसत या प्रतिशत के मूल में प्रदर्शित करते हैं। जैसे- जनघनत्व (प्रति इकाई क्षेत्रफल पर निवासित जनसंख्या), कृषि भूमि का प्रतिशत, उत्पादकता (kg प्रति इकाई क्षेत्रफल) को दिखाया जाता है।

⇒ इसमें मूल्यों के बढ़ने के साथ रंगों के गहराई में भी वृद्धि होते जाती है।

(2) सममान रेखा विधि (Isopleth Map)

          मानचित्र पर किसी वस्तु के समान मूल्य या धनत्व को मिलाने वाली रेखा को Isopleth रेखा कहते हैं।

⇒ Isopleth जलवायु के तत्वों को दिखलाने के लिए काफी उपयोगी है। इसके अलावे इस पर निम्नलिखित तत्त्वों को प्रदर्शित किया जा सकता है। जैसे- समताप रेखा, सममेघ रेखा, समवर्षा रेखा, समदाब रेखा इत्यादि।

1. आइसोनीफ (Isonif)⇒ समान हिम वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा को आइसोनीफ कहते है।

2.  सममेघ रेखा या आइसोनेफ (Isoneph)⇒ समान मेघ आच्छादन वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा को आइसोनेफ कहते है।

3. आइसो बाथ (Isobath)⇒ समुद्र के अंदर समान गहराई वाले स्थानों को मिलाकर खींचे जाने वाली रेखा को आइसो बाथ कहते है।

4. आइसो ब्रांट (Isobront)⇒ एक समान समय पर तूफान आने वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

5. समपवनवेग रेखा या आइसोटैक (Isotach)⇒ मौसम मानचित्र पर पवन की समान गति वाले स्थानों को मिलाकर खींची गई रेखा।

6. समताप रेखा (Isotherm)⇒ समान तापमान वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

7. आइसोपैच (Isopach)⇒ हिमानी अथवा चट्टानों के समान मोटाई वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

8.  समकाल रेखा या आइसोक्रोन (Isochrone)⇒ किसी बिंदु से एक समान समय में तय कि गई दूरी वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा।

(3) बिन्दु विधि (Dot Method)

          इसे बनाने से पूर्व चार तथ्यों पर ध्यान देना पड़ता है-

(i) बिन्दुओं के आकार को निश्चित करना पड़ता है।

(ii) बिन्दु मूल्य सुनिश्चित करना पड़ता है।

⇒ बिन्दुओं के मूल्य का निर्धारण दो आधार पर होता है:

(a) क्षेत्रीय या स्टिल जेन बोअर विधि (क्षेत्रफल के लिए)

(b) आयतनी या स्टेनडी गीयर विधि (आयतन के लिए)

(iii) बिन्दुओं को अंकित करना- यह भी दो प्रकार का हो सकता है:-

(a) समवितरण प्रणाली पर आधारित

(b) असमवितरण प्रणाली पर आधारित

(iv) एक समान बिन्दु बनाना।

⇒ बिन्दु विधि या आधारित मानचित्र में केवल एक वस्तु का विवरण दिखाते हैं। जैसे:- जनसंख्या,पालतू पशु

क्षेत्रीय या स्टिल जेन बोअर विधि

⇒ यह बिन्दु विधि वितरण मानचित्र का एक संशोधित रूप है।

⇒ इस विधि के द्वारा ग्रामीण एवं नगरीय जनसंख्या को स्पष्ट रूप से दिखाया जा सकता है।

⇒ इस विधि में ग्रामीण जनसंख्या को बिंदु के द्वारा और नगरीय जनसंखा को अनुपातिक वृत के द्वारा दिखाया जाता है।

इसमें आनुपातिक वृत को क्षेत्रफल के रूप में प्रदर्शित करते हैं।

⇒ वृतों की त्रिज्या सम्बंधित जनसंख्या का वर्गमूल निकालकर बिन्दु के आकार से गुणा करके प्राप्त किया जाता है।

आयतनी या स्टेनडी गीयर विधि

⇒ इसमें भी ग्रामीण एवं नगरीय जनसंख्या के वितरण को मानचित्र पर दिखाया जाता है।

⇒ बोअर विधि में कभी-2 नगरीय केन्द्र की जनसंख्या अधिक होने पर आकार बहुत बड़ा हो जाता है, जिसके कारण वृत नगर सीमा के बाहर चली जाती है।

⇒ अत: इस समस्या से निपटने हेतु नगरीय जनसंख्या को समानुपातिक गोला के रूप में प्रदर्शित किया जाता है। 

⇒ गोला का अर्द्ध व्यास जनसंख्या के घनमूल निकालकर ज्ञात करते हैं।

⇒ स्टेन डी गियर विधि में ग्रामीण जनसंख्या को बिन्दुओं एवं नगरीय जनसंख्या को गोलों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।

(4) आरेखी विधि पर आधारित मानचित्र

         वैसा मानचित्र जिसमें भौगोलिक तत्वों को सरल रेखा, वृत, दण्ड इत्यादि के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। उसे आरेख कहते हैं।

आरेख चार प्रकार के होते हैं-

(i) दण्डारेख (Bar Diagram)

(ii) वृत आरेख (Pie Diagram)

(iii) रेखीय आरेख (Line Graph)

(iv) त्रिविम आरेख (Three Dimensional)

(i) दण्डारेख (Bar Diagram)

        दण्ड-आरेख पा पिछले शताब्दी के जनसंख्या को प्रदर्शित किया जा सकता है। इसमें समय को x-axis पर और जनसंख्या को Y-axis पर दिखाया जाता है।

      वस्तुतः दण्डारेख दो प्रकार का होता है:-

(a) साधारण दण्ड आरेख (Simple Bar Diagram):- साधारण दण्ड आरेख में कुल मात्रा को एक दण्ड के रूप में प्रदर्शित करते है।

साधारण दण्ड आरेख

(b) मिश्रित दण्ड आरेख (Compound Bar Diagram):- यदि दिया गया डाटा सतत (Continuous) हो तो दण्डारेख आयत चित्र के रूप में बनते है। 

मिश्रित दण्ड आरेख

(c) बहुदण्ड आरेख (Multiple Bar Diagram):- इसमें दो या अधिक वस्तुओं के आँकड़े एक साथ प्रदर्शित किये जाते हैं। तुलनात्मक अध्ययन में ये विशेष रूप से महत्वपूर्ण होते हैं।

बहुदण्ड आरेख

(ii) वृत आरेख (Pie Diagram)

                  यह आँकड़ों को प्रदर्शित करने की एक सरल ज्यामितीय विधि है। वृत्तारेख में वृत्त का कुल क्षेत्रफल आँकड़ों का कुल योग तथा विभिन्न त्रिज्याखंड आँकड़ों के प्रत्येक घटक को प्रदर्शित करते हैं। वृत्तारेख बनाने के लिए सर्वप्रथम सुविधानुसार कोई अर्द्धव्यास से वृत्त खींचकर आँकड़ों के योग को प्रदर्शित करते हैं। इसके बाद आँकड़ों के विभिन्न घटकों या उपविभागों के अंशों में मान निम्न प्रकार ज्ञात करते हैं:

आरेख का प्रकार एवं उपयोग

            इस प्रकार ज्ञात किये गये कोणों को वृत्त में कहीं भी अर्द्धव्यास खींचकर बनाया जा सकता है, परन्तु उत्तर दिशा से प्रारंभ करके घड़ी की सूई की दिशा में तथा अवरोही क्रम में बनाये गये कोण अधिक श्रेयस्कर होते हैं।

वृत आरेख

(iii) रेखीय आरेख (Line Graph)

              Line Diagram प्रवृति का द्धोतक है। Line Diagram से जनसंख्या वृद्धि, Market Price, Index को पर्दर्शित करते है। 

Line Diagram

(iv) त्रिविम आरेख (Three Dimensional)

               जैसा कि नाम से पता चलता है, इन आरेखों के तीन आयाम होते हैं, अर्थात लंबाई, चौड़ाई और गहराई। घनीय और गोलाकार आरेख त्रिविम या त्रिआयामी आरेखों के मुख्य उदाहरण हैं। त्रिवि या त्रिआयामी रेखाचित्रों का आयतन उनके द्वारा दर्शायी जाने वाली मात्राओं के समानुपाती होता है, और इसीलिए उन्हें आयतन आरेख भी कहा जाता है। यह आरेख द्विविम या द्विआयामी आरेखों की तुलना में बहुत कम जगह घेरते हैं। इस प्रकार, वे विशेष रूप से उपयोगी होते हैं जब दिए गए मात्राओं के मूल्य बहुत भिन्न होते हैं। इन आरेखों को वितरण मानचित्रों पर स्थित आरेखों के रूप में भी उपयोग किया जाता है।

त्रिविम आरेख

त्रिविम आरेख


पिरामिड आरेख (Piramidal Diagram) 

                     पिरामिड Diagram द्वारा दो विपरीत भौगोलिक आंकड़ों को विरूपित किया जाता है। जैसे- पुरुष-महिला के लिंगानुपात, आयात-निर्यात, औसत आयु (स्त्री- पुरुष) को दिखाते है।

पिरामिड आरेख

पट्टिका-ग्राफ (Band Graph)

             जब किसी उत्पादन का आंकड़ा कई वर्षों का और कई देशों का उपलब्ध हो तो उसे Band Graph के माध्यम से प्रदर्शित करते है।

पट्टिका-ग्राफ

Poly Graph 

⇒ Poly Graph  का प्रयोग जनसँख्या भूगोल में किया जाता है

⇒ Poly Graph  पर मृत्यु दर, जन्म दर और प्राकृतिक वृद्धि दर को प्रदर्शित किया जाता है

Poly Graph 


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18. आलेखी / रैखिक विधि (Graphical or Linear Method)

आलेखी / रैखिक विधि (Graphical or Linear Method)



आलेखी / रैखिक विधि⇒

            आलेखी विधि का प्रयोग कर मानचित्र पर की दूरी को और धरातल के वास्तविक दूरी को मापने हेतु एक रेखा खींचकर उस पर मापनी अंकित कर दिया जाता है।

गुण एवं उपयोगिता के आधार पर रेखीय मापनी निम्नलिखित प्रकार के होते हैं-

(1) साधारण रेखीय मापक (Simple Linear Seale)

       यह मानचित्र पर दूरी मापने का सर्वोत्तम Scale है। इस मापनी को मानचित्र के एक भाग में एक साधारण रेखा खींचकर दो भागों में बाँट देते हैं। एक भाग प्राथमिक पैमाना कहलाता है और दूसरा भाग द्वितीयक पैमाना कहलाता है। प्राथमिक पैमाना को हमेशा दाईं ओर प्रदर्शित करते हैं। जबकि द्वितीयक पैमाना को हमेशा बाईं ओर प्रदर्शित करते हैं।          

आलेखी

साधारण रेखीय मापक

       प्राथमिक मापनी में केवल एक उपविभाग होता है जबकि द्वितीयक मापनी में दस उपविभाग होता है। इसका तात्पर्य है कि साधारण मापनी से 1km के 10वें भाग के दूरी को भी ज्ञात कर सकते हैं।

(2) तुलनात्मक मापनी (Comaprative Scale)

        तुलनात्मक मापनी को बनाने के पीछे उद्देश्य यह है कि मानचित्र की विभिन्न मापों के मापकों जैसे- मील और किमी०, मीटर और गज, फैदम और मीटर इत्यादि में एक साथ दूरियाँ ज्ञात कर ली जाय।

       रचना के दृष्टि से तुलनात्मक मापनी भी साधारण मापनी के समान होता है। लेकिन इसमें एक ही स्थान पर दो मापनी अलग-2 इकाई के बना दिये जाते हैं।

तुलनात्मक मापनी

तुलनात्मक मापनी

⇒ तुलनात्मक मापक दो साधारण मापकों का समिश्रण है।

⇒ दोनों साधारण मापक समान लम्बाई के होते हैं।

⇒ दोनों साधारण मापक का मापन एक ही प्रदर्शक भिन्न पर निर्मित किये जाते हैं।


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17. विकर्ण तथा वर्नियर स्केल (Vernier and Diagonal Scale)

17. विकर्ण तथा वर्नियर स्केल

(Diagonal and Vernier Scale)



विकर्ण मापनी (Diagonal Scale)⇒

        विकर्ण मापनी एक ऐसा मापनी है जिसके माध्यम से तीन इकाई तक दूरियों का मापन कर सकते हैं। या इसी शब्दों में यह कहा जा सकता है कि इसके द्वारा दशमलव के बाद दो अंकों तक (100वाँ भाग तक) की दूरी को ज्ञात किया जा सकता है।

       इस मापनी में विकर्णों की सहायता से द्वितीयक मापनी को पुन: और छोटे-2 भागों में विभाजित कर दिया जाता है। इसे नीचे के चित्र में देखा जा सकता है।

विकर्ण मापनी

विकर्ण मापनी

 

वर्नियर स्केल (Vernier Scale)⇒

वर्नियर स्केल

वर्नियर स्केल

         वर्नियर स्केल एक ऐसा यंत्र है जिसके माध्यम से सूक्ष्म दूरियों को पढ़ा जा सकता है। 

⇒ सर्वेक्षण कार्य के दौरान और वायुयान के पायलट अपने पास वर्नियर स्केल रखते है, ताकि सूक्ष्मतम स्तर तक दूरियों का मापन कर सके।

⇒ वर्नियर पैमाना का आविष्कार पियरे वर्नियर ने किया था।

⇒ सर्वेक्षण के दौरान थियोडोलाइट नामक उपकरण के साथ इसका प्रयोग किया जाता है।

⇒ भारत में वार्नियर स्केल का निर्माण मुजफ्फरनगर के मोती झील (मुहल्ला) में किया जाता है।

⇒ वर्नियर मापनी के द्वारा मापा जाने वाला सबसे छोटी दूरी को Least Count (लीस्ट काउंट) कहते हैं।

Least Count = 1/N XP

यहाँ, P = प्राथमिक मापनी के सबसे छोटे भाग का मान

N = वर्नियर मापनी में बनाए गए भागों की कुल संख्या।

⇒ वर्नियर पैमाना में दो प्रकार का स्केल होता है।

(1) प्राथमिक/प्रधान पैमाना,

(2) वर्नियर पैमाना

⇒ जर्मनी में निर्मित वर्नियर में 0 के स्थान पर “तीर” का  प्रयोग होता है। 

⇒ किसी गोल पृष्ठ वाले सतह का सूक्ष्मतम मोटाई या वक्रता का मापन स्फैरोमीटर के द्वारा करते हैं। 


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21. जनसंख्या मानचित्र के प्रकार एवं प्रदर्शन की विधियाँ

21. जनसंख्या मानचित्र के प्रकार एवं प्रदर्शन की विधियाँ


जनसंख्या मानचित्र के प्रकार एवं प्रदर्शन की विधियाँ⇒

           जनसंख्या वितरण एवं घनत्व मानचित्रों का भूगोल के अध्ययन में विशेष महत्व है। इन मानचित्रों के अध्ययन से स्पष्ट हो जाता है कि धरातल, जलवायु तथा अन्य प्राकृतिक परिस्थितियों का मनुष्य के घनत्व एवं वितरण के ऊपर क्या प्रभाव पड़ता है। समय अथवा स्थान परिवर्तन के साथ-साथ किस प्रकार मनुष्य की भौतिक तथा सामाजिक परिस्थिति परिवर्तित होती है तथा इस परिवर्तन का मनुष्य के वितरण एवं घनत्व पर क्या प्रभाव पड़ता है, इन सभी प्रश्नों का उत्तर जनसंख्या-मानचित्र के अध्ययन से प्राप्त होता है।

जनसंख्या मानचित्र के प्र

जनसंख्या मानचित्र के प्रकार

             जनसंख्या मानचित्रों के निम्नलिखित तीन मुख्य प्रकार होते हैं:- 

1. जनसंख्या वितरण मानचित्र (Maps Showing Population Distribution):-

           इस प्रकार के मानचित्रों से जनसंख्या के वितरण का चित्रण किया जाता है। यह चित्रण वास्तविक आंकड़ों (Absolute Figures) के आधार पर किया जाता है। इस प्रकार के जनसंख्या वितरण मानचित्र जनसंख्या के वितरण का शुद्ध एवं सजीव चित्रण प्रस्तुत करते हैं। इस प्रकार के मानचित्रों द्वारा किसी क्षेत्र की ग्रामीण एवं शहरी जनसंख्या का सांख्यिकीय वितरण भी प्रस्तुत किया जा सकता है।

2. जनसंख्या घनत्व मानचित्र (Maps Showing Relative Density of Population or Choropleth Maps):-

           इस प्रकार के मानचित्रों द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में जनसंख्या के औसत घनत्व को प्रदर्शित किया जाता है। इस प्रकार मानचित्रों द्वारा क्षेत्र की भौगोलिक एवं अन्य परिस्थितियों का जनसंख्या के घनत्व पर क्या प्रभाव पड़ता है इत्यादि प्रश्नों का उत्तर प्राप्त होता है। रेखा द्वारा छाया देकर विभिन्न घनत्व प्रदर्शित किए जाते हैं।

3. परिमाणविहीन मानचित्र (Non-Statistical Population Maps or Chorochromatic Maps):-   

           इस प्रकार के मानचित्र द्वारा जनसंख्या सम्बन्धी ऐसी दशाओं का वितरण प्रस्तुत होता है, जिनमें आंकड़ों की आवश्यकता नहीं होती, जैसे—धर्म, भाषा, जाति, आदि का वितरण। परिमाणविहीन मानचित्रों में नामांकन विधि, चित्रात्मक विधि तथा रंगछाया-विधि द्वारा जनसंख्या सम्बन्धी दशाओं का क्षैतिज वितरण प्रस्तुत किया जाता है।

             जनसंख्या के वितरण एवं घनत्व को निम्नलिखित विधियों द्वारा मानचित्र पर प्रदर्शित किया जाता है।

1. समान बिन्दु विधि (Uniform Dot Method):-

             मापनी के अनुसार एक-समान गोलाई के बिन्दुओं द्वारा क्षेत्र की जनसंख्या का क्षेत्रीय वितरण प्रदर्शित किया जाता है। बिन्दुओं को भरने में विशेष सावधानी की आवश्यकता पड़ती है। इसका उल्लेख पहले ही किया जा चुका है। इस विधि द्वारा जनसंख्या वितरण के प्रदर्शन का मुख्य दोष यह है कि ग्रामीण अथवा शहरी जनसंख्या का अलग-अलग प्रदर्शन इस विधि द्वारा सम्भव नहीं है।

2. आनुपातिक बिन्दु तथा वृत्त विधि (Proportional Dot and Circle Method):-

              इस विधि द्वारा जनसंख्या के वितरण आदि का प्रदर्शन मापनी के अनुसार मानचित्र के विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार के बिन्दु तथा वृत्त बनाकर किया जाता है। इस विधि का दोष यह है कि कभी-कभी वृत्त एक-दूसरे को ढंक लेते हैं तथा मानचित्र स्पष्ट (Clear) आंकड़े प्रदर्शित नहीं करता।

3. बिन्दु एवं वृत्त विधि (Dot and Circle Method):-

               इस विधि को स्टिलजेनबौर विधि (Stilgenbaur’s Method) भी कहते हैं। इस विधि द्वारा ग्रामीण जनसंख्या बिन्दुओं द्वारा तथा नगर जनसंख्या वृत्तों द्वारा प्रदर्शित की जाती है। नगरों की विभिन्न जनसंख्या विभिन्न क्षेत्रफल वाले वृत्तों द्वारा प्रदर्शित की जाती है। इस विधि के आंकड़ों के प्रदर्शन हेतु बनाए गए वृत्तों तथा बिन्दुओं के अर्द्धव्यास में महान असमानताएं होने के कारण यह विधि अधिक प्रचलित नहीं है। उदाहरण के लिए, यदि 1/20 इंच के अर्द्धव्यास का बिन्दु 103 जनसंख्या प्रदर्शित करता है तो 10,00,000 जनसंख्या वाले नगर के लिए 5 इंच के अर्द्धव्यास का वृत्त खींचा जाएगा जो अत्यन्त असंगत होगा। इस दोष को दूर करने के लिए गोलीय आरेखों (Spherical Diagrams) का प्रयोग बिन्दु विधि साथ करते हैं। बिन्दु एवं वृत्त विधि में वृत्तों का अर्द्धव्यास वर्गमूल सूत्र विधि द्वारा निकाला जाता है।

4. बिन्दु एवं गोला विधि (Dot and Sphere Method):-

               इस विधि को स्टेन डी गियर विधि (Sten De Geer Method) भी कहते हैं। इस विधि द्वारा ग्रामीण जनसंख्या बिन्दुओं द्वारा तथा नगरीय जनसंख्या गोलों द्वारा प्रदर्शित की जाती है। गोलों के अर्द्धव्यास विभिन्न नगरों की जनसंख्या के आंकड़ों की सहायता से परिकलित (Calculate) किए जाते हैं। बिन्दु समान अर्द्धव्यास के होते हैं तथा नगरों की जनसंख्या का प्रदर्शन करने वाले गोले मापनी के अनुसार ही अर्द्धव्यास के होते हैं। इनकी मापनी भी बिन्दुओं की मापनी के अनुसार होती है। गोलों का अर्द्धव्यास निकालने के लिए घनमूल मापनी विधि प्रयोग में लाते हैं।

5. आनुपातिक बिन्दु विधि (Multiple Dot Method):-

            इस विधि द्वारा जनसंख्या प्रदर्शन में बिन्दुओं का आकार जनसंख्या के साथ घटता-बढ़ता रहता है। अधिक जनसंख्या प्रदर्शित करने के लिए बड़े आकार के बिन्दु मानचित्र में भरे जाते हैं तथा छोटे आकार के बिन्दु कम जनसंख्या प्रदर्शित करते हैं।

जनसंख्या घनत्व प्रदर्शन विधियाँ

             जनसंख्या घनत्व मानचित्र मनुष्य तथा भूमि का साधारण आनुपातिक सम्बन्ध प्रदर्शित करते हैं। इस प्रकार के सम्बन्ध को गणितीय घनत्व (Arithmetric Density) भी कहते है। इस घनत्व का यह अर्थ समझा जाता है कि प्रति वर्ग किमी भूमि पर कितने मनुष्य रहते हैं।

             कृषि योग्य भूमि तथा जनसंख्या के घनत्व के सम्बन्ध को भी मानचित्रों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। इस प्रकार का घनत्व (Physiological Density) जनसंख्या तथा कृषि योग्य भूमि का आनुपातिक घनत्व कहलाता है। इसी प्रकार जनसंख्या का खेतिहर घनत्व (Agricultural Density) अथवा आर्थिक घनत्व (Economic Density) अथवा पौष्टिक घनत्व (Nutrition Density) आदि का भी प्रदर्शन जनसंख्या घनत्व प्रदर्शन मानचित्रों द्वारा प्रस्तुत किया जा सकता है।

              इस प्रकार के मानचित्रों में विभिन्न घनत्व प्रदर्शन के लिए साधारण रेखा छाया विधि (Simple Shading Method or Choropleth Method) का प्रयोग करते हैं। इस विधि द्वारा जनसंख्या घनत्व प्रदर्शन की सीमाओं का उल्लेख पहले ही किया जा चुका है।

            जनसंख्या घनत्व प्रदर्शन के लिए समरेखा विधि (Isopleth Method) का भी उपयोग कर सकते हैं, परन्तु यह विधि इस कार्य के लिए अधिक रुचिकर नहीं है तथा प्रचलित भी नहीं है।

              अन्य प्रकार के मानचित्र, जैसे Stock Maps, आदि में बिन्दु विधि तथा छाया विधि प्रयोग में लाते हैं। यही विधि कृषि मानचित्रों (Crop Maps) में क्षेत्रफल अथवा पैदावार की मात्रा प्रदर्शन के लिए प्रयोग की जाती है। फसलों अथवा विशेष क्षेत्रफल के अनुपात के लिए वृत्त चित्रों का प्रयोग करते हैं। जलवायवीय मानचित्रों में समरेखा विधि (Isopleth Method) का प्रयोग करते हैं तथा अन्य प्रकार के मानचित्रों में अन्य यथायोग्य विधियों का प्रयोग करते हैं।

             जनसंख्या की वृद्धि रैखिक आरेख (Line Graph) द्वारा आयु तथा लिंग-भेद (Age and Sex Structure) पिरामिड विधि द्वारा तथा व्यावसायिक विशेषताएँ (Occupational Structure) चक्राकार आरेख (Wheel Diagrams) अथवा दण्डारे (Bar Diagrams) द्वारा प्रदर्शित करते हैं।


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14. कार्ल रिटर

14. कार्ल रिटर




कार्ल रिटर⇒

कार्ल रिटर

प्रश्न प्रारूप

Q. भूगोल के विकास में रिटर के योगदानों का मूल्यांकन कीजिए।

अथवा, “रिटर उन्नीसवीं शताब्दी का महत्वपूर्ण भूगोलवेत्ता था”। विवेचना कीजिये।

परिचय

      आनुभाविक अनुसंधान में विश्वास रखने वाले, उद्देश्यवादी और सशक्त प्रकृतिवादी रिटर ने भूगोल को अपने अथक प्रयास से एक नया स्वरूप प्रदान किया है, इसलिए इन्हें आधुनिक भूगोल के भवन का आधार कहा जाता है। कार्ल रिटर एवं अलेक्जेंडर वॉन हम्बोल्ट दोनों ही समकालीन, आधुनिक वैज्ञानिक भूगोल के संस्थापक एवं भूगोल के चिरसम्मत काल के पर्याय थे।

    कार्ल रिटर भौगोलिक प्रतिरूपों में ईश्वर की झलक देखता था जबकि हम्बोल्ट धर्मनिरपेक्ष एवं तत्कालीन जर्मन आदर्शवाद का पैरोकार था। 

जीवनी- जन्म- 1789 ई० में जर्मनी के क्लेडिलन बर्ग में एक साधारण  चिकित्सक परिवार में हुआ। 

शिक्षा- प्रारंभिक शिक्षा रूसो तथा पेस्टोलॉजी के सिद्धांतों पर आधारित स्नेप पेंथल नामक स्कूल में 1785 ई० से प्रारंभ हुई। इसके बाद, 

◆ 17 वर्ष की आयु में हाले विश्वविद्यालय में प्रवेश।

◆ 19 वर्ष की आयु में फ्रैंकफर्ट नगर में प्राइवेट शिक्षक।

◆ 1814 ई० में गोटेंजन विश्वविद्यालय में शोध कार्य किया।

◆ 1819 ई० में जिम्नेशियम ऑफ फ्रैंकफर्ट विश्वविद्यालय में इतिहास भूगोल के प्रोफेसर बने।

◆ 1820-59 ई० तक बर्लिन विश्विद्यालय में प्राध्यापक।

नोट: 1807 में रिटर की मुलाकात हम्बोल्ट से हुई तथा इसके बाद दोनों ने मिलकर भूगोल का विकास किया।

मृत्यु- 1859 ई० को बर्लिन में

भूगोल रिटर का योगदान 

         रिटर के योगदान की चर्चा निम्न शीर्षकों के अंतर्गत की जा सकती है-

(1) भौगोलिक समिति के संस्थापक के रूप में:-

            भौगोलिक ज्ञान के प्रसार तथा भौगोलिक पत्रिका के प्रकाशन हेतु 1828 में ‘बर्लिन भौगोलिक संस्था’ (Berlin Geographical Society) की स्थापना की।

 

(2) एक भौगोलिक लेखक के रूप में:-

कार्ल रिटर

(3) भौगोलिक विधितंत्र के विश्लेषक के रूप में:-

(i) आनुभविक विधि (Emperical Method)

(ii) तुलनात्मक विधि (Comperative Method)

(iii) प्रादेशिक विधि (Regional Method)

(iv) विश्लेषण तथा संश्लेषण विधि (Analysis and Synthesis Method) 

(v) मानचित्र विधि (Cartographic Method)

(vi) निगमनात्मक विधि (Deductive Method)

          इसके अलावे विभिन्न दर्शनग्राही विधि, क्षेत्र वर्णनी विधि, परिस्थितिकी विधि को भूगोल में रिटर की देन है।

नोट: भौगोलिक अध्ययन विधि के क्षेत्र में रिटर ने फॉरस्टर को महान माना।

(4) प्रदेशों के पदानुक्रम को स्पष्ट करने में:-

          प्रदेशों के पदानुक्रम को स्पष्ट करना रिटर का भूगोल में एक प्रमुख योगदान है। इसने भू-आकृतियों का द्वि-स्तरीय वर्गीकरण प्रस्तुत किया है:-

कार्ल रिटर

नोट: महाद्वीप को रिटर ने जर्मन भाषा में ‘आर्डटिल’ (Erdteule) कहा है।

कार्ल रिटर

चित्र: रिटर के तृतीय कोटि प्रदेश का उच्चावच

(5) भौगोलिक संकल्पनाओं के क्षेत्र में:-

कार्ल रिटर

नोट: रिटर को ‘आर्म चेयर ज्योग्रफर’ कहा जाता है।           

(6) भौगोलिक विचारधाराओं के प्रतिपादक के रूप में:-

(A) भूगोल के क्षेत्र (The Field of Geography)- रिटर के अनुसार भूगोल में तीन चीजों का होना आवश्यक है-

कार्ल रिटर

(B) नियतिवाद (Determinism)- रिटर के अनुसार भौगोलिक विविधता के द्वारा ऐतिहासिक विविधता उत्पन्न   होती है। अत: मानव स्वतंत्र नहीं है बल्कि प्रकृति के नियत्रण में उसके अधीन है। 

कार्ल रिटर

(C) सम्पूर्णता की संकल्पना (Concept of Wholeness)- रिटर के अनुसार केवल प्राकृतिक तथा मानवीय पक्ष से भूगोल का निर्माण नहीं होता। अत: सम्पूर्णता के लिए विभिन्न शक्तियों का संयोजन आवश्यक है।

कार्ल रिटर

(D) मानव केन्द्रित भूगोल (Anthropocentric)- केवल पृथ्वी तल का अध्ययन ही भूगोल का उद्देश्य नहीं है बल्कि मानवीय क्रियाओं का वर्णन विशेष महत्व रखता है।

कार्ल रिटर

(E) क्षेत्रीय अध्ययन (Chorological Study)- रिटर के अनुसार, जिस तरह कालक्रम इतिहास का आधार होता है, उसी तरह कोई क्षेत्र भौगोलिक अध्ययन का आधार होता है।

(F) भूगोल आनुभाविक विज्ञान है- रिटर के अनुसार भूगोल एक आनुभाविक विज्ञान है जो प्रेक्षण, परिणाम और सूचना पर आधारित है। 

(G) प्रादेशिक अध्ययन- रिटर ने प्रादेशिक अध्ययन की व्याख्या के लिए ‘Landerkunde’ और ‘Augemeine Erdkunde’ नामक शब्द का प्रयोग किया।

धरातल विभाजन का आधार⇒ प्राकृतिक 

  • Landerkunde (प्राकृतिक प्रदेश)⇒ विशिष्ट अध्ययन से सम्बंधित
  • Augemeine Erdkunde (सामान्य भूगोल)⇒ प्राकृतिक +मानवीय

नोट: रिटर को प्रादेशिक भूगोल का जनक कहा जाता है।

कार्ल रिटर

(H) ईश्वरवादी विचारधारा (Teleological Approach)- रिटर का मानना था कि पृथ्वी की रचना ईश्वर ने उद्देश्यपूर्वक की है। इनके अनुसार पृथ्वी मानव की शिक्षण और पोषण भूमि है। 

(I) विविधता में एकता (Unity in Diversity)- प्रकृति में विविधता में एकता इनके प्रादेशिक भूगोल का मूल मंत्र था।

(J) मानचित्र विधि (Cartographic Process)- भौगोलिक वर्णन के लिए रिटर ने मानचित्र विधि को एक प्रमुख अस्त्र बनाया।

आलोचना

(i) रिट अपनी प्रादेशिक अध्ययन में तुलनात्मक विधि का व्यवहार करने में असफल रहे।

(ii) रिटर भूगोल का स्पष्ट तथा युक्तिपूर्ण ढाँचा गढ़ने में लगभग असफल रहे।

(iii) बाद के वर्षों में उन पर द्वैधता का पोषक होने का भी आरोप लगा। 

निष्कर्ष 

       उपर्युक्त आलोचनाओं के बावजूद रिटर का योगदान भौगोलिक ज्ञान के प्रसारण में महत्वपूर्ण रहा है। अंततः हम कह सकते हैं कि कार्ल रिटर ही भूगोल में वस्तुत: द्वैतवाद का जनक था। उसी ने इस अवधारणा का सृजन किया कि पृथ्वी का अध्ययन मनुष्य के लिए किया जाता है। उसने यह भी कहा कि मनुष्य का अध्ययन पृथ्वी का अंग मानकर किया जाता है। इस तरह भौतिक भूगोल एवं मानव भूगोल दोनों की नींव पड़ी।

उत्तर लिखने का दूसरा तरीका

           यदि उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम चरण में भूगोलवेत्ताओं ने अपने नवीन विज्ञान की अधिकांश संकल्पनाओं को विकसित किया तो उनके “विचारों, मांगों तथा इच्छाओं को तथ्यों में परिणत करने” का श्रेय बहुत कुछ अलेक्जेन्डर वॉन हम्बोल्ट तथा कार्ल रिटर को जाता है। रिटर का जन्म जर्मनी की हार्ल्स पहाड़ियों में स्थित क्वेडली बुर्ग गांव में एक साधारण परिवार में हुआ था। प्राथमिक शिक्षा, पिता की मृत्यु व आर्थिक कठिनाई के कारण घर पर ही हुई थी। घरेलू अध्यापक गुटस मुथ्स थे। 1776 में इन्होंने हाल विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया।

      1825 में फ्रिडरीश विश्वविद्यालय, बर्लिन में प्रोफेसर बने। 1828 में जब बर्लिन में भूगोल परिषद की स्थापना हुई तो वे इसके प्रथम अध्यक्ष बने और जीवन पर्यन्त इसके अध्यक्ष रहे।

रिटर की रचनायें (Works of Ritter):-

      रिटर ने भूगोल के प्रचार-प्रसार के लिये अनेक ग्रन्थ लिखे, मानचित्र बनाये व शोध पत्र प्रकाशित किये। 1804 में रिटर का प्रथम ग्रन्थ- Europe: A Geographical, Historical and Statistical Painting प्रकाशित हुआ। इस पुस्तक का दूसरा खण्ड 1806 में प्रकाशित हुआ। 1817 में रिटर की सर्वाधिक महत्वपूर्ण रचना अर्डकुण्डे (Erdkunde) का प्रथम खण्ड (अफ्रीका महाद्वीप) प्रकाशित हुआ। 1818 में अर्डकुण्डे का दूसरा खण्ड (एशिया महाद्वीप) प्रकाशित हुआ। इस प्रकार 1859 तक अर्डकुण्डे के 19 खण्डों का प्रकाशन हुआ। अन्तिम खण्ड रिटर की मृत्यु के मात्र दो दिन पूर्व प्रकाशित हुआ था। रिटर ने यूरोप की मानचित्रावली भी 1806 में प्रकाशित की थी। इसमें छः मानचित्र थे।

रिटर का विधि-तंत्र (Methodology of Ritter):-

      रिटर की अध्ययन प्रणाली भी हम्बोल्ट की अध्ययन प्रणाली के समान ही थी। उसने अपने अध्ययन के लिये निम्नलिखित विधियाँ अपनायीं-

(i) आनुभविक विधि (Empirical Method):-

      रिटर आनुभविक विधि द्वारा क्षेत्र सर्वेक्षण (Field Survey) करने में विश्वास करता था। उसका मत था कि सावधानीपूर्वक शुद्ध प्रेक्षण करना व सत्य का पता लगाना अध्ययन का उद्देश्य होना चाहिये। रिटर भूगोल को आनुभविक विज्ञान (Empirical Science) मानता था।

(ii) विश्लेषण एवं संश्लेषण विधि (Analysis and Synthesis Method):-

      भौगोलिक तथ्यों को प्रेक्षणों (Observations) द्वारा एकत्र करना व उनका संश्लेषण एवं विश्लेषण करना तथा अन्त में सामान्यीकरण करना-रिटर की इस पद्धति ने भूगोल को वैज्ञानिकता प्रदान की।

(iii) तुलनात्मक विधि (Comparative Method):-

      रिटर ने विभिन्न तथ्यों में कार्य कारण सम्बन्ध (Causal relationship) व अन्तर समझाने के लिये तुलनात्मक विधि अपनाई।

(iv) मानचित्र विधि (Cartographic Method):

       मानचित्रण को रिटर ने भूगोल का अभिन्न अंग माना था। उसने स्वयं अपने ग्रन्थों आदि में मानचित्रों का उपयोग किया। यूरोप के मानचित्रों की एक मानचित्रावली प्रकाशित की।

रिटर की विचारधारा (Ritter’s Ideology)-

     रिटर व हम्बोल्ट समकालीन विद्वान थे। आयु में हम्बोल्ट रिटर से 10 वर्ष बड़ा था। रिटर पर हम्बोल्ट का काफी प्रभाव पड़ा था। रिटर ने स्वयं भी इस तथ्य को स्वीकार किया था। परन्तु फिर भी इन दोनों महान विद्वानों की विचारधाराओं में पर्याप्त अंतर था। रिटर की विचारधारा के मुख्य तथ्य इस प्रकार हैं:-

(i) रिटर के विभिन्न ग्रन्थों व लेखों को पढ़ने पर ज्ञात होता है कि रिटर की विचारधारा विकासशील थी।

(ii) रिटर वातावरण निश्चयवाद (Environmental Determinism) का पोषक था। उसने मानव व वातावरण के सम्बन्धों के अध्ययन को भूगोल का अभिन्न अंग बताया था तथा स्वयं ने इन सम्बन्धों का अध्ययन करके वातावरण को अधिक शक्तिशाली बताया था।

(iii) रिटर ने होम्मेयर व गट्टेरेर की शुद्ध भूगोल (Reine/Pure Geography) की विचारधारा की न केवल आलोचना की, वरन् उसे अवैज्ञानिक बताते हुए अस्वीकार भी कर दिया था। उसके अनुसार- “Pure Geography is nothing more than a general description of terrain.”

(iv) रिटर ने प्रादेशिक अध्ययन पद्धति को अपनाया था तथा प्रादेशिक व्यक्तित्व में सम्पूर्ण की कल्पना की थी। रिटर का सर्वाधिक प्रसिद्ध ग्रन्थ अर्डकुण्डे (Erdkunde) इसी विचारधारा पर आधारित था। उसने अर्डकुण्डे के प्रथम खण्ड में ही अफ्रीका महाद्वीप को विभिन्न प्रदेशों में बांट कर प्रत्येक का सम्पूर्ण वर्णन किया है।

(v) रिटर की विचारधारा ईश्वरवादी (Teleological) विचारधारा थी । उसका मत था कि ईश्वर ने पृथ्वी पर प्रत्येक वस्तु किसी न किसी उद्देश्य से बनाई है।

(vi) रिटर के अनुसार उसका उद्देश्य- ‘समस्त थल’ (Whole Land) का सजीव चित्रण प्रस्तुत करना है, जिसमें उसके प्राकृतिक और कृषि के (Cultivated) उत्पादनों को, उसके प्राकृतिक और मानवीय लक्षणों (Features) को तथा इन सबको एक सम्बद्धपूर्ण (Coherent whole) के रूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जाना है कि मानव और प्रकृति (Nature) के विषय में सबसे अधिक महत्वपूर्ण अनुमान स्वयं प्रत्यक्ष हो जायें, विशेषकर जब उनकी साथ-साथ तुलना की जाय।

(vii) रिटर के अनुसार भूगोल का उद्देश्य पृथ्वी तल का वर्णन करना मात्र नहीं वरन् उसकी घटनाओं का सकारण (Causal) वर्णन करना है।

अध्याय-7 मानचित्र अध्ययन

बिहार बोर्ड वर्ग-6 Geography Solution

अध्याय-7 मानचित्र अध्ययन


अध्याय-7 मानचित्र अध्ययन

अभ्यास

1. सही विकल्प को चुनें।

(i) जमीन के बड़े भाग को कागज पर दिखाने के लिए प्रयोग करते हैं:

(क) छोटे मापक का

(ख) बड़े मापक का

(ग) दोनों मापक का

(ङ) उपर्युक्त सभी

उत्तर- (क) छोटे मापक का

(ii) जिस मानचित्र में पर्वत पठार, मैदान इत्यादि को दर्शाते हैं उसे कहते हैं-

(क) थिमेटिक मानचित्र

(ख) भौतिक मानचित्र

(ग) राजनैतिक मानचित्र

(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं।

उत्तर- (ख) भौतिक मानचित्र

(iii) मानचित्र में मैदान को दिखाते हैं-

(क) काले रंग से

(ख) नीले रंग से

(ग) हरे रंग से

(घ) लाल रंग से

उत्तर- (ग) हरे रंग से

(iv) मानचित्र में दक्षिण दिशा होती है-

(क) दायीं ओर

(ख) बायीं ओर

(ग) ऊपर की ओर

(घ) नीचे की ओर

उत्तर- (घ) नीचे की ओर

(v) मानचित्र निर्माण में ध्यान रखना चाहिए-

(क) संकेतों का

(ख) दिशाओं का

(ग) मापक का

(घ) उपर्युक्त सभी का

उत्तर- (घ) उपर्युक्त सभी का

2. खाली जगहों को भरिए।

(i) मानचित्र में जलीय भाग को नीला रंग से दिखाया जाता है।

(ii) मानचित्र में उत्तर दिशा हमेशा ऊपर की तरफ होती है।

(iii) जनसंख्या मानचित्र थिमेटिक मानचित्र का उदाहरण है।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें।

(i) चित्र एवं मानचित्र में क्या अंतर है?

उत्तर- चित्र एवं मानचित्र में निम्नलिखित आधारभूत अंतर है-

⇒ चित्रों में आमतौर पर चीजें वैसी ही बनाई जाती हैं, जैसी वह दिखती हैं परन्तु मानचित्र में चीजों को चिह्न या संकेत के रूप में दिखाई जाती है।

⇒ चित्र आमतौर पर ऐसे बनाये जाते हैं जैसे कोई उस जगह किनारे खड़े होकर देखता हो और वह उसी प्रकार दिखाई भी देता है लेकिन मानचित्र हमेशा ऐसा बनाया जाता है जैसे उस जगह को ऊपर या आसमान से देख रहे हैं।

⇒ चित्र में मापक (स्केल) का उपयोग नहीं होता परन्तु मानचित्र में मापक (स्केल) का उपयोग किया जाता है।

(ii) अगर आपको विश्व का मानचित्र बनाना हो तो किन-किन बातों का ध्यान रखना होगा?

उत्तर- अगर विश्व का मानचित्र बनाना हो तो निम्न बातों को ध्यान में रखकर बना सकते-

⇒ नक्शे में अगर कोई दुरी सेमी० में है तो वह वास्तविक रूप में कमरे में 1 मीटर के बराबर होगा।

⇒ 1 सेमी = 1 मीटर, जिससे पता किया जा सकता है कि नक्शे में जो दूरी है वह वास्तव में कितनी दूरी के बराबर है। इस प्रकार हम मानचित्र को छोटा, बड़ा कर सकते हैं। जितना बड़ा मानचित्र बनाना होता है पैमाने का निर्धारण भी उसी प्रकार करते हैं।

⇒ मानचित्र में दिशा सूचक रेखा बनाई जाती है।

जैसे-
अध्याय-7 मानचित्र अध्ययन

⇒ मानचित्र से हमें बहुत अधिक जानकारी प्राप्त होती है। मानचित्रों में दी गई सूचनाओं के आधार पर उनका नामकरण किया जाता है। जैसे- जलवायु मानचित्र, वनस्पति मानचित्र, जनसंख्या मानचित्र, वर्षा मानचित्र, उद्योग मानचित्र आदि।

⇒ नक्शे में रंगों एवं चिह्नों की सहायता से हमें वहाँ की जानकारी प्राप्त करने में सहायता होती है। जैसे- जलाशय-नीला रंग, पर्वत- भूरा रंग, पठार- पीला रंग, मैदान- हरा रंग आदि।

इस प्रकार हम उपर्युक्त इन सभी बातों को ध्यान में रखकर विश्व का मानचित्र बना सकते हैं।

(iii) मानचित्र में इस्तेमाल किए गए रंग किसके प्रतीक हैं?

उत्तर- मानचित्र में जलाशय- नीले रंग का, पर्वत- भूरा रंग का, पठार- पीला रंग का और मैदान- हरा रंग का प्रतीक है।

(iv) मानचित्र के कितने प्रकार है? लिखें।

उत्तर- मानचित्र के निम्नलिखित प्रकार होते हैं:-

⇒ पर्वत, पठारों, मैदानों, नदियों, महासागरों आदि को दर्शाने वाले मानचित्र, प्राकृतिक मानचित्र कहलाते हैं।

⇒ गाँव, शहर, राज्य, देश एवं विश्व के विभिन्न देशों तथा उनकी सीमाओं को दर्शाने वाले मानचित्र, राजनीतिक मानचित्र कहलाते हैं।

⇒ इन मानचित्रों में दी गई सूचनाओं के आधार पर उनका नामकरण किया जाता है। जैसे-जलवायु मानचित्र, वनस्पति मानचित्र, जनसंख्या मानचित्र, वर्षा मानचित्र, उद्योग मानचित्र आदि।

(v) मानचित्र में दिशाओं का निर्धारण कैसे करते हैं?

उत्तर- मानचित्र में दिशाओं का निर्धारण दिशा सूचक रेखा के द्वारा किया जाता है। मानचित्र में उत्तर दिशा जो ऊपर की ओर है उसे उत्तर दिशा सूचक रेखा के माध्यम से दिखाई जाती है। जैसे-उत्तर की ओर चिह्न को दर्शाया जाता है।

जैसे-
अध्याय-7 मानचित्र अध्ययन

(vi) मापक क्या है? उदाहरण देकर समझाएँ।

उत्तर- मानचित्र पर दो किन्हीं स्थानों के बीच की दूरी और धरातल पर उन्हीं दो स्थानों के बीच की वास्तविक दूरी के अनुपात को मापक/पैमाना (Scale) कहते हैं। उदाहरण के लिए यदि किन्हीं दो स्थानों के बीच की वास्तविक दूरी 500 किमी० है, और इसे मानचित्र प 5 सेमी० द्वारा दिखाया जाता है तो संबंधित मानचित्र का पैमाना 1 सेमी० = 100 किमी० होगा।


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अध्याय-6 पृथ्वी और ग्लोब

बिहार बोर्ड वर्ग-6 Geography Solution

अध्याय-6 पृथ्वी और ग्लोब


अध्याय-6 पृथ्वी और ग्लोबअभ्यास

1. सही विकल्प चुनें-

(i) एक देशांतर से दूसरे देशांतर की दूरी तय करने में समय लगता है-
(क) चार मिनट
(ख) पाँच मिनट
(ग) चालीस मिनट
(घ) चार संकेण्ड
उत्तर- (क) चार मिनट

(ii) सबसे अधिक गर्मी पड़ती है-
(क) शीत कटिबंध में
(ख) शीतोष्ण कटिबंध में
(ग) उष्ण कटिबंध में
(घ) उत्तरी ध्रुव में
उत्तर- (ग) उष्ण कटिबंध में

(iii) कर्क रेखा है-
(क) 90° अक्षांश पर
(ख) 23½° उत्तरी अक्षांश
(ग) 23½° दक्षिणी अक्षांश
(घ) ध्रुव पर
उत्तर- (ख) 23½° उत्तरी अक्षांश

(iv) अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा से पूरब जाने पर-
(क) दिन-रात में परिवर्तन होता है
(ख) एक तिथि घटा दी जाती है
(ग) एक तिथि बढ़ा दी जाती है
(घ) तिथि में कोई परिवर्तन नहीं करते हैं
उत्तर- (ग) एक तिथि बढ़ा दी जाती है

अध्याय-6 पृथ्वी और ग्लोब

2. कम शब्दों में उत्तर दें-

(क) पृथ्वी के दिये गये नमूने का क्या नाम है?
उत्तर- पृथ्वी के दिये गये नमूने का नाम ग्लोब है।

(ख) यह नमूना किस आकृति का होगा? जैसे त्रिकोण, गोल, त्रिभुजाकार आदि।
उत्तर- यह नमूना गोल आकृति का होगा।

(ग) इस नमूने की आकृति वाले किन्हीं अन्य दो वस्तुओं के नाम लिखिये।
उत्तर- इस नमूने की आकृति वाले संतरा, खरबूजा हैं।

(घ) पृथ्वी के इस नमूने पर कौन-सी रेखाएँ बनी हैं? उनके नाम लिखिये।
उत्तर- पृथ्वी के इस नमूने पर अक्षांश रेखा,भूमध्य रेखा, कर्क रेखा, मकर रेखा, आर्कटिक रेखा और अन्टार्टिक बनी है।

(ङ) इस नमूने के अलावा, आप और किन माध्यमों से पृथ्वी पर स्थित किसी स्थान का पता लगा सकते हैं?
उत्तर- इस नमूने के अलावा, मैं आसमान में सूरज की स्थिति या रात में ध्रुवतारे को देखकर किसी स्थान की स्थिति का अनुमान लगा सकते हैं, लेकिन इसमें बहुत समस्या होती है।

       पृथ्वी पर स्थित स्थानों को जानने के लिए कम्पास (दिक् सूचक) और नक्शे से ठिकाना खोजना आसान हो गया। इस प्रकार इन माध्यमों के द्वारा भी हम पृथ्वी पर स्थित स्थानों को पता लगा सकते हैं।

3. ग्लोब पर कुछ पड़ी एवं खड़ी रेखाएँ बनी हुई हैं। इन्हें गौर से देखकर निम्न प्रश्नों के उत्तर तालिका में लिखिए-

अध्याय-6 पृथ्वी और ग्लोब

(क) पड़ी/खड़ी रेखाएँ किन दिशाओं के बीच में खींची गयी-
उत्तर- पड़ी रेखायें पूरब-पश्चिम और खड़ी रेखाएँ उत्तर-दक्षिण दिशाओं के बीच में खींची गयी हैं।

(ख) अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा क्या है?
उत्तर- पृथ्वी का आकार गोल है जो एक वृत्त के समान है। एक वृत्त में 360° होते हैं। इसी आधार पर पृथ्वी पर 360 देशांतर रेखाएँ खींची जा सकती हैं। इनमें दो देशांतर रेखाएँ महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। ये हैं 0° तथा 180° देशांतर रेखाएँ।

        0° देशांतर को प्रधान देशांतर रेखा या प्रधान मध्याह्न रेखा तथा 180º देशांतर रेखा को अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा कहते हैं।

(ग) किन्हीं दो पड़ी अथवा खड़ी रेखाओं के बीच किस प्रकार की दूरी है? (समान/असमान)
उत्तर- किन्हीं दो पड़ी रेखाओं के बीच की दूरी समान और खड़ी रेखाओं के बीच की दूरी असमान होती है।

(घ) पड़ी/खड़ी रेखाओं को क्या कहते हैं?
उत्तर- पड़ी रेखाओं को अक्षांश रेखा और खड़ी  को देशांतर रेखा कहते हैं।

(ङ) पड़ी एवं खड़ी रेखाओं में से कौन-सी आपस में मिलती है?
उत्तर- पड़ी एवं खड़ी रेखाओं में से खड़ी रेखा आपस में मिलती है।

4. बताइये-

(i) अक्षांश वृत्त किसे कहते हैं?
उतर- भूमध्य रेखीय वृत्त एवं किसी स्थान के बीच जो कोण बनता है उसे उस स्थान का अक्षांश वृत्त कहा जाता है।

(ii) दो प्रमुख अक्षांश रेखाओं के नाम बताइये।
उत्तर- दो प्रमुख अक्षांश रेखाओं के नाम-विषुवत एवं कर्क रेखा हैं।

(iii) पृथ्वी पर कितने कटिबंध हैं? इन कटिबंधों की विशेषताएँ बतलाइये।
उत्तर- पृथ्वी पर तीन कटिबंध हैं।

(क) उष्ण कटिबंध- कर्क एवं मकर रेखाओं के बीच अन्य अक्षांशों की तुलना में सबसे अधिक गर्मी पड़ती है जिसके कारण इसे उष्ण कटिबंध कहा जाता है। यहाँ दिन और रात की स्थितियाँ सालों भर होती है तथा सूर्य की  किरणें लम्बवत् पड़ती हैं।

(ख) सम शीतोष्ण कटिबंध- कर्क एवं मकर रेखा के बाद उत्तरी गोलार्द्ध में उत्तरी ध्रुव वृत्त तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में दक्षिणी ध्रुव वृत्त के बीच वाले क्षेत्र में तापमान मध्यम रहता है। यहाँ जाड़े में सर्दी पड़ती है तथा गर्मी में तापमान अधिक रहता है। इसे सम शीतोष्ण कटिबंध कहते हैं। दिन और रात की स्थितियाँ होती हैं परन्तु सूर्य की किरणें कभी लम्बवत् नहीं पड़ती हैं।

(ग) शीत कटिबंध- उत्तरी गोलार्द्ध में उत्तरी ध्रुव तथा दक्षिण गोलार्द्ध में दक्षिणी ध्रुव क्षेत्रों में सालों भर ठंड पड़ती है। इसे शीत कटिबंध कहा जाता है। यहाँ छ: महीने का दिन एवं छः महीने की रात होती है।

(iv) देशान्तर रेखा किसे कहते हैं?
उत्तर- ग्लोब पर उत्तरी ध्रुव एवं दक्षिणी ध्रुव को जोड़ती हुई रेखाएँ खींची गई हैं। ये सभी लम्बवत् रेखाएँ देशांतर रेखाएँ हैं। 0° तथा 180° दो प्रमुख देशांतर रेखाएँ है। एक वृत्त में 360° होते हैं। इसी आधार पर पृथ्वी पर 360 देशांतर रेखाएँ खींची गई हैं। इनकी लम्बाई समान होती है। इसकी संख्या 360 होती है। देशांतर रेखाएँ तिथि निर्धारण में सहयोग देती हैं।

(v) प्रधान मध्याह्न रेखा क्यों महत्वपूर्ण हैं?
उत्तर- 0° देशांतर को प्रधान देशांतर रेखा या प्रधान मध्याह्न रेखा कहते हैं। पृथ्वी पर किसी स्थान की स्थिति दर्शाने तथा समय निश्चित करने के लिए देशांतर रेखाओं का ज्ञान होना आवश्यक है। इससे तिथि निर्धारण में भी सहयोग मिलता है।

(vi) अक्षांश रेखाओं तथा देशांतर रेखाओं की कुल संख्या कितनी है?
उत्तर- ग्लोब प कुल अक्षांश रेखाओं की संख्या 179 तथा देशांतर रेखाओं की कुल संख्या 360 है।


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अध्याय-8 हमारा राज्य बिहार

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अध्याय-8 हमारा राज्य बिहार


अध्याय-8 हमारा राज्य बिहार

अभ्यास

1. सही विकल्पों पर (√) का निशान लगाएँ

(i) रबी फसलों के लिए मशहूर ताल क्षेत्र अवस्थित है-
(क) तराई क्षेत्र
(ख) पटना से पूरब
(ग) पटना से पश्चिम
(घ) शाहाबाद में
उत्तर- (ख) पटना से पूरब

(ii) सोमेश्वर पहाड़ियाँ हैं-
(क) तराई क्षेत्र में
(ख) राजगीर में
(ग) कैमूर में
(घ) मंदार हिल में
उत्तर- (क) तराई क्षेत्र में

(iii) सरैसा क्षेत्र में शामिल जिले हैं-
(क) सीतामढ़ी, मधुबनी, सुपौल
(ख) सुपौल, सहरसा, अररिया
(ग) वैशाली, समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर
(घ) जहानाबाद, गया, पटना
उत्तर- (ग) वैशाली, समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर

(iv) गन्ना उत्पादक जिले हैं-
(क) किशनगंज, अररिया, जोगबनी
(ख) पूर्णिया, कटिहार, भागलपुर
(ग) गया, नवादा, बिहार
(घ) गोपालगंज, बेतिया, मोतिहारी
उत्तर- (घ) गोपालगंज, बेतिया, मोतिहारी

2. प्रश्नों के उत्तर लिखें-

(क) बिहार की चौहद्दी लिखें।
उत्तर- बिहार के उत्तर दिशा में नेपाल देश, पूरब में पश्चिम बंगाल, दक्षिण में झारखंड तथा पश्चिम में उत्तर प्रदेश राज्य स्थित है।

(ख) ताल क्षेत्र की विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर- ताल क्षेत्र में किसी का भी घर नहीं होता है। ताल क्षेत्र में हम रबी की फसल ही केवल उगाई जाती हैं। खरीफ की फसल तो बोते ही नहीं हैं। बरसात में नदियों का पानी का बड़ा हिस्सा पूरे इलाके में दूर-दूर तक फैल जाता है और एक बड़ा ताल-सा दृश्य दिखाई देता है, इसीलिए इसे ताल क्षेत्र कहते हैं।

          अक्टूबर के महीने में जब सारा पानी धरती सोख लेती है और जमीन दलदली होती है तब हम इनमें दलहन और रबी की फसलों को बो देते हैं। इनमें चना, मसूर, सरसों, तीसी, गेहूँ होता है। मिट्टी दलदली होने के कारण रबी की जबरदस्त फसल होती है।

          टाल या ताल क्षेत्र में दुधारू पशुओं के लिए पर्याप्त भूसा मिलता है। यह पशुओं के लिए अत्यंत ही लाभदायक होता है। रबी की फसल अच्छी होने के कारण ही यहाँ दाल छाँटने वाली कई मिलें भी हैं। ताल क्षेत्र में दलहन की फसल अत्यधिक मात्रा में होती है जिससे यहाँ खेती की पैदावार काफी अच्छी होती है।

(ग) सरैसा क्षेत्र में कौन-कौन से जिले आते हैं और उनका क्या महत्व है?
उत्तर- उत्तर बिहार में समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर और वैशाली जिलों के कुछ-कुछ प्रखंडों में तम्बाकू उपजाया जाता है। इस इलाके को संयुक्त रूप से ‘सरैसा क्षेत्र’ कहा जाता है। यह किसी खास क्षेत्र न होकर पूरे इलाके का ही नाम है। इस इलाके का तम्बाकू देश के अन्य राज्यों में भी भेजा जाता है। वहाँ के किसानों की खेती-बाड़ी का अर्थ खेतों को साफ करके तम्बाकू के पौधों को लगाना उसके पत्तों को सुखाना और उन्हें व्यापारियों के हाथों में बेचना है।

           इस इलाके के किसान बड़ी मेहनत से तम्बाकू के पौधे को उगाते हैं। यहाँ की मिट्टी भी चूनायुक्त होती है। तंबाकू के पौधे धीरे-धीरे बड़े होकर फैलते हैं। बाद में इसे सुखाते हैं। इसको धीरे-धीरे पत्ते को लपेटकर रखते हैं। चूँकि सरैसा इलाके के तम्बाकू काफी कड़कदार होते हैं। इसलिए तम्बाकू बेचने वाले सरैसा के नाम का इस्तेमाल तम्बाकू को प्रभावशाली बनाने के लिए करते हैं।

(घ) बिहार की ज्यादातर चीनी मिलें उत्तर बिहार में हैं। क्यों?
उत्तर- बिहार की ज्यादातर चीनी मिलें उत्तर बिहार में ही हैं। क्योंकि उत्तर बिहार में नेपाल की पहाड़ियों से पानी बहकर आता है और मिट्टी में चूने का अंश चला आता है। यह मिट्टी ईख की खेती के लिए काफी उपयुक्त है।

              यहाँ भारी मात्रा में ईख की खेती की जाती है, और उसकी पैदावार भी अच्छी होती है। एक बड़े किसान अकेले सौ सवा सौ ट्रैक्टर गन्ने बेचते हैं और किसानों के गन्ने खरीदने के लिए मिलें तैयार रहती हैं और उन्हें नकद पैसा भी देती है। इसलिए यहाँ के किसान गन्ना उपजाना पसंद करते हैं। किसान भी गन्ने के फसल एक ही खेत में बार-बार लगातार उपजाते हैं जिससे यहाँ उसकी खरीद-बिक्री भी ज्यादा मात्रा में होती है।

(च) बाढ़ का पानी उतरते ही गाँवों एवं घरों की प्राथमिक जरूरतें क्या होती होगी?
उत्तर- बाढ़ का पानी उतरते ही गाँवों एवं घरों की प्राथमिक जरूरत अपने मवेशियों को ऊँचे स्थानों पर रखकर सुरक्षित करते हैं। ऐसा इसलिए कि बाढ़ का पानी इनकी मवेशियों को बहा न ले जाएँ। बरसात के दिनों में वे लोग बाढ़ से बचने के लिए तटबंधों और स्परों पर रहने चले जाते हैं।

         उसकी प्राथमिक जरूरत अपने और अपने मवेशियों को सुरक्षित जगहों तक पहुँचाना होता है ताकि अपने मवेशियों की जान बचा सकें, इसलिए वे फुस और प्लास्टिक के कामचलाऊ छत और दीवार बनाकर रहते हैं। घरों को छोड़कर तटबंध पर जाने से पहले खेतों में मनीजर के बीज छींट देते हैं। बाद में बाढ़ का पानी उतरने पर मनीजर के पौधे डंठल के रूप में तैयार हो जाते हैं। इस प्रकार वह अपने-आपको तैयार करते हैं जिससे वह अपना बचाव कर सकें।

अध्याय-8 हमारा राज्य बिहार

(छ) बरसात में उत्तर बिहार के लोगों को किस प्रकार की कठिनाइयाँ झेलनी पड़ती हैं?
उत्तर- बरसात में उत्तर बिहार के लोगों को निम्नलिखित प्रकार की कठिनाइयाँ झेलनी पड़ती हैं:-

⇒ बरसात में उत्तर बिहार के लोगों को वर्ष में लगभग 3-4 महीने दोहरी जिंदगी जीते हैं।

⇒ मवेशियों को बचाने के लिए उसे ऊँचे स्थानों पर रखकर सुरक्षित करना पड़ता है जिससे वह बाढ़ के पानी में बहकर कहीं चले न जाएँ।

⇒ गाँव से पानी उतरते ही लोग वापस गाँव में आते हैं और फिर आठ महीनों के लिए फिर से गृहस्थी जमाते हैं। फिर अगले साल पुनः चार महीने बाढ़ की विभीषिका झेलने को तैयार रहना पड़ता है।

⇒ बरसात के मौसम में प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में जनजीवन पर बहुत ही गहरा असर पड़ता है।

⇒ बरसात में किसानों, गरीब मजदूरों पर अन्न, जल और आवास की समस्या उत्पन्न हो जाती है।

⇒ बाढ़ का पानी बढ़ने से परेशान लोगों को अपने घरों को छोड़कर तटबंधों या अन्य सुरक्षित जगहों पर रहने के लिए जाना पड़ता है।

(ज) बाढ़ से बचाव का क्या समाधान है?
उत्तर- बाढ़ से बचाव का निम्नलिखित समाधान किया जा सकता है:-

⇒ बाढ़ की समस्या का सामना सभी को एक साथ मिल-जुलकर करना चाहिए।

⇒ बाढ़ से बचने के लिए सभी को भूमि अपरदन की क्रिया को रोकना चाहिए।

⇒ बड़े-बड़े नदियों के जल को मजबूत बाँध बनाकर उसकी दिशाओं को बदलकर उससे बचाव किया जा सकता है।

⇒ बरसात के पानी से बचने के लिए नावों की व्यवस्था भी रखनी चाहिए जिससे पानी बढ़ने पर हम उन नावों के द्वारा दूसरे गाँवों की ओर पलायन कर सके।

⇒ बाढ़ से बचने के लिए हमें अपने घरों को छोड़कर किसी दूसरे स्थान पर सुरक्षित पहुँचना चाहिए।

⇒ अपने मवेशियों को किसी ऊँचे स्थानों पर ले जाकर रखना चाहिए।

⇒ अपनी जरूत की चीजों को पहले से ही अपने पास उपलब्ध करा लेना चाहिए। जिससे सही समय पर उसका उपयोग कर सकें।


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अभ्यास

1. सही विकल्प को चुनें।

(i) गौतम बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति कहाँ हुई थी?

(क) पावापुरी

(ख) वैशाली

(ग) बोधगया

(घ) सासाराम

उत्तर- (ग) बोधगया

(ii) गया में अवस्थित विष्णुपद मंदिर किसने बनवाया था?

(क) रानी अहिल्या बाई

(ख) अजातशत्रु

(ग) अशोक

(घ) जरासंध

उत्तर- (क) रानी अहिल्या बाई

(ii) बिहार में गर्म जलकुंड कहाँ अवस्थित है?

(क) पावापुरी

(ख) राजगीर

(ग) गया

(घ) चाँदचारा

उत्तर- (ख) राजगीर

(iv) ककोलत प्रसिद्ध है-

(क) ठंडे जल के लिए

(ख) गर्म जल के लिए

(ग) मंदिरों के लिए

(घ) घाटों के लिए

उत्तर- (क) ठंडे जल के लिए

(v) जरासंध का अखाड़ा अवस्थित है-

(क) राजगीर में

(ग) बोधगया में

(ख) नालंदा में

(घ) वैशाली में

उत्तर- (क) राजगीर में

2. खाली जगहों को भरिए।

(i) पितृ पक्ष का मेला कृष्ण पक्ष में लगता है।

(ii) महाबोधि मंदिर के निकट मुचलिंद सरोवर है।

(iii) पावापुरी में जल मंदिर है।

(iv) महावीर ने  शरीर त्यागकर महापरिनिर्वाण प्राप्त किया था।

(v) नालंदा विश्वविद्यालय ज्ञान-विज्ञान का अन्तर्राष्ट्रीय केंद्र था।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें।

(i) बोधगया क्यों प्रसिद्ध है?

उत्तर- बोधगया में ही महाबोधि मंदिर है। यह मंदिर विश्व के धरोहरों में जाना जाता है। इसी मंदिर में ध्यानरत बुद्ध की प्रतिमा है। यहीं बोधिवृक्ष के नीचे गौतम को ज्ञान प्राप्त हुआ था और वे गौतम बुद्ध कहलाने लगे। इस प्रकार बोधगया मुख्य रूप से गौतम बुद्ध के ज्ञान प्राप्ति स्थान के लिए प्रसिद्ध है।

(ii) अपने स्कूल से आप राजगीर जायेंगे तो रास्ते में आपको क्या-क्या नजर आएगा?

उत्तर- अपने स्कूल से राजगीर जाएँगे तो रास्ते में हमें सर्वप्रथम महाबोधि मंदिर के दर्शन होंगे और रास्ते में बोधिवृक्ष जहाँ गौतम बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था, स्थित है, और वे उसके बाद ही गौतम बुद्ध कहलाने लगे थे। फल्गू नदी के तट पर गया में स्थित ‘विष्णुपद’ मंदिर है। राजगीर के गर्म जलकुंड, मनियारमठ और जरासंध का अखाड़ा, शांति स्तूप नजर आएंगे।

(ii) विष्णुपद मंदिर का निर्माण किसने करवाया था? इसमें किस तरह के पत्थरों का उपयोग किया गया है?

उत्तर-  विष्णुपद मंदिर का निर्माण रानी अहिल्याबाई ने करवाया था। यह काले पत्थरों से बनवाया गया है। यहाँ भगवान विष्णु के पदचिह्न हैं।

(iv) राजगीर में गर्म जल कुंड है। क्यों?

उत्तर- राजगीर चारों ओर पहाड़ियों से घिरा हुआ है और इन पहाड़ियों में गंधक है। इसलिए यहाँ से गर्म पानी का स्राव होता रहता है। इसलिए राजगीर में गर्म जलकुंड हैं। राजगीर के गर्म जलकुंड में हाथ-पाव धोने से सभी की थकावट मिट जाती है।

(v) जलमंदिर कहाँ है और क्यों प्रसिद्ध है?

उत्तर- जलमंदिर पावापुरी में स्थित है। तालाब के बीचों-बीच स्थित जलमंदिर में भगवान महावीर हैं। तालाब में मछलियों और कमल के फूल प्राकृतिक रूप में मंदिर की शोभा बढ़ाते हैं। यही वह जगह है जहाँ भगवान महावीर ने शरीर त्यागकर महापरिनिर्वाण प्राप्त किया था। इसलिए जलोदर अपना खास योगदान के द्वारा ही जलोदर मनमोहक और आकर्षित लगता है। इसी वजह से जलमंदि दुनिया में सुप्रसिद्ध है।

अध्याय-9 बिहार दर्शन-1

4. सही मिलान करें।

                                  उत्तर-

(i) मुचलिंद सरोवर- (घ) बोध गया

(ii) रानी अहिल्या बाई- (ग) विष्णुपद मंदिर

(iii) शांतिस्तूप- (ख) राजगीर की पहाड़ी

(iv) ककोलत जल प्रपात- (क) नवादा जिला


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अध्याय-10 बिहार दर्शन-2अभ्यास

1. सही विकल्प को चुनें।

(i) गुरु गोविंद सिंह का जन्म स्थान है-

(क) पटना

(ख) आरा

(ग) सासाराम

(घ) पटना सिटी

उत्तर- (क) पटना

(ii) गोलघर कहाँ अवस्थित है?

(क) आरा

(ख) पूर्णिया

(ग) पटना

(घ) वैशाली

उत्तर- (ग) पटना

(iii) दीदारगंज कहाँ है?

(क) वैशाली

(ख) समस्तीपुर

(ग) पटना

(घ) गया

उत्तर- (ग) पटना

2. खाली जगहों को भरिये-

(i) गोलघर का निर्माण 1786 ई. में करवाया गया था।

(ii) शेरशाह का मकबरा सासाराम में है।

(iii) पटना स्थित संग्रहालय में 5000 वर्ष पुरानी एक विशाल पेड़ की डाल रखी है।

(iv) यक्षिणी की मूर्ति दीदारगंज में मिली थी।

(v) तख्त श्री हरमंदिर पटना साहिब में स्थित है।

(vi) शेरशाह का मकबरा अष्ट कोणीय है।

(vii) ग्रैंडकोर्ड रेलवे दिल्ली-हावड़ा को जोड़ती है।

(viii) गोलघर का निर्माण  कैप्टन जान गॉलस्टीन ने करवाया।

3. सही मिलान करें।

                                उत्तर-

(i) गुरु गोविंद सिंह- (ख) पटना साहिब

(ii) पटना संग्रहालय- (ग) राजेन्द्र कक्ष

(ii) गोलघर- (घ) अनाज का भंडारण

(iv) रोहतास- (क) सासाराम

प्रश्न 4. सही कथनों में सही (√) का चिह्न लगाएँ एवं गलत कथन में गलत (x) का चिह्न लगाएँ-

(क) शेरशाह को हराकर हुमायूँ ने भारत की गद्दी पर कब्जा किया।- (x)

(ख) पटना से गया को जोड़ने वाली रेलवे लाईन ग्रैंड कार्ड लाईन कहलाती है।-(x)

(ग) पटना का गोलघर कैप्टन जान गॉलस्टीन ने बनवाया था।- (√)

(घ) पत्थर की मूर्ति “यक्षिणी” पटना के दीदारगंज में मिली थी।- (√)

(ड़) गुरुगोविन्द सिंह का जन्म स्थल तख्त श्री हरमंदिर जी कहलाता है।- (√)

प्रश्न 5. बताइये-

(क) गोलघर कहाँ है ? इसका निर्माण क्यों करवाया गया?
उत्तर- गोलघर पटना के गाँधी मैदान के पश्चिम में स्थित है। इसका निर्माण कैप्टन जान गॉलस्टीन ने 1786 ई में अनाज के सुरक्षित भंडारण के उद्देश्य से करवाया था ताकि दुर्भिक्ष काल अर्थात अकाल के समय इस अनाज से मदद पहुँचाई जा सके, जिससे सभी को अनाज की समस्याओं का सामना करना नहीं पड़े।

(ख) शेरशाह कौन थे? इनका मकबरा कहाँ है?
उत्तर- शेरशाह के बचपन का नाम फरीद खाँ था जो युवा काल में ही अपने संरक्षक की रक्षा करते हुए शेर को तलवार से एक ही बार में दो टुकड़े कर दिये थे, तभी से उसे शेरशाह के नाम से पुकारा जाने लगा। रोहतास जिला मुख्यालय सासाराम में अफगान शासक शेरशाह का मकबरा स्थित है। यह मकबरा अष्टकोणीय है, जो लाल पत्थरों से बना हुआ है। यह मकबरा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के संरक्षण में है।

(ग) अगर आप पटना संग्रहालय जायेंगे तो आपको कौन-कौन सी चीजें नजर आएंगी?
उत्तर- पटना संग्रहालय का भवन राजस्थानी शैली में बना हुआ है। संग्रहालय के बगीचे में सामने ही तोप रखे हैं, चारों ओर कई बड़ी-बड़ी दुर्लभ मूर्तियाँ भी हैं। मुख्य भवन में जाते ही एक विशाल पेड़ देखने को मिलेगा। जो लगभग 5000 वर्ष पुराना है। उसकी लकड़ियाँ अब पत्थरनुमा हो गई हैं। यह पत्थरनुमा वृक्ष जीवाश्म का उदहारण है।

         यहाँ भगवान बुद्ध और जैन तथा मौर्यकाल की महत्वपूर्ण मूर्तियों, सिक्कों और बर्तनों को भी देखते हैं। पटना संग्रहालय में ही आगे बढ़कर जाने पर एक राजेन्द्र कक्ष बना हुआ है। यहाँ राष्ट्रपति के रूप में राजेन्द्र प्रसाद को मिले हुए उपहारों को भी देख सकते हैं जो उनकी स्मृति के रूप में रखा हुआ है।

(घ) गुरुगोविन्द सिंह का जन्म-स्थान आज किस नाम से प्रसिद्ध है? वहाँ सिक्ख क्यों आते हैं?
उत्तर- गुरुगोविन्द सिंह का जन्म-स्थान आज तख्त श्री हरमंदिर साहब गुरुद्वारा के नाम से प्रसिद्ध है। यह सफेद संगमरमर से बना हुआ है। यह सिक्खों का प्रसिद्ध तीर्थस्थल है। यहाँ सभी श्रद्धालु अपने सिर पर रुमाल रखकर जाते है। गुरुगोविन्द सिंह के जन्मदिवस पर यहाँ मेला लगता है। यहाँ देश-विदेश के सिक्ख बड़ी संख्या में भाग लेने आते हैं। सिक्खों के इस पवित्र स्थल के अंदर गुरुग्रंथ साहिब खा हुआ है और गुरुवाणी पढ़ी जाती है। यहाँ प्रत्येक दिन लंगर भी चलता है जहाँ लोगों को नि:शुल्क भोजन कराया जाता है।


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अभ्यास

1. सही विकल्प चुनें।

(i) प्रमुख दिशाएँ कितनी होती हैं?

(क) चार

(ख) छह

(ग) तीन

(घ) बारह

उत्तर- (क) चार

(ii) कुल दिशाओं की संख्या कितनी है?

(क) 5

(ख) 7

(ग) 4

(घ) 10

उत्तर- (घ) 10

(iii) बंगाल की खाड़ी भारत के किस दिशा में है?

(क) उत्तर-पश्चिम

(ख) दक्षिण-पश्चिम

(ग) उत्तर-पूर्व

(घ) दक्षिण-पूरब

उत्तर- (ग) उत्तर-पूर्व

2. खाली जगहों को भरें।

(i) हिमालय पर्वत भारत के उत्तर दिशा में है।

(ii) उत्तर तथा पूरब के बीच उत्तर-पूरब दिशा होती है।

(iii) अरब सागर, बंगाल की खाड़ी से दक्षिण दिशा में है।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें।

(i) आपके स्कूल के उत्तर दिशा में क्या है?

उत्तर- मेरे स्कूल के उत्तर दिशा में पान की खेती है।

(ii) ध्रुवतारा किस दिशा में नजर आता है?

उत्तर- ध्रुवतारा एक अकाशीय  पिंड अर्थात तारा है, जो हमेशा उत्तर दिशा में नजर आता है। रात्रि के समय आकाश में उत्तर की तरफ देखने पर जो सबसे चमकता हुआ तारा नजर आता है, उसे ही ध्रुवतारा कहा जाता है।

(iii) दिशासूचक यंत्र से दिशा की जानकारी कैसे करते हैं?

उत्तर- दिशासूचक यंत्र में एक सूई लगी रहती है, जिसके दोनों छोर में चुम्बकीय शक्ति होने के कारण ये हमेशा उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव के तरफ घुमता है जो कि दिशा को दर्शाता है। अतः दिशासूचक यंत्र का उपयोग कर हम दिशा की वास्तविक ज्ञान प्राप्त करते हैं।

(iv) आपका घर विद्यालय से किस दिशा में है?

उत्तर- हमारे घर विद्यालय से दक्षिण दिशा में स्थित है।

(v) आपके मित्रों के घर विद्यालय से किन-किन दिशाओं में है?

उत्तर- हमारे मित्रों का घर विद्यालय से दक्षिण, पश्चिम तथा दक्षिण-पश्चिम दिशाओं में स्थित है। 

(vi) आपके विचा से आपके गाँव/मुहल्ले को सुंदर बनाने के लिए किस-किस परिवर्तन की जरूरत है?

उत्तर- छात्र शिक्षक की मदद से स्वयं करने का प्रयास करें


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अभ्यास

1. सही विकल्प को चुनें।

1. बिहार में सोन नदी किस तरह के क्षेत्र से होकर गुजरती है?

(क) पहाड़ी क्षेत्र

(ग) मैदानी क्षेत्र

(ख) पठारी क्षेत्र

(घ) रेगिस्तानी क्षेत्र

उत्तर- (ग) मैदानी क्षेत्र

ii. बाल्मीकीनगर बिहार के किस क्षेत्र में अवस्थित है?

(क) पश्चिमी क्षेत्र

(ख) पूर्वी क्षेत्र

(ग) दक्षिणी क्षेत्र

(घ) उत्तरी क्षेत्र

उत्तर- (घ) उत्तरी क्षेत्र

iii. धान की फसल के लिए उपयुक्त मिट्टी है-

(क) बलुआही मिट्टी

(ख) चिकनी मिट्टी

(ग) पर्वतीय मिट्टी

(घ) दोमट मिटटी

उत्तर- (ख) चिकनी मिट्टी

iv. पठार के ऊपर की सतह होती है-

(क) नुकीला

(ग) संर्कीण

(ख) सपाट

(घ) ढालदार

उत्तर- (ख) सपाट

2. खाली स्थानों को भरें

i. बिहार का अधिकतर भाग गंगा नदी के दोनों ओर मैदानी भाग के रूप में फैला है।

ii. पामीर पठार को संसार का छत कहा जाता है।

iii. पहाड़ों की लम्बी श्रृंखला को पर्वत श्रेणी कहते हैं।

iv. शिमला और कश्मीर देश के प्रमुख केंद्र पर्यटन स्थल के उदाहरण हैं।

v. प्राकृतिक वातावरण के बदलते स्वरूप के मुख्य कारण बढ़ती आबादी है।

3. बताइए-

(i) मैदानी क्षेत्र की क्या-क्या विशेषताएँ होती हैं?
उत्तर- प्रायः समतल भूमि का प्रदेश मैदान कहलाता है। मैदानों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे समुद्र से ऊँचे या नीचे हो सकते हैं परंतु अपने समीपवर्ती पठार तथा पर्वत से ऊँचे नहीं हो सकते हैं। मैदान प्रायः एक ही मिट्टी के बने होते हैं।

⇒ वे मैदान जिनकी रचना में अपरदन की क्रिया का प्रमुख स्थान होता है, अपरदन मूलक मैदान कहलाते हैं।

⇒ निक्षेपण के क्रिया द्वारा नदियों, हिमानी, वायु तथा सागरीय तरंगों से जो मैदान बनते हैं उन्हें निक्षेपण के मैदान कहते हैं।

(ii) सड़क-निर्माण का कार्य किस क्षेत्र में आसान होगा और क्यों?
उत्तर- सडक-निर्माण का कार्य मैदानी क्षेत्र में आसानी से होगा क्योंकि मैदानी क्षेत्र प्रायः समतल भूमि का प्रदेश होता है। मैदानों की वजह से प्रायः एक ही प्रकार की मिट्टी पायी जाती है। इन क्षेत्रों को आसानी से उपयोग करके सड़क का निर्माण किया जा सकता है, जिससे यहाँ परिवहन की सुविधाएँ आसानी से उपलब्ध होंगी और सड़क का निर्माण करने में भी बहुत कम खर्च लगेगा और सड़क का कार्य जल्दी ही पूरा हो जाता है।

(iii) पर्वत, पठार और मैदान के दोहन से इस पर क्या प्रभाव पड़ा है?
उत्तर- बढ़ती जनसंख्या के कारण ही पर्वत, पठार और मैदानी क्षेत्रों का दोहन हो रहा है। वनों को काटा जा रहा है, इससे प्रदूषण की समस्या भी बढ़ी है। सड़क निर्माण में इन्हीं पठारों, पहाड़ों को काटा जा रहा है, जिससे यह विलुप्त होते जा रहे हैं। मैदानी क्षेत्रों में परिवहन, जल, समतल भूमि होने के कारण कल-कारखाने बन रहे हैं जिससे आबादी काफी घनी हो गई है। कारखानों के लिए खनिजों की उपलब्धता पठारों से है। इसलिए पठारों का दोहन हो रहा है, जिससे प्राकृतिक सुंदरता घटी हैं और प्रदूषण बढ़ा है।

        रचनात्मक मैदान का निर्माण पृथ्वी के आंतरिक हलचलों के द्वारा होता है। मैदानी क्षेत्रों में जीवन-यापन के लिए भोजन, जल, आवास परिवहन की सुविधाएँ आसानी से हो सकती है। यहाँ सड़क मार्ग, रेलमार्ग एवं अन्य सुविधाएँ आसानी से प्रदन की जा सकती हैं। बिहार का अधिकतर भाग गंगा नदी के दोनों तरफ मैदानी भाग के रूप में फैला हुआ है। इसमें कृषि कार्य होता है। ऐसे मैदानी क्षेत्र अन्न उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। मैदानी क्षेत्र पश्चिम में पंजाब से लेकर पूरब में आसम तक ये इलाके सतलज, गंगा और ब्रह्मपुत्र का मैदान कहलाते हैं। ये सभी क्षेत्र कृषि के लिए सर्वोत्तम माने जाते हैं।

(iv) मैदान में ही अधिक लोग क्यों बसते हैं?
उत्तर- मैदान में ही अधिक लोग बसते हैं क्योंकि मैदान की भूमि समतल होती है। जिससे लोग यहाँ कृषि-कार्य आसानी से करते हैं। इसमें लोग धान, गेहूँ, चना इत्यादि उपजाकर अपना जीवन-यापन कर सकते हैं। मैदानी क्षेत्रों में जीवन के लिए सभी सुख-सुविधा उपलब्ध हैं। भोजन, जल, आवास, परिवहन की सुवधिा आसानी से उपलब्ध होती है। ऐसे क्षेत्रों में संडक मार्ग आसानी से प्रदान हो जाती हैं। मैदानी क्षेत्र अन्न उत्पादन के लिए प्रसिद्ध हैं। 

(v) पर्वत कितने प्रकार के होते हैं? सभी के नाम लिखें।
उत्तर- पर्वत निम्नलिखित तीन प्रकार के होते हैं:-

(क) वलित पर्वत- इनकी सतह ऊबड़-खाबड़ एवं शिखर शंक्वाकार होती है। जैसे-भारत का हिमालय पर्वत एवं दक्षिण अमेरिका का एन्डीज पर्वत।

(ख) भ्रंशोत्थ पर्वत- पृथ्वी के आंतरिक हलचलों के कारण पृथ्वी पर दरारें पड़ जाती हैं और उन दो दरारों के बीच का भाग ऊपर उठ जाता है, इस ऊँचे उठे भाग को ही भ्रंशोत्थ पर्वत कहा जाता है। भारत का सतपुड़ा पर्वत इसका उदाहरण है।

(ग) ज्वालामुखी पर्वत- ज्वालामुखी से निकले लावा एवं अन्य पदार्थों के ठंडा होकर जम जाने से जिन पर्वतों का निर्माण होता है उसे ज्वालामुखी पर्वत कहते हैं। इटली का विसुवियस पर्वत इसका उदाहरण है। भारत के अण्डमान निकोबार के बैन द्वीप में सक्रिय ज्वालामुखी पर्वत पाए जाते हैं। कम ऊँचाई के पर्वतों को पहाड़ी कहा जाता है।


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