Category Human Geography – मानव भूगोल

25. Social change and its patterns (सामाजिक परिवर्तन तथा इसके प्रतिरूप)

Social change and its patterns

(सामाजिक परिवर्तन तथा इसके प्रतिरूप)



Q. सामाजिक परिवर्तन से क्या तात्पर्य है? सामाजिक परिवर्तन के प्रतिरूप लिखिए।

Ans- परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है। जीवन और समाज गतिशील है, परिवर्तनशील है। प्रत्येक समाज में परिवर्तन होता है। सामाजिक परिवर्तन वह परिवर्तन है जिसका सम्बन्ध समाज एवं सामाजिक व्यवस्था में होने वाले परिवर्तन से है। परिवर्तन समाज एवं जीवन का आधार है। सामाजिक परिवर्तन समाज से सम्बन्धित है। समाज, सामाजिक संगठन सामाजिक सम्बन्ध और सामाजिक ढांचे का सम्मिलित रूप है। समाज के इन भागों में जब परिवर्तन होता है तो इसे सामाजिक परिवर्तन कहा जाता है।

    किंग्सले डेविस के अनुसार, “सामाजिक परिवर्तन से हम केवल उन्हीं परिवर्तनों को समझते हैं जो सामाजिक संगठन अर्थात् समाज के ढांचे और प्रकार्यों में घटित होते हैं।”

     गिलिन एवं गिलिन के अनुसार, “सामाजिक परिवर्तन जीवन की मानी हुई रीतियों में परिवर्तन को कहते हैं। चाहे ये परिवर्तन भौगोलिक दशाओं के परिवर्तन से हों या सांस्कृतिक साधनों, जनसंख्या की रचना या सिद्धान्तों के परिवर्तन से या प्रसार से या समूह के अन्दर ही आविष्कारों के फलस्वरूप हुए हों।”

    समाज की भौगोलिक दशाओं में परिवर्तन होने से जीवन की स्वीकृत प्रणालियों एवं मान्य रीतियों में परिवर्तन होने लगता है।

सामाजिक परिवर्तन की विशेषताएँ

    सामाजिक परिवर्तन की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:-

(1) सामाजिक परिवर्तन एक सार्वभौमिक घटना है। प्रत्येक समाज में प्रत्येक काल में परिवर्तन होता रहता है। सामाजिक जनसंख्या में परिवर्तन होता है, उसकी कार्य पद्धतियां बदलती हैं।

    यदि परिवर्तन न होता तो आज भी समाज उसी आखेट की अवस्था में होता। मानव की आवश्यकताओं, विचार एवं उसकी मनोवृत्तियों में निरन्तर परिवर्तन होता रहता है।

(2) सामाजिक परिवर्तन अनिवार्य तो है, किन्तु उसकी गति समान नहीं है। एक समाज में परिवर्तन दूसरे समाज से भिन्न होता है अर्थात् एक समाज में परिवर्तन की गति तीव्र हो सकती है जबकि दूसरे में बन्द।

   भारत में स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद आए आर्थिक परिवर्तन के साथ उसी गति से सामाजिक एवं दार्शनिक दृष्टिकोण में परिवर्तन नहीं आया है।

(3) सामाजिक परिवर्तन प्रत्येक देश, काल और परिस्थितियों में होता रहा है और होता भी रहेगा। समाज चाहे शिक्षित हो अथवा अशिक्षित, आदिम हो या आधुनिक, सभ्य हो या असभ्य परिवर्तन तो सभी में होता रहता है।

(4) सामाजिक परिवर्तन समाज में होने वाले अन्तर से सम्बन्धित होता है। समाज में अन्तर होने से सामाजिक परिवर्तन होता है। जो अन्तर कल था, वह आज नहीं है। सामाजिक संगठन, परिवार, विवाह-प्रथा, परम्परा, रीति-रिवाज और रहन-सहन, आदि में होने वाले अन्तर ही सामाजिक अन्तर हैं।

(5) सामाजिक परिवर्तन वैयक्तिक नहीं होता अर्थात् किसी एक व्यक्ति के परिवर्तन को सामाजिक परिवर्तन नहीं कहा जा सकता है। सामाजिक परिवर्तन तो समुदाय के जीवन में आने वाले अन्तरों या विचलनों को कहा जाता है।

(6) सामाजिक परिवर्तन निश्चित नहीं होता है। इसका पूर्वानुमान नहीं किया जा सकता है। समाज में परिवर्तन अनेक ऐसे कारकों द्वारा होता है जो अचानक होते हैं। इसके अतिरिक्त यह भी निश्चित नहीं होता कि इसके परिणाम क्या होंगे ?

(7) परिवर्तन भौतिक एवं अभौतिक दोनों वस्तुओं में होता है। भौतिक वस्तुओं में होने वाले परिवर्तनों को नापा जा सकता है जबकि अभौतिक वस्तुओं में होने वाले परिवर्तनों को नापा नहीं जा सकता है।

   व्यक्ति के आचार-विचार, रीति-रिवाज तथा मनोवृत्तियों में होने वाले परिवर्तनों को नापा नहीं जा सकता है।

(8) समाज सामाजिक सम्बन्धों की एक सुसम्बद्ध व्यवस्था है। जब समाज के किसी एक भाग में परिवर्तन उत्पन्न होता है तो वह सम्बन्धित दूसरे भागों को भी प्रभावित करता है। इससे सामाजिक परिवर्तन एक श्रृंखलाबद्ध क्रम में होता है।

(9) सामाजिक परिवर्तन से समाज संगठित होता है और कभी-कभी विघटित भी होता है। परिवर्तन की प्रकृति के अनुसार समाज उन्नति एवं अवनति दोनों करता है।

सामाजिक परिवर्तन के प्रतिरूप

     सामाजिक परिवर्तन इतनी तीव्रता से हो रहे हैं कि उनका प्रतिरूप जानना कठिन हो रहा है। मैकाइवर एवं पेज ने परिवर्तन के तीन प्रतिरूप बताए हैं:-

(1) औद्योगिक प्रतिरूप:-

     इस प्रतिरूप में परिवर्तन की दिशा निरन्तर ऊपर ही रहती है। समाज में होने वाले आविष्कार निरन्तर प्रगतिशील होंगे। मानव ने बैलगाड़ी से लेकर वायुयान तक बना लिए हैं जो उसकी प्रगति के सूचक हैं।

(2) उत्थान एवं पतन प्रतिरूप:-

     समाज में परिवर्तन की गति एक निश्चित सीमा तक बढ़कर विपरीत दिशा की ओर मुड़ जाती है। यह उत्थान एवं पतन प्रत्येक क्षेत्र में देखा जा सकता है। आर्थिक क्रियाओं से भी जिस गति से उन्नति होती है, उसी गति से अवनति भी हो जाती है।

(3) चक्रीय परिवर्तन प्रतिरूप:-

    इस प्रतिरूप में सामाजिक परिवर्तन की गति एक चक्र की भांति चलती है। विल्फ्रेडो पैरेटो ने अभिजात वर्ग के परिभ्रमण की चर्चा की है। जब अभिजात वर्ग निष्क्रिय हो उठता है तो वह सत्ता पर से अपनी पकड़ खो बैठता है। नीचे से दलित वर्ग ऊपर उठता है और अभिजात वर्ग नीचे लुढ़क जाता है। इसी तरह के परिवर्तन समाज में निरन्तर चलते रहते हैं।

    स्प्रंगलर ने अनेक सभ्यताओं का अध्ययन कर यह निष्कर्ष निकाला है कि सभ्यताओं का उद्भव व विकास प्राणियों के समान ही होता है। सभ्यता बाल्यावस्था एवं तरुणाई पार करके परिपक्व अवस्था में आती है अन्ततः उसका क्षय होकर विघटन हो जाता है। यह क्रम निरन्तर चलता रहता है।

    जोसेफ आर्नोल्ड टायनबी ने सभ्यता के उद्भव को चुनौती और प्रत्युत्तर का काल माना है। इसमें प्रकृति चुनौती देती है और समाज उस चुनौती का सामना करता है और प्रत्युत्तर देता है। प्रकृति उच्च स्तर पर चुनौती देती है और समाज उसी स्तर पर प्रत्युत्तर देता है। परिपक्वावस्था में समाज में पूर्व जैसी ताकत नहीं रहती, किन्तु पूर्व अनुभवों के आधार पर वह कठिनाइयों का सामना करता रहता है।

     अन्त में समाज की सभ्यता और संस्कृति का पतन हो जाता है। इस पुरानी संस्कृति के आधार पर नई संस्कृति का पुनः उद्भव व विकास होता है। इस प्रकार के परिवर्तनों के प्रतिरूप चक्रीय प्रतिरूप कहलाते हैं।

24. Concept of social process (सामाजिक प्रक्रिया की अवधारणा)

Concept of social process

(सामाजिक प्रक्रिया की अवधारणा)



Q. सामाजिक प्रक्रिया की अवधारणा तथा विशेषताएँ लिखिए।

Ans- मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह समाज के अन्य सदस्यों के साथ मिल-जुलकर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। अर्थात् व्यक्ति समाज के अभाव में न तो अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकता है और न ही जीवित रह सकता है।

    मानव स्वभावतः लालची, क्रोधी व स्वार्थी होता है। यही वे स्वाभाविक प्रवृत्तियां हैं जो एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से या एक समूह से दूसरे समूह को अन्तःक्रियाएं करने के लिए प्रेरित करती हैं। जब अन्तःक्रियाओं में निरन्तरता होती है तथा ये एक निश्चित परिणाम की ओर बढ़ती हैं तब ऐसी स्थिति में अन्तः क्रियाओं को ही सामाजिक प्रक्रिया कहा जाता है।

मैकाइवर व पेज के अनुसार, “सामाजिक प्रक्रिया का तात्पर्य उस ढंग से है जिसमें एक समूह के सदस्यों के सम्बन्ध एक निश्चित रूप प्राप्त कर लेते हैं।”

    इन्होंने सामाजिक प्रक्रिया का अर्थ स्पष्ट करते हुए पुनः लिखा है, “प्रक्रिया का अर्थ वह निरन्तर परिवर्तन है जो एक विशिष्ट स्थिति में पहले से ही विद्यमान शक्तियों की क्रियाशीलता के माध्यम से होता है।”

    गिलिन एवं गिलिन के अनुसार, “सामाजिक प्रक्रिया से आशय अन्तः क्रियाओं के उन तरीकों से है जो कि व्यक्ति और समूह के मध्य सम्बन्धों की व्यवस्था को स्थापित करते हैं या परिवर्तित जीवन के प्रचलित तरीकों को अव्यवस्थित कर देते हैं।”

     फेयर चाइल्ड के अनुसार, “कोई भी सामाजिक परिवर्तन या अन्तःक्रिया जिससे कोई अनुसन्धानकर्ता किसी ऐसे सुसंगत गुण को देखता है तथा जिसे एक स्पष्ट श्रेणी का नाम दिया जा सकता है, एक विशेष प्रकार के परिवर्तन या अन्तःक्रियाएं जिसमें अमूर्त धारणा के द्वारा कोई सामान्य प्रतिमान देखा जा सकता हो और जिसे स्पष्ट नाम दिया जा सकता हो, को सामाजिक प्रक्रिया कहते हैं।”

    लुण्डबर्ग तथा अन्य के अनुसार, “प्रक्रिया सम्बन्धित घटनाओं की उस श्रृंखला को प्रकट करती है, जोकि सापेक्षिक रूप से विशिष्ट और पहले से ही अनुमान योग्य परिणामों की ओर ले जाती है।”

    यह परिभाषा स्पष्ट करती है कि सामाजिक प्रक्रिया सामाजिक जीवन में सदैव संचालित रहने वाली वह महत्वपूर्ण प्रक्रिया है, जो कि परस्पर सम्बन्धित घटनाओं को एक निश्चित दिशा प्रदान करके निश्चित परिणामों की ओर निरन्तर संचालित रहती है अर्थात् सामाजिक प्रक्रिया अन्तःक्रियाओं की उस श्रृंखला को प्रदर्शित करती है जिनमें न सदैव निरन्तरता बनी रहती है, जो एक निश्चित दिशा व परिणामों की ओर ले जाने वाली रहती है।

सामाजिक प्रक्रिया के आवश्यक तत्व या विशेषताएँ

     सामाजिक प्रक्रिया के आवश्यक तत्व या विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :-

(1) क्रमिक घटनाएं:-

     कोई भी घटना कितनी ही महत्वपूर्ण क्यों न हो उसे सामाजिक प्रक्रिया तब तक नहीं कहा जा सकता जब तक कि वह किसी निश्चित समयावधि के बाद निरन्तर घटित न होती रहे अर्थात् सामाजिक प्रक्रिया के लिए किसी घटना का घटना मात्र ही आवश्यक नहीं होता है, अपितु घटना की पुनरावृत्ति का होना आवश्यक होता है।

(2) घटनाओं के मध्य सम्बन्ध:-

     समाज में घटित होने वाली सभी घटनाएं सामाजिक प्रक्रियाओं की श्रेणी में नहीं आती हैं, क्योंकि उनकी प्रकृति में पर्याप्त अन्तर रहता है तथा उनके क्षेत्रों में भी अन्तर हो सकता है। सामाजिक प्रक्रियाओं में वे ही घटनाएं सम्मिलित की जाती हैं जो समान प्रकृति वाली हों तथा एक-दूसरे से किसी न किसी रूप में परस्पर सम्बन्धित हों।

(3) निरन्तरता:-

     निरन्तरता का सामान्य आशय सदैव होते रहने से है। सामाजिक प्रक्रिया के लिए घटनाओं के मध्य सम्बन्ध होने के साथ ही यह अति आवश्यक है कि इन घटनाओं में निरन्तरता का गुण हो। बिना निरन्तरता के भी घटनाओं को सामाजिक प्रक्रिया नहीं कहा जा सकता है।

    उदाहरणार्थ परिवार एक सहयोगात्मक संस्था है जिसकी आवश्यकता व्यक्ति को सदैव रहती है। व्यक्ति एक मरणशील प्राणी है, किन्तु परिवार निरन्तर बनी रहने वाली संस्था है। यह कभी समाप्त नहीं होगी।

(4) विशिष्ट परिणाम:-

    सामाजिक घटना का एक महत्वपूर्ण तत्व परिणाम की प्राप्ति है। सामाजिक प्रक्रियाएं सामाजिक घटनाओं की एक श्रृंखला के रूप में होती हैं जिनमें निरन्तरता बनी रहती है तथा इसके कुछ परिणाम अवश्य ही सामने आते हैं।

    यदि सामाजिक प्रक्रिया की प्रकृति सहयोगात्मक होती है तो इसके परिणामस्वरूप व्यक्तियों में एकता, सहयोग, अपनत्व, आदि गुणों का विकास होता है, समाज में संगठन पनपता है तथा सामाजिक प्रगति होती है, किन्तु यदि प्रक्रिया की प्रकृति असहयोगात्मक है तो परिणाम ठीक विपरीत होते हैं।

23. Social Structure (सामाजिक संरचना)

Social Structure

(सामाजिक संरचना)



Q.- सामाजिक संरचना क्या है? सामाजिक संरचना की अवधारणा, विशेषताएँ एवं तत्त्व लिखिए।

Ans:- सामान्य व्यक्ति जिसे ढांचा कहता है, उसी को समाजशास्त्रीय संरचना कहता है। प्रत्येक भौतिक वस्तु की एक निश्चित संरचना होती है जिसका निर्माण विभिन्न इकाइयों के मिश्रण से होता है। ये निर्माणक इकाइयां सुव्यवस्थित रूप से परस्पर सम्बन्धित रहती हैं तथा इनमें स्थिरता पाई जाती है।

   संरचना के लिए आवश्यक होता है कि सभी इकाइयां सुनिश्चित स्थान पर रहते हुए अपनी-अपनी भूमिका का उचित निर्वाह करती रहें। जिस प्रकार शरीर का एक निश्चित ढांचा होता है ठीक उसी प्रकार समाज की भी संरचना होती है। मानव संरचना की भांति सामाजिक संरचना भी अनेक इकाइयों का मिश्रित रूप होती है।

    सामाजिक संरचना की विभिन्न इकाइयों में विभिन्न प्राथमिक व द्वितीयक समूह जैसे- परिवार, क्रीड़ा समूह, जाति, पड़ोस, सेना, व्यापारिक संगठन, औद्योगिक संस्थान, शिक्षण संस्थान, सामाजिक मूल्य, सामाजिक प्रतिमान, आदि को लिया जाता है।

    ये सभी समाज की इकाइयां व्यवस्थित रहते हुए तथा परस्पर सम्बन्धित होते हुए अपने-अपने सुनिश्चित स्थान पर रहते हुए अपने-अपने कार्यों को व्यवस्थित रूप से करती रहती हैं। तभी समाज का बाह्य स्वरूप दिखाई देता है, यही सामाजिक संरचना है।

    संक्षेप में सामाजिक संरचना (Social Structure) एक ऐसा शब्द है जो किसी समाज में व्यक्तियों और समूहों के बीच स्थापित संबंधों और संगठित पैटर्न को दर्शाता है। 

    यह समाज के विभिन्न हिस्सों, जैसे परिवार, स्कूल, धार्मिक संगठन, और सामाजिक क्लबों के बीच के संबंधों को संदर्भित करता है, जो समाज के सदस्यों को एक साथ बांधते हैं।

    सामाजिक संरचना समाज को एक ढांचा प्रदान करती है, जिसमें लोग अपने विभिन्न गुणों, रुचियों और व्यक्तिगत पहलुओं के आधार पर एक-दूसरे के साथ अंतःक्रिया करते हैं। 

सामाजिक संरचना की अवधारणा:-

   सामाजिक संरचना की अवधारणा को विभिन्न विद्वानों ने भिन्न-भिन्न प्रकार से समझाया है।

कार्ल मानहीम ने सामाजिक संरचना को स्पष्ट करते हुए लिखा है कि “सामाजिक संरचना परस्पर क्रिया करती हुई सामाजिक शक्तियों का जाल है, जिससे निरीक्षण और चिन्तन की विभिन्न प्रणालियों का जन्म होता है।”

    स्पष्ट है कि सामाजिक संरचना का निर्माण सामाजिक शक्तियों के माध्यम से होता है। ये सामाजिक शक्तियां एक-दूसरे से परस्पर सम्बन्धित रहती हुई कार्य करती रहती हैं तथा निरीक्षण एवं चिन्तन की पद्धतियों को जन्म देती रहती हैं।

मॉरिस जिन्सबर्ग के अनुसार, “सामाजिक संरचना का अध्ययन सामाजिक संगठन के प्रमुख स्वरूपों अर्थात् समूह, समूहों के प्रकार, समितियों, संस्थाओं और इनके संकुलों से जिससे कि समाज का निर्माण होता है, से है।”

   इस परिभाषा से स्पष्ट है कि सामाजिक संरचना का निर्माण उन विशिष्ट इकाइयों से होता है जिनसे कि समाज का निर्माण होता है।

जॉनसन के अनुसार, “किसी भी वस्तु की संरचना से हमारा आशय इसके भागों में सापेक्षिक रूप से पाए जाने वाले स्थायी अन्तः सम्बन्धों से होता है।”

रेडक्लिफ ब्राउन के अनुसार, “संस्था द्वारा परिभाषित और नियमित सम्बन्धों में लगे हुए व्यक्तियों की क्रमबद्धता ही सामाजिक संरचना है।”

टालकोट पारसन्स के अनुसार, “सामाजिक संरचना परस्पर सम्बन्धित संस्थाओं, एजेन्सियों, सामाजिक प्रतिमानों तथा साथ ही समाज में प्रत्येक सदस्य द्वारा ग्रहण किए गए पदों तथा कार्यों की विशिष्ट क्रमवद्धता को कहते हैं।”

     इन विचारों से स्पष्ट है कि मात्र समाज की विभिन्न इकाइयों या तत्वों को जिनसे कि समाज का निर्माण होता है, सामाजिक संरचना के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता, बल्कि जब समाज की विभिन्न निर्माणक इकाइयों में एक निश्चित रूप में क्रमबद्धता होती है तभी सामाजिक संरचना कहा जाता है।

एस. एस. नैडेल के अनुसार, “सामाजिक संरचना विभिन्न अंगों की क्रमबद्धता को स्पष्ट करती है, यह तुलनात्मक रूप से स्थायी होती है, किन्तु इसका निर्माण करने वाले अंग परिवर्तनशील होते हैं।”

    इस परिभाषा से स्पष्ट होता है कि सामाजिक संरचना की प्रकृति तो स्थायी होती है, किन्तु सामाजिक संरचना का निर्माण करने वाली इकाइयां चाहे कोई भी क्यों न हों, परिवर्तनशील प्रकृति की होती हैं या हो सकती हैं।

सामाजिक संरचना की विशेषताएँ

     सामाजिक संरचना की प्रमुख विशेषताएं निम्न हैं:

(1) समाज की बाह्य संरचना:-

    सामाजिक संरचना समाज के ढांचे से जानी जाती है। ढांचे के लिए आवश्यक निर्णायक इकाइयों में पाई जाने वाली क्रमबद्धता ही सामाजिक संरचना है। यद्यपि प्रत्येक समाज की संरचना में पर्याप्त समानता पाई जाती है, फिर भी वह दूसरे समाज से अलग अपनी पहचान बनाए रखता है। एक समाज दूसरे समाज से कुछ न कुछ बातों में भिन्न होता है जो व्यवहारों के प्रतिमानों के रूप में दिखाई देती है।

(2) विशिष्ट क्रमबद्धता:-

      पारसन्स ने परस्पर सम्बन्धित संस्थाओं और समितियों की विशिष्ट क्रमबद्धता को सामाजिक संरचना कहा है। सामाजिक संरचना में विभिन्न इकाइयां एक-दूसरे से जुड़कर एक ढांचा तैयार करती हैं। यही सामाजिक संरचना है। स्पष्ट है कि सामाजिक संरचनाएं इकाइयों में पाई जाने वाली विशिष्ट क्रमबद्धता ही है।

(3) तुलनात्मक रूप से स्थिर:-

     नैडेल का मानना है कि संरचना अपने निर्माण करने वाले अंगों से अधिक स्थायी होती है। अंग परिवर्तनशील होते हुए भी अपने में विद्यमान क्रमबद्धता की दृष्टि से स्थिर होते हैं। मानव में आयु के अनुसार परिवर्तन आता है। यह परिवर्तन उसके आचार-विचारों में भी होता है, किन्तु इन व्यक्तियों द्वारा निर्मित होने वाले समूह अधिक स्थिर होते हैं।

(4) अमूर्तता:-

     जब किसी एक वस्तु को दूसरी वस्तु द्वारा परिभाषित किया जाता है तो उसे सम्बन्ध कहा जाता है। जब ये सम्बन्ध जागरूक चेतनायुक्त प्राणियों के मध्य पारस्परिक रूप में पाए जाते हैं तब उन्हें सामाजिक सम्बन्ध कहा जाता है। इन्हें अमूर्त सम्बन्ध कहा जाता है। इन सम्बन्धों द्वारा बनने वाले समाज की संरचना अमूर्त होती है।

    राइट महोदय ने सामाजिक संरचना के अमूर्त पक्ष को महत्व दिया। पारसन्स ने सामाजिक संरचना की इकाइयों में सामाजिक प्रतिमानों को महत्वपूर्ण स्थान दिया। ये प्रतिमान अमूर्त एवं बाह्य होते हैं।

(5) खण्डात्मक विभाजन:-

      सामाजिक संरचना में खण्डात्मक विभाजन पाया जाता है। सामाजिक इकाइयों में अनेक उप संरचनाएं पाई जाती हैं। इसकी प्रत्येक इकाई में उप संरचनाएं होती हैं। धर्म, राजनीति, आर्थिक, पारिवारिक एवं सामाजिक संस्थाएं सामाजिक संरचनाओं की महत्वपूर्ण अंग होती हैं। ये सभी संस्थाएं अपनी व्यक्तिगत सामाजिक संरचनाएं रखती हैं।

(6) संघटन एवं विघटन:-

     सामाजिक संरचनाओं का आधार सामाजिक प्रतिमान होता है जो देशकाल एवं परिस्थिति के अनुसार बदलते रहते हैं। पुराने मूल्यों का स्थान नवीन मूल्य ग्रहण करने लगते हैं। इससे समाज में पुराने मूल्यों के आधार पर विघटन प्रारम्भ हो जाता है। जबकि नवीन मूल्यों के आधार पर समाज की पुनर्रचना प्रारम्भ हो जाती है।

(7) सामाजिक प्रक्रियाएं:-

    सामाजिक संरचनाओं में सामाजिक प्रक्रियाओं का योगदान रहता है। सामाजिक प्रतिक्रियाओं द्वारा सामाजिक संरचनाओं का रूप निर्धारित होता है जबकि सामाजिक संरचनाएं इन प्रक्रियाओं का नियमन करती हैं।

(8) क्षेत्रीयता:-

    प्रत्येक संरचना अपना एक सामाजिक क्षेत्र रखती है। इस क्षेत्र की सांस्कृतिक, राजनीतिक एवं आर्थिक, आदि संस्थाओं को वहां की भौगोलिक दशाएं प्रभावित करती हैं।

सामाजिक संरचना के तत्व

   सामाजिक संरचना का निर्माण समितियों एवं संस्थाओं के आधार पर होता है। सामाजिक संरचना के तत्व निम्नांकित हैं:-

(1) नियमात्मक प्रणाली:-

     प्रत्येक समाज की व्यवस्था वास्तविक व्यवहारों पर नियन्त्रण करती है। जिन नियमों द्वारा नियन्त्रण होता है, उन्हें ही नियमात्मक प्रणाली के अन्तर्गत जाना जाता है। समाज द्वारा स्वीकृत एवं मान्य मूल्यों के आधार पर ही व्यक्ति अपनी भूमिका अदा करता है। सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था इन्हीं मूल्यों एवं नियमों पर आधारित है।

(2) पद व्यवस्था:-

    सामाजिक संरचना में व्यक्तियों की स्थिति उनके व्यक्तिगत गुण तथा किसी विशिष्टता के आधार पर होती है। इन्हीं विशिष्टताओं के आधार पर उनका पद सृजन होता है। व्यक्ति अपनी क्षमताओं के आधार पर इनमें परिवर्तन भी करता रहता है। व्यक्ति एक साथ कई प्रकार के सम्बन्धों में बंधा रहता है यथा पिता, पति, मित्र, अधिकारी, आदि। यह व्यवस्था सामाजिक संरचना का महत्वपूर्ण तत्व हैं।

(3) अनुशासित व्यवस्था:-

     यह व्यवस्था समूह के व्यक्तियों के कार्यों का मूल्यांकन कर उचित एवं अनुचित की मान्यता प्रदान करती है। सामाजिक संरचना के भाग एवं उपभाग सभी एक दूसरे से सम्बन्धित आदर्शों एवं मूल्यों के कारण होते हैं। समाज में इस व्यवस्था के कारण ही पुरस्कार एवं दण्ड व्यवस्था का प्रावधान है।

(4) अपेक्षाओं की व्यवस्था:-

     प्रत्येक सामाजिक व्यवस्था में व्यक्तियों के पारस्परिक प्रति उत्तरों का पूर्वानुमान लगाकर ही व्यवहारों का सन्तुलित नियमन होता है। मानव अपनी क्षमता के अनुसार कार्य करता रहता है जिससे सामाजिक संरचना का स्वरूप निर्धारित होता है और कर्तव्य पालन से ही व्यवहारों के प्रति उत्तरों को निश्चित एवं नियमित किया जाता है।

(5) क्रिया व्यवस्था:-

     सामाजिक संरचना के लिए एक क्रिया व्यवस्था अत्यावश्यक होती है। इस क्रिया व्यवस्था में सामाजिक क्रियाओं का विशिष्ट स्वरूप पाया जाता है। किसी व्यक्ति द्वारा समाज के लिए किया गया कार्य सामाजिक क्रिया कहलाता है। इसके लिए कर्ता, उसकी प्रेरणा और उस क्रिया की पृष्ठभूमि या सन्दर्भ का होना आवश्यक होता है। समाज की क्रियाशीलता का प्रमुख कारण क्रिया व्यवस्था है जिसे जीवन्त रखने के लिए सामाजिक संरचना सर्वदा प्रयत्नशील रहती है। क्रिया व्यवस्था सामाजिक संरचना को गतिशील बनाती है।

22. What is language? Origin and classification of languages ​​in India (भाषा क्या है? उत्पत्ति तथा भारत में भाषाओं का वर्गीकरण)

What is language? Origin and classification of languages ​​in India

(भाषा क्या है? उत्पत्ति तथा भारत में भाषाओं का वर्गीकरण)



     भाषा अभिव्यक्ति का सबसे उत्तम साधन है। यदि मानव के पास भाषा न होती तो उसके आविष्कारों का विस्तार एवं प्रसार अत्यन्त सीमित हो जाता। मानव की सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक एवं राजनीतिक उन्नति का प्रमुख कारण आविष्कार है और आविष्कार को प्रसारित करने का सबसे अधिक श्रेय मनुष्य की भाषा शक्ति को है।

    भाषा द्वारा मानव अपने मन के भाव प्रकट करता है, सामाजिक आदान-प्रदान या अन्तःक्रिया में भाग लेता है। संगीत रचना करता है और गाता है, साहित्य की सृष्टि करता है और आविष्कारों का प्रसार मानवीय धरातल में करता है।

    भाषा का अर्थ बोलना है, क्योंकि इसका मुख्य प्रयोग बोलकर ही किया जाता है, किन्तु दूरस्थ व्यक्ति को विचार लिखकर ही व्यक्त किए जाते हैं।

परिभाषा

स्टर्टीवेण्ट के अनुसार, “भाषा मुंह से उच्चारण किए जाने वाले संकेतों की वह व्यवस्था है जिसके द्वारा एक सामाजिक समूह के सदस्य सहयोग तथा अन्तः क्रिया करते हैं।”

पतंजलि मुनि के अनुसार, “जिस व्यापार में वाणी द्वारा वर्ण व्यक्त किए जाते हैं। वह व्यक्त वाक् अर्थात् भाषा है।

हर्सकोविट्ज के अनुसार, “भाषा मुंह से उच्चारण किए जाने वाले संकेतों की वह व्यवस्था है जिसके द्वारा एक सामाजिक समूह के सदस्य सहयोग तथा अन्तः क्रिया करते हैं और जिसके माध्यम से सीखने की प्रक्रिया को सफल बनाया जाता है तथा जीवन की एक विधि विशेष को निरन्तरता एवं परिवर्तनशीलता दोनों ही प्राप्त होती हैं।”

भाषा की उत्पत्ति:-

      भाषा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में विभिन्न मत हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार भाषा की उत्पत्ति उन परिस्थितियों का परिणाम है जिनमें प्रारम्भिक काल में मानव निवास करता था। उस समय प्राकृतिक वस्तुएं एवं घटनाएं देखकर अनायास मुंह से आवाजें निकल पड़ती थीं।

     धीरे-धीरे आवाजें निकालकर ही वह अपने भावों को दूसरों तक पहुंचाता था। धीरे-धीरे सामाजिक अन्तः क्रिया के दौरान एक-एक विशिष्ट आवाज एक-एक विशेष प्रकार के संकेत के रूप में स्थापित व क्रियाशील हुई। इन्हीं संकेतों के क्रमिक विकास से भाषा की उत्पत्ति हुई।

      भाषा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में द्वितीय मत यह है कि मानव ने बोलने की प्रेरणा प्रकृति से ही ली है। प्रारम्भिक समय में मानव ने प्रकृति में कुछ आवाजें सुनीं जिनकी नकल की जिससे बाद में संकेतों का जन्म हुआ तथा भाषा की उत्पत्ति हुई।

     भाषा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में तृतीय सिद्धान्त प्राणीशास्त्रीय है। मानव में कुछ प्राणीशास्त्रीय विशेषताएं पाई जाती हैं जिनके कारण वाणी अथवा भाषा की उत्पत्ति होती है।

भाषाओं का वर्गीकरण:-

    भारत में बोली जाने वाली भाषाएं निम्नांकित चार परिवारों से सम्बन्धित हैं:

(1) ऑस्ट्रिक (Ausric)

(2) द्रविण (Dravidian)

(3) चीनी-तिब्बती (Sino-Tibetan)

(4) इण्डो-यूरोपियन (Indo-European)

(1) ऑस्ट्रिक:-

    इसकी दो शाखाएं हैं-

(ⅰ) ऑस्ट्रो-एशियाटिक शाखा एवं

(ii) ऑस्ट्रोनेशियन शाखा।

   ऑस्ट्रो-एशियाटिक शाखा के अन्तर्गत मध्य एवं पूर्वी भारत की कोल एवं मुण्डा बोलियां, निकोबार द्वीप समूह की बोली तथा थाईलैण्ड और वियतनाम की भाषाएं सम्मिलित हैं जबकि ऑस्ट्रोनेशियन शाखा के अन्तर्गत इण्डोनेशिया की राष्ट्रभाषा तथा मलाया, माइक्रोनेशिया, मैलेनेशिया तथा पोलिनेशिया, आदि की भाषाएं सम्मिलित हैं। इनमें सबसे बड़ा भाग सन्थाली बोलने वालों का है।

(2) द्रविण:-

     इसके सदस्य मध्य और दक्षिणी भारत में रहते हैं। इसके अन्तर्गत निम्नांकित चार साहित्यिक भाषाएं आती हैं-तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयालय। द्रविण समूह में निम्नांकित तीन समूह हैं-

(i) दक्षिणी द्रविण,

(ii) मध्य द्रविण तथा

(iii) उत्तरी द्रविण।

     दक्षिणी द्रविण समूह में दक्षिणी भारत का बड़ा भाग सम्मिलित है जिसमें तमिल, मलयालम तथा कन्नड़ भाषाएं बोली जाती हैं। मध्य द्रविण में तेलुगु तथा गोंडी भाषाएं सम्मिलित हैं जबकि उत्तरी द्रविण समूह में कुराख (ओरांव) तथा माल्टो हैं।

(3) चीनी-तिब्बती:-

      इसे भाषाओं का किरात समूह भी कहा जाता है। इस भाषा परिवार में हिमालय के दक्षिणी ढालों, उत्तरी पंजाब से भूटान, उत्तरी तथा पूर्वी बंगाल और असम में पाई जाने वाली इण्डो मंगोलाइड प्रगति के लोगों में प्रचलित भाषाएं आती हैं। भारत में तिब्बती भाषा बोलने वालों की निम्नांकित शाखाएं हैं:-

(i) तिब्बत-हिमालयी,

(ii) उत्तरी असम,

(iii) असम म्यांमारी। (बर्मी)।

      तिब्बत-हिमालयी शाखा में भूटिया समूह तथा हिमालयन समूह हैं। भूटिया समूह में तिब्बत, बेल्टी, लद्दाखी, लाहुली, शेरपा तथा सिक्किम भूटिया सम्मिलित हैं। हिमालयन समूह में चम्बा, कनौरी तथा लेप्चा हैं।

     उत्तरी असम समूह में अका, इफला, अबोर, मिरी, मिशमी तथा निशिंग हैं। इनमें मिरी सबसे अधिक लोगों द्वारा बोली जाती है।

    असम म्यांमारी भाषा को पुनः निम्नांकित उपविभागों में विभाजित किया जा सकता है-बोडा, नागा, कचिन, कुकिचिन, म्यांमार।

(4) इण्डो यूरेपियन:-

      इसके अन्तर्गत दो मुख्य शाखाएं हैं:

(i) डारडिक तथा

(ii) इण्डो-आर्यन।

    डारडिक समूह में दारदी, शिना, कोहिस्तानी तथा कश्मीरी, आदि हैं। इनमें कश्मीरी सबसे ज्यादा लोगों द्वारा बोली जाती है।

    इण्डो-आर्यन शाखा को पुनः उत्तर-पश्चिमी, दक्षिणी, पूर्वी, पूर्वी-मध्य, मध्य तथा उत्तरी समूहों में उपविभाजित किया जाता है।

प्रश्न प्रारूप 

Q. भाषा क्या है? इसकी उत्पत्ति तथा भारत में भाषाओं का वर्गीकण कीजिए।

21. Fundamental Concepts in Human Geography (मानव भूगोल में मौलिक अवधारणाएँ)

Fundamental Concepts in Human Geography

(मानव भूगोल में मौलिक अवधारणाएँ)



अवधारणाएँ (Concepts):-

      अवधारणाएँ किसी भी विषय का एक महत्वपूर्ण अंग होती है, क्योंकि वे उस विषय को एक अलग पहचान देने का काम करती है। जबकि एक विषय की मौलिक अवधारणाएँ उस विषय में अध्ययन किए गए तथ्यों की प्रकृति और उन तथ्यों का अध्ययन करने हेतु अपनाए गए परिप्रेक्ष्य या दृष्टिकोण पर निर्भर करती है, क्योंकि पृथक् पृथक् विषय तथ्यों के पृथक् पृथक् समूहों पर ध्यान केन्द्रित करते हैं और पृथक पृथक परिप्रेक्ष्य का प्रयोग करते है इसलिए उनके पास अवधारणाओं का उनका अपना विशिष्ट समूह होता है।

    मानव भूगोल की कुछ अवधारणाएँ तो अभिन्न अंग है जो मानव भूगोल की विशिष्ट प्रकृति को चरित्रित करने में उपयोगी है। इसी कारण इन्हें मानव भूगोल की मूलभूत अवधारणाओं के रूप में जाना जाता है। मानव भूगोल की मूलभूत अवधारणाएँ समय (काल), स्थान/जगह, अवस्थिति, स्थानिक वितरण, स्थानिक अंत: क्रिया और स्थानिक संगठन मानव भूगोल की अपनी मूल अवधारणाएँ है।

     जबकि दूसरी ओर समय (काल), समाज, संस्कृति, धारणा, व्यवहार, विकास और असमानता जैसी अवधारणाएँ व्युत्पन्न अवधारणाएँ है। अतः मानव भूगोल की मूलभूत अवधारणाओं का विस्तृत अध्ययन निम्न प्रकार है-

(1) मापक (Scale):-

    मानचित्र का मापक मानचित्र पर दूरी तथा धरातल पर वास्तविक दूरी का अनुपात है। जैसे मानचित्र पर 1 इंच धरातल पर 20 मील को प्रदर्शित कर सकता है। द्वितीय मापक का विश्लेषण किसी क्षेत्रीय इकाई के आकार के रूप में करता है जिस पर किसी समस्या का विश्लेषण किया जाता है, जैसे- देश, राज्य या जिला स्तर।

    तथ्य विषयक/ परिघटनात्मक मापक का मतलब उस आकार से है जिस पर भौगोलिक संरचनाएँ उपलब्ध है अथवा जिस पर भौगोलिक प्रक्रिया संसार में काम कर रही है। विद्वानों द्वारा अध्ययन किए गए तथ्य-विषयकों/परिघटना को सूक्ष्म, समष्टि या वृहत् स्तर पर देखा जा सकता है। यह स्थानीय, प्रादेशिक या वैश्विक स्तर पर भी उपलब्ध हो सकते है। जैसे- एक समुदाय द्वारा बोली जाने वाली बोली स्थानीय स्तर पर मिलती है जबकि एक भाषा प्रादेशिक स्तर या वैश्विक स्तर पर मिलती है।

(2) समय/काल और जगह/स्थान (Time/Period and Place/Space):-

      समय तथा जगह दोनों पृथ्वी की सतह पर किसी भी वस्तु के अस्तित्व की दो मूलभूत वास्तविकताएँ है। काण्ट (1724-1804) का मत था कि समय (काल) और जगह स्थान मानव अनुभव की सम्पूर्ण परिधि को भरते है। मानव सहित समस्त कुछ समय (काल) और जगह स्थान के अन्तर्गत होता है।

   समय (काल) और जगह दोनों को रोजमर्रा के शब्दों के रूप में जाना जाता है, क्योंकि हम समस्त अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन में समय एवं जगह सम्बन्धी तथ्यों का सामना करते हैं। फलस्वरूप, हम सभी को इन शब्दों के बारे में सामान्य समझ है। इसके बावजूद इन अवधारणाओं को परिभाषित करना मुश्किल है। समय के साथ दो लगातार घटित घटनाओं का पृथक्‌करण है। जबकि जगह को दो स्थानों के मध्य पृथक्‌करण के रूप में माना गया है।

     इतिहास समय (काल) के साथ सम्बन्धित है। इसी कारण इतिहासकार वास्तविकता के लौकिक या सामयिक आयाम से सम्बन्ध रखते है। वे मुख्य रूप से समाज के लौकिक या सामयिक क्रम विकास का अध्ययन करने में रुचि रखते हैं। मानव इतिहास में अब तक जो कुछ घटित हुआ है, वह केवल विशिष्ट स्थानों पर हुआ है जबकि भूगोल का सम्बन्ध जगह से है। इसलिए भूगोलवेत्ता वास्तविकता के स्थानिक आयामों से सम्बन्ध रखते है। अतः भूगोल को एक क्षेत्र या स्थानिक विज्ञान के रूप में परिभाषित किया गया है।

      समय एवं जगह की अवधारणाओं की परस्पर अन्तनिर्भरता इतिहास और भूगोल के मध्य घनिष्ठ सम्बन्ध की वकालत करते है। यूनानी इतिहासकार हेरोडोटस (485-428 ई. पू.) का मत है कि “सम्पूर्ण इतिहास को भौगोलिक रूप से देखना चाहिए और सम्पूर्ण भूगोल को ऐतिहासिक रूप से देखना चाहिए।”

(3) क्षेत्र, स्थान और प्रदेश (Area, Place and Region):-

     कई विद्वानों ने संसार को समझने हेतु क्षेत्र, स्थान एवं प्रदेश की अवधारणा को विकसित किया है। क्षेत्र शब्द सामान्यतः किसी स्थान के एक भाग या पृथ्वी की सतह के एक भाग के रूप में माना गया है जिसका एक निश्चित विस्तार एवं सीमा होती है, परन्तु यह किसी आकार का हो सकता है। यह एक सामान्य अवधारणा है, परन्तु इसकी कोई निश्चित अवस्थिति नहीं होती है।

    वहीं दूसरी ओर एक स्थान अपनी भौतिक एवं सांस्कृतिक विशेषताओं या कार्यों के रूप में विशिष्टता व विलक्षणता के कारण निश्चित या अनिश्चित सीमा का क्षेत्र है। किसी स्थान की भौतिक विशेषताओं में भू-आकृतियाँ, जलाशय, मिट्टी, तापमान, वर्षा, वायु, जीव एवं वनस्पति तथा जीवन आदि सम्मिलित है। जबकि सांस्कृतिक विशेषताओं में मानव अधिवास, कारखाने, अस्पताल, विद्यालय, रक्षा प्रतिष्ठान, सड़कें, रेलवे, भाषा, धर्म आदि सम्मिलित है।

(4) तंत्र (Mechanism):-

     तंत्र एक-दूसरे से अंतः परस्पर या एक-दूसरे से जुड़े तत्वों का समूह है या जुड़े हुए सिरों का समूह तंत्र है। पृथ्वी की सतह पर अवस्थित या वितरित तत्व स्थानिक तत्व है। परिवहन तंत्र स्थानिक तंत्र की व्यापक श्रेणी से सम्बन्धित है। जबकि जैविक प्रणाली, सामाजिक तंत्र, कार्यालय व्यवस्थान गैर-स्थानिक तंत्र के उत्तम उदाहरण है। भूगोल विशेषज्ञ अधिकतर स्थानिक तंत्र में ध्यान केन्द्रित रखते है।

     एक तंत्र एवं उसकी संयोजकता का प्रतीकात्मक प्रदर्शन रेखाचित्र के रूप में होता है। यह संधियों द्वारा जुड़े असंधियों या किनारों का एक समूह होता है। स्थानिक तंत्र के दो सबसे महत्वपूर्ण तत्व शीर्ष (Vertex) और छोर (edge or link) है। एक असंधि एक रेखाचित्र का एक अंतिम बिंदु या प्रतिच्छेदन बिंदु है। परिवहन तंत्र में असंधि (nodes) का उत्तम उदाहरण सड़क का चौराहा या परिवहन टर्मिनल है।

    मानव भूगोल के प्रमुख विद्वान मानव के सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक तत्वों को पृथ्वी की सतह पर व्यवस्थित और संरचित करने के तरीकों के अध्ययन में रुचि लेते हैं। इनमें सड़क तंत्र, रेलवे तंत्र, बिजली तंत्र, संचार तंत्र, सामाजिक एवं संपर्क तंत्र आदि प्रमुख है।

(5) स्थानिक अंतः क्रिया (Spatial Interaction):

     स्थानिक अंतःक्रिया द्वारा पृथ्वी एक-दूसरे से जुड़ी हुई है। इसलिए एक स्थान के व्यक्ति दूसरे स्थान के व्यक्तियों से सम्पर्क एवं सम्बन्ध स्थापित करते हैं। गाँव से गाँव के मध्य, गाँव से शहरों के मध्य, शहरों का शहरों के मध्य और बन्दरगाह एवं आन्तरिक प्रदेशों के मध्य अन्त: क्रिया होती है। व्यक्ति वस्तुओं, सेवाओं, पैसा, सूचना और विचारों का संचार तथा आदान-प्रदान के कारण स्थानों के मध्य स्थापित अंतर्निर्भरता का सम्बन्ध स्थानिक अंत: क्रिया कहा जाता है।

(6) अवस्थिति एवं स्थानिक वितरण (Location and Spatial Distribution):-

     मानव भूगोल में भूगोलवेत्ता पृथ्वी पर स्थानों, परिघटनाओं की अवस्थिति एवं वितरण की व्याख्या करते हैं, जबकि मानव भूगोल में प्रयुक्त होने वाली अवस्थिति और वितरण की अवधारणा को जानने हेतु सर्वप्रथम स्थानिक, वितरण, अवस्थिति, परिघटना और परिमाण की अवधारणाओं को जानना होगा। गॉर्डन जे. फील्डिंग (1974) ने इन शब्दों की अवधारणाओं के मध्य अन्तर स्पष्ट किया है। स्थानिक शब्द इंगित करता है कि एक परिघटना पृथ्वी की सतह के एक हिस्से को अधिग्रहित करती है। जबकि वितरण एक-दूसरे से सम्बन्धित परिघटनाओं का संयोजन है और वितरण एक प्रकार की परिघटना की व्यवस्था है।

(7) पदानुक्रम और स्थानिक व्यवस्थापन (Hierarchy and Spatial Organisation):-

    पदानुक्रम (Hierarchy) आकार, कार्य या महत्व के किसी अन्य आधार पर वस्तुओं को क्रमबद्ध या श्रेणीबद्ध किया जाता है। स्थानिक शब्द में कल्पना की जाती है कि संसार का आकार, कार्यात्मक महत्व या भौगोलिक महत्व का पदानुक्रम में व्यवस्थित करता है। पृथ्वी पर विभिन्न स्थानों और वस्तुओं की श्रेणी या क्रम को स्थानिक पदानुक्रम में रखा जाता है। जैसे भारत में बस्तियों का पदानुक्रम।

     जनसख्या के आधार पर भारत में बस्तियों सबसे बड़ी इकाई (महानगर) से लेकर सबसे छोटी इकाई (पल्ली गाँव) तक होती हैं। इसके अलावा भारत की जनगणना के आधार पर शहरी बस्तियों के पदानुक्रम में रखा गया है। स्थानिक पदानुक्रम का एक उत्तम उदाहरण प्रादेशिक पदानुक्रम है। एक प्रदेश समान श्रेणी के प्रदेशों के पदानुक्रम में एक नियत स्थान रखता है। जैसे भारत का सम्पूर्ण क्षेत्र 6 जल संसाधन प्रदेशों में बंटा है। प्रत्येक जल संसाधन प्रदेश में अनेक द्रोणियाँ है। एक द्रोणी कई जलग्रहण क्षेत्रों के मिलने से बनती है एक जलग्रहण क्षेत्र में कई उप-जलग्रहण क्षेत्र होते हैं। एक उप-जलग्रहण क्षेत्र कई वाटरशेड में विभाजित होते है।

    मानवीय बस्तियों का आकार मुख्यतः उनके मध्य अन्तः क्रिया का स्तर निर्धारित करता है। कम जनसंख्या वाली बस्तियों की तुलना में अधिक जनसंख्या वाली बस्तियों के मध्य से सम्बन्धित है। जबकि देहरादून दूरी के कारण दिल्ली के निकट है मुम्बई-देहरादून की तुलना में दिल्ली से अधिक दूर होने पर भी यहाँ स्थानिक पदानुक्रम की अवधारणा का प्रयोग देश के प्रशासन और विकास की योजना का निर्धारण होता है। जैसे-प्रशासनिक उद्देश्य हेतु देश राज्यों और जिलों में बाँट दिया जाता है।

(8) अन्तर्सम्बन्ध की संकल्पना (Concept of Inter-relationship):-

   इसे पार्थिव एकता की संकल्पना के नाम से भी जाना जाता है। विश्व के सभी भौगोलिक तत्व चाहे वे प्राकृतिक हो या मानवीय एक-दूसरे से किसी-न-किसी रूप में सम्बन्धित होते है और किसी भी तत्व का अकेले तथा स्वतंत्र कोई अस्तित्व नहीं है। सभी तथ्य एक-दूसरे को प्रभावित करते है।

    अतः किसी प्रदेश का वास्तविक भृदृश्य वहाँ के सभी तथ्यों के मिले-जुले प्रभावों का परिणाम होता है। किसी प्रदेश में मानव जीवन के विवेचन के लिए वहाँ की भौगोलिक दशाओं का अध्ययन आवश्यक हो जाता है, क्योंकि मानव जीवन उनसे निश्चित रूप से सम्बन्धित तथा प्रभावित होता है। इसी कारण मानव भूगोल को “मानव पारिस्थितिकी” का अध्ययन माना जाता है।

    जर्मन विद्वान फ्रेडरिक रैटजेल ने “पार्थिव एकता के सिद्धान्त” को ही प्रमुखता प्रदान की थी। इनके अलावा ब्लाश, बूंश, डिमांजिया आदि भूगोलविदों ने भी ‘पार्थिव एकता या अन्तर्सम्बन्धों के सिद्धान्त’ को मानव भूगोल का प्रमुख सिद्धान्त माना है।

(9) कालिक परिवर्तन की संकल्पना (Concept of Temporal Change):-

    कालिक परिवर्तन की संकल्पना को ‘क्रियाशीलता का सिद्धान्त’ के नाम से भी जाना जाता है। विश्व में कोई तत्व पूर्णतः स्थायी नहीं है. क्योंकि यह दुनिया ही परिवर्तनशील है। परिवर्तन प्रकृति का नियम है। पर्यावरण के सभी तत्व चाहे वे प्राकृतिक हों या सास्कृतिक, जड़ हो या चेतन सभी परिवर्तनशील हैं। उनमें परिवर्तन की क्रिया निरन्तर क्रियाशील रहती है। बूंश के शब्दों में “हमसे सम्बन्धित प्रत्येक वस्तु परिवर्तित हो रही है, प्रत्येक वस्तु बढ़ रही है या घट रही है। वास्तव में कुछ भी बिना परिवर्तन के नहीं है।” प्रत्येक जीव अथवा वस्तु सभी अपनी उत्पत्ति से विनाश तक जीवन चक्र में परिवर्तित होती रहती है।

(10) सांस्कृतिक भूदृश्य की संकल्पना (Concept of Cultural Landscape):-

    किसी प्रदेश में भू-आकृत्तियों, वनस्पतियाँ, जलाशयों, मानव भूमि उपयोग तथा अन्य प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक तत्वों के सम्पूर्ण योग को भूदृश्य कहा जाता है। तत्वों की प्रकृति के अनुसार उन्हें प्राकृतिक भूदृश्य और सांस्कृतिक भूदृश्य में बाँटा जाता है। भूदृश्य की संकल्पना परम्परागत भूगोल का अभिन्न अंग रही है। जर्मन भाषा में भूदृश्य के समानार्थी ‘लैण्डशाफ्ट’ (Landschaft) शब्द का प्रयोग किया जाता है।

    अमेरिकी भूगोलवेत्ता कार्ल सावर ने भूदृश्य की व्याख्या की है और उन्होंने कहा है कि सम्पूर्ण भूदृश्य में प्राकृतिक तत्वों के समुच्चयिक स्वरूप को प्राकृतिक भूदृश्य और मानवकृत तत्वों के समुच्चयक स्वरूप को सांस्कृतिक भूदृश्य कहा जा सकता है। मानव द्वारा निर्मित गृह, ग्राम, नगर, मार्ग, सड़क, खेत, बाग-बगीने, फसलें, कल-कारखाने, खेल के मैदान, पार्क आदि सांस्कृतिक भूदृश्य के प्रमुख घटक है।

(11) नियतिवाद की संकल्पना (Concept of Determinism):-

     भूगोल में मानव एवं पर्यावरण के बीच संबंधो का अध्ययन हेतु अनेक पद्धति एवं वैचारिक सम्प्रदाय का विकास हुआ। उनमें से एक विचार निश्चवादी के नाम से जाना जाता है। भूगोल में द्वितीय विश्वयुद्ध तक निश्चयवादी विचार का प्रभाव बना रहा। निश्चयवादी विचार का तात्पर्य है- समय का इतिहास, सभ्यता, जीवनशैली, संस्कृति एवं राष्ट्र की सभी धारणाएँ पर्यावरण के द्वारा निर्धारित एवं संचालित होती है।

    भौतिक दशाओं के अनुसार ही मानव के शारीरिक गठन, उसके भोजन, वस्त्र, आवास आदि प्राथमिक आवश्यकताओं, व्यवसायी तथा सामाजिक व सांस्कृतिक क्रियाओं का निर्धारण होता है। इसमें प्रकृति की प्रबलता पर बल दिया है और मनुष्य को प्रकृति का दास माना है। जर्मन भूगोलवेत्ता रैटजेल इस विचारधारा के प्रबल समर्थक थे। इस विद्यारधारा को पर्यावरणवाद या पर्यावरणीय नियतिवाद के नाम से भी जाना जाता है।

(12) सम्भववाद की संकल्पना (Concept of Possibilism):-

    ‘सम्भववाद’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग फ्रांसीसी भूगोलवेत्ता लुसियन फैबे (1922) ने किया था, लेकिन इसका प्रतिपादन इससे पूर्व विडाल डी ला ब्लाश के द्वारा किया जा चुका था। अधिकतर फ्रांसीसी भूगोलवेत्ताओं ने मानव की स्वतन्त्रता और उसके कार्यों को बल दिया तथा नियतिवाद विचारधारा की कटु आलोचना की। ब्लाश के अनुसार, “प्राकृतिक वातावरण मानव को सम्भावनाएँ प्रदान करता है, उसके बदले में मानव अपनी आवश्यकताओं, इच्छाओं तथा क्षमताओं के आधार पर उनका उपयोग करता है।” एक अन्य स्थान पर ब्लाश ने लिखा है, “प्रकृति असंख्य सम्भावनाएँ प्रदान करती है तथा इन सम्भावनाओं का उपयोग मानवीय छांट पर निर्भर करता है।”

(13) नवनिश्चयवाद की संकल्पना (Concept of Neodeterminism):-

    नवनिश्चयवाद, नियतिवाद की संशोधित विचारधारा है, जो व्यावहारिक जगत् के अधिक पास है। इसका प्रतिपादन अमेरिकन भूगोलवेत्ता ग्रिफ्थ टेलर ने किया। टेलर ने इस विचारधारा को ‘वैज्ञानिक निश्चयवाद’ तथा रुको और जाओ निश्चयवाद की संज्ञा दी। टेलर का मानना था कि न तो प्रकृति का मानव पर पूर्ण नियन्त्रण है और न ही मानव का प्रकृति पर। दोनों में एक सक्रिय क्रियात्मक अन्तर्सम्बंध है।

(14) व्यवहारपरक भूगोल की संकल्पना (Concept of Behavioural Geography):-

    यह मानव भूगोल की एक नवीन संकल्पना है। इस विचारधारा का प्रारम्भ अमेरिकन भूगोलवेत्ता विलियम किर्क द्वारा प्रकाशित लेख ‘Historical Geography and the Concept of Behavioural Environment’ के माध्यम से हुआ। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अन्तरविषयक अध्ययन का दौर प्रारंभ हुआ। अन्तरविषयक अध्ययन के परिणाम स्वरूप भूगोल में कई क्रांतियों का आगमन हुआ जिनमें मात्रात्मक क्रांति और आचारपरक या व्यावहारात्मक क्रांति प्रमुख था।

    आचारपरक क्रांति का अभ्युदय मात्रात्मक क्रांति के विरोध में हुआ क्योंकि मात्रात्मक क्रांति ने मानव को पूर्णतः मशीनीकृत बना दिया था। मात्रात्मक क्रांति ने मानवीय चेतना, बौद्धिकता, व्यवहार, सौंदर्य, श्रृंगार रस इत्यादि को कोई महत्व नहीं दिया था। अर्थात मात्रात्मक क्रांति ने भूगोल को एक निर्जीव विषय बना दिया था। इस तरह भूगोल में मनोविज्ञान तथ्यों का अध्ययन प्रारंभ किया गया ताकि भूगोल को मानवीय चेतनाओं से मुक्त विषय बनाया जाय।

(15) अतिवादी भूगोल की संकल्पना (Concept of Radical Geography):-

    अतिवादी भूगोल को उग्र सुधारवाद या अमूल्य चुल परिवर्तनवादी क्रांतिकारी उपागम के नाम से जानते है। अतिवादी भूगोल का जन्म 1960-70 ई० के दशक में USA में हुआ। भूगोल में अतिवाद का उदय मात्रात्मक क्रांति और स्थानिक विश्लेषण के विरोध में हुआ। यह साम्यवादी विचारधारा से प्रभावित है लेकिन इसका उद‌य साम्यवादी या समाजवादी देशों में न होकर पूँजीवादी देश USA में हुआ है।

    अतिवादी भूगोल के विचारधारा को विकसित करने में अमेरिका के क्लार्क विश्वविद्यालय और वहाँ से प्रकाशित होने वाला पत्रिका ‘एंटीपोड’ का विशेष योगदान है। व्यक्तिगत रूप से डेविड हार्वे और जे.आर. पीट जैसे भूगोलवेताओं का योगदान रहा है। इस विचारधारा का विकास मूलतः पूर्व संस्थापित नियमो की नकारात्मक प्रतिक्रिया के रूप में हुआ था जिसका केन्द्र बिन्दु मानव कल्याण से सम्बद्ध सामाजिक मूल्यों का प्रश्न है।

        निष्कर्षतः जा सकता है कि मात्रात्मक कांति, व्यावहारात्मक क्रांति,  प्रत्यक्षवादी दर्शन, भूगोल को मानवीय समस्याओं के समाधान से दूर रखकर इसके आधार को ही समाप्त कर रहे थे लेकिन अतिवादी भूगोल ने सामाजिक समस्याओं का समाधान प्रस्तुत कर भूगोल में नई दृष्टि का सूत्रपात्र किया।

(16) मानवतावादी भूगोल की संकल्पना (Concept of Humanistic Geography):-

    मानवतावादी भूगोल प्रत्यक्षवाद के भी विरुद्ध है क्योंकि प्रत्यक्षवाद उन्हीं तथ्यों का अध्ययन करता है जिसे आँखों से देखा जा सके। लेकिन मानवतावाद एवं कल्याणकारी उपागम वैसे तथ्यों का अध्ययन करता है जिसे मात्र अनुभव किया जा सके। ‘मानवतावादी’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग सन् 1976 में ‘तुआन’ ने किया था।

     मानववाद का सर्वप्रथम आरम्भ 20वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में ब्लाश के नेतृत्व में फ्रांसीसी विद्वानों ने किया था। भौगोलिक अध्ययनों में मानवतावादी दृष्टिकोण का समावेश 1970 के दशक में प्रारम्भ हुआ। मानवतावादी विचारधारा भौगोलिक अध्ययनों में मानवीय जागरूकता, मानवीय चेतना तथा मानवीय क्रियात्मकता को केन्द्रीय एवं सक्रिय भूमिका प्रदान करती है। इस विचारधारा से अनुप्रेरित मानववादी भूगोल अपने भौगोलिक अध्ययनी में मानवीय अनुभवो, मानवीय मूल्यों के आकलन एवं मूल्यांकन की महत्व प्रदान करता है।

(17) कल्याणपरक भूगोल की संकल्पना (Concept of Welfare Geography):-

      मानव भूगोल की इस अभिनव प्रवृत्ति के अन्तर्गत विकसित इस विचारधारा ने मानव भूगोल की एक नवीन शाखा को उद्धृत किया है, जिसे परिवर्तनवादी भूगोल अथवा क्रान्तिकारी भूगोल की संज्ञा दी जा रही है। यद्यपि मानव कल्याणपरक भूगोल से सम्बन्धित अध्ययन सन् 1960 के बाद ही प्रारम्भ हो गये थे, किन्तु सन् 1971 में लन्दन में प्रकाशित ‘एरिया’ शोध पत्रिका में डेविड स्मिथ के क्रान्तिकारी भूगोल पर लेख प्रकाशित हुए। सन् 1977 में इससे सम्बन्धित दो पुस्तके प्रकाशित हुई।

    वर्तमान में मानव कल्याणपरक विचारधारा विकराल रूप लेती जा रही मानवीय समस्याओं, जैसे गरीबी, भुखमरी, अकाल, युद्ध, जाति-भेद, रंग-भेद, नैतिक मूल्यों में गिरावट, पर्यावरण प्रदूषण आदि से सम्बन्धित है। इसके अन्तर्गत हम समाज के कल्याण पर विभिन्न भौगोलिक नीतियों के सम्भावित प्रभावों का अध्ययन करते है। यह संकल्पना ‘सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय’ की अवधारणा पर आधारित है।

20. Human Geography: Definition, Nature and Scope (मानव भूगोल: परिभाषा, प्रकृति और विषय-क्षेत्र)

        Human Geography: Definition, Nature and Scope

(मानव भूगोल: परिभाषा, प्रकृति और विषय-क्षेत्र)



      मानव भूगोल मानव समाज और उनके भौतिक पर्यावरण के बीच संबंधों का अध्ययन है। मानव भूगोल विज्ञान की वह शाखा है जो पृथ्वी पर मानव तथ्यों के स्थानिक वितरण के साथ-साथ विभिन्न मानव समूहों और उनके पर्यावरण के बीच क्षेत्रीय कार्यात्मक अंतःक्रियाओं की जांच करती है। यह एक व्यापक अनुशासन है जिसमें कई तरह के विषय शामिल हैं, जैसे:-

 (i) जनसंख्या : मानव जनसंख्या का वितरण, वृद्धि और विशेषताएँ।

(ii) स्थान : स्थानों की भौतिक और सांस्कृतिक विशेषताएँ।

(iii) संचलन : मानव प्रवास और गतिशीलता के पैटर्न।

(iv) अर्थव्यवस्था : आर्थिक गतिविधियों का स्थानिक वितरण।

(v) संस्कृति : मानव संस्कृतियों की विविधता और उनकी स्थानिक अभिव्यक्ति।

(vi) पर्यावरण : मानव समाज और प्राकृतिक पर्यावरण के बीच अंतःक्रिया।

मानव भूगोल की परिभाषा

        मानव भूगोल, भूगोल की प्रमुख शाखा हैं जिसके अन्तर्गत मानव की उत्पत्ति से लेकर वर्तमान समय तक उसके पर्यावरण के साथ सम्बन्धों का अध्ययन किया जाता हैं। मानव भूगोल की एक अत्यन्त लोकप्रिय और बहु अनुमोदित परिभाषा है- “मानव एवं उसका प्राकृतिक पर्यावरण के साथ समायोजन का अध्ययन।”     

      किसी भी विषय को परिभाषित करना हमेशा मुश्किल होता है। ज्ञान के विस्तार और समाज की प्रगति के साथ समय के साथ विषय की अवधारणा बदलती रहती है। यहाँ कुछ भूगोलवेत्ताओं द्वारा व्यक्त मानव भूगोल की कुछ परिभाषाएँ दी गई हैं।

रैटजेल : “मानव भूगोल मानव समाज और पृथ्वी की सतह के बीच संबंधों का संश्लेषित अध्ययन है”

एलेन सी. सेम्पल : “मानव भूगोल अशांत मनुष्य और अस्थिर पृथ्वी के बीच बदलते संबंधों का अध्ययन है”

विडाल डी ला ब्लाश : “मानव भूगोल पृथ्वी और मानव के बीच अंतर्संबंधों की एक नई अवधारणा प्रस्तुत करता है”

ई. हंटिंगटन : “मानव भूगोल को भौगोलिक वातावरण और मानव गतिविधियों और गुणों के बीच संबंधों की प्रकृति और वितरण के अध्ययन के रूप में परिभाषित किया जा सकता है”

एच. डी. ब्लिज : “मानव भूगोल इस बात का अध्ययन है कि लोग कैसे स्थान बनाते हैं, हम स्थान और समाज को कैसे व्यवस्थित करते हैं, हम स्थानों और अंतरिक्ष में एक-दूसरे के साथ कैसे बातचीत करते हैं, और हम अपने इलाके, क्षेत्र और दुनिया में दूसरों और खुद को कैसे समझ सकते हैं”

रुबेनस्टीन : “मानव भूगोल इस बात का अध्ययन है कि लोग और मानवीय गतिविधियाँ कहाँ और क्यों स्थित हैं”

मानव भूगोल की प्रकृति  

      मानव भूगोल की प्रकृति अत्यधिक जटिल एवं विस्तृत है। जीन ब्रुश के अनुसार जिस प्रकार अर्थशास्त्र का सम्बन्ध कीमतों से, भू-गर्भशास्त्र का सम्बन्ध चट्टानों से, वनस्पति शास्त्र का सम्बन्ध पौधों से है ठीक उसी प्रकार भूगोल का केन्द्र बिन्दु स्थान से है जिसमें कहाँ व क्यों जैसे प्रश्नों के उत्तरों का अध्ययन किया जाता है। मानव भूगोल मानव को केन्द्रीय भूमिका का अध्ययन करता है। फ्रेडरिक रेटजेल, जिन्हें आधुनिक मानव भूगोल का संस्थापक कहा जाता है।

        उन्होंने मानव समाजों एवं पृथ्वी के धरातल के सम्बन्धों के संश्लेषणात्मक अध्ययन पर जोर दिया है। पृथ्वी पर जो भी मानव निर्मित दृश्य दिखाई देते हैं उन सबका अध्ययन मानव भूगोल के अन्तर्गत आता है। इसी कारण मानव भूगोल की प्रकृति में मानवीय क्रियाकलाप केन्द्रीय बिन्दु के रूप में रहते हैं। इस प्रकार मानवीय क्रियाकलापों के विकास (कब, क्यों, कैसे) को भौगोलिक दृष्टि से प्रस्तुत करना ही मानव भूगोल की प्रकृति को दर्शाता है।

      मानव भूगोल विभिन्न प्रदेशों के पारिस्थितिक समायोजन व क्षेत्र संगठन के अध्ययन पर केन्द्रित रहता है। पृथ्वी पर रहने वाले मानव के जैविक, आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक विकास के लिए वातावरण के उपयोग का अध्ययन व वातावरण में किए गए बदलाबों का अध्ययन मानव भूगोल का आधार है। सारांशत: यह कहा जा सकता है कि मानव भूगोल मानव व वातावरण के जटिल तथ्यों के पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन मानव को केन्द्रीय भूमिका के रूप में रखकर अध्ययन कस्ता है।

       मानव भूगोल की प्रकृति को समझने के लिए, निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिए:-

(i) मानव भूगोल, भूगोल की एक प्रमुख शाखा है।

(ii) मानव भूगोल में, मानव और पर्यावरण के बीच के संबंधों का अध्ययन किया जाता है

(iii) मानव भूगोल में, मानव की उत्पत्ति से लेकर वर्तमान समय तक के संबंधों का अध्ययन किया जाता है।

(iv) मानव भूगोल में, मानव की गतिविधियों और पर्यावरण पर उनके प्रभाव का अध्ययन किया जाता है।

(v) मानव भूगोल में, मानव निर्मित चीज़ों का भी अध्ययन किया जाता है।

(vi) मानव भूगोल में, मानव समाज और पर्यावरण के बीच के संबंधों का अध्ययन किया जाता है।

(vii) मानव भूगोल में, मानव समाज के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, और जैविक विकास का अध्ययन किया जाता है।

(viii) मानव भूगोल में, मानव समाज और पर्यावरण के बीच के संबंधों को समझने के लिए, सामाजिक विज्ञान की सभी शाखाओं का अध्ययन किया जाता है।

Human Geography

     इस प्रकार मानव भूगोल की प्रकृति यह है कि यह दोनों – सक्रिय मानव और अस्थिर पृथ्वी सतह की पारस्परिक क्रिया का अध्ययन करना है जहाँ भौतिक वातावरण में मानव के लिए अवसरों की सम्भावनाएँ प्रदान करने के साथ कई सीमाएँ हैं। और इसके जवाब में मानव प्राकृतिक वातावरण को संशोधित करता है और उस वातावरण में समायोजित होता है।

मानव भूगोल का विषय-क्षेत्र

      मानव द्वारा अपने प्राकृतिक वातावरण के सहयोग से जीविकोपार्जन करने के क्रियाकलापों से लेकर उसकी उच्चतम आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किये गये सभी प्रयासों का अध्ययन मानव भूगोल के विषय क्षेत्र के अतर्गत ही आता है। अतः पृथ्वी पर जो भी दृश्य मानवीय क्रियाओं द्वारा निर्मित हैं, वे सभी मानव भूगोल के विषय क्षेत्र के अन्तर्गत सम्मिलित किया जाता हैं।

    पृथ्वी तल पर मिलने वाले मानवीय तत्त्वों को समझने व उनकी व्याख्या करने के लिए मानव भूगोल के अन्य सामाजिक विज्ञानों के सहयोगी विषयों का अध्ययन भी करना पड़ता है। मानव भूगोल के विषय क्षेत्र, उपक्षेत्र तथा अन्य सामाजिक विज्ञानों के सहयोगी विषयों से मानव भूगोल के सम्बन्धों को निम्नलिखित तालिका में प्रस्तुत किया गया है।

मानव भूगोल के क्षेत्र उप-क्षेत्र अन्य सामाजिक विज्ञानों से संबंध
सामाजिक भूगोल व्यवहारवादी भूगोल

सामाजिक कल्याण का भूगोल

सांस्कृतिक भूगोल

लिंग भूगोल

ऐतिहासिक भूगोल

चिकित्सा भूगोल

मनोविज्ञान

कल्याण

अर्थशास्त्र

समाजशास्त्र

मानव विज्ञान

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19. Definition and Scope of ​​social geography (सामाजिक भूगोल की परिभाषा तथा विषय क्षेत्र)

19. Definition and Scope of ​​social geography

(सामाजिक भूगोल की परिभाषा तथा विषय क्षेत्र)



प्रश्न प्रारूप

Q. सामाजिक भूगोल को परिभाषित कीजिए तथा इसका विषय क्षेत्र बताइए।

उत्तर- सामाजिक भूगोल मानव भूगोल की महत्वपूर्ण शाखा है। मानव एक सामाजिक प्राणी है, अतः समाज में घटित होने वाली समस्त घटनाओं का अध्ययन मानव भूगोल की इस शाखा में होता है। समाज में रहकर मानव विभिन्न क्रिया-कलाप करता है। इन क्रिया-कलापों के लिए कुछ कारक भी उत्तरदायी होते हैं। समाज में पाए जाने वाले विभिन्न सामाजिक वर्गों एवं सामाजिक विभिन्नताओं में अन्तर पाया जाता है, अतः सामाजिक भूगोल में इस अन्तर के कारणों का भी अध्ययन किया जाता है।

हैरीसन के अनुसार, “सामाजिक भूगोल समाज का इसके पर्यावरण के सम्बन्ध में एक क्रमिक व्यवहार नहीं था, अपितु सामाजिक भिन्नताओं का एक उत्पत्तिजनक विवरण था क्योंकि वे अन्य कारकों से एवं पृथ्वी सतह के क्षेत्रों में भिन्नताओं से सम्बन्धित हैं।”

डेरियल फोर्ड ने इसमें आदिम समाज का वर्णन बताया है जबकि ग्रिफिथ टेलर ने इसमें विकसित समाज के सामाजिक एवं सांस्कृतिक तथ्य सम्मिलित करने पर बल दिया है।

विषय क्षेत्र-

    सामाजिक भूगोलवेत्ताओं का अध्ययन क्षेत्र केवल भाव वाचक मानव नहीं है तथा न ही जैविक मानव है, किन्तु आदमी, औरतें, बच्चे हैं जो सामाजिक समूहों के सदस्य हैं। इस प्रकार मनुष्य जाति (Mankind) को विभिन्न छोटे व्यक्तिगत समूहों में बांटा जा सकता है तथा सामाजिक भूगोल वेत्ताओं का दायित्व है कि वे उनके जीवन का अध्ययन करें।

     सामाजिक भूगोल में मानव समाज के तथ्य- आवास, विविध स्वरूप, सामाजिक तत्व व तंत्र, राजनीतिक भूगोल, पारितंत्र, विकसित व विकासशील परिवेश प्रारूप तथा उसका मानव पर प्रभाव, मानव के आचार-विचार, आदतें व अर्थतंत्र एवं सामंजस्य जैसे तत्व सम्मिलित हैं। इसमें यह अध्ययन किया जाता है कि पृथ्वी पर बसे हुए लोगों के सामाजिक वर्गों एवं सामाजिक विभिन्नताओं में अन्तर क्यों है? अर्थात् मानव समुदायों, सामाजिक संगठन, परिवार प्रणाली, श्रम विभाजन, रीति-रिवाज एवं सामाजिक प्रथाओं, समुदायों का अध्ययन इसमें किया जाता है।

प्रो. वाटसन के अनुसार यदि भूगोल पृथ्वी के नक्षत्र का विज्ञान है, या पारिस्थितिकी का विज्ञान है अथवा वस्तु वितरण का विज्ञान है तो इसके सामाजिक सामंजस्यों का अध्ययन करने के लिए ऐसी सामाजिक शक्तियों का अध्ययन करना आवश्यक होगा जिनके परिणामस्वरूप उस क्षेत्र विशेष के सामाजिक प्रतिमान उत्पन्न होते हैं। ऐसा अध्ययन करने वाला विज्ञान सामाजिक भूगोल है।

      अब व्यक्तिगत प्रोत्साहन (Individual Motivation) पर अधिक आनुभविक कार्य किया जा रहा है। उदाहरणार्थ स्थानान्तरण के सम्बन्ध में अनेक विस्तृत प्रोत्साहन अध्ययन किए जा रहे हैं जिससे यह पता चले कि प्राचीन एवं वर्तमान स्थानान्तरण में क्या सम्बन्ध है तथा परिवर्तन हुआ है। व्यवहार तथा सामाजिक भूगोल के सम्बन्ध में बहुत कम अध्ययन किया गया है। यह दृढ़ विश्वास किया जाता रहा है कि पर्यावरणीय अथवा आर्थिक क्षेत्र में सामान्यीकरण की व्याख्या को छोड़ दिया गया है।

किर्क तथा अन्य ने 1963 में स्पष्ट किया कि मानव तथ्य पर्यावरण (Phenomenal environment) के विरुद्ध व्यावहारिक पर्यावरण में निवास करते हैं तथा कार्य करते हैं। व्यवहार उन प्रत्युत्तरों एवं मूल्यों से प्रत्यक्षतः जुड़ा हुआ है जो सामाजिक रूप से प्राप्त होते हैं।

      मानव को विशिष्ट संस्कृति का सदस्य मानकर अध्ययन किया जाता है। अतः इसका विस्तृत अध्ययन सामाजिक भूगोल का क्षेत्र है। डेरियल फोर्ड ने सामाजिक भूगोल में केवल आदिम समाज का वर्णन बताया है जबकि ग्रिफिथ टेलर का विचा है कि इसमें विकसित समाज के सामाजिक एवं सांस्कृतिक तथ्य सम्मिलित किए जाने चाहिए।

     वर्तमान समय में सामाजिक भूगोल में मानव समाज की बढ़ती समस्याओं के प्रति चेतना बढ़ती जा ही है। इसी सन्दर्भ में मानव समाज के कल्याण की संकल्पना (Concept of social well being) के अन्तर्गत आने वाले समस्त मानवीय प्रयासों का अध्ययन सामाजिक भूगोल के अन्तर्गत किया जाने लगा है।

18. Delimitation and division of cultural regions (सांस्कृतिक प्रदेशों के परिसीमन तथा विभाजन)

18. Delimitation and division of cultural regions

(सांस्कृतिक प्रदेशों के परिसीमन तथा विभाजन)



Delimitation and division

प्रश्न प्रारूप 

Q. सांस्कृतिक प्रदेशों के परिसीमन तथा विभाजन के प्रमुख आधारों का वर्णन कीजिए।

उत्तर- समान गुण एवं समान प्रकृति वाले क्षेत्र को प्रदेश कहते हैं। इस दृष्टि से सांस्कृतिक प्रदेश धरातल का वह भाग है जिसमें सांस्कृतिक लक्षणों में समानता विद्यमान होती है तथा जिस कारण वह अपने निकटवर्ती प्रदेशों से भिन्न होता है।वस्तुतः मानव संस्कृति का उद्भव किसी सूक्ष्म केन्द्र पर होता है, कालान्तर में इसका प्रसरण समीपवर्ती क्षेत्रों में होता है।कुछ समय उपरान्त जब एक विस्तृत क्षेत्र के अन्तर्गत समान सांस्कृतिक लक्षण, तकनीकी तथा संसाधन उपयोग प्रक्रिया का विस्तार हो जाता है तब इसे सांस्कृतिक प्रदेश कहते हैं।

     स्पेन्सर के अनुसार किसी लघु क्षेत्र में रहने वाले मानवों का प्रभाव तथा उनकी संस्कृति निकटवर्ती क्षेत्रों में फैलकर अपना प्रभाव अंकित करती है। उसके सम्पूर्ण प्रभाव क्षेत्र को सांस्कृतिक प्रदेश कहते हैं।

    सांस्कृतिक प्रदेश में सांस्कृतिक तत्वों की समानता, सांस्कृतिक तत्वों का पारस्परिक सम्बन्ध, तथा उसके द्वारा उत्पन्न परिणामों का विशिष्ट पुंज होता है जिसके आधार पर प्रदेशों का विभाजन किया जाता है। सांस्कृतिक प्रदेशों के विभाजन में सर्वप्रथम महत्वपूर्ण सांस्कृतिक तत्वों का चयन किया जाता है तथा यह देखा जाता है कि कौन-सा सांस्कृतिक तत्व सबसे अधिक एवं सम्पूर्ण क्षेत्र में प्रभावी है। सांस्कृतिक तत्व मानवीय विचारों से सम्बन्धित होते हैं, जिनके ज्ञान के लिए सूक्ष्म निरीक्षण की आवश्यकता होती है।

       वह क्षेत्र जिसमें समान संस्कृति विद्यमान होती है, वह एक सांस्कृतिक प्रदेश कहलाता है। संस्कृति प्रदेशों का उल्लेख सर्वप्रथम विस्लर ने अमेरिकी इण्डियन संस्कृतियों के अध्ययन में प्रस्तुत किया था। इस अध्ययन में विस्लर ने सम्पूर्ण सांस्कृतिक लक्षणों के आधार पर प्रदेशों का विभाजन किया। सांस्कृतिक प्रदेशों के परिसीमन के समय क्षेत्र के भौतिक लक्षणों को भुला दिया जाता है तथा यह बात भी अमान्य कर दी जाती है कि संस्कृति भौतिक संस्कृति के गुणों पर आधारित होती है।

    बोआस के अनुसार धर्म या सामाजिक संगठन या संस्कृति के किसी अन्य पहलू के आधार पर विभाजित किए गए सांस्कृतिक प्रदेश भौतिक संस्कृति पर आधारित सांस्कृतिक प्रदेशों से मेल नहीं खाते हैं।

     समान सांस्कृतिक गुणों के अधिकाधिक सघन संग्रह मिलते हैं, वही उस संस्कृति-प्रदेश का केन्द्र बनता है। केन्द्र से दूर जब प्रदेश की सीमा को खोजा जाता है, तो वहां पर संस्कृति के भावात्मक तथा निषेधात्मक दोनों गुणों पर ध्यान दिया जाता है। सांस्कृतिक प्रदेशों के परिसीमन में निम्नलिखित संस्कृति लक्षणों को आधार बनाया जा सकता है। जैसे-

(i) भौतिक दशाओं,

(ii) बसावट प्रारूप,

(iii) जनसंख्या,

(iv) व्यवसाय,

(v) भाषा,

(vi) शिक्षा,

(vii) धर्म,

(viii) रहन-सहन,

(ix) रीति-रिवाज तथा

(x) आचार-विचार   

     सांस्कृतिक प्रदेशों के परिसीमन के समय निम्न बातों को ध्यान में रखना आवश्यक होता है ताकि सांस्कृतिक प्रदेशों का यथार्थ विभाजन सम्भव हो सके :

1. संस्कृति क्षेत्र मूलतः एक युक्ति है, जिसका प्रयोग सांस्कृतिक भूगोलवेत्ता किसी महाद्वीप या द्वीप में संस्कृतियों के विस्तार को दिखाने के लिए करता है। सांस्कृतिक प्रदेश के लिए किसी विस्तृत परिवेश में एक विशिष्ट जीवन-रीतियां विद्यमान हैं, उनकी जानकारी प्राप्त करना आवश्यक है। इसके लिए संस्कृतियों के बीच समानताओं एवं भिन्नताओं का सूक्ष्म निरीक्षण आवश्यक होता है।

2. सांस्कृतिक प्रदेश वह स्थान है, जहां गुणों का संग्रह पाया जाता है, इस तथ्य को ध्यान में रखना चाहिए। यह नहीं देखना चाहिए कि किसी क्षेत्र में लोग किस प्रकार समृद्धशाली जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

3. सांस्कृतिक प्रदेशों के सीमांकन के समय सीमान्त संस्कृति का सूक्ष्मता से निरीक्षण आवश्यक होता है। सीमान्त संस्कृति वह है, जहां कि पड़ोस के क्षेत्र के गुणों को पहचाना जा सके।

4. कभी-कभी किसी क्षेत्र में इतनी अधिक सांस्कृतिक सादृश्यताएं रहती हैं कि सांस्कृतिक-प्रदेशों के क्रम में उनकी भिन्नताएं छिप जाती हैं। ऐस दशा में किसी सामाजिक वर्ग या पेशे वाले समूह के विशिष्ट व्यवहार को मुख्य आधार माना जाता है।

     संस्कृति मण्डल की लघुतर इकाई संस्कृति-परिमण्डल तथा संस्कृति-परिमण्डल की लघुतर इकाई संस्कृति-प्रदेश है। संस्कृति-परिमण्डल के अन्तर्गत जितनी विषमता संस्कृति लक्षणों में विद्यमान होगी, प्रदेशों की इकाई उतनी ही अधिक होगी।

    प्रदेशों की इकाइयों की संख्या संस्कृति-लक्षणों की विषमता पर निर्भर करती है। इन्हीं संस्कृति लक्षणों के आधार प संस्कृति प्रदेशों का स्वरूप विश्लेषित किया जाता है, परन्तु संस्कृति-लक्षणों की संख्या इतनी अधिक होती है कि सभी का विश्लेषण कना सम्भव नहीं होता है।

      ऐसी दशा में महत्वपूर्ण लक्षणों का वर्णन किया जाता है तथा कम महत्व के संस्कृति-लक्षणों को छोड़ दिया जाता है। संस्कृति-लक्षणों के महत्व का आकलन संस्कृति लक्षणों के अन्तर्सम्बन्ध से लगाया गया है। जो संस्कृति लक्षण व्यावहारिक दृष्टि से अधिक सम्बन्धित होते हैं, उनका महत्व अधिक होता है तथा सांस्कृतिक प्रदेशों के अन्तर्गत उसी का विश्लेषण किया जाता है।

17. Definition and scope of ​​cultural geography (सांस्कृतिक भूगोल की परिभाषा एवं विषय क्षेत्र)

17. Definition and scope of ​​cultural geography

(सांस्कृतिक भूगोल की परिभाषा एवं विषय क्षेत्र)



Definition and scope

प्रश्न प्रारूप 

Q. सांस्कृतिक भूगोल को परिभाषित करते हुए इसके विषय क्षेत्र की विवेचना कीजिए।

उत्तर- सांस्कृतिक पर्यावरण मानव के द्वारा निर्मित किया हुआ भूदृश्य होता है जिसमें मानवीय निवास गृह, आवागमन के साधन, सिंचाई के साधन, परिवहन और संचार के साथन, आर्थिक व्यवसाय, श्रम विभाजन, खेत, कारखाने, बैंक, बीमा संस्थान, साहित्यिक, वैज्ञानिक, औद्योगिक और राजनैतिक संस्थाएं, आदि होती हैं। इनके अतिरिक्त सामाजिक व्यवस्था, श्रम विभाजन, प्रथाएं और जीवन के मूल्य भी इसमें सम्मिलित रहते हैं।

    सांस्कृतिक पर्यावरण के इस निर्माण में मानव की संख्या, उसकी शारीरिक एवं बौद्धिक क्षमता, विकास का स्तर. सांस्कृतिक विरासत, रीति-रिवाज, धार्मिक मान्यताएं, ज्ञान-विज्ञान और तकनीकी उपलब्धियां आधारी कारक रहे हैं। इन कारकों ने सांस्कृतिक पर्यावरण की कई प्रक्रियाओं को जन्म दिया है जिनमें समाजीकरण और आर्थिकीकरण मुख्य हैं।

     समाजीकरण मानव की वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से वह अपने समाज में कुछ निश्चित तौर तरीके अपनाता है तथा अपने को समाज के अनुकूल ढालता है। विभिन्न समाजों के अन्तर्गत मानव अपने जीवन निर्वाह तथा विकास के लिए पर्यावरण के संसाधनों को प्राप्त करने के लिए कार्य करते हैं। मानव की इस प्रक्रिया को आर्थिकीकरण कहते हैं। इसके अन्तर्गत मानव की उत्पादन, वितरण, उपभोग सम्बन्धी मांग-आपूर्ति तथा आय द्वारा समृद्धि से जुड़ी क्रियाएं आती हैं।

     संस्कृति एक ऐसा महत्वपूर्ण तत्व है जो सांस्कृतिक पर्यावरण और सामाजिक क्रिया का निर्धारण करती है। व्यक्ति विशेष का व्यवहार उस संस्कृति द्वारा नियमित होता है जिसमें वह रहता है। संस्कृति व्यक्ति को एक अत्यन्त विस्तृत क्षेत्र के वैकल्पिक व्यवहारों में से एक विशेष प्रकार के व्यवहार का चुनाव करने में सहायक सिद्ध होती है, जो उसकी जैविक विरासत द्वारा उसे अनुमत है। यह एक ऐसी जटिल सम्पूर्णता है जिसके अन्तर्गत ज्ञान, विश्वास, कला, नैतिकता, कानून, प्रथा और कई अन्य क्षमताओं तथा आदतों का समावेश होता है जिसे व्यक्ति ने समाज के एक सदस्य के रूप में अर्जित किया है।

   यद्यपि सम्पूर्ण विश्व की मानव जाति की संस्कृतियों में एक आश्चर्यजनक विभिन्नता दिखाई पड़ती है फिर भी प्रत्येक संस्कृति मानव कार्यकलापों के कुछ ऐसे क्षेत्रों को सम्मिलित करती है जिनको संस्कृति के विविध पक्षों के रूप में जाना जाता है। ये पक्ष आसपास के भौतिक पर्यावरण से अनुकूलन करने के साधन हैं।

    इन पक्षों में प्रौद्योगिकी, अर्थशास्त्र, सामाजिक संगठन, शिक्षा, राजनीतिक संरचनाएं, विश्वास, प्रथाएं, शक्ति का नियंत्रण, कला, संगीत, नाटक, नृत्य, लोकवार्ता, आदि उल्लेखनीय हैं। किसी समाज द्वारा अपने लिए सांस्कृतिक व्यवस्थाओं के विशिष्ट तंत्रों को अपनाने का निर्धारण अधिकांशतः उसका भौतिक पर्यावरण ही करता है जिसमें जलवायु, स्थलाकृति, प्राकृतिक संसाधन और अन्य सम्मिलित होते हैं।

सांस्कृतिक भूगोल की परिभाषा

    धरातल पर सांस्कृतिक भूदृश्यों में विभिन्नता का कारण मानव की सांस्कृतिक प्रक्रियाओं में भिन्नता होना है। मानव प्राकृतिक पर्यावरण में प्राविधिकी ज्ञान, सामाजिक संगठन आदि के द्वारा परिवर्तन करता है और सांस्कृतिक पर्यावरण का निर्माण करता है। प्रत्येक सांस्कृतिक पर्यावरण में भिन्न-भिन्न जीवन तंत्र का विकास होता है। इस जीवन तंत्र का विश्लेषण करना सांस्कृतिक भूगोल का मुख्य उद्देश्य है।

    फ्रांसीसी भूगोलवेत्ता डिमांजियां के अनुसार मानव समाज का अध्ययन पर्यावरण के परिप्रेक्ष्य में करना ही सांस्कृतिक भूगोल है।

   हंटिंगटन के अनुसार सांस्कृतिक भूगोल के अन्तर्गत भौतिक दशाओं एवं मानवीय प्रतिक्रियाओं के पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन किया जाता है। इन्होंने जलवायु को मानव की संस्कृति के उत्थान और पतन का कारण माना है।

    कार्ल ओ सावर के अनुसार सांस्कृतिक भूगोल की वास्तविक योजना सामान्य उद्देश्यों से सम्बन्धित है जो पृथ्वी तल की क्षेत्रीय विभिन्नताओं का अध्ययन करता है। धरातल पर भौतिक पर्यावरण एवं सांस्कृतिक पर्यावरण दोनों विद्यमान हैं, लेकिन सांस्कृतिक पर्यावरण का अध्ययन सांस्कृतिक भूगोल में किया जाता है।

     जार्डन तथा रॉवेन्ट्री के अनुसार सांस्कृतिक भूगोल के अन्तर्गत प्राकृतिक पर्यावरण, जिसमें मानव निवास करता है, की अपेक्षा मानवीय संस्कृति पर विशेष बल दिया जाता है। ये मानवीय संस्कृतियां भिन्न-भिन्न होती हैं, जिससे क्षेत्रीय भिन्नताएं उत्पन्न हो जाती हैं। अतः सांस्कृतिक समूहों की क्षेत्रीय विभिन्नताओं का अध्ययन ही सांस्कृतिक भूगोल है।

     स्पेन्सर तथा थॉमस जूनियर के अनुसार मानवीय प्राविधिक व्यवस्थाओं तथा सांस्कृतिक व्यवहारों, जिसका सम्बन्ध आदिकाल से पृथ्वी के विशिष्ट क्षेत्रों में मानवीय संस्कृति से ही प्रचलित है, का अध्ययन सांस्कृतिक भूगोल है।

सांस्कृतिक भूगोल का उद्देश्य और अध्ययन क्षेत्र

       उपर्युक्त परिभाषा के विश्लेषण के पश्चात प्रमुख तथ्य स्पष्ट होते हैं। जो सांस्कृतिक भूगोल के मूलभूत उद्देश्य है :

1. प्राकृतिक पर्यावरण एवं संस्कृति का प्रभाव मानव जीवन पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। पर्यावरण संस्कृति पर तथा संस्कृति पर्यावरण पर स्पष्ट प्रभाव डालते हैं। फलस्वरूप दोनों में परिवर्तन घटित होता है। इस परिवर्तन का प्रभाव मानव जीवन स्तर पर पड़ता है। अतः आदिकाल से वर्तमान काल तक के इन्हीं तथ्यों का विश्लेषण सांस्कृतिक भूगोल का उद्देश्य है।

2. धरातल पर प्राकृतिक पर्यावरण तथा भौगोलिक पर्यावरण में भिन्नता एवं विषमता दृष्टिगत है। ये भिन्नताएं तथा विषमताएं मानव समाज में मानसिक एवं सांस्कृतिक भिन्नताएं उत्पन्न कर देती हैं। फलस्वरूप किसी विशिष्ट स्थान का मानव ज्ञान एवं प्राविधिकी का विकास करके अपना जीवन स्तर, दूसरे स्थान के मानव की अपेक्षा सुधार लेता है। अतः इसका विश्लेषण सांस्कृतिक भूगोल में किया जाता है।

3. पूर्वज मानव जब गुफाओं अथवा वृक्षों पर रहता था, तब जंगली फलों, आखेट एवं मछुआ कर्म द्वारा जीविकोपार्जन करता था तथा पशुओं की खालों, वृक्षों की छालों एवं पत्तियों से अपना शरीर ढकता था। अर्थात् इस समय मानव पूर्णरूपेण प्राकृतिक पर्यावरण के अनुसार अपने को ढालते थे, परन्तु मानव ने जब कृषि एवं पशुपालन अपनाया, तब प्राकृतिक वातावरण में सांस्कृतिक वातावरण का निर्माण किया।

     वर्तमान समय में, मानव ने आविष्कार शक्ति, संचित अनुभव, अन्य समुदायों से लाभ उठाकर, एक स्थान से दूसरे स्थान पर परिवर्तन कर तथा प्राकृतिक पर्यावरण में यथासम्भव परिवर्तन करके अपनी संस्कृति का विकास किया है। पूर्व मानव तथा आधुनिक मानव के क्रियाकलापों का अध्ययन सांस्कृतिक भूगोल का लक्ष्य है।

4. प्राकृतिक पर्यावरण में अनेक सम्भावनाएं विद्यमान रहती हैं, परन्तु, मानव सम्पूर्ण सम्भावनाओं का पूर्ण उपयोग करे, यह सम्भव नहीं है। यह उपयोग मात्र मानव के सांस्कृतिक विकास पर आधारित होता है। संस्कृति का विकास कम हुआ है तथा इसी क्रम में उसने प्राकृतिक सम्भावनाओं का उपयोग भी किया है। वर्तमान काल में उसका उपयोग हो रहा है। अतीतकाल तथा वर्तमान काल के उपयोग की दर के अन्तर का अध्ययन सांस्कृतिक भूगोल का लक्ष्य है।

5. प्राकृतिक पर्यावरण में सांस्कृतिक विकास की सीमाएं होती हैं। मानव अपने ज्ञान तथा प्राविधिकी कारकों की सहायता से इस सीमा का विस्तार कर लेता है। सांस्कृतिक भूगोल में इन्ही सीमाओं एवं अधिकार क्षेत्रों का अध्ययन किया जाता है।

6. मानव की संस्कृति में निरन्तर परिवर्तन हुआ है। इसके द्वारा सृजित सांस्कृतिक पर्यावरण में धर्म, भाषा, रहन-सहन, वेश-भूषा, आदि में विश्व स्तर पर अनेक भिन्नताएं मिलती हैं। इन सब का अध्ययन सांस्कृतिक भूगोल में किया जाता है।

7. प्राकृतिक पर्यावरण पर मानव का नियंत्रण प्रभावशाली ढंग से हुआ है, परन्तु इसमें कुछ परिवर्तन महत्वपूर्ण तथा तीव्रगामी हैं, जिसे क्रान्ति की संज्ञा प्रदान की जाती है। उदाहरणार्थ- कृषि क्रान्ति, औद्योगिक क्रान्ति, प्राविधिक क्रान्ति, आदि। प्राचीन काल से वर्तमान काल तक, इन क्रान्तियों की भौगोलिक व्याख्या करना सांस्कृतिक भूगोल का मुख्य लक्ष्य है।

सांस्कृतिक अन्तर्सम्बन्ध-

    सांस्कृतिक लक्षणों तथा मानव प्राविधि तंत्रों का विकास विभिन्न संस्कृति क्षेत्रों में होता है जिसका अध्ययन सांस्कृतिक भूगोल के अन्तर्गत किया जाता है। भौतिक पर्यावरण में मानवीय क्रियाओं द्वारा प्राचीन से अर्वाचीन तक अनेक परिवर्तन घटित हुए हैं। पर्यावरण में परिवर्तन के कारण एक विस्तृत संस्कृति तंत्र का विकास होता है।

     मानव एक सक्रिय तत्व है जो अपने गुण द्वारा विभिन्न संस्कृति तत्वों का विकास करता है। मानव की सृजनात्मक एवं विनाशात्मक प्रवृत्ति के द्वारा पर्यावरण में अन्तःक्रिया तथा  सांस्कृतिक स्थानान्तरण होता है। संस्कृति के प्रत्येक तत्व क्रियाशील होते हैं तथा प्रत्येक तत्व में अन्तर्सम्बन्ध होता है। प्रत्येक तत्व के संगठन की क्रिया के फलस्वरूप किसी विशेष संस्कृति में एकीकरण होता है।

     क्रोबर के अनुसार ‘सांस्कृतिक एकीकरण या मानवीय सामाजिक एकीकरण कुछ लचीला होता  है।’

   मानव जीवन तंत्र की उत्पत्ति, पर्यावरण की विभिन्नता तथा नूतन प्रविधि के द्वारा परिवर्तन, आदि का विश्लेषण सांस्कृतिक भूगोल में किया जाता है। नूतन प्रविधि को प्रयोग तथा संस्कृति सृजन में पर्याप्त समय लगता है। संस्कृति का सृजनात्मक स्वरूप, संस्कृति के विभिन्न तत्वों के आपस में सम्मिलन के द्वारा उत्पन्न होता है। ये सभी तत्व एक संगठन के रूप में कार्य करते हैं।

   मेलिनोवस्की के अनुसार संस्कृति एक जटिल यंत्र के समान है, जिसके विभिन्न पक्षों में अन्तर्सम्बन्ध है तथा उन्हें संगठित रूप में कार्य करना पड़ता है। यदि ऐसा नहीं होता तो वह व्यर्थ सिद्ध होता है। संस्कृति का अध्ययन भौतिक तथा जैविक पर्यावरण के अन्तर्सम्बन्धों के सन्दर्भ में होता है।

    स्पेन्सर ने स्पष्ट किया कि किसी संस्कृति का अध्ययन भौतिक जैविक वातावरण के अन्तर्सम्बन्धों के परिप्रेक्ष्य में होता है। विभिन्न मानव समूह अथवा मानव जनसंख्या का अध्ययन, उसका सामाजिक संगठन, विशेष अवस्था प्राप्त प्रविधि और इनके कलात्मक एवं गुणात्मक विकास के रूप में किया जाता है।

     स्थानान्तरणीय प्रवृत्ति के कारण सामाजिक संगठन में विकास की नवीन विधि का उद्भव हुआ है। वर्तमान में अपनी बौद्धिक क्षमता के कारण अधिकांश प्राकृतिक पर्यावरण को मानव ने अपने अधीन कर लिया है। मानव समुदायों में नवीन प्रविधियों के विकास के कारण चेतन तथा अचेतन पदार्थों का समुचित उपयोग करके विकसित मानवीय पर्यावरण का विकास करता है।

    मानव ने संचयात्मक तथा प्रसरण की प्रवृत्ति के फलस्वरूप नवीन प्रविधि का विकास विभिन्न पर्यावरण में किया है। मानव के प्रसार के कारण विभिन्न संस्कृतियों का प्रादुर्भाव हुआ है। वर्तमान संस्कृति ऐतिहासिक धरोहर है, जो विभिन्न मानव समूहों द्वारा विभिन्न कालों तथा स्थानों में अनुभव के सापेक्ष प्रयोग से उद्भूत हुई है। सभी संस्कृतियों में कुछ न कुछ सम्बन्ध अवश्य पाया जाता है। सांस्कृतिक भूगोलवेत्ता का यह कर्तव्य होता है कि संस्कृति के समस्त भौगोलिक तथ्यों के अन्तर्सम्बन्धों का अध्ययन करें।

    जार्डन तथा रॉवेन्टी ने स्पष्ट किया कि सांस्कृतिक भूगोलवेत्ता संस्कृति के समस्त तत्वों तथा क्षेत्रीय अन्तर्सम्बन्धों को महत्व देता है। बिना क्षेत्रीय विषमताओं एवं अन्तर्सम्बन्धों के अध्ययन के संस्कृति की प्रक्रिया को समझना अत्यन्त कठिन है। सांस्कृतिक तत्व परस्पर किस प्रकार सम्बन्धित हैं, बिना इसके समझना असम्भव है। सांस्कृतिक अन्तर्सम्बन्ध के स्पष्टीकरण के लिए, उन कारणों की व्याख्या करना आवश्यक है जिससे सभ्यता, संस्कृति व सामाजिक विकास होता है। स्पेन्सर तथा थॉमस (1973) ने चा स्वतंत्र आधा तथा इनके मध्य छः अन्तर्सम्बन्धों की व्याख्या की है।

चित्र : कार्यात्मक अवधारणाएं तथा अन्तर्सम्बन्ध

        स्पेन्सर के अनुसार सांस्कृतिक भूगोल का चार अवधारणात्मक अस्तित्व निम्न है :

1. भौतिक-जैविक पर्यावरण-

      इसमें क्षेत्रीय परिवर्तन तथा मानव की आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायक संसाधन : मिट्टी, जलवायु, वनस्पति, खनिज, आदि का अध्ययन किया जाता है। मानव समुदाय इसका उपयोग करके अपने सन्ततियों की वृद्धि करता है।

2. जनसंख्या-

     मानव समुदायों द्वारा अधिकृत क्षेत्र जिसके संसाधनों का उपयोग करता है, समूहों का विकास, ह्रास तथा उसकी संख्या का अध्ययन किया जाता है।

3. सामाजिक संगठन-

        पूर्वज मानव से वर्तमान मानव की आवश्यकताओं की पूर्ति में प्रयुक्त प्रविधि, सामाजिक इकाइयों : परिवार, जाति, वर्ग तथा संस्था, आदि की संगठनात्मक संरचना तथा श्रम विभाजन का अध्ययन इसके अन्तर्गत किया जाता है।

4. प्रविधियां –

       इसमें नूतन एवं प्राचीन प्रविधियां जिसका प्रयोग मानव भौतिक एवं सांस्कृतिक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु करता है, का अध्ययन किया जाता है।

15. What is religion? Characteristics of religion and description of Indian religions (धर्म क्या है? धर्म की विशेषताएँ तथा भारतीय धर्मों का विवरण)

15. What is religion? Characteristics of religion and description of Indian religions

(धर्म क्या है? धर्म की विशेषताएँ तथा भारतीय धर्मों का विवरण)



  What is religion

     धर्म शब्द का अर्थ है ‘धारणा’। धारणा से तात्पर्य उन आदर्शों की अन्तरंग प्रतिष्ठापना से है जो व्यक्ति और समाज को श्रेष्ठता और सद्भावना की दिशा में प्रेरित करते हैं। धर्म का दूसरा अर्थ है अभ्युदय और निश्रेयस अर्थात् उन गतिविधियों को अपनाया जाना जो कल्याण और प्रगति का शालीनता युक्त पथ प्रशस्त करती हैं।

      स्मृतिकारों ने धर्म को कर्तव्यपालन के अर्थ में लिया है। सामान्य अर्थों में धर्म अलौकिक शक्ति पर विश्वास है। प्रत्येक समाज व समुदाय में धर्म किसी न किसी रूप में अवश्य पाया जाता है। धर्म जीवन को सम्पूर्णता प्रदान करने की एक विधि है।

डॉ. राधाकृष्णन के अनुसार, जिन सिद्धान्तों के अनुसार हम अपना दैनिक जीवन व्यतीत करते हैं तथा जिनके द्वारा हमारे सामाजिक सम्बन्धों की स्थापना होती है, वही धर्म है। यह जीवन का सत्य है और हमारी कृति को निर्धारित करने वाली शक्ति है।”

जेम्स फ्रेजर के अनुसार, “धर्म से मैं मनुष्य से श्रेष्ठ उन शक्तियों की सन्तुष्टि या आराधना समझता हूं जिसके सम्बन्ध में यह विश्वास किया जाता है कि प्रकृति और मानव जीवन को मार्ग दिखलाती व नियन्त्रित रखती है।

प्रसिद्ध समाजशास्त्री मैलिनोवस्की के अनुसार, धर्म क्रिया का एक तरीका है, साथ ही विश्वासों की एक व्यवस्था भी। धर्म समाजशास्त्रीय घटना के साथ-साथ एक व्यक्तिगत अनुभव भी है।” इस परिभाषा से स्पष्ट है कि धर्म विश्वासों की एक व्यवस्था है। यह विश्वास आत्मा, परमात्मा या अलौकिक शक्ति आदि पर हो सकता है। तथा व्यवस्था का आशय आराधना, पूजा-पाठ, प्रार्थना या भक्ति से है।

ईमाइल दुर्खीम के अनुसार, “धर्म पवित्र वस्तुओं से सम्बन्धित विश्वासों एवं आचरणों की समग्रता है, जो इन पर विश्वास करने वालों को एक नैतिक समुदाय के रूप में संयुक्त करती है।”

जॉनसन के अनुसार, “धर्म कम या अधिक रूप में उच्च आलौकिक क्रम या प्राणियों, शक्तियों, स्थानों एवं अन्य तत्वों के सम्बन्ध में विश्वास व व्यवहारों की एक स्थिर प्रणाली है।”

स्वामी विवेकानन्द के अनुसार, “धर्म वह है जो मानव को इस संसार एवं परलोक में आनन्द की खोज के लिए प्रेरित करता है।”

मजूमदार एवं मदान के अनुसार, “धर्म किसी आलौकिक और अतीन्द्रिय शक्ति के भय का एक मानवीय प्रत्युत्तर है। यह व्यवहार की अभिव्यक्ति अथवा परिस्थितियों से किए जाने वाले अनुकूलन का वह रूप है, जो आलौकिक शक्तियों की धारणा से प्रभावित होता है।”

धर्म की विशेषताएँ-

       धर्म की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं।:-

(1) अतिमानवीय व अलौकिक शक्ति पर प्रभाव:-

    धर्म में यह स्वीकार किया जाता है कि निश्चित रूप से कोई न कोई ऐसी अलौकिक शक्ति है जो मानव शक्ति से श्रेष्ठ व मानव से परे रहकर विश्व का संचालन करती है।

(2) पवित्रता की धारणा:-

    धर्म पवित्र वस्तुओं से सम्बन्धित विश्वासों एवं क्रियाओं की एक समन्वित व्यवस्था है अर्थात् धार्मिक विश्वासों, वस्तुओं, स्थानों, आदि में पवित्रता का भाव पाया जाता है।

(3) धार्मिक क्रियाकलाप:- 

    प्रत्येक धर्म में कुछ न कुछ क्रियाकलाप अवश्य पाए जाते हैं जिन्हें पूर्ण करके व्यक्तियों को आत्मिक सुख प्राप्त होता है।

(4) भय की धारणा:-

   धर्म में भय की धारणा होती है, इसलिए व्यक्ति धार्मिक क्रियाकलापों के माध्यम से पारलौकिक या अलौकिक शक्ति को प्रसन्न करने का प्रयास करता है तथा धार्मिक क्रियाकलापों में ऐसे कार्य करता है जिससे अलौकिक शक्ति द्वारा उसकी इच्छाएं पूर्ण हों और वह ऐसा कोई भी कार्य नहीं करना चाहता जो धर्म के विरुद्ध हो।

(5) धर्म वैयक्तिक व सामाजिक:-

    धर्म व्यक्तिगत अनुभवों के साथ-साथ सामाजिक अनुभवों से भी सम्बन्धित होता है।

(6) तर्क का अभाव:-

      धर्म का आधार विश्वास है, अतः इसमें तर्क का कोई स्थान नहीं होता है और न ही वैज्ञानिक आधार पर इसे सही या गलत बताया जा सकता है।

(7) सार्वभौमिकता:-

    धर्म प्राचीन समय से ही किसी न किसी रूप में रहा है। इसका रूप परिवर्तन अवश्य हो सकता है।

भारतीय धार्मिक संरचना

      भारतीयों के जीवन में धर्म का प्रमुख स्थान रहा है। वह जन्म से मृत्यु तक धार्मिक संस्कारों से आबद्ध है। हमारे अनेक धार्मिक कृत्य, रीति-रिवाज व स्तुतियाँ, आदि वैदिक काल से चले आ रहे हैं और आज भी हमारे धर्म सम्बन्धी कार्य वेदों के अनुसार होते हैं। भारत में धार्मिक स्वतन्त्रता प्राचीन काल से रही है, यही कारण है कि भारत-भू पर विविध धर्मों एवं धार्मिक विचारों व सम्प्रदायों का प्रादुर्भाव समय के साथ होता रहा है। इसके साथ ही बाहर से आए धर्म एवं धार्मिक विचारों का परिष्कार भी हुआ। भारत के प्रमुख धर्म निम्नलिखित हैं:

(1) हिन्दू धर्म देश का सबसे प्रमुख धर्म है। अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के अनुसार, हिन्दू वह है जो भारत में उत्पन्न किसी धर्म को मानता है तथा जो भारत में भारतीय माता-पिता की सन्तान है। इस महासभा के अनुसार सनातनी, आर्य समाजी, जैन, सिख, बौद्ध, ब्राह्मण, आदि सभी हिन्दू कहे जा सकते हैं। यह सत्य ही कहा है कि भाषा भारतीय लोगों को भौगोलिक समुदायों में बांटती है, धर्म उन्हें समान्तर परतों में बांटता है।

         हिन्दू धर्म की तीन विशेषताएँ हैं:-

(i) एक सर्वोच्च सत्ता तथा अनेक छोटे देवताओं में प्रत्येक हिन्दू धर्मावलम्बी पूर्ण आस्था रखता है।

(ii) इसकी प्रवृत्ति सहनशीलता की है तथा कोई भी हिन्दू देवी या देवता विशेष की आराधना कर सकता है, उस पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है।

(iii) यह कर्म, पुनर्जन्म और मृत्यु के बाद मोक्ष मिलने में विश्वास रखता है। गीता की यह सूक्ति ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचनः’ (Action is the duty, Reward is not the concern)

      सभी भारतीयों में मान्यता पाती है।

    हिन्दू धर्म की अपनी एक विशेष सामाजिक व्यवस्था होती है जिसके मुख्य तत्व जाति, समुदाय, संयुक्त परिवार प्रणाली, बाल-विवाह की प्रथा, सार्वभौमिक विवाह प्रथा, आदि हैं।

भारत में धर्म के अनुसार जनसंख्या का वितरण- 2011

क्रम संख्या धार्मिक समुदाय प्रतिशत
1.

2.

3.

4.

5.

6.

7.

हिंदू

मुस्लिम

ईसाई

सिख

बौद्ध

जैन

अन्य

79.8

14.2

2.3

1.7

0.7

0.4

0.9

कुल योग 100.00

(2) मुस्लिम (Muslims) या इस्लाम धर्म का जन्म अरब देश में हुआ, किन्तु यह भारत में 12वीं शताब्दी के लगभग उत्तर-पश्चिम की ओर आने वाले आक्रमणकारियों द्वारा लाया गया। अतः इसका विस्तार उत्तर-पश्चिमी भारत तक ही सीमित रहा, किन्तु शनैः-शनैः यह गंगा की घाटी में फैल गया तथा पश्चिम बंगाल में भी इसने अपनी जड़ें जमा लीं। प्रायद्वीप भारत में यह अधिक नहीं फैल सका और इसलिए वहां 15% से अधिक मुस्लिम नहीं हैं। मुस्लिम अधिकतर पश्चिमी भागों में पाए जाते हैं।

(3) ईसाई (Cristians):

       सीरिया के ईसाई जो ईसा शताब्दी के प्रारम्भिक काल में ट्रावनकोर-कोचीन में आ बसे थे, वह अन्य मिशनरी ईसाइयों से भिन्न हैं। रोमन, कैथोलिक, ऐंग्लिकन तथा बैपटिस्ट ईसाइयों की संख्या ही भारत में अधिक है। ईसाई धर्म का विस्तार भारत में पहाड़ी जातियों तथा हिन्दुओं की निम्न जातियों में अधिक हो पाया है। इस समय ईसाइयों का केन्द्रीकरण विशेषतः केरल, गोआ, दमन, दीव, पाण्डिचेरी, नगालैण्ड, तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में ही है।

(4) सिख (Sikhs):-

       इस धर्म का जन्म 16वीं शताब्दी में वैष्णव धर्म से पृथक् होकर हुआ। यह धर्म प्राचीन हिन्दू धर्म को एक शुद्ध धर्म के रूप में अपनाने का ही प्रयास था जिसने बहु-देवों, मूर्ति पूजा, जाति प्रथा, तीर्थयात्रा और पुनर्जन्म का खण्डन किया। मुसलमानों की राजनीतिक क्रूरता तथा हिन्दुओं की सामाजिक क्रूरता के फलस्वरूप ही सिक्खों ने एक शान्तिमय पथ के स्थान पर एक सैनिक धर्म का अवलम्बन किया।

      इस धर्म के दो सिद्धान्त हैं- लम्बे बाल रखना तथा धूम्रपान न करना। इनके पास सदैव कच्छा, कृपाण, कंघी, कड़ा और केश रहते हैं जिनसे इन्हें अन्य धर्मावलम्बियों के बीच सरलतापूर्वक पहचाना जा सकता है। यह प्रारम्भ में अविभाजित पंजाब में केन्द्रित थे। अब पंजाब, हरियाणा, उत्तरी गंगा नहर (राजस्थान एवं दिल्ली व चण्डीगढ़) में अधिक फैले हैं। ये बड़े हट्टे-कट्टे होते हैं और इसलिए ये भारतीय सेना में बड़ी संख्या में मिलते हैं।

(5) जैन (Jains):-

   जैन धर्म हिन्दू धर्म की ही एक शाखा मानी जाती है। यद्यपि जैन धर्मावलम्बी हिन्दू धर्म के सिद्धान्तों को मानते हैं, किन्तु यह जीवों के प्रति अहिंसा पर अधिक जोर देते हैं। ये अधिकांशतः व्यापारी और धनवान होते हैं तथा भारत में दूर-दूर तक फैले हैं।

(6) बौद्ध (Buddhist):-

     बौद्ध धर्म भी हिन्दू धर्म की ही एक शाखा है। इसे गौतम बुद्ध ने छठी शताब्दी ई. पू. में चलाया था। इसका सबसे अधिक प्रचार गंगा की घाटी में ही हुआ। यह धर्म नीति पर अवलम्बित है। यद्यपि भारत में यह धर्म 10वीं शताब्दी के बाद से लोप हो गया, किन्तु आज महाराष्ट्र, जम्मू-कश्मीर, त्रिपुरा, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, असम तथा सिक्किम के पहाड़ी भागों में इनके अनुयायी मिलते हैं।

(7) पारसी (Zoroastrian):–

   पारसी लोग भारत में 7वीं शताब्दी में फारस के मुस्लिम धर्म की क्रूरता से बचने के लिए आए और भारत के पश्चिमी तटीय भागों में बस गए। यह लोग सूर्य और अग्नि की पूजा करते हैं। यह अधिकांशतः व्यापारी उद्योगी हैं। इनका सबसे अधिक केन्द्रीकरण मुम्बई नगर में है।

निष्कर्ष:

   उपर्युक्त वर्णन के आधार पर कहा जा सकता है कि भारत के निवासियों का सम्बन्ध किसी-न-किसी धर्म से है। अधिकांश धर्मों का सम्बन्ध तीर्थ स्थानों से बताया जाता है। उदाहरणार्थ, काशी धर्म और संस्कृति से सम्बन्धित है। यहाँ अनेक हिन्दू मन्दिर हैं। हिन्दुओं के लिए गंगा सबसे पवित्र नदी है जिसके तट पर मृत्यु अथवा अन्त्येष्टि क्रिया से आत्मा को शान्ति प्राप्त होना माना जाता है।

      अलीगढ़, हैदराबाद और देवबन्द के विश्वविद्यालय मुस्लिम संस्कृति के केन्द्र हैं। सिखों के पंजाब में ननकाना साहब और अमृतसर तथा बिहार में पटना साहिब, जैनियों के राजस्थान (महावीरजी, दिलवाड़ा, रणकपुर, ऋषभदेव), गुजरात (पालीताना, गिरनार) बिहार (सम्मेद शिखर) तथा पारसियों के मुम्बई नगर में सांस्कृतिक केन्द्र हैं। बौद्ध गया (बिहार), सारनाथ (उत्तर प्रदेश), सांची (मध्य प्रदेश) में बोध के विहा हैं। बद्रीनाथ, केदारनाथ, जगन्नाथपुरी, द्वारिका, रामेश्वरम्, वाराणसी, कांजीवम् सभी हिन्दुओं के लिए पूज्य स्थान हैं।


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16. Description of sources and characteristics of Hindu religion (हिन्दू धर्म के स्रोत तथा लक्षणों का विवरण)

16. Description of sources and characteristics of Hindu religion

(हिन्दू धर्म के स्रोत तथा लक्षणों का विवरण)



    characteristics of Hindu religion   

     प्रत्येक धर्म का कोई न कोई आधार होता है। यह भी कहा जा सकता है कि धर्म के आधार व स्रोत एक नहीं बल्कि अनेकानेक हैं।

मनु के अनुसार वेद, स्मृति, आचार तथा आत्म सन्तुष्टि, आदि धर्म के चार आधार हैं।

याज्ञवल्क्य के अनुसार वेद, स्मृति, सदाचार, अपनी आत्मा अनुकूल कार्य तथा उचित संकल्प से उत्पन्न हुई इच्छा ये सब धर्म के मूल कहे गए हैं।

विशिष्ट धर्म सूत्र के अनुसार, “श्रुति स्मृति विहितो धर्मः तदालाभे शिष्टाचारः प्रमाणम्” अर्थात् वेद और स्मृतियों में जो विहित है वह धर्म है, उनके अभाव में शिष्टाचार प्रमाण हैं।”

भीष्म के अनुसार, “वेद, स्मृति और सदाचार धर्म के स्वरूप को लक्षित करने वाले लक्षण हैं।”

      सामान्यतः हिन्दू धर्म के निम्नांकित स्रोत हैं:

(1) वेद:-

     वेद हिन्दू धर्म का मूल ग्रन्थ है। इन्हें श्रुति भी कहा जाता है। हिन्दू धर्म ग्रन्थों में वेदों को प्राचीनतम माना जाता है। केवल हिन्दू धर्म ग्रन्थों के ही अनुसार नहीं अपितु इतिहासकारों के विचार से भी ॠग्वेद इस पृथ्वी पर उपलब्ध साहित्य में प्रथम ग्रन्थ है। मनु के अनुसार, “वेदोलिखो धर्ममूल” अर्थात् वेद धर्म के मूल हैं।

       चाणक्य ने लिखा है “न वेदो ब्राह्मो धर्मः” अर्थात् धर्म वेद से बाहर नहीं होता। महाभारत में कहा गया है “वेदोक्तः परमो धर्मः” अर्थात् वेदों में कहा गया धर्म ही सर्वश्रेष्ठ धर्म है। ब्रह्मा जी ने लिखा है कि वेद ही मेरे उत्तम नेत्र हैं, वे ही मेरे परम बल हैं, वेद ही मेरे परम आश्रय तथा वेद ही मेरे सर्वोत्तम उपास्य देव हैं।” वेदों से ईश्वरीय ज्ञान का प्रतिपादन होता है। इसलिए प्रत्यक्ष एवं अनुमान से जो प्राप्त नहीं हो सकता है, वह ज्ञान वेदों से प्राप्त किया जा सकता है।

(2) स्मृति:-

    स्मृति का अर्थ है याद करना। स्मृतियों के अन्तर्गत देश एवं काल के अनुसार श्रुतियों की व्याख्या एवं सार संयोजित है। श्रुतियों पर आधारित होने के कारण स्मृतियाँ भी प्रामाणिक मानी जाती हैं। स्मृतियाँ वेदों का ही अनुसरण करती हैं। मनु और याज्ञवल्क्य ने वेदों और स्मृतियों को धर्म का मूल आधार कहा है।

(3) सदाचार:-

     धर्म सूत्रों में इसे शील, शिष्टाचार अथवा सामयाचारिक तथा स्मृतियों में इसे आचार अथवा सदाचार कहा गया है। मनु याज्ञवल्क्य, गौतम, वशिष्ट, आपस्तम्ब, आदि ने वेद और स्मृति के साथ-साथ सदाचार को भी धर्म का मूल स्रोत कहा है। मनु ने निर्देश दिया है कि “श्रुति और स्मृतियों में भली-भांति बताए गए अपने कर्मों के अनुष्ठान में धर्ममूलक सदाचार का आलस्य रहित होकर पालन करें।”

(4) अन्तःकरण:-

    धर्म का अन्तिम स्रोत व्यक्ति का अन्तःकरण कहा गया है अर्थात् धर्म का निर्णय स्वयं व्यक्ति के अन्तःकरण से होता है। व्यक्ति को अपने प्रत्येक कर्म का फल स्वयं भोगना पड़ता है। अतः धर्मशास्त्रों के निर्देश एवं अनुमोदन के बाद भी किसी कर्म के अन्तिम निर्णय का अधिकार व्यक्ति का होना ही चाहिए। जिन कार्यों को व्यक्ति का अन्तःकरण सहमति दे केवल उन्हीं को सम्पन्न करना चाहिए। इसके विपरीत जिन्हें अन्तःकरण अनुमति न दे, भले ही धर्मशास्त्र निर्देश व अनुमति दे, नहीं करना चाहिए।

धर्म के लक्षण:–

       मनु ने धर्म के दस लक्षणों का उल्लेख किया है- धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रिय निग्रह, धी, विद्या, सत्य, अक्रोध।

धृतिः क्षमाः दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रिय निग्रहः।

धीर्विद्याः सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥

(1) धृति:-

     धृति का अर्थ है धैर्य। धैर्यवान व्यक्ति को ही धीर कहा जाता है। गीता में धृति के सात्विकी, राजसी और तामसी तीन भेद किए गए हैं। सांसारिक बन्धनों में न बंधकर मन, प्राण और इन्द्रियों की क्रियाओं को धारण करने को सात्विक धृति कहते हैं।

     फल की इच्छा रखते हुए धर्म, अर्थ, काम को धारण करना राजसी धृति कहलाता है। जब व्यक्ति दुर्बुद्धि होकर निन्दा, भय, चिन्ता, दुख एवं उन्मत्तता को नहीं छोड़ता तो उसे तामसी धृति कहते हैं। महाभारत में कहा गया है कि सुख या दुख प्राप्त होने पर मन में विचार न होना धृति है।

(2) क्षमा:-

   महर्षि वाल्मीकि के अनुसार व्यक्ति का सच्चा आभूषण क्षमा है। क्षमा ही दान, सत्य, यज्ञ, यश तथा धर्म है। महाभारत में कहा गया है कि क्षमा धर्म है, यश है, वेद है, शास्त्र है, ब्रह्म है, सत्य है, भूत है, भविष्य है, तप है तथा शौच है।

(3) दम:-

    दम से तात्पर्य है बाह्य इन्द्रियों का संयम जिसके लिए अन्तःकरण को संयमित करना पड़ता है। गीता में कहा गया है कि जो व्यक्ति मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त होकर कर्मेन्द्रियों का संयम करता है, वह श्रेष्ठ है।

(4) अस्तेय:-

    अस्तेय का अर्थ स्तेय अथवा चोरी के त्याग से होता है। इसके अन्तर्गत वे सभी वस्तुएं आती हैं जो शास्त्रों के द्वारा ग्रहणीय कही गई हैं। इसी प्रकार अस्तेय के अन्तर्गत मन, वचन और कर्म तीनों से किए जाने वाले स्तेय का त्याग सम्मिलित होता है।

(5) शौच:-

    शौच से तात्पर्य पवित्रता है। शौच बाह्य एवं आन्तरिक दो प्रकार की होती है। शरीर के विभिन्न अंगों को मिट्टी एवं जल आदि के द्वारा शुद्ध करना बाह्य शौच कहलाता है जबकि मैत्री, करुणा, सहानुभूति, तप, सत्य, आदि वृत्तियों द्वारा मन को निर्मल रखना आन्तरिक शौच कहलाता है।

(6) इन्द्रिय निग्रह:-

    इन्द्रिय निग्रह से तात्पर्य इन्द्रियों को उनके विषयों से हटाना है। गीता में कहा गया है कि बुद्धिमान पुरुष के मन को भी ये इन्द्रियाँ बलात विषयों की ओर खींच लेती हैं। इसलिए बुद्धि को स्थिर रखने के लिए इन्द्रियों को वश में रखना आवश्यक है।

(7) धी:-

   धी का अर्थ विवेक बुद्धि है। विवेक बुद्धि व्यक्ति को वस्तुओं एवं विषयों के गुण-दोषों का ज्ञान कराती है ताकि वह गुणों का ग्रहण तथा दोषों का परित्याग कर सके। महाभारत में कहा गया है कि बुद्धि ही धन की प्राप्ति कराती है, बुद्धि से मनुष्य को कल्याण प्राप्त होता है।

(8) विद्या:-

    भर्तृहरि के अनुसार विद्या मनुष्य का सबसे बड़ा सौन्दर्य है, उसका छिपा हुआ गुप्त धन है। विद्या भोग देने वाली है, यश और सुख प्रदान करने वाली है। विद्या गुरुओं का भी गुरु है। परदेश में विद्या ही बन्धुजन है, विद्या ही परम देवता है। विद्या ही राजाओं में सम्मान्य है, वही धन है। इसलिए विद्या रहित पुरुष पशु है।

(9) सत्य:-

    सत्य की महिमा का वर्णन प्रत्येक जगह मिलता है। महाभारत में कहा गया है कि “सत्य ही धर्म, तप और योग है। सत्य ही सनातन ब्रह्म है, सत्य को ही परम यज्ञ कहा गया है तथा सब कुछ सत्य पर ही टिका हुआ है।” ऋग्वेद में कामना की गई है कि “सत्य वाणी के सहारे आकाश टिका है, सम्पूर्ण संसार के प्राणी उसी पर आश्रित हैं, उसी से सूर्य का उदय होता है, उसी से जल निरन्तर बहता है वही सत्य हमारी रक्षा करता है।”

(10) अक्रोध:-

     अक्रोध का अर्थ है कारण होते हुए भी क्रोध न करना। गीता में कहा गया है कि “क्रोध से अविवेक उत्पन्न होता है, अविवेक से स्मरण शक्ति भ्रमित होती है, स्मृति के भ्रमित होने से बुद्धि अर्थात् ज्ञानशक्ति का नाश होता है औ बुद्धि के नाश होने से व्यक्ति अपने श्रेय साधन से गि जाता है।” अतः व्यक्ति को अक्रोधी ही बनना चाहिए।


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14.. Explain habitat as a cultural expression/ सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के रूप में निवास स्थान को समझाइए।

14. Explain habitat as a cultural expression.

(सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के रूप में निवास स्थान को समझाइए।)

अथवा

विश्व के विभिन्न भागों में निवास करने वाली प्रतिनिधि प्रजातियाँ



         मानव जीवन विभिन्न परिस्थितियों द्वारा प्रभावित होता है। विभिन्न क्षेत्रों में पाई जाने वाली परिस्थितियाँ भिन्नता वाली होती हैं। अतः वहाँ का मानव-जीवन अन्य क्षेत्रों से भिन्न होता है। मानव निवास की दृष्टि से निम्नांकित क्षेत्र हैं:-

(i) विषुवतरेखीय क्षेत्र

(ii) उष्ण मरुस्थलीय क्षेत्र

(iii) घास के मैदान

(iv) टुण्ड्रा प्रदेश

       इन प्रदेशों में निवास करने वाली प्रतिनिधि प्रजातियों का विवरण नीचे दिया जा रहा है:

(1) पिग्मी:-

     पिग्मी मध्य अफ्रीका के कांगो बेसिन में जायरे व कांगो गणराज्यों एवं गैबन व कैमरून में पाए जाते हैं। इनकी मुख्य बस्तियाँ छोटे-छोटे समूहों में घने वनों के आसपास पाई जाती हैं। पिग्मी काले, नाटे कद के नीग्रिटो प्रजाति के लोग हैं। इनका कद 1 से 1.5 मीटर तक होता है। इसीलिए इन्हें बौने कहा जाता है। इनकी शारीरिक रचना में छोटा कद, भार कम, रंग काला अथवा चाकलेटी, पैर लम्बे, बाल छोटे और छल्लेदार गुच्छों वाले, होठ लटकते हुए मोटे, नथुने चौड़े, नाक चपटी और ठोढ़ी पतली होती है।

     पिग्मी स्थायी घर बनाकर नहीं रहते हैं। अधिकांश पिग्मी जंगली जीवों से सुरक्षा की दृष्टि से अपनी झोपड़ियाँ वृक्षों पर ही बनाते हैं। ये झोपड़ियाँ पेड़ की टहनियों, पत्तों एवं घास-फूस से बनाई जाती हैं। उन पर चढ़ने के लिए बांस की सीढियाँ काम में लाई जाती हैं।

     उष्ण एवं आर्द्र जलवायु के कारण इन लोगों को वस्त्रों की आवश्यकता बहुत कम पड़ती है। अतः ये बहुत कम वस्त्रों का प्रयोग करते हैं।

    पिग्मी को वनों में फूल, मांस के लिए पशु एवं पक्षी अधिक मात्रा में मिल जाते हैं। अतः शिकार और फल एकत्रित कर इनका भी भोजन पिग्मी जाति के लोग करते हैं। ये लोग कन्द, मूल, फल, केला, कसाबा, रतालू, मक्का आदि खाते हैं। पिग्मी लोगों का मुख्य व्यवसाय पशुओं का शिकार, वन से वस्तुएं एकत्रित करना और मछली मारना है। आखेट करने में ये लोग बड़े चतुर होते हैं। हाथी जैसे भीमकाय पशु का शिकार भी सरलता से कर लेते हैं।

(2) बोरो:-

     पश्चिमी अमेजन बेसिन में निवास करने वाली जाति बोरो है। ब्राजील, पीरू तथा कोलम्बिया के समीपवर्ती क्षेत्र में जहाँ अमेजन की सहायक-जापुरा, पुतुगामा, ईसा के बेसिन हैं, वहाँ बोरो आदिम जाति कृषक के रूप में जीवन-यापन करती है। ये लोग शारीरिक गठन में अमेरिकी इण्डियन जैसे हैं। इनकी त्वचा का रंग भूरा, सीधे काले बाल, तथा मध्यम कद होता है। इनका भोजन कुसावा की रोटियाँ तथा पका मांस मुख्य होता है। जापुरा नदी तट के निवासी प्रातः स्नान कर ठण्डी कसावा की रोटी तथा जंगली फलों का भोजन करते हैं। इनके अतिरिक्त ग्रब, मछली तथा मधु का भी प्रयोग करते हैं।

     नृत्य के समय स्त्रियाँ अपने सम्पूर्ण शरीर में चित्रकारी करती हैं और बीजों का हार बनाकर पहनती हैं। पुरुष नृत्य के समय पक्षियों के पंखों का मुकुट पहनते हैं।

    बोरो जाति के लोग वनों को जलाकर साफ की हुई भूमि पर बड़े और ऊँचे मकान बनाते हैं। कई परिवारों का संयुक्त मकान होता है। यहाँ के निवासी कृषि करते हैं। ये कृषि के अतिरिक्त आखेट भी करते हैं। ये प्रतिदिन नदियों और जलाशयों में मछली और केकड़ों को जाल में फंसाकर पकड़ते हैं। शिकार के लिए एक विशेष प्रकार का यंत्र प्रयोग करते हैं जिसे ब्लो-पाइप कहते हैं।

     बोरो का परिवार सारा गाँव ही होता है, परन्तु पूरे गाँव में भी छोटे-छोटे कई परिवार होते हैं। दो परिवारों के मध्य लड़के-लड़कियों का विवाह होने से इनके रीति-रिवाज तथा भाषा में समानता पाई जाती है।

(3) सेमांग:-

       सेमांग जनजाति मलेशिया में मलाया प्रायद्वीप के उत्तरी भाग तथा थाईलैण्ड के दक्षिणी भाग के पहाड़ी भागों में फैली हुई है। इनके प्रमुख क्षेत्र उत्तरी पैराक, केदा, केलनतान, पैहांग में पाए जाते हैं। उनकी शारीरिक रचना नीग्रिटो जैसी हैं। इनका रंग चाकलेटी या गहरा भूरा, नाक चपटी व खुली हुई, होठ मोटे, आंखें बड़ी और स्थिर दृष्टि वाली, ठोड़ी अन्दर को घंसी हुई होती है एवं कद नाटा होता है।

     यह जनजाति अपना भरण-पोषण वन-वस्तु संग्रह एवं शिकार द्वारा करती है। विषुवतरेखीय एवं आर्द्र मानसूनी वनों से ये कन्द मूल, फल जड़ें, मोटे तने जैसे कन्द एकत्रित करते हैं। जंगली रतालू एवं ड्यूरिन पेड़ के मोटे फल का यहाँ के भोजन में विशेष महत्व है।

       ये लोग अपना निवास स्थान पहाड़ी ढालों पर सुरक्षित स्थलों के निकट बनाते हैं। इनकी झोपड़ियाँ चट्टानी भाग की छाया में प्रायः खजूर, रटन, ताड़ एवं अन्य लम्बी पत्ती वाली टहनियों से बनाई जाती है। झोपड़ियों का निर्माण स्त्रियाँ करती हैं, किन्तु पुरुष भी सहायता करते हैं।

सेमांग के एक या एक से अधिक घरों के समूह में एक ही कबीले के या बड़े परिवार के लोग रहते हैं। यही इनका समाज भी है। इनका मुख्य उद्यम कन्द मूल, फल, आदि एकत्रित करना तथा आखेट करना है। वन्य पदार्थों को एकत्रित करने का कार्य प्रायः स्त्रियाँ करती हैं।

(4) सकाई:-

     मलेशिया में मुख्य मलाया प्रायद्वीप के मध्यवर्ती पहाड़ी ढालों पर दूर-दूर तक फैली हुई जनजाति है। इनकी शारीरिक रचना अधिक आकर्षक एवं बदन गठीला होता है। इनका रंग हल्का भूरा अथवा साफ होता है। ये लोग पहाड़ी ढालों से नीचे नदी घाटियों एवं संकरी मैदानी पट्टी में रहते हैं। इनका आवास झोपड़ियाँ होती हैं जो टहनियों, छाल व पत्तों से ढकी जाती हैं।

     ये अपना भरण-पोषण मुख्यतः शिकार, वन्य-वस्तु संग्रह एवं मछलियाँ पकड़कर करते हैं। रबर के बगीचों में भी कार्य करके मजदूरी प्राप्त करते हैं। इनकी सामाजिक व्यवस्था एवं रीति-रिवाज सेमांग से मिलती जुलती है।

(5) पापुआन:-

      प्रशान्त महासागर में न्यूगिनी द्वीप के निवासी पापुआन कहलाते हैं। ये कद में मोटे नाटे होते हैं तथा चमड़ी का रंग हल्का होता है। ये लोग वृक्षों की जड़ों, छाल, कन्दमूल, फल, आदि से भोजन प्राप्त करते हैं। शिकार से प्राप्त मांस अन्य जीव भी भोजन के मुख्य पदार्थ हैं। इनके गाँव पहाड़ियों की चोटियों पर होते हैं। प्रत्येक गाँव पुराने ढंग पर किलाबन्दी किए रहता है। इनके घर का आकार गोल होता है।

       ये लोग सांपों तथा शत्रुओं से रक्षा हेतु कभी-कभी ऊँचे पेड़ों पर भी अपना मकान बना लेते हैं। इनकी अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि है। कृषि में गन्ना तथा पपीता मुख्य उत्पादन है। ये लोग पशुपालन भी करते हैं। पालतू पशुओं में सुअर का प्रमुख स्थान है।

    पापुआन की लड़ाई का आधार रोटी है। ये बड़े खूंखार होते है। लड़ना-झगड़ना तथा हत्या करना बड़ी सामान्य बात है। ये लोग अन्धविश्वासी होते हैं।

(6) बद्दू:-

     बद्दुओं का निवास क्षेत्र दक्षिण-पश्चिमी एशिया में पश्चिमवर्ती अरब प्रायद्वीप तथा अफ्रीका में सहारा के उष्ण मरुस्थल हैं। ये अपने को सेमेटिक जाति की एक शाखा के वंशज मानते हैं। केवल स्थायी विकास क्षेत्रों को छोड़कर बद्दू लोगों का कोई स्थायी निवास नहीं होता है। ये अपने कबीलों, ऊंटों, घोड़ों, कुत्तों, भेड़-बकरियों, आदि के साथ चारे-पानी और मरुद्यानों की खोज में भ्रमण करते रहते हैं। इनका मुख्य भोजन खजूर है। इसके अलावा गेहूँ, जौ, मक्का, आदि भी खाते हैं।

        ये लोग अपने शरीर को सूती वस्त्रों से ढंके रहते हैं। इनके कपड़े ढीले-ढाले होते हैं। इनका मुख्य व्यवसाय भेड़, बकरी, ऊंट और घोड़े पालना है। ये मरुद्यानों के लोगों को खजूर, ऊन, पशु, मांस और दूध बेचकर बदले में गेहूँ, जौ, कपड़े तथा तम्बाकू, आदि ले लेते हैं।

(7) बुशमैन:-

       कालाहारी मरुस्थल में निवास करने वाले बुशमैन हैं। ये लोग ठिगने कद के होते हैं। ये चपटी मुखाकृति, भारी पलकों और तिरछी आंखों वाले होते हैं। इनका रंग भूरा और पीलापन लिए होता है। इनका आवास कच्ची झोपड़ी गुफाओं तथा कन्दराओं में होता है, ये लोग प्रायः अर्द्ध नग्नावस्था में रहते हैं। बुशमैन मांसाहारी होते हैं। शिकार करना और मांस प्राप्त करना इनका मुख्य व्यवसाय है। शिकार के लिए स्थान-स्थान पर घूमना व शिकार के पीछे मीलों दूर तक भगाकर मारना इनके लिए अनिवार्य हो जाता है।

(8) खिरगीज:-

      ये लोग मध्य एशिया में किरगिजस्तान में पामीर उच्च भूमि तथा ध्यानशान पर्वतमाला के क्षेत्र में निवास करते हैं। इनका शरीर खूब गठा हुआ सुडौल तथा मजबूत होता है। यह तुर्कों के सम्मिश्रण से उत्पन्न हुई जाति है। खिरगीज घुमक्कड़ जाति के लोग होते हैं। अतः इनका कोई स्थायी घर नहीं होता है। भ्रमणकारी होने के कारण तम्बू ही इनका घर होता है। इन्हें पशुओं की खाल तथा ऊन के नमदों से बनाया जाता है। इनका भोजन पशुओं से ही प्राप्त होता है। पशुओं का मांस, रक्त, दूध, दूध पदार्थ इनके भोजन के अंग हैं। बकरे का मांस इनका प्रिय भोजन है।

     खिरगीज अर्थव्यवस्था में गाय, घोड़ों, भेड़ और बकरियों का विशेष महत्व है। ये जूते, टोपियाँ, टोकरियाँ, मशकें, कोट, पायजामे, आदि बनाते हैं। ये लोग मौसमी पशुचारण करते हैं।

(9) एस्किमो:-

     एस्किमो का निवास ध्रुवीय क्षेत्रों में टुण्ड्रा प्रदेश में स्थित है। एस्किमो मंझोले कद के होते हैं। इनका रंग भूरा व पीलापन लिए होता है, चेहरा गोल और चौड़ा तथा शरीर, बेडौल, आंखें काली और छोटी, नाक चपटी, मांसल शरीर, जबड़े भारी तथा दांत विशेष मजबूत होते हैं। ये लोग मांसाहारी होते हैं। इनका मुख्य भोजन सील, बालरस और ह्वेल, मछलियाँ, कैरीबो, बारहसिंगे, ध्रुवीय भालू, आदि का मांस है।

     इनका मुख्य व्यवसाय आखेट है। ये लोग श्वेत भालू, रेण्डियर, कैरीबो, आर्कटिक लोमड़ी, खरगोश, समूरदार जानवर, ह्वेल, सील, बालरस, आदि का शिकार करते हैं।

        इनका निवास गृह इग्लू (Igloo) कहलाता है। ये तीन या चा मीटर के घेरे में बनाए जाते हैं। इनके वस्त्र जानवरों की खाल से निर्मित होते हैं। स्त्रियाँ एवं पुरुष एक समान वस्त्र पहनते हैं। स्लेज, कयाक, उमियाक तथा हारपून इनके दैनिक उपकरण हैं।

 



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