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2. ह्विटलसी के कृषि प्रादेशीकरण तकनीक/ विश्व के प्रमुख कृषि प्रदेश/Major Agriculture Region of The World

2. ह्विटलसी के कृषि प्रादेशीकरण तकनीक

(विश्व के प्रमुख कृषि प्रदेश/Major Agriculture Region of The World)


      ह्विटलसी के कृषि

          कृषि अध्ययन में कृषि प्रदेश की संकल्पना का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। कृषि प्रदेश भूमि का एक विस्तृत क्षेत्र है, जिसमें कृषि करने की दशाओं तथा प्रतिरूप में व्यापक रूप से समानता मिलती है तथा जो समीपवर्ती क्षेत्रों से विशिष्ट रूप से भिन्न होता है। कृषि प्रदेशों का सीमांकन फसल-साहचर्य, फसल-पशुपालन साहचर्य तथा फार्म क्रिया प्राविधियों, आदि के मानदण्डों के आधार पर होता है। कृषि प्रदेशों का सीमांकन करने वाले विद्वानों में डी. ह्विटलसी का नाम उल्लेखनीय है।

        संक्षेप में कृषि प्रदेश ऐसे विस्तृत क्षेत्र होते है, जहां फसलों की किस्मों एवं उनकी उत्पादन विधि में समरूपता पाई जाती है। सर्वप्रथम 1939 में डी. ह्विटलसी ने विश्व को 13 कृषि प्रदेशों में विभाजित किया, जिसमें उन्होंने निम्नलिखित आधार तत्वों को प्रदेशों के सीमांकन का मानक आधार (Criterion) माना था।

(i) कृषि एवं पशुपालन का साहचर्य

(ii) कृषि की उत्पादन-विधि।

(iii) कृषि भूमि में श्रम, पूंजी आदि के विनियोग की मात्रा।

(iv) कृषि से उत्पादित पदार्थों के उपभोग का तरीका।

(v) कृषि कार्य में सहायक यंत्रों, उपकरणों एवं आवास आदि संबंधी दशाएं।

(i) फसलों एवं पशुओं का पारस्परिक सम्बन्ध:-

        विश्व में कृषि एवं पशुपालन क्रियाएँ साथ-साथ चलती हैं। दोनों कार्य विस्तृत भूमि एवं मिट्टी की उर्वरता से सम्बन्धित हैं। पशु मानवीय श्रम की पूर्ति करते हैं और मानवीय क्षमता को बढ़ाते हैं। वे दुग्ध, मांस, चमड़ा, हड्डी, खाद जैसे पदार्थों को उपलब्ध कराकर कृषि संस्कृति के महत्वपूर्ण घटक बन जाते हैं। भूमि के अनुकूलतम उपयोग के लिए फसलों एवं पशुओं का साहचर्य आवश्यक होता है। भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में यह साहचर्य अलग-अलग प्रकार का मिलता है जो कृषि दशाओं की समानता की प्रादेशिक भिन्नताओं को प्रदर्शित करता है।

(ii) कृषि उत्पादन विधियाँ:-

       पृथ्वी के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में कृषि की दशाओं में भिन्नता के साथ कृषि की उत्पादन विधियाँ भी बदल जाती हैं जिसके कारण कृषि दशाओं की प्रादेशिक समानता एवं सम्बद्धता मिलती है। उदाहरणार्थ, किसी क्षेत्र में कृषि उत्पादन में पारस्परिक विधियों, जैसे पशुओं तथा हल, आदि का प्रयोग होता है तो किसी क्षेत्र में आधुनिक कृषि यंत्र जैसे ट्रैक्टर, हार्वेस्टर, आदि का प्रयोग होता है। किन्हीं क्षेत्रों में फसल उत्पादन सिंचाई पर आधारित है और किन्हीं क्षेत्रों में बिना सिंचाई के कृषि सम्भव है। इसी प्रकार विस्तृत एवं गहन कृषि भी विभिन्न उत्पादन विधियों के उदाहरण हैं।

(iii) कृषि में पूंजी, श्रम एवं संगठन आदि के विनियोग की मात्रा:-

       किन्हीं कृषि प्रदेशों में पूँजी का निवेश अधिक होता है तो कहीं श्रम का अथवा कहीं-कहीं दोनों का ही अधिक उपयोग किया जाता है। अतः पूंजी एवं श्रम के विनियोग की मात्राओं की भिन्नता के आधार पर भी कृषि दशाओं की प्रादेशिक समरूपता एवं सम्बद्धता में भिन्नता मिलती है। मानवीय श्रम पर आधारित कृषि जीवन निर्वाहक हो जाती है। यांत्रिक कृषि लाभांश को बढ़ाती है। पूंजी विनियोग से कृषि उत्पादन की मात्रा, किस्म एवं विविधता प्रभावित होती है। संगठन कृषि का एक आवश्यक तत्व है। पिछड़े देशों में प्रत्येक कृषक अलग-अलग कृषि उत्पाद का विनिमय करता है, अतः वह मोल-भव में घाटा उठाता है। उत्पादकों में विपणन की उचित व्यवस्था, मूल्यों पर ध्यान रखना संगठनात्मक पहलू के उत्तम उदाहरण हैं।

(iv) कृषि उत्पादन के उपभोग का स्वरूप:-

       कृषि पदार्थों की मात्रा, विविधता एवं किस्म उपभोग प्रतिरूप से प्रभावित होती है। यदि कृषि उत्पादन व्यापारिक दृष्टि से किया जाता है जब वहाँ विस्तृत प्रकार की फसलों के विशेषीकरण वाली कृषि होती है जैसे रबर, गन्ना, कॉफी, चाय, गेहूँ, आदि की, परन्तु यदि उत्पादन कृषक के निजी उपभोग के लिए किया जाता है तब वहाँ निर्वाहक कृषि के अन्तर्गत अनाज, दलहन, तिलहन, आदि अनेक फसलों की कृषि की जाती है। अतः कृषि उपज के उपभोग के तरीके से भी कृषि दशाओं में प्रादेशिक विविधता मिलती है जो कृषि प्रदेशों के सीमांकन हेतु आधार प्रदान करती है।

(v) कृषि उत्पादन में प्रयुक्त यन्त्र एवं उपकरण तथा आवास सम्बन्धी दशाएँ:-

       कृषि क्षेत्रों की अपनी संस्कृति होती है। उसमें कृषि उपकरणों का प्रयोग तथा कृषकों की जीवन पद्धतियाँ आती हैं। उदाहरण के लिए यूरोप एवं संयुक्त राज्य अमेरिका के गाँव जीवन की सभी सुविधाओं से युक्त होते हैं। वहाँ कृषि पद्धति एवं कृषकों का जीवन स्तर उच्च कोटि के होते हैं। दक्षिणी एशिया के अधिकांश गांवों में परिवहन, विद्युत्, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं का भी अभाव है। अतः कृषकों का जीवन निम्न स्तर का होता है। 

      उपरोक्त तत्त्वों के आधार पर व्हीट्लसी ने विश्व को निम्नलिखित 13 कृषि प्रदेशों में विभाजित किया है:

डी. ह्विटलसी द्वारा वर्गीकृत विश्व के कृषि प्रदेश:-

1. चलवासी पशुचारण प्रदेश (Nomadic Herding Region)

2. व्यापारिक पशुपालन प्रदेश (Livestocking Ranching Region)

3. स्थानान्तरी कृषि प्रदेश (Shifting Cultivation Region)

4. प्रारम्भिक स्थानबद्ध कृषि प्रदेश (Redimental Sedentary tillage Region)

5. चावल प्रधान गहन निर्वाह कृषि प्रदेश (Intensive Subsistence Tillage with Rice Dominant) 

6. चावल विहीन गहन निर्वाह कृषि प्रदेश (Intensive Subsistence Tillage region without Paddy Rice)

7. व्यापारिक बागान कृषि प्रदेश (Commercial Plantation Tillage Region)

8. भूमध्य सागरीय कृषि प्रदेश (Mediterranean Agricultural Region)

9. व्यापारिक अनाज उत्पादक कृषि प्रदेश (Com- mercial Grain Farming Region)

10. व्यापारिक फसल एवं पशु उत्पादक कृषि प्रदेश (Commercial Livestock Crop and Farming Region)

11. निर्वाह फसल एवं पशु उत्पादक कृषि प्रदेश (Subsistence Crop and Livestock Farming Region)

12. व्यापारिक दुग्ध पशुपाल कृषि प्रदेश (Commercial Dairy Farming Region)

13. विशेषीकृत बागवानी या उद्यान कृषि प्रदे (Specialised Horticulture Region)

(i) चलवासी / स्थानान्तरणशील पशुचारण प्रदेश:-

         इस कृषि प्रदेश में अफ्रीका का सहारा प्रदेश, इथियोपिया, मिस्र, सूडान, सऊदी अरब, ईरान, इराक, अफगानिस्तान, पूर्व सोवियत संघ से अलग हुए मध्य एशिया के देश, उत्तरी चीन, मंगोलिया, दक्षिणी अफ्रीका के भाग आते है। यह शुष्क एवं अर्द्धशुष्क प्रदेश है। घास यहाँ प्राकृतिक वनस्पति है। घास के विस्तृत मैदानों में चरवाहों के समूह एक स्थल की घास समाप्त होने पर दूसरे स्थान पर जाते हैं। अतः इसे स्थानान्तरणशील पशुचारण कहते हैं। यहाँ जनसंख्या का घनत्व कम होता है पशुचारण समूह अस्थाई अधिवास बनाते हैं तथा परिवर्तन उनके जीवन का अंग होता है। किरगिज, मसाई, बद्दू जैसे समूह इसके उदाहरण हैं।

        यहाँ के निवासियों का जीवन पशुओं से प्राप्त उत्पादों यथा दूध, मक्खन, पनीर, चमड़ा, माँम, हिड्डी, सींग, खुर पर आधारित रहता है। अन्य वस्तुएँ जो इतर क्षेत्रों से मिलती हैं उनके लिए विलासिता के वर्ग में आती हैं। उनके वस्त्र, तम्बू, हथियार, पशुओं से संबंधित होते हैं। मरुस्थलों में ऊँट, अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में बकरी, भेड़ आई प्रदेशों में गाय, बैल, टुन्ड्रा में रेण्डियर, तिब्बत में याक जैसे जानवर मिलते हैं। इन पशुओं की जीवन निर्वाह हेतु विविध रूपों में प्रयोग किया जाता है।

(2) व्यापारिक पशुपालन प्रदेश:-

         इस प्रदेश का विस्तार मध्य पश्चिमी अमेरिका, मध्य पूर्वी दक्षिणी अमेरिका, दक्षिणी अफ्रीका, यूरोप के सीमित क्षेत्र और आस्ट्रेलिया में है। इन प्रदेशों में अन्न उत्पादन पर कम ध्यान दिया जाता है और पशुपालन पर अधिक।

         क्षेत्रों की विशेषता के अनुसार कहीं गाय, बैल (अमेरिका) तो कहीं भेड़, बकरी (आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड) की प्रधानता है। ये प्रदेश ऊन, चमड़ा, माँस, दूध और उससे बनी वस्तुओं जैसे मक्खन, पनीर का निर्यात करते हैं। पशुओं की नस्ल में सुधार करते हैं तथा विस्तृत चारागाहों की व्यवस्था इनके जीवन का अंग होता है। इन प्रदेशों के घास के मैदान कृषि के लिए उपयुक्त भी नहीं होते हैं। यहाँ वर्षा 35 सेमी० वार्षिक से अधिक नहीं होती है।

        व्यापारिक पशुपालन वैज्ञानिक युग की देन है। त्वरित परिवहन, रेफ्रीजरेशन, रेल, जहाज, ट्रक की सुविधा, औद्योगिक केन्द्रों में वृहद् जनसमूहजन्य माँग आदि इनके अभ्युदय के प्रमुख कारण हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका, अर्जेण्टाइना, पेटेगोनिया, उरुग्वे, ब्राजील, चाको का पठार, वेनेजुएला, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड इस तरह की कृषि के पर्याप्त हैं।

       व्यापारिक पशुपालन में कम संख्या में मनुष्यों की आवश्यकता पड़ती है। रखवाली करने वाले कुत्तों और घोड़ों की सहायता से यह कार्य किया जाता है। जीवन पद्धति पशुओं पर आधारित होती है। उत्तम संगठन व्यवस्था, निर्यात के प्रति जागरूकता, पूँजी इसके विकास के आवश्यक तत्व हैं।

(3) स्थानान्तरणशील कृषि:-

      यह कृषि प्रदेश अमेजन घाटी, दक्षिणी वेनेजुएला, गायना, नाइजीरिया, घाना, काँगो, चाड, जिम्बाबे, मालागासी, न्यूगिनी, बोर्नियो, म्यांमार कम्पूचिया जैसे देशों में मिलता है।

       ऐसी कृषि मुख्यत: आदिवासियों द्वारा जंगलों को साफ करके की जाती है तथा कालान्तर में खेत छोड़कर कृषक अन्यत्र नये जंगल साफ करते हैं। इसमें मानवीय श्रम एवं न्यूनतम उपकरण का प्रयोग होता है। इसे असम में झुम, इण्डोनेशिया में लदांग, श्रीलंका में चेना, रोडेशिया में मिल्पा के नाम से जाना जाता है।

प्रमुख फसलें- 

         इस तरह के कृषि प्रदेश में फसलोत्पादन प्रधान होता है और पशुपालन नगण्य होता है। फसलों में धान (एशियाई देश), मक्का (अमेरिका) और ज्वार-बाजरा प्रधान होते हैं। फसल की देख-रेख निराई-गुड़ाई नहीं होती है। अतः उपज कम होती हैं। कृषक फल संग्रह एवं आखेट भी करते रहते हैं।

      यह कृषि पद्धति पिछड़ी अवश्य है किन्तु प्राकृतिक वातावरण से पूर्णत: समायोजित होती हैं। कृषकों की सूझ-बूझ प्रधान होती है। ऐसे प्रदेशों में अज्ञानतावश वनों की क्षति अवश्य होती है।

(4) प्रारंभिक स्थायी कृषि प्रदेश:-

         यह प्रदेश उत्तर-पूर्वी भारत, मलाया, प्रायद्वीप, सुमात्रा, प० न्यूगिनी, मध्य एण्डीज के देशों में मिलता है। यहाँ खेती सीमित क्षेत्रों में होती है, अतः स्थानान्तरणशीलता संभव नहीं होती। अधिकांश विशेषताएँ स्थानान्तरणशील कृषि प्रदेश के समान होती हैं। बागानी खेती के संलग्न प्रदेशों में, उत्खनन, केन्द्रों से संलग्न भागों में तथा पठारी भागों में यह कृषि मिलती है। यहाँ कृषि गहन भी होती है तथा पशुपालन भी इससे संबंधित होता है। गाय, बैल, भैंस, खच्चर, घोड़े, भेड़, बकरी आदि स्थान एवं क्षेत्र के अनुरूप पाये जाते हैं।

(5) चावल प्रधान गहन निर्वाहक कृषि प्रदेश:-

        इस प्रदेश में बंग्लादेश, श्रीलंका, भारत, दक्षिणी एवं मध्य चीन, म्यांमार, कम्पूचिया, थाईलैण्ड, जावा आदि देश व प्रदेश प्रमुख रूप से आते हैं। यह कृषि प्रदेश प्राकृतिक वातावरण से समायोजित होता है। मानसूनी जलवायु के अधिक वर्षा वाले भाग इसमें आते हैं। अधिक ताप एवं मौसमी परिवर्तन इसकी विशेषता है।

      औसत वार्षिक वर्षा 150 सेमी० से अधिक होती है। समतल मैदानी भागों में मेंड़ बाँध कर धान की खेती की जाती है। अपेक्षाकृत उच्च भाग अथवा कम वर्षा वाले क्षेत्रों में ज्वार, बाजरा, रागी, मक्का जैसी फसलें होती हैं। गंगा, ब्रह्मपुत्र का मैदान, कृष्णा, गोदावरी का डेल्टाई भाग, दक्षिणी पश्चिमी भारत का तट, इरावदी, सोनम, मौकांग, सीक्यांग, यॉरिटसीक्यांग, हांगहों के डेल्टाई प्रदेशों को इस कृषि का प्रतीक माना जा सकता है।

        कृषि उत्पादन का प्रमुख उद्देश्य जीवन निर्वाह होता हैं। वर्तमान समय में तकनीकी प्रगति, कृत्रिम खाद, कीटनाशक दवायें, कृषि यंत्रों का प्रयोग आदि से उत्पादन बढ़ा है तथा चावल का निर्यात भी होता है किन्तु तीव्र जनावृद्धि से अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता है।
(6) चावल विहीन गहन निर्वाहक कृषि प्रदेश:-

           इसके अन्तर्गत पाकिस्तान, मध्य पश्चिमी भारत, उत्तरी मंगोलिया, दक्षिणी कोरिया जैसे देश प्रमुख रूप से आते हैं। यहाँ वर्षा का सापेक्ष अभाव तथा तापमान की कमी से गेहूँ की खेती की उपयुक्त दशाएँ मिलती हैं। सिंचाई का प्रसार होने से गेहूँ की खेती का विस्तार हुआ है क्योंकि वह अधिक टिकाऊ एवं प्रमुख खाद्यान्न फसल है। यहाँ वर्षा 150 सेमी से कम होती है। कुछ संक्रमण वाले क्षेत्रों में बरसात में धान (खरीफ) तथा जाड़े में गेहूँ की खेती की जाती है।

अन्य विशेषताएँ-

       उपर्युक्त चावल प्रधान एवं गेहूँ प्रधान क्षेत्र नदियों के मैदानी भाग हैं। यहाँ जनसंख्या का घनत्व सर्वाधिक मिलता है, अतः यहाँ स्वभावतः गहन कृषि होती है। मानवीय श्रम का भरपूर प्रयोग होता है। कुछ क्षेत्रों में क्रमश: यांत्रिकीकरण भी हो रहा है। अधिकांश मानसूनी क्षेत्रों में ‘हरित क्रांति’ (Green Revolution) से धान एवं गेहूँ की किस्मों में सुधार हुआ है। उत्पादन की मात्रा बढ़ी है तथा आत्मनिर्भरता के साथ व्यापारिक प्रवृत्ति भी पनपी है। मानूसन की अनिश्चितता से बाढ़ तथा सूखा जैसे प्राकृतिक संकट आते रहते हैं।

         राजनीतिक दृष्टि से यह क्षेत्र लगभग स्थिर है तथा प्रशासन कृषि के विकास का प्रयास कर रहा है। धार्मिकता, रूढ़िवादिता और परम्पराओं का कुप्रभाव कम हो रहा है। विपणन व्यवस्था में शासकीय हस्तक्षेप बढ़ने से छोटे किसानों को लाभ मिल रहा है। भूमिहीन कृषकों को कुछ भूमि मिल रही है। सभी कृषक वैज्ञानिक विधियों को अपना रहे हैं। परिवहन एवं संचार के साधनों का विकास हुआ है। रेडियो, दूरदर्शन एवं समाचार-पत्र भी किसानों को प्रशिक्षण प्रदान कर रहे हैं।

(7) व्यापारिक बागानी कृषि प्रदेश:-

          यह कृषि प्रदेश उष्ण कटिबन्धों में मिलती है। लैटिन अमेरिका, अफ्रीका, दक्षिणी एवं दक्षिण-पूर्वी एशिया इसमें प्रधान रूप से आते हैं। यह क्षेत्र एक फसली होता है।

प्रमुख फसलें-

           कोको, कॉफी, चाय, रबर, गन्ना, नारियल, मिर्च-मसाले इसमें प्रधान हैं। गन्ना प० द्वीप समूह, ब्राजील, पूर्वी अफ्रीका, मलागासी होता है। केला, प० द्वीप समूह, मध्य अमेरिका, वेनेजुएला तथा अफ्रीका के कुछ भाग में होता है।

विशेषतायें

       यहाँ कृषि बड़े-बड़े बागानों पर होती है। बगानों में फसल की बुआई, कटाई, सुखाई उसे डिब्बो में बंद करना, निर्यात प्रबंध आदि सभी व्यवस्थायें उपलब्ध होती हैं।

       बागानी खेती अधिकांश विदेशी आधिपत्य में है। वैज्ञानिक विधि का प्रयोग, आधुनिक यंत्र, कीटनाशक, उन्नत बीज यहाँ प्रयोग में लाये जाते हैं।

         श्रमिकों को रहने के लिए घर, स्वास्थ्य, शिक्षा, मनोरंजन आदि के लिए सम्पूर्ण व्यवस्था रहती है। कृषि का उद्देश्य निर्यात करना होता है। स्थानीय जनसंख्या श्रमिक के रूप में कार्य करती है अतः प्रादेशिक विकास नहीं हो पाता है।

         यह कृषि प्रदेश प्रधानतः उष्ण क्षेत्रों में ही मिलता है। पूँजी निवेश इसकी प्रमुख आवश्यकता होती है। इसके उत्पादों की माँग भी स्थाई होती है। कुछ फसलों को कृत्रिम उत्पादों से प्रतियोगिता का सामना करना पड़ता है।

(8) भमूमध्य सागरीय कृषि प्रदेश:-

      यह कृषि प्रदेश भूमध्य सागर के चतुर्दिक स्थित देशों- मध्य स्पेन, इटली, दक्षिणी फ्रांस, यूनान, तुर्की, सीरिया एवं कैलिफोर्निया, दक्षिणी-पश्चिमी आस्ट्रेलिया, दक्षिणी-पश्चिमी अफ्रीका तथा दक्षिणी चिली में मिलता है। वस्तुतः यह भूमध्य सागरीय जलवायु के पर्याप्त हैं। इस प्रदेश में जाड़े में वर्षा होती है और ग्रीष्म काल शुष्क रहता है। अतः यहाँ की फसलों को दो भागों में बाँटा जा सकता है-

(अ) जाड़े की फसलें-

         इसके अन्तर्गत गेहूँ, आलू, प्याज, टमाटर, सेम और फल की खेती होती है। यहाँ की फसलों की माँग यूरोपीय नगरों में बहुत होती है। उदाहरणार्थ कैलीफोर्निया से संयुक्त राज्य अमेरिका के पूर्वी तट के नगरों को सब्जी एवं फल की आपूर्ति होती है।

(ब) ग्रीष्म ऋतु की फसलें-

         इस ऋतु में सिंचाई द्वारा खेती की जाती है। अंगूर इस मौसम की प्रमुख फसल है। हल्के ढाल वाले क्षेत्रों में अंगूर की बेलें लगाई जाती हैं। सेब, नाशपाती, जैतून, अंजीर, चीकू आदि फल होते हैं, सब्जियाँ भी उगाई जाती हैं।

अन्य विशेषताएँ-

        भूमध्य सागरीय कृषि प्रदेश में कहीं फल एवं सब्जी प्रधान होते हैं तो कहीं-कहीं पशुपालन भी होता है। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भेड़-बकरियाँ चराई जाती हैं। ऊन का निर्यात होता है। कहीं माँस के लिए भी पशु पाले जाते हैं।

        यह कृषि प्रदेश धरातल, जलवायु एवं मानवीय तत्त्वों में अद्भुत सामंजस्य प्रकट करता है। धरातलीय विभिन्नता का प्रभाव फसलों एवं सब्जियों पर पड़ता है। यहाँ जनसंख्या का घनत्व अपेक्षाकृत अधिक पाया जाता है। यहाँ से तेल, शराब, माँस, सूखे फल आदि का निर्यात किया जाता है।

(9) व्यापारिक अन्नोत्पादक कृषि प्रदेश:-

           यह कम जनसंख्या वाला ऐसा क्षेत्र है जहाँ कृषि का उद्देश्य व्यापार करना होता है। उत्तरी अमेरिका में प्रेयरी, रूस में स्टेपी, अर्जेण्टाइना में पम्पा, आस्ट्रेलिया में मरे-डार्लिंग बेसिन आदि इसी कृषि प्रदेश में आते हैं।

अन्य विशेषतायें-

          सैकड़ों हेक्टेयर के खेत तथा एकाकी मकान इस प्रदेश में कृषि की पहचान होते हैं। फार्मों में व्यापक पैमाने पर यंत्रों का प्रयोग होता है, तथा एक या दो व्यक्ति मिलकर फसल संबंधी सभी कार्य जुताई-बुआई, निराई-गुड़ाई कटाई-महाई, भण्डारण आदि करते हैं। कटाई के समय कभी-कभी अस्थाई श्रमिक भी लगाये जाते हैं।

          यहाँ कीटनाशक दवाओं का प्रयोग, खाद, सिंचाई का प्रयोग पर्याप्त होता है। वर्षा प्राय: 25 से 50 सेमी० तक होती है अतः गेहूँ ही प्रधान फसल है। यहाँ की मिट्टी में नमी पर्याप्त मात्रा में होती है, अतः प्रति इकाई उपज अधिक होती है।

          कृषि व्यापार पर आधारित होती है। विदेशों में माँग कम होने या कीमत गिरने या अत्यधिक उत्पादन होने पर फसल या तो जानवरों को खिलाई जाती है या जला दी जाती है।

(10) व्यापारिक कृषि एवं पशुपालन प्रदेश:-

         इस कृषि में पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोप, साइबेरिया के क्षेत्र आते हैं। इस प्रदेश में फसलों का उत्पादन पशुपालन के उद्देश्य से किया जाता है। पशुओं को मोटा करना और उनसे अधिक माँस प्राप्त करना प्रमुख उद्देश्य होता है। हड्डी, चमड़ा, सींग, खुर, अण्डे अदि भी प्राप्त हो जाते हैं।

प्रमुख फसलें-

      प्रमुख फसलों में जई, चरी (Hay) मक्का, आलू, चुकन्दर, गाजर, मटर, गोभी, सेम, शलजम ककड़ी का भी उत्पादन होता है तथा हरे चारे की भी खेती होती है।

अन्य विशेषतायें-

       इस प्रदेश में अनाज, हरा चारा एवं सब्जियों का क्रमानुक्रम में उत्पादन किया जाता है। जिससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहे।

      संयुक्त राज्य अमेरिका में फार्म विस्तृत होते हैं, जबकि यूरोप में छोटे फार्म पर मकान, पशुशाला, यंत्रागार भंडारगृह बने होते हैं। 

        फसल चारे के रूप में या अनाज के रूप में पशुओं को खिलाई जाती है तथा विक्रय भी की जाती है।

        पशुओं का विक्रय होता है या माँस तैयार करके बेचा जात है। उत्पादनों का निर्यात विदेशों में किया जाता है। कृषि में पूँजी एवं श्रम का विनियोग अधिक होता है तथा कृषि वैज्ञानिक विधियों से की जाती है।

         आर्थिक दृष्टिकोण से यह खेती लाभदायक होती है। भूमि संरक्षण तथा भूमि की उर्वरता को बनाये रखने का प्रयास किया जाता है। आवश्यकतानुसार फसलों या पशुओं का उत्पादन समायोजित किया जाता रहा है जिनमें हानि नहीं होती है।

(11) निर्वाहक अन्न और पशुपालन प्रदेश:-

       इस प्रकार की कृषि पद्धति पश्चिमी एशिया में तुर्की उत्तरी ईरान, मध्यवर्ती एशिया और उत्तरी साइबेरिया के क्षेत्रों में जलवायु और स्थलीय बाधाओं के कारण विकसित हुई है। यहाँ न तो पूर्ण कृषि पर जीवनयापन आश्रित है और न पशुपालन पर। फलतः अन्नोत्पादन और पशुपालन दोनों से जीवन निर्वाह हो पाता है। यहाँ शुष्कता एवं ठंडा के कारण कंवल एक फसल किसी प्रकार हो पाती है। फलतः पशुपालन आवश्यक हो जाता है।

(12) व्यापारिक दुग्धोत्पादन कृषि प्रदेश:-

         यह कृषि प्रदेश संयुक्त राज्य अमेरिका में बड़ी झीलों के समीप विस्तृत भाग में, पश्चिमी यूरोप में रूस के पश्चिमी मध्य पेटी में तथा दक्षिणी-पूर्वी आस्ट्रेलिया, रूमानिया एवं न्यूजीलैण्ड में मिलता है।

        इस कृषि प्रदेश में दुग्धोत्पादन प्रधान पेशा है। गाय सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण होती है। पालतू गायों की किस्में दूध की मात्रा एवं दूध में मक्खन की मात्रा से संबंधित होती है। जर्सी, स्विश, आयरिश, बाउन, होन्सटाइन नस्लें प्रधान हैं। यहाँ सूअर और मुर्गियाँ भी पाली जाती हैं। फसलों में मक्का एवं हरे चारे की प्रधानता होती है।

        ताजे दूध एवं मक्खन, पनीर के निर्यात हेतु लम्बी दूरी तक त्वरित परिवहन साधनों का प्रयाग होता है। पानी के जहाजों पर शीत गृह का निर्माण कर माँस, मक्खन, पनीर का निर्यात होता है।

        दुग्धोत्पादन के निर्माण से संबंधित कारखानों की स्थापना की जाती है। दूध से पाउडर, आइसक्रीम, मक्खन आदि बनाये जाते हैं।

       पशुओं के रहने, नहाने, टहलने, स्वास्थ्य आदि की देखभाल के लिए विस्तृत प्रबंध किये जाते हैं। पशुओं को वातानुकूलित कक्षों में रखा जाता है।

        पशुओं के दूध निकालने के लिये, माँस काटने के लिए और बाल निकालने के लिए मशीनों का प्रयोग किया जाता है। संबंधित फसलों को बोने-काटने हेतु भी यंत्रों का प्रयोग किया जाता है।

        उत्पादों की पर्याप्त माँग इन कृषि प्रदेशों का आधार है अतः विकसित एवं संपन्न राष्ट्रों से यह कृषि प्रदेश संबंधित है।

(13) विशेषीकृत बागवानी कृषि प्रदेश:-

        संयुक्त राज्य अमेरिका में खाड़ी एवं अटलांटिक तट, कैलीफोर्निया की घाटी, मध्य एशिया, पेरू, ब्राजील तट और दक्षिणी अफ्रीका में ऐसी विशिष्ट कृषि का विकास हुआ है। फल, सब्जी, फूल और कुछ अन्य फसलों की गहन खेती इस क्षेत्र में की जाती है। संयुक्त राज्य अमेरिका का यह क्षेत्र ऐसी फसलों के उत्पादन में अग्रणी है।

13. अन्तर्राष्ट्रीय सीमाओं के कार्यों का वर्णन

13. अन्तर्राष्ट्रीय सीमाओं के कार्यों का वर्णन



    अन्तर्राष्ट्रीय सीमाओं

      अन्तर्राष्ट्रीय सीमा-रेखा वस्तुतः प्रभुत्व सम्पन्न राज्य के यथार्थ प्रभाव की बाह्य सीमा होती है। प्रत्येक राज्य अपनी-अपनी सीमाओं में सर्वोच्च प्रभुसत्ता का उपयोग करता है और सैद्धान्तिक दृष्टि से राज्य सीमाएँ पूर्णतः अवरुद्ध प्राचीर का कार्य करती हैं तथा बाह्य विश्व से सभी प्रकार का समागम बन्द करती हैं, किन्तु माल, मनुष्य एवं विचारों के आदान-प्रदान की सुविधा हेतु तथा तस्करी की रोकथाम के उपायों को ढूंढने हेतु सभी सीमाएँ किसी मात्रा तक भेद्य बना दी जाती हैं। इस प्रकार सीमा का उद्देश्य पूर्ण प्रभुसत्ता एवं स्वतंत्र संसर्ग के परस्पर विरोधी सिद्धान्तों के मध्य समझौता करना है।

     सीमाओं के कार्य परिवर्तित होते रहते हैं। जापान ने अपनी एकात्मवादी नीति के अन्तर्गत 1853 ई. से पूर्व अपनी तटीय सीमा को पूर्णतः अभेद्य रखा, किन्तु 1853 ई. में जब यहाँ कोमोडोर पैरी ने प्रवेश किया तो जापान ने एकान्तवादी नीति को छोड़कर अपने को अन्य पश्चिमी देशों की भांति लाने का प्रयास किया। इस हेतु उसने बाहरी लोगों से व्यापारिक सम्बन्ध बनाना प्रारम्भ किया।

बोग्ज के अनुसार, “सीमा के कार्य व्यक्ति तथा वस्तुओं के संचरण से सम्बन्धित होते हैं। इनके कार्यों में विचार पद्धति, उत्पादन के ढंग, युद्ध तकनीक एवं मानव जीवन के ढंग के साथ परिवर्तन होते रहते हैं।”

प्रो. जोन्स के अनुसार, “सीमा कार्यों की सूची मानव कार्यों की सूची के समान है।”

स्पाइकमैन के अनुसार, “सीमा कार्यों को सैनिक एवं असैनिक प्रकारों में बाँटा जा सकता है। इनके कार्य परिवर्तनशील हो सकते हैं, किन्तु ये सरलता से नहीं बदलतीं।”

      सामान्यतः सीमाओं के कार्यों को निम्न प्रकार से समझा जा सकता है:

(1) सुरक्षात्मक कार्य (Defence Functions)-

       सीमाओं का प्रमुख कार्य सुरक्षात्मक रहा है। प्राचीन समय में तो सुरक्षा ही इनका प्रमुख कार्य था, किन्तु अब तो वायुयान, आदि के कारण ये उतनी सुरक्षा नहीं कर पाती हैं। सीमा राज्य की परिधि होती है तथा सुरक्षात्मक कार्य करती है। यदि वे ऐसा नहीं कर पातीं तो राज्य को जीवित रहने में कठिनाई होगी। इसीलिए प्राचीन समय में सीमाओं की किलेबन्दी होती थी।

     कौटिल्य ने सीमाओं की दृढ़ता तथा दुर्ग निर्माण पर विशेष बल दिया। चीन की दीवार इसका उत्तम उदाहरण है, किन्तु अब इनका यह कार्य लगभग समाप्त-सा है, क्योंकि युद्ध हवाई होने लगे हैं, अतः इनके ऊपर से होकर निकला जा सकता है। हवाई आक्रमण के बावजूद भी इनका सुरक्षात्मक कार्य है।

      सुरक्षात्मक दृष्टि से सीमा को दृढ़ बताते हुए होल्डिच ने लिखा है, “सीमाएँ अवरोध के रूप में होनी चाहिए, चाहे वे भौगोलिक या प्राकृतिक न होकर मानवीय ही हों, किन्तु मजबूत सैन्य सुरक्षा से सज्जित रहनी चाहिए।”

(2) अवरोधक कार्य (Barrier Functions)-

     ये अवरोधक के रूप में सदैव से कार्य करती रही हैं। इनके कारण कोई भी बाहरी देश आसानी से अन्दर प्रवेश नहीं कर सकता है। इनकी अवरोधक क्षमता सीमा के प्रकार तथा उसकी दृढ़ता पर आधारित होती है।

      सीमा के अवरोध के कारण ही एक राज्य दूसरे राज्य से अलग पहचान बनाता है। इस सम्बन्ध में कार्लसन का विचार है, “अन्तर्राष्ट्रीय सीमा मानव, वस्तुओं अथवा मशीनों की गति को रोकने में विस्तृत महासागरों, उच्च पर्वतों एवं शुष्क मरुस्थलों से अधिक प्रभावशाली है।”

(3) तटकर भित्ति के रूप में (In the Form of Tariff Wall)-

     सीमाएँ तटकर भित्ति के रूप में भी कार्य करती हैं। सभी राज्य अपने आन्तरिक लाभ हेतु प्रशुल्क सीमा को अधिक मजबूत बनाने का प्रयास करते हैं। देश के उत्पादन को बढ़ाने हेतु विदेशी माल पर तटकर अधिक लगाया जाता है। इसके द्वारा बाहर से आने वाला माल बाहर ही रोक दिया जाता है तथा देश का माल बाहर नहीं जाने दिया जाता है जब तक कि उस पर शुल्क वसूल न कर लिया जाए। जिन राज्यों की सीमाएँ तटकर के लिए खोल दी गई हैं, वहाँ सीमाएँ समाप्त-सी हैं।

(4) आवागमन तथा व्यापार (Migration and Trade)-

     सीमा का यह भी कार्य है कि वह लोगों के आवागमन तथा व्यापार को बढ़ावा देती है। विभिन्न संस्कृतियों से मेल मिलाप भी होता है। यद्यपि अपनी-अपनी सीमा में सभी राज्यों के निवासी स्वतंत्र गति से विचरण करते हैं, किन्तु कई बार चरवाहे अपने जानवरों के साथ सीमा पार कर जाते हैं तथा ऋतु परिवर्तन के साथ पुनः वापस आ जाते हैं। इस तरह का दृश्य फ्रांस व स्पेन तथा अफ्रीका में स्पष्टतः देखा जा सकता है।

      फ्रांस व स्पेन के चरवाहे पिरेनीज में तथा पूर्वी अफ्रीका की मसाई जतियाँ भी सीमा पार करके चली जाती हैं। इनमें लैप्स फिन्स एवं खिरगीज प्रमुख हैं। वास्तविकता तो यह है कि इन्हें व्यापार के लिए पूर्णतः अभेद्य न बनाया जाए अर्थात् इन्हें व्यापार के लिए भी प्रयोग में लाया जाए।

(5) कानूनी कार्य (Legal Functions)-

      किसी भी राज्य की सीमा तक उसके कानून लागू होते हैं, अतः इस परिधि में हने वाले सभी व्यक्तियों को वे कानून मानने पड़ते हैं जो उस राज्य द्वारा बनाए जाते हैं। इस सीमा रेखा से बाहर के लोगों प उन कानूनों को नहीं लगाया जा सकता है।


14. हिन्द महासागर के भूराजनीतिक महत्व 

14. हिन्द महासागर के भूराजनीतिक महत्व



हिन्द महासागर

हिन्द महासागर का भूराजनीतिक महत्व 

        19वीं शताब्दी के आरम्भ में अमेरीकी नौसेना विशेषज्ञ अल्फ्रेड माहन ने कहा था, “जो भी देश हिन्द महासागर को नियंत्रित करता है वह एशिया पर वर्चस्व स्थापित करेगा। यह महासागर सात समुद्रों की कुंजी है। 21वीं शताब्दी में विश्व का भाग्य निर्धारण इसकी समुद्री सतहों पर होगा।” माहन का यह कथन सिर्फ ब्रिटेन के लिए ही नहीं, बल्कि अमेरीका सहित सभी विश्व शक्तियों के लिए नौसैनिक नीति निर्धारण करता आ रहा है।

         वर्तमान समय में हिन्द महासागर विश्व का ऐसा क्षेत्र है जो अस्थिर और अशान्त है। राजनीतिक हलचल और महाशक्तियों की प्रतिद्वन्द्विता इस क्षेत्र की मूल विशेषताएँ हैं। जब से नौसैनिक शक्ति के महत्व को समझा जाने लगा है, विशेषकर द्वितीय महायुद्ध के बाद से, तब से यह क्षेत्र संघर्ष, तनाव और टकराव का केन्द्र बन गया है। अपना नौसैनिक वर्चस्व स्थापित करने के लिए विश्व की महाशक्तियाँ विशेषकर अमेरीका व सोवियत संघ, हिन्द महासागर में अपनी उपस्थिति बढ़ाती रही हैं।

हिन्द महासागर : भौगोलिक स्थिति एवं महत्व

         हिन्द महासागर विश्व का तीसरा बड़ा महासागर है। यह 10,400 किलोमीटर लम्बा, 9,600 किलोमीटर चौड़ा है। यह संसार के 20.6% समुद्री क्षेत्र में फैला हुआ है और 47 राज्य उसके तटों को छूते हैं। पूरब से पश्चिम की दिशा में यह आस्ट्रेलिया से अफ्रीका तक और उत्तर से दक्षिण में यह केप कोमोरिन से अटलांटिक महाद्वीप तक फैला हुआ है। इसका जल आस्ट्रेलिया, एशिया और अफ्रीका के तीन महाद्वीपों को छूता है। मलक्का जलडमरूमध्य तथा स्वेज नहर के बीच से यह क्रमशः प्रशान्त महासागर के तीन महाद्वीप को छूता है। तीसरी दुनिया के अधिकांश राष्ट्र इसके तट पर स्थित हैं या इसके भीतरी प्रदेश में हैं। इसके 36 तटवर्ती और 11 भीतरी देश हैं।

       इस विशाल जल क्षेत्र में सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण द्वीप और प्रवालद्वीप हैं। आस्ट्रेलिया द्वीप तो पूरा महाद्वीप ही है। संसार में क्षेत्रफल की दृष्टि से पांचवां द्वीप मेडागास्कर भी यहाँ पर स्थित है। इसके अलावा श्रीलंका, सुमात्रा और जावा जैसे बड़े द्वीप, तीन बड़े द्वीप समूह तथा सारे महासागर में फैले अनेक छोटे-छोटे द्वीप हैं। 15वीं शताब्दी में एक मानचित्र बनाने वाले ने अनुमान लगाया था कि हिन्द महासागर में 12,600 टापू है।

       हिन्द महासागर का महत्व उसके जल मार्गों और उसके क्षेत्र में उपलब्ध कच्चे माल के कारण अत्यधिक है। इसके जल मार्ग पश्चिम और जापान के लिए जीवन रेखाएँ हैं जिनके बन्द होने या जिन पर विरोधी का प्रभुत्व स्थापित होने से उनके लिए जीवन-मरण का प्रश्न पैदा हो जाता है। इसके गर्भ में उपलब्ध कच्चे माल के भण्डार महाशक्तियों में प्रतिद्वन्द्विता के कारण हैं। विश्व का 37% तेल, 90% रबड़, 70% टिन, 79% सोना, 28% मैंगनीज, 27% क्रोमियम, 16% लोहा, 12.5% सिक्का, 11.5% टंगस्टन, 11% निकल, 10% जिंक, 98% हीरे और 60% यूरेनियम इसके क्षेत्र में पाये जाने की आशा है।

      इसकी समुद्री सतह पर उपलब्ध होने वाले स्रोतों, विशेषकर ऊर्जा स्रोतों की कमी नहीं सोवियत लेखक येठोनी सम्यात्सेव ने अपनी पुस्तक ‘हिन्द महासागर शान्ति और सुरक्षा की समस्याएं’ में लिखा है, “संयुक्त राज्य अमेरिका यहाँ से 40 तरह का कच्चा माल ले जाता है जिसमें यूरेनियम, लिथियम, बेरीलियम, इत्यादि सैनिक महत्व का कच्चा माल भी होता है। जापान अपनी तेल की प्रायः शत-प्रतिशत मांग फारस की खाड़ी के तेल से पूरी करता है। हिन्द महासागर क्षेत्र के देशों से ही वह 75 प्रतिशत लौह अयस्क 35 प्रतिशत कोक कोयले, 90 प्रतिशत बॉक्साइट, जिंक और प्राकृतिक खड़ का आयात करता है।”

        एक परिवहन मार्ग के नाते हिन्द महासागर का महत्व अपार है। यूरोप, पूर्वी अफ्रीका, पश्चिमी दक्षिणी और दक्षिण-पूर्वी एशिया, सुदूरपूर्व, आस्ट्रेलिया तथा ओशियाना को जोड़ने वाले जल एवं वायु मार्ग ययाँ से गुजरते हैं। हिन्द महासागर अटलांटिक और प्रशान्त महासागरों को जोड़ता है। जल मार्गों का जाल यहाँ सबसे घना है। उदाहरणार्थ, संसार में टैंकरों द्वारा ढोये जाने वाले खनिज तेल का 57 प्रतिशत ओर्मुज जलडमरूमध्य से होकर जाता है। हर ग्यारह मिनट में एक जहाज यहां से गुजरता है।

      कुछ समय पहले इस मार्ग से माल से लदे ईस्ट इण्डिया कम्पनी के जहाजों का ही आना-जाना होता था, परन्तु आज अमेरीका व रूस की पनडुब्बियाँ यहाँ से आती-जाती हैं एवं तेल से भरे सैकड़ों जहाज प्रत्येक माह जापान, यूरोप एवं उत्तरी व दक्षिणी अमेरीका जाने के लिए हिन्द महासागर से होकर ही गुजरते हैं क्योंकि इनके लिए यही मुख्य मार्ग बन गया है। हिन्द महासागर के ऊपर से जाने वाले वायुमार्गों का महत्व भी इधर बहुत बढ़ गया है। इनकी कुल लम्बाई दस लाख किलोमीटर से अधिक है। अन्तर-महाद्वीप वायुभागों की सेवाएं प्रदान करने वाले संसार के 240 हवाई अड्डो में से लगभग एक-तिहाई हिन्द महासागर क्षेत्र के देशों में हैं।

    उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि इस क्षेत्र में शान्ति और सहयोग का वातावरण बनाना तथा ऐसी परिस्थितियाँ पैदा करना कितना आवश्यक है जिनमें सभी अन्तर्राष्ट्रीय विधि के अनुरूप हिन्द महासागर का निर्बाध उपयोग कर सकें।

हिन्द महासागर महाशक्तियों की प्रतिस्पर्द्धा का केन्द्र

       द्वितीय महायुद्ध से पूर्व हिन्द महासागर के अधिकांश तटवर्ती क्षेत्रों पर ब्रिटेन का नियंत्रण था तथा हिन्द महासागर को ब्रिटेन की झील के नाम से पुकारा जाता था। द्वितीय महायुद्ध की समाप्ति के साथ हिन्द महासागर के तटवर्ती क्षेत्रों से ब्रिटेन का प्रभुत्व समाप्त होने लगा; 1966 में ब्रिटेन ने स्वेज से पूर्व में स्थित अपने नौ सैनिक अड्डों को धीरे-धीरे समाप्त करने की घोषणा कर दी। इससे यह क्षेत्र महाशक्तियों की राजनीति का एक प्रधान अखाड़ा बन गया। इस सम्बन्ध में तीन दृष्टिकोण प्रचलित हैं-

     प्रथम यह कहा जाता है कि हिन्द महासागर में अमेरीकी हित उसकी साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं से प्रेरित हैं, तथा वह जानबूझकर सोवियत प्रसारवाद का भूत खड़ा कर रहा है।

     द्वितीय, कतिपय विद्वानों का मत है कि महाशक्तियों की हिन्द महासागर में रुचि शीत युद्ध का एक विस्तार है जिसने इस क्षेत्र में अति शक्ति प्रतिद्वन्द्विता को जन्म दिया है।

     तृतीय, कतिपय चीनी और अमेरीकी कूटनीतिज्ञ किसिंगर आदि यह मानते हैं कि सोवियत संघ इस क्षेत्र में अपना आधिपत्य स्थापित करने को लालायित रहा है।

       भारत और आस्ट्रेलिया को छोड़कर किसी तटवर्ती देश के पास बड़ी नौसेना नहीं है और भारत और ऑस्ट्रेलिया की नी सेनाएँ भी बाहरी शक्तियों की नौसेनाओं की तुलना में बहुत साधारण हैं। बाहरी शक्तियों के हस्तक्षेप की स्थिति में महासागरीय क्षेत्र कमजोर और असुरक्षित होता है।

      1960 के दशक के अन्तिम वर्षों में ब्रिटिश नौसेना ने इस क्षेत्र से हटना प्रारम्भ कर दिया। इससे इस महासागर में अन्य शक्तियों की गतिविधियाँ प्रारम्भ हो गयीं। इन शक्तियों के इस क्षेत्र में रुचि के अनेक कारण हैं-व्यापारिक, राजनीतिक, सामरिक। इस समय इस महासागर में भारतीय नौसैनिक बेड़ा है, अमेरीका का सातवां नौसैनिक बेड़ा है, रूस की पनडुब्बियाँ और लड़ाकू जहाज हैं, ब्रिटेन और फ्रांस के घटते हुए पर महत्वपूर्ण नौसैनिक हित हैं तथा चीन और जापान की उभरती हुई नौसैनिक उपस्थिति है। इस समय कुल मिलाकर हिन्द महासागर में 181 विदेशी युद्धपोत तैनात हैं। इनमें से अमेरीका के 77, रूस के 40, ब्रिटेन के 18, और फ्रांस के 33 युद्धपोत शामिल हैं।

हिन्द महासागर में अमेरीकी उपस्थिति:-

        हिन्द महासागर में अमेरीका की उपस्थिति सन् 1959 के बाद से ही देखी जा सकती है जब उसने साम्यवाद के प्रतिरोध की नीति अपना ली थी। अमेरीका ने हिन्द महासागर क्षेत्र से अपनी उपस्थिति का विस्तार उस समय करना प्रारम्भ किया जब ब्रिटेन ने यह संकेत दिया था कि वह हिन्द महासागर क्षेत्र से हटने की मजबूरी में है। अमेरीकी विचारकों का मत था कि हिन्द महासागर क्षेत्र से ब्रिटिश वापसी से वहाँ एक शक्ति-शून्य उत्पन्न हो जायेगा जिसका भरा जाना आवश्यक है। अगस्त 1964 में आंग्ल-अमेरीकी संयुक्त दल ने सैनिक अड्डों के लिए द्वीपों के चुनाव के निमित्त हिन्द महासागर का संयुक्त सर्वेक्षण किया।

       1970 के दशक में अमेरीका का हिन्द महासागर के मुख्य प्रवेश द्वारों पर नियंत्रण हो गया। उसने सामन्स टाउन पर अर्थात् हिन्द महासागर में अटलाण्टिक महासागर के केप मार्ग द्वारा प्रवेश पर नियंत्रण स्थापित कर लिया; मसीरा पर अर्थात् डियागो गार्शिया पर अर्थात् मध्यवर्ती हिन्द महासागर और दक्षिण से प्रवेश पर नियंत्रण कर लिया; कोकबर्न साउण्ड और केप उत्तर-पश्चिम पर अर्थात् प्रशान्त महासागर के दक्षिण से हिन्द महासागर में प्रवेश पर नियंत्रण कर लिया।

      अमेरीका ने आसियन (ASEAN) देशों के साथ मधुर सम्बन्ध स्थापित करके मलक्का जलडमरूमध्य पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। कहा जाता है कि अमेरीका अब हिन्द महासागर के सभी प्रवेश पथों को नियंत्रित करता है और उसने हिन्द महासागर को एक अमेरीकन झील में परिवर्तित कर लिया है।

    हिन्द महासागरीय क्षेत्र में अमेरीका के न्यस्त आर्थिक हित बड़े महत्वपूर्ण हैं। अर्थशास्त्रियों की गणनाओं के अनुसार हिन्द महासागर क्षेत्र के देशों की अर्थव्यवस्थाओं में अमेरीका का सीधा पूँजी-निवेश दस अरब डॉलर से अधिक का है। विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था में लगाये गये हर डॉलर से अमेरीका 4.25 डॉलर का लाभ पाता है। जिन देशों से यह लाभ पाया जाता है, उनमें अधिसंख्य हिन्द महासागर क्षेत्र में ही स्थित हैं।

      हिन्द महासागर में अमेरीका की उपस्थिति का अन्दाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसमें उसके न केवल स्थायी सैनिक अड्डे हैं बल्कि उसे अनेक देशों की हवाई पट्टियों और बन्दरगाहों के प्रयोग की सुविधाएँ भी उपलब्ध हैं। उसके परमाणु अस्त्रों से लैसे युद्धपोत इसमें निरन्तर गश्त लगाते हैं। अमेरीका का ‘निमित्ज’ नामक विमान वाहक जहाज भी यहाँ विद्यमान है।

        डियागो गार्शिया उसका एकमात्र बन्दरगाह बन गया है। जिन देशों में अमेरीका को हवाई पट्टियों या बन्दरगाहों की सुविधाएँ उपलब्ध हैं उनमें प्रमुख ये हैं- मिस्र में एट्ज्योन का हवाई सैनिक अड्डा, शर्म-अल-शेख का नौसैनिक अड्डा तथा रस बानस का अड्डा, सोमालिया में बरबेरा, पाकिस्तान में करांची के पश्चिम में ग्वादर का बन्दरगाह, कीनिया में मोम्बासा, ओमान में मसीरा हवाई अड्डा और मैराड, आस्ट्रेलिया में डार्विन हवाई अड्डा, आदि। इसके अतिरिक्त, बहरीन, जिबूती और सऊदी अरब में अमेरीका के पास स्थायी अड्डे हैं।

      अमेरीका के हिन्द महासागरीय अड्डों में डियागो गार्शिया सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। इस अड्डे का संचार नेटवर्क आणविक पनडुब्बियों से प्रक्षेपित सामरिक प्रक्षेपास्त्रों की दिशा निर्धारित करने की क्षमता रखता है। इस अड्डे का तेजी से विस्तार किया जा रहा है। इस अड्डे को नये नये शस्त्रास्त्रों से सुजज्जित किया जा रहा है। यहाँ नाभिकीय और रासायनिक अस्त्र रखे गये हैं। भण्डार पोतों को यहाँ स्थायी लंगर डालकर खड़ा किया गया है।

       डियागो गार्शिया’ अमेरीका का न केवल नौसैनिक अड्डा ही है, वरन् यहाँ पर वायुसैनिक अड्डे का भी निर्माण किया गया है। इसी द्वीप पर बारह हजार फीट लम्बी हवाई पट्टी का भी निर्माण किया गया है। डियागो गार्शिया पर अपनी सैनिक शक्ति को सुदृढ़ करके अमेरीका एशिया और अफ्रीका के महाद्वीपों पर अपने प्रभाव का विस्तार करना चाहता है और सोवियत संघ के नौसैनिक रास्तों पर नजर रखने लगा।

हिन्द महासागर में सोवियत उपस्थिति:-

          सोवियत संघ भी अपनी सुरक्षा नाम पर हिन्द महासागर क्षेत्र में सक्रिय रहा है। 1967 में ब्रिटेन द्वारा स्वेजपूर्व के नौसैनिक अड्डों को छोड़ देने की घोषणा के बाद हिन्द महासागर में प्रथम बार सोवियत नौसैनिक गतिविधियों की शुरूआत हुई। मार्च 1968 में पांच युद्धपोतों का एक सोवियत नौसैनिक स्क्वैड्रन दक्षिण एशिया, अरब सागर, फारस की खाड़ी, लाल सागर और पूर्वी अफ्रीका के बन्दरगाहों में पहुँचा। उसके बाद अनेक वर्षों तक सोवियत संघ का एक नौसैनिक स्क्वैड्रन हिन्द महासागर की यात्रा करता रहा। 1979 से सोवियत संघ ने हिन्द महासागर में अधिक संख्या और अधिक बार युद्धपोत भेजना प्रारम्भ कर दिया।

       लगभग 20 से 40 सोवियत जहाज इस क्षेत्र में लगातार उपस्थित रहने लगे। बाद में सोवियत संघ ने सोकोतरा द्वीप अदन, होदेदा, सिचेलेस और कम्पूचिया में कुछ सुविधाएँ प्राप्त की, परन्तु अमेरीका के समान कोई स्थायी सैनिक या असैनिक अड्डा प्राप्त नहीं किया।

      सोवियत संघ के अनुसार अपनी सुरक्षा के खातिर ही उसे हिन्द महासागर में अपने युद्धपोत रखने पड़ रहे हैं। सोवियत संघ के यहाँ कभी कोई अड्डे नहीं रहे और न ही वह कोई अड्डा बनाने का इरादा रखता था।

हिन्द महासागर में फ्रांस और चीन:-

      री यूनियन द्वीप पर फ्रांस का अधिकार है, इसलिए फ्रांस भी कभी-कभी इस क्षेत्र में घुसपैठ करता रहता है। हाल ही में चीन भी हिन्द महासागर में रुचि लेने लगा है। चीन हिन्द महासागर में सोवियत संघ का प्रतिद्वन्द्वी बनना चाहता था। हाल ही में उसने कोको द्वीप पर अपनी नौसेनाएँ तैनात कर दी हैं। म्यांमार की गुंटा सरकार ने अण्डमान द्वीपों के निकट कोको द्वीप जिस पर बर्मी सम्प्रभुता है चीन को लीज पर दे दिया है। तथा चीन ने वहाँ पर एक भारी नौसैनिक अड्डा तैयार कर लिया है। अब तो चीनी पनडुब्बियाँ बंगाल की खाड़ी के मुहाने तक पहुंच चुकी हैं।

      इस प्रकार इसे महाशक्तियों की सीनाजोरी ही कहा जायगा कि वे तटवर्ती देशों की मांग की उपेक्षा करके हिन्द महासागर के शान्त जल को अशान्त बनाने पर तुली हुई हैं। महाशक्तियाँ हिन्द महासागर को अपने शक्ति प्रदर्शन का अखाड़ा बना सकती हैं, इस सम्भावना को ध्यान में रखते हुए ही भारत ने 1975 में हिन्द महासागर को ‘शान्त क्षेत्र’ घोषित किये जाने की मांग उठायी थी।

पर्यावरण प्रदूषण के खतरे-

       हिन्द महासागर पर पर्यावरण प्रदूषण का प्रकोप कुछ अधिक ही रहा है। वर्तमान समय में सैनिक खतरों से भी अधिक गम्भीर खतरा पर्यावरण प्रदूषण से है जिसके कारण इस महासागर के अस्तित्व का प्रश्न उठ खड़ा हुआ है। हिन्द महासागर विश्व के दो प्रमुख जल मार्गों में से एक है। जिन देशों में जलमार्ग के माध्यम से तेल की आपूर्ति होती है उनके जहाज प्रायः इसी महासागर से होकर जाते हैं। इस कारण इस मार्ग पर चलने वाले तेल के टैंकरों से रिसने वाला तेल हिन्द महासागर में गिरता है एवं पानी को प्रदूषित करता है।

     इतना ही नहीं, इस महासागर में ही तेल के खाली टैंकरों को धोया भी जाता है। इस प्रकार तेल का कचरा भी अत्यधिक मात्रा में समुद्र के पानी में मिल जाता है। समुद्र के बीच में जहाजों को धोना जहाजरानी व पर्यावरण कानून का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन है।

       वैज्ञानिकों का मानना है कि टैंकरों से गिरा कुछ तेल समुद्र के जल में मिल जाता है, बाकी तेल कचरे के साथ ठोस पिण्ड बनकर समुद्र के तल में बैठ जाता है। कुछ तेल तेज लहरों के साथ समुद्र तट पर आ जाता है, परन्तु जो तेल कचरा रहित समुद्र के तल में बैठ जाता है उससे प्रति वर्ष हजारों टन के ठोस पिण्ड समुद्र में बन जाते हैं। ये पिण्ड लगातार पर्वताकार होते जा रहे हैं।

हिन्द महासागर की समस्या और भारतीय दृष्टिकोण

       भारत दक्षिणी एशिया का न केवल प्रमुख देश है अपितु गुटनिरपेक्ष आन्दोलन का अगुआ भी है। भारत सारे संसार में ही और, बेशक एशिया में भी, शान्ति और सुरक्षा के लिए संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। एशिया में आधिपत्यवादी ध्येयों की पूर्ति और विश्व प्रभुत्व की स्थापना की। साम्राज्यवादी देशों की नीति के कारण यहाँ तनाव में वृद्धि पर भारत गम्भीर चिन्ता व्यक्त करता है। भारत के विदेश मंत्रालय की 1981-82 की वार्षिक रिपोर्ट में हिन्द महासागर में महाशक्तियों द्वारा नये अड्डों की खोज को एक प्रमुख कारण बताया गया।

     एशिया महाद्वीप में सामान्य स्थिति में उत्पन्न जटिलता को देखते हुए भारत अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा तभी सुनिश्चित कर सकता है, जबकि न केवल उसकी सीमाओं से लगे भागों में, बल्कि सारे एशिया में तनाव में शिथिलता आये, शान्ति और स्थिरता का वातावरण बने। यही कारण है कि भारतीय नेता दक्षिणी एशिया में तनाव बढ़ाये जाने और हिन्द महासागर का सैन्यीकरण करने के विरोध को, दक्षिण-पूर्वी और दक्षिण-पश्चिमी तथा सुदूरपूर्व में राजनीतिक नियमन लाने में सहयोग को देश की विदेश नीति के प्रमुख कार्यभारों में गिनते हैं।

        हिन्द महासागर के बढ़ते सैन्यीकरण पर भारत में उचित ही चिन्ता व्याप्त हो रही है। इस सैन्यीकरण का भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों पर सीधा प्रभाव पड़ता है। वस्तुतः भारत के व्यापक राष्ट्रीय, सुरक्षात्मक और आर्थिक हित इसके शान्त बने रहने पर निर्भर करते हैं।

     प्रथम, हिन्द महासागर का जल भारत को तीन दिशाओं से छूता है। इसके शान्त और स्थिर रहने से उसकी समुद्री सीमाएं सुरक्षित हैं।

       द्वितीय, भारत की सीमाएं हिन्द महासागर में सैकड़ों मील दूर तक चली गयी हैं। उसमें स्थित सैकड़ों द्वीपों की सुरक्षा इसके शान्त बने रहने पर ही निर्भर करती है। उदाहरणार्थ, केवल बंगाल की खाड़ी में उसके 667 द्वीप हैं और अरब सागर में 508 द्वीप हैं। अण्डमान और निकोबार द्वीपों की सुरक्षा, जो भारतीय तट से क्रमश: 500 और 700 मील दूर हैं, इसके शान्त बने रहने पर ही निर्भर करती है।

       तृतीय, भारत को दूसरे क्षेत्रों और महाद्वीपों से जोड़ने वाले समुद्री और वायु मार्ग यहाँ से गुजरते हैं। इन मार्गों की सुरक्षा उसके लिए बुनियादी महत्व का प्रश्न है। यह बात देश की 6 हजार किलोमीटर से अधिक लम्बी समुद्री सीमा के लिए भी सही है और देश के प्रमुख औद्योगिक एवं सांस्कृतिक केन्द्रों के लिए भी, क्योंकि वे मुख्यतः सागर तट पर या उससे थोड़ी दूर ही स्थित हैं।

       चतुर्थ, हिन्द महासागर के अनेक द्वीपों में जैसा कि श्रीलंका, मालदीव, मारीशस, सेशेल्स आदि में भारतीय मूल के अनेक लोग निवास करते हैं, उनके हितों और अधिकारों की रक्षा की भी आवश्यकता है।

      पंचम, तेल और दूसरे खनिज भण्डारों के दोहन की, मत्स्य पालन के विकास की भारत की व्यापक योजनाएँ भी सागर से ही जुड़ी हुई हैं।

        स्पष्ट ही है कि ये योजनाएँ शान्तिपूर्ण है। इनका ध्येय देश की आर्थिक उन्नति करना, जनता की खुशहाली बढ़ाना है। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट है कि अमेरीका द्वारा हिन्द महासागर के सैन्यीकरण से भारत की सुरक्षा के लिए खतरा है। भारतीय विद्वान जेड इमाम ने चिन्ता व्यक्त करते हुए पैट्रियट में लिखा है, “डियागो गार्शिया अड्डे से छोड़े गये नाभिकीय अस्त्रयुक्त प्रक्षेपास्त्र कुछ मिनटों में ही नई दिल्ली पहुँच सकते हैं।” अतः हिन्द महासागर के परिप्रेक्ष्य में भारत इस समूचे क्षेत्र को ‘शान्ति क्षेत्र’ घोषित करने तथा इस प्रश्न पर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन बुलाने के समर्थन में अपनी आवाज बुलन्द करता आया है।

          हिन्द महासागर में शान्ति क्षेत्र के प्रश्न का अपना इतिहास है। 1964 में यह विचार रखा गया था कि इस महासागर को ‘शान्ति और चैन’ का क्षेत्र घोषित करने सम्बन्धी अन्तर्राष्ट्रीय समझौता किया जाय। ऐसा प्रस्ताव काहिरा में हो रहे गुटनिरपेक्ष देशों के दूसरे सम्मेलन में श्रीलंका ने रखा था। एशिया और अफ्रीका के गुटनिरपेक्ष देशों ने इस पहल का समर्थन किया। परिणामस्वरूप, काहिरा सम्मेलन के प्रस्ताव में यह परामर्श प्रकट हुआ कि सर्वप्रथम उन महासागरों को परमाणु अस्त्र-रहित क्षेत्र घोषित किया जाये, जहाँ अभी ऐसे अस्त्र नहीं पहुंचे हैं। हिन्द महासागर में फौजी अड्डे बनाने के साम्राज्यवादी राज्यों के इरादे की सम्मेलन में भर्त्सना की गयी।

        सातवें और आठवें दशक में हिन्द महासागर को परमाणु अस्त्र-रहित घोषित करने का विचार अधिसंख्य तटवर्ती देशों के लिए अपर्याप्त हो गया था। वे अब अपना लक्ष्य यह मानते थे कि इस महासागर में न केवल नाभिकीय अस्त्रों को न आने दिया जाये, बल्कि यहाँ साम्राज्यवादी ताकतों की सैनिक उपस्थिति को ही रोका जाये। इस प्रकार उपर्युक्त विचार का आगे विकास हुआ और हिन्द महासागर को शान्ति क्षेत्र घोषित करने का प्रश्न अधिकाधिक सक्रिय रूप से उठाया जाने लगा।

      1970 में लुसाका में हुए गुटनिरपेक्ष देशों के तीसरे शिखर सम्मेलन में श्रीलंका ने यह प्रस्ताव रखा कि संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्द महासागर को शान्ति क्षेत्र बनाने सम्बन्धी पेशकश की जाये। इस सम्मेलन में स्वीकृत ‘संयुक्त राष्ट्र के बारे में प्रस्ताव’ में सम्मेलन के सहभागियों ने एक ऐसा घोषणा-पत्र तैयार करने का समर्थन किया, जिसमें सभी देशों से आह्वान किया जाये कि वे हिन्द महासागर को शान्ति क्षेत्र मानें वहाँ थलसेना, नौसेना या वायुसेना किसी का भी कोई विदेशी अड्डा न हो और साथ ही इस क्षेत्र में नाभिकीय अस्त्र न लगाये जायें।

       संयुक्त राष्ट्र महासभा के 26वें अधिवेशन में 16 दिसम्बर, 1971 को हिन्द महासागर को शान्ति क्षेत्र घोषित करने सम्बन्धी घोषणा-पत्र स्वीकार किया गया। इसका मसौदा निम्न 13 देशों ने तैयार किया- इराक, ईरान, कीनिया, जाम्बिया, तंजानिया, बुरुण्डी, भारत, यमन, युगाण्डा, यूगोस्लाविया, श्रीलंका, सोमाली और स्वाजीलैण्ड। इस घोषणा पत्र में कहा गया था कि संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा यह विश्वास रखते हुए कि विशाल भौगोलिक क्षेत्र में शान्ति क्षेत्र की स्थापना समानता और न्याय के आधार पर सार्विक शान्ति लाने पर सुप्रभाव डाल सकती है, संयुक्त राष्ट्र संघ के ध्येयों और सिद्धान्तों के अनुरूप:

       “घोषणा करती है कि हिन्द महासागर को उन सीमाओं में, जिन्हें अभी निर्धारित किया जाना है, इसके ऊपर फैले आकाशीय क्षेत्र तथा उसके समुद्र तल सहित इस प्रस्ताव द्वारा चिरकाल के लिए शान्ति क्षेत्र घोषित किया जाता है।”

        घोषणा-पत्र में बड़े देशों से आह्वान किया गया कि वे हिन्द महासागर में सैनिक उपस्थिति का विस्तार रोकने, यहाँ से अपने सभी फौजी अड्डे, फौजी ठिकाने, नाभिकीय संयंत्र और जनसंहार के शस्त्रास्त्र हटाने तथा अपनी सैनिक उपस्थिति का प्रदर्शन समाप्त करने के उद्देश्य से तटवर्ती देशों, इस क्षेत्र के निकटवर्ती देशों, सुरक्षा परिषद् के स्थायी सदस्य देशों का भी आह्वान किया गया कि वे इस बात को आवश्यक प्रत्याभूति दें कि हिन्द महासागर के इलाके में जो युद्धपोत और वायुसैनिक टुकड़ियाँ हैं वे बल प्रयोग का खतरा पैदा नहीं करेंगी; वे हिन्द महासागर के तटवर्ती या निकटवर्ती किसी देश की सम्प्रभुता, क्षेत्रीय अखण्डता या स्वतंत्रता को खतरे में न डालें।

        26वें अधिवेशन में इस प्रस्ताव के पक्ष में 61 देशों ने मत दिया और 55 ने मतदान में भाग नहीं लिया। इसके विरुद्ध किसी ने मत नहीं दिया।

       सन् 1993 में महासभा ने हिन्द महासागर को शान्ति क्षेत्र बनाने का संकल्प पारित किया। इस संकल्प में हिन्द महासागर को शान्ति क्षेत्र घोषित करने की 1971 की घोषणा का अनुसरण किया गया।

        संक्षेप में, भारत हिन्द महासागर क्षेत्र की लगभग आधी जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करता है, अतः इस क्षेत्र में भूमिका निभाने के लिए प्रयत्नशील है। भारत इस बात का समर्थन करता है कि:

      मुख्य हिन्द महासागर शान्ति क्षेत्र घोषित किया जाय; सभी विदेशी अड्डों का उन्मूलन हो; यहाँ नाभिकीय शस्त्रास्त्र तथा जनसंहार के दूसरे शस्त्रास्त्र न लगाये जायें; तटवर्ती और तटेनर देशों के विरुद्ध नाभिकीय अन्त्रों का उपयोग न हो और सभी नाभिकीय राष्ट्र तत्सबन्धी दायित्व ग्रहण कर लें; यहाँ ऐसी सशत्र सेनाएँ और शास्त्रास्त्र न रखे जायें जो इस क्षेत्र के देशों की सम्प्रभुता, क्षेत्रीय अखण्डता और स्वतन्त्रता के लिए खतरा पेश करें। भारत की इन प्रस्थापनाओं की पूर्ति से हिन्द महासागर वास्तव में ही शान्ति क्षेत्र बन सकता है। मार्च 1983 में दिल्ली में हुए गुटनिरपेक्ष देशों के सातवें शिखर सम्मेलन में हिन्द महासाग के प्रश्न की ओ विशेष ध्यान दिया गया।


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12. राज्यों की उत्पत्ति के सिद्धान्तों का विवरण

12. राज्यों की उत्पत्ति के सिद्धान्तों का विवरण


    राज्यों की उत्पत्ति  

     रक्त सम्बन्ध से समाज बनता है और समाज से अन्ततः राज्य बनता है। मानव अपने जन्म से ही समुदाय में रहता आया है और इसमें अपने साथियों से सामूहिक प्रगति तथा कल्याण के लिए भौतिक लाभ प्राप्त करता है। राज्यों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में अनेक धारणाएँ एवं विचार बने। इन्हें दो वर्गों में से रखा गया है:-

(1) परिकलित सिद्धान्त एवं

(2) ऐतिहासिक सिद्धान्त।

       सामान्य तौर पर राज्य की उत्पत्ति से सम्बन्धित सिद्धान्त निम्नांकित हैं:

(1) दैवीय उत्पत्ति का सिद्धान्त (Theory of Divine Origin):-

        यह सबसे प्राचीन सिद्धान्त है। इसके अनुसार राज्य मानवीय नहीं अपितु ईश्वर द्वारा स्थापित एक दैवीय संस्था है। ईश्वर राजा के रूप में अपने किसी प्रतिनिधि को नियुक्त करता है। राजा ईश्वर का प्रतिनिधि है अतः वह ईश्वर के प्रति ही उत्तरदायी है।

     राजा की आज्ञाओं का पालन करना प्रजा का परम कर्तव्य है। यहूदी धर्म ग्रन्थ के अनुसार स्वयं ईश्वर ने अपनी जनता पर राज किया, मिस्र में राजा को सूर्यदेव का पुत्र कहा गया, चीन में सम्राट को स्वर्ग पुत्र माना गया, बाइबिल के अनुसार सत्ता ईश्वर के आदेश से बनी।

    राज्य विकास में यह सिद्धान्त मनुष्य के योगदान की उपेक्षा करता है जबकि राज्य के विभिन्न स्वरूप का परिवर्तन मानवीय लक्षण है, ईश्वरीय नहीं।

     आज के वैज्ञानिक और प्रगतिशील विश्व ने राज्य की उत्पत्ति के दैवीय सिद्धान्त को अस्वीकार कर दिया, जबकि प्रारम्भिक समय में यह सिद्धान्त अत्यन्त उपयोगी रहा।

गिलक्राइस्ट के शब्दों में “यह सिद्धान्त चाहे कितना ही गलत और विवेकशून्य क्यों न हो, अराजकता के अन्त का श्रेय इसे अवश्य ही जाता है।”

(2) शक्ति सिद्धान्त (Force Theory):-

       शक्ति सिद्धान्त के अनुसार राज्य की उत्पत्ति का कारण शक्ति है। इस सिद्धान्त के अनुसार राज्य और शासन शक्ति पर आश्रित हैं। जब शक्ति सम्पन्न लोगों ने अपनी शक्ति द्वारा निर्बलों को अपने अधीन कर लिया, तब राज्य की उत्पत्ति हुई। शक्ति सिद्धान्त के अनुसार मानव विकास के प्रारम्भ में कुछ शक्तिशाली मनुष्यों ने निर्बल मनुष्यों को अपने अधीन कर लिया।

      शक्तिशाली समूह का नेता पराजित समूह का भी नेता बन गया। धीरे-धीरे वही नेता इन समूहों का शासक हो गया। इसी क्रम से जनपद, राज्य व साम्राज्य उत्पन्न हुए। सभी राज्य प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इस सिद्धान्त का न्यूनाधिक समर्थन करते हैं। इससे निरंकुशता को प्रोत्साहन मिला है। प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में भी शक्ति के आधार पर राजा की स्थापना की बात कही गई है।

     जैसे-ऐतरेय ब्राह्मण एवं तैत्तिरीय ब्राह्मण में बताया गया है कि देवों और दानवों के युद्ध में जब देवता पराजित हो गए तो उन्होंने शक्तिशाली इन्द्र को अपना राजा बनाया और उसके नेतृत्व में विजय प्राप्त की।

     मध्य युग में भी राजा को पाशविक शक्ति का परिणाम बताया गया। पोप ग्रेगरी सप्तम के अनुसार, “राजाओं और सामन्तों की उत्पत्ति उन क्रूर आत्माओं से हुई है जो परमात्मा को भूलकर उद्दण्डता, लूटमार, कपट, हत्या और प्रत्येक अपराध से संसार के शासक के रूप में बुराई का प्रसार करते हुए अपने साथी मनुष्यों पर मदांधता और असहनीय धारणा के साथ राज्य करते रहे हैं।”

     आधुनिक युग में ट्रीटस्के, बनहार्डी, मारगेंथो तथा नीत्शे आदि विचारकों ने भी शक्ति सिद्धान्त का समर्थन किया है।

      यद्यपि यह सिद्धान्त राज्य की उत्पत्ति का एक महत्वपूर्ण कारक है तथा राज्य के अस्तित्व के लिए शक्ति अनिवार्य है तथापि हमें स्वीकर करना पड़ेगा कि केवल शक्ति के प्रयोग से ही राज्य की उत्पत्ति सम्भव नहीं हुई है। इसमें लोक कल्याण तथा जनमत की उपेक्षा की जाती है। फलतः राज्यास्था नहीं पनपती और राष्ट्रत्व के गुण उत्पन्न नहीं होते।

(3) सामाजिक अनुबन्ध सिद्धान्त (Social Contract Theory):-

       इस सिद्धान्त के अनुसार जब राज्य नहीं था तब प्राकृतिक अवस्था से समुदाय के लोग तंग आ गए और मिल जुलकर एक समझौता किया जिसके आधार पर राज्य का जन्म हुआ। इस सिद्धान्त का सूत्रपात 17वीं व 18वीं शताब्दी में हुआ और थॉमस हॉब्स, लॉक, जीन जेक्स रूसो इसके प्रबल समर्थक रहे। हॉब्स समझौते से पूर्व मनुष्य की प्राकृतिक अवस्था को दुखद व असुरक्षित बताता है जबकि लॉक इस अवस्था को सुख, शान्ति व पारस्परिक आदर पर आधारित मानते हैं।

हॉब्स के अनुसार प्राकृतिक अवस्था ‘शक्ति ही सत्य है’ की धारणा पर आधारित है।

हॉब्स के शब्दों में “वहाँ कोई व्यवस्था नहीं थी, कोई संस्कृति नहीं थी कोई विद्या नहीं थी कोई भवन निर्माण कला न थी और न कोई समाज था। मानव जीवन अत्यन्त दीन मलिन, पाशविक तथा अल्पकालिक था।” अतः मनुष्यों ने अपने जीवन तथा सम्पत्ति की सुरक्षा करके अपने दुखी जीवन से छुटकारा पाने के लिए परस्पर एक समझौता किया और एक राजनीतिक समाज का निर्माण हुआ।

      लॉक के अनुसार प्राकृतिक दशा में मनुष्य सुख और शान्ति का जीवन व्यतीत करता था। वह उस समय के नियम, “तुम दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करो जैसा व्यवहार तुम दूसरों से अपने प्रति चाहते हो” का पालन करते थे। लॉक के अनुसार, इस प्राकृतिक अवस्था में प्राकृतिक नियमों की स्पष्ट व्यवस्था नहीं थी, इन नियमों की व्याख्या करने के लिए कोई सभा नहीं थी तथा इन नियमों का पालन करवाने वाली शक्ति का अभाव था।

      अतः समझौता द्वारा राज्य का निर्माण किया गया। रूसो ने हॉब्स तथा लॉक के सिद्धान्तों के मध्य समन्वय स्थापित किया तथा बताया कि राज्य की उत्पत्ति की अवस्था मानव अधिकारों के उपयोग हेतु आदर्श थी, किन्तु कालान्तर में जनसंख्या वृद्धि के कारण मनुष्य को प्राकृतिक अवस्था से शिष्ट अवस्था की ओर अग्रसर होने को बाध्य होना पड़ा।

(4) आनुवंशिक सिद्धान्त (Genetic Theory):-

         आनुवंशिक सिद्धान्त का समर्थन हेनरीमेन, मैकलेनन, जेक्स मोरगन आदि ने किया। दैवी शक्ति एवं सामाजिक समझौता सिद्धान्तों के विपरीत यह सिद्धान्त काल्पनिक तर्कों पर आधारित नहीं है, किन्तु इसका आधार आरम्भिक कबाइली जनसमूहों के जीवन से सम्बन्धित ऐतिहासिक खोजें या कल्पनाएँ हैं। इस सिद्धान्त के दो रूप हैं-

(1) मातृ सत्तात्मक एवं

(2) पितृ सत्तात्मक।

      आरम्भिक परिवार मातृ सत्तात्मक थे तथा सत्ता भी उन्हीं के हाथ रहती थी। परिवार तथा कबीला सामाजिक जीवन की ऐसी प्रथम इकाइयाँ हैं जो मानव की सामाजिकता की प्राकृतिक प्रकृति के फलस्वरूप गठित होती हैं और उनकी व्यवस्था तथा संचालन प्रक्रिया में राज्य के संगठन तथा संचालन प्रक्रिया के लक्षण से विद्यमान रहते हैं। कालान्तर में जब ये जनसमूह विस्तृत हो गए तो निश्चित भूखण्डों में रहने लगे।

       आरम्भिक परिवारों को मातृ सत्तात्मक मानने की कल्पना भले ही हो या न हो, परन्तु तर्क की दृष्टि से सही प्रतीत होती है। यह सम्भव है कि कालान्तर में इन परिवारों एवं कबीलों में स्थायी विवाह प्रथा प्रचलित हो गई होगी एवं परिवार बनने से परिवार के वृद्ध पुरुष को ही सत्ता सौंपी जाती थी।

हेनरीमेन के अनुसार, “प्रारम्भिक जनसमूह ऐसा परिवार है जो सर्वोच्च पुरुष पूर्वज के सामूहिक आधिपत्य के अधीन संयुक्त था। परिवारों के साथ योग से गोत्र या कुल बनता है। कुलों के योग से कबीला। कबीलों के योग से राज्य बनता है।”

(5) विकासवादी सिद्धान्त (Evolutionary Theory):-

       राज्य का विकास धीरे-धीरे हुआ है। राज्य के विकास में निम्नांकित तत्व सहायक हैं:

(i) मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज में रहने की मूल प्रवृत्ति ने ही राज्य को जन्म दिया।

अरस्तू के शब्दों में “यदि कोई मनुष्य ऐसा हो जो समाज में न रह सकता हो अथवा जो यह कहता है कि मुझे केवल अपने ही साधनों की आवश्यकता है तो उसे मानव समाज का सदस्य मत समझो। वह या तो जंगली जानवर है या देवता।”

(ii) रक्त सम्बन्ध ने जातियों और कुलों को एकता के बन्धन में बांधा और उन्हें संगठन का रूप दिया तथा दृढ़ता प्रदान की। सामाजिक संगठन रक्त सम्बन्ध से ही उत्पन्न होता है।

(iii) धर्म ने समाज को एकता के बन्धन में बांधा है। प्रारम्भिक समाज में रक्त सम्बन्ध तथा धर्म एक ही वस्तु के दो पहलू थे। धर्म संगठन एवं एकता के लिए एक महत्वपूर्ण तत्व रहा है। धर्म ने मनुष्य को अनुशासन तथा आज्ञापालन का पाठ पढ़ाया। इस प्रकार धर्म ने राज्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
(iv) राज्य के विकास में शक्ति का महत्वपूर्ण स्थान है। सामाजिक व्यवस्था को राजनीतिक व्यवस्था में बदलने का कार्य युद्ध द्वारा ही किया गया। युद्ध विजय और आज्ञापालन के फलस्वरूप कुटुम्ब जाति में, जाति कबीलों में तथा कबीले बड़े संगठनों में विस्तृत होते गए तथा राज्य का रूप धारण करते गए।

(v) राज्य की उत्पत्ति एवं विकास में मनुष्य की आर्थिक गतिविधियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। प्लेटो, मैकियावली, हॉब्स, लॉक, एडम स्मिथ और माण्टेस्क्यू ने भी राज्य की उत्पत्ति एवं विकास में आर्थिक तत्वों के योगदान को स्वीका किया है।

(vi) राज्य के विकास में योगदान देने वाला एक महत्वपूर्ण तत्व राजनीतिक चेतना है।


11. राज्य क्या है? राज्य के आवश्यक तत्व क्या हैं?

11. राज्य क्या है? राज्य के आवश्यक तत्व क्या हैं?



राज्य क्या है  

     राज्य शब्द अंग्रेजी भाषा के State का हिन्दी रूपान्तर है। इसकी उत्पत्ति यूनानी भाषा के पोलिस (Polis) से हुई है। प्राचीन यूनान के नगर राज्यों को पोलिस ही कहा जाता था। इसे विभिन्न विद्वानों ने विभिन्न समयों में परिभाषित किया है।

अरस्तू के अनुसार, “राज्य परिवार और ग्रामों का एक समुदाय है जिसका उद्देश्य पूर्ण एवं आत्मनिर्भर जीवन की प्राप्ति है।”

सेण्ट अगस्टाइन के अनुसार, “राज्य ऐसे व्यक्तियों की समझौते द्वारा निर्मित संस्था है। जिन्होंने अपना संगठन विधि और कर्तव्यों के प्रयोगों एवं पूर्ति के लिए तथा पारस्परिक सम्पर्क से लाभ की प्राप्ति के लिए बनाया है।”

    आधुनिक युग में राज्य के स्वरूप के विषय में विचार बदला है, अतः राज्य की नवीन परिभाषाएँ अस्तित्व में आई हैं। आधुनिक विचारकों के अनुसार राज्य का स्वरूप प्राप्त करने के लिए व्यक्तियों का एक निश्चित क्षेत्र में निवास भी होना चाहिए और शान्ति तथा व्यवस्था बनाए रखने के लिए कोई राजनीतिक सत्ता होनी चाहिए।

ब्लंटशली के शब्दों में, “किसी निश्चित भू-भाग में राजनीतिक दृष्टि से संगठित व्यक्तियों को राज्य कहा जाता है।”

लास्की के अनुसार, “राज्य एक ऐसा प्रादेशिक समाज है जो सरकार और प्रजा में विभाजित है और जो अपने निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में समुदायों पर सर्वोच्च सत्ता रखता है।”

फिलिमोर के अनुसार, “राज्य मनुष्यों का एक समुदाय है जो एक निश्चित भू-भाग पर स्थायी रूप से बसा हुआ हो और जो एक सुव्यवस्थित सरकार द्वारा उस भू-भाग की सीमा के अन्तर्गत व्यक्तियों तथा पदार्थों पर पूरा नियंत्रण तथा प्रभुत्व रखता हो और जिसे विश्व के अन्य किसी भी राज्य से सन्धि या युद्ध करने अथवा अन्य किसी प्रकार से अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध स्थापित करने का अधिकार प्राप्त हो।”

कार्लसन के अनुसार, “राज्य का क्षेत्र ग्लोब का वह भाग है, जिसकी सीमा में उसकी सर्वोच्च सत्ता होती है तथा वहाँ के निवासियों एवं साधनों पर प्रशासन होता है।”

प्रो. मूडी के अनुसार, “राज्य मात्र क्षेत्र या क्षेत्र में रहने वाले व्यक्ति से निर्मित नहीं है, अपितु यह एक अति जटिल संगठन है, जिसमें क्षेत्र, मनुष्य एवं उनका आपसी सम्बन्ध सम्मिलित रूप से एक इकाई बनाते हैं, जिनका एक व्यक्तित्व एवं चरित्र होता है, जो अन्य सभी राज्यों से भिन्नता का द्योतक है।”

डॉ. गार्नर के अनुसार, “राजनीतिक विज्ञान तथा सार्वजनिक धारणा के रूप में राज्य संख्या में कम या अधिक व्यक्तियों का ऐसा संगठन है जो किसी प्रदेश के निश्चित भू-भाग में स्थायी रूप से रहता हो जो बाहरी नियंत्रण से पूर्ण स्वतंत्र या लगभग स्वतंत्र हो और जिसका संगठित शासन हो जिसके आदेशों का पालन नागरिकों का विशाल समुदाय स्वभावतः करता हो।”

राज्य के आवश्यक तत्व

       ब्लंटशली के अनुसार, भू-भाग, जनता, एकता और संगठन राज्य के ये चार आवश्यक तत्व हैं।

गैटिल ने भी जनता, प्रदेश, सरकार तथा सम्प्रभुता ये चार तत्व राज्य के लिए आवश्यक माने हैं।

     डॉ. गार्नर के अनुसार, राज्य के चार आवश्यक तत्व हैं-

(1) मनुष्यों का समुदाय,

(2) एक प्रदेश, जिसमें वे स्थायी रूप से निवास करते हैं,

(3) आन्तरिक सम्प्रभुता तथा बाहरी नियंत्रण से स्वतंत्रता,

(4) जनता की इच्छा को कार्यरूप में परिणत करने हेतु एक राजनीतिक संगठन।

      वर्तमान में डॉ. गार्नर के विचारों को ही मान्यता प्राप्त है। राज्य के आवश्यक तत्व निम्नलिखित हैं:

(1) जनसंख्या ( Population)

(2) निश्चित भू-भाग (Definite Territory)

(3) सरकार (Government)

(4) सम्प्रभुता (Sovereignty)

(1) जनसंख्या:-

       राज्य का सर्वप्रथम तथा आवश्यक तत्व है- जनसंख्या। राज्य मनुष्यों का ही एक संगठन है। व्यक्तियों से ही मिलकर राज्य का निर्माण होता है। जनसंख्या के बिना राज्य की कल्पना ही नहीं की जा सकती। यदि जनसंख्या न हो तो कौन शासक होगा और प्रजा कहाँ से आएगी। राज्य का अस्तित्व मानव तत्व के अस्तित्व पर ही आश्रित है। मानव राज्य की आधारिशला है। मनुष्य राज्य का कच्चा माल है। अतः राज्य के निर्माण के लिए जनसंख्या का होना नितान्त आवश्यक है।

       अतः सभी विद्वान जनसंख्या को राज्य का आवश्यक तत्व मानते हैं। राज्य के तत्व के रूप में जनसंख्या की व्याख्या करने में सामान्यतः दो प्रश्न उपस्थित होते हैं। पहला, जनसंख्या कितनी होनी चाहिए तथा दूसरा जनसंख्या कैसी होनी चाहिए। किसी राज्य के लिए जनसंख्या कितनी होनी चाहिए, इस सम्बन्ध में विद्वानों के विचारों में मतभेद हैं।

      प्लेटो ने अपनी पुस्तक ‘रिपब्लिक’ में बताया है कि एक आदर्श राज्य में 5,040 नागरिक ही होने चाहिए।

      अरस्तू के अनुसार, राज्य की जनसंख्या 10,000 होनी चाहिए।

      हिटलर और मुसोलिनी के अनुसार, राज्य एक शक्ति है और यह शक्ति भली प्रकार से कार्य कर सके, इसके लिए अधिकतम जनसंख्या का होना आवश्यक है।

     राज्य के लिए यह आवश्यक है कि जनसंख्या कम-से-कम इतनी हो कि उन्हें ‘शासक’ और ‘शासित’ में विभाजित किया जा सके। आधुनिक युग में वैज्ञानिक प्रगति, आवागमन के साधनों के विकास तथा प्रतिनिध्यात्मक प्रणाली के प्रचलन के कारण जनसंख्या का कम या अधिक होना बहुत महत्वपूर्ण नहीं है।

     वास्तव में जनसंख्या राज्य के संगठन के निर्माण के लिए संख्या में पर्याप्त होनी चाहिए और वह वहाँ के प्राकृतिक साधनों तथा प्रदेश के अनुपात में होनी चाहिए। राज्य की जनसंख्या कितनी होनी चाहिए। इस सम्बन्ध में डॉ. गार्नर का कथन सत्य है कि “जनता राज्य के संगठन के निर्वाह के लिए संख्या में पर्याप्त होनी चाहिए तथा यह उससे अधिक नहीं होनी चाहिए जितनी के लिए भूखण्ड तथा राज्य के साधन पर्याप्त हों।”

      वर्तमान में भारत, चीन, अमेरिका जैसे करोड़ों जनसंख्या वाले राज्य भी हैं तथा सेनमेरिनो तथा मोनाको जैसे कुछ हजार की जनसंख्या वाले राज्य भी हैं।

       राज्य की जनसंख्या अर्थात् जनता कैसी हो, इसका राजनीतिक जीवन में अत्यधिक महत्व है। चूंकि जनता के स्वरूप पर ही राज्य का स्वरूप निर्भर करता है, अतः इस सम्बन्ध में संस्था की अपेक्षा गुण अधिक महत्वपूर्ण हैं। राज्य के नागरिक शारीरिक, मानसिक, नैतिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से स्वस्थ होने चाहिए।

अरस्तू के शब्दों में “श्रेष्ठ नागरिक ही श्रेष्ठ राज्य का निर्माण कर सकते हैं, अतः यह आवश्यक है कि नागरिक चरित्रवान हों। “

(2) निश्चित भू-भाग:-

     निश्चित भू-भाग राज्य का दूसरा आवश्यक तत्व है। निश्चित भू-भाग के अभाव में मनुष्यों द्वारा व्यवस्थित जीवन व्यतीत नहीं किया जा सकता।

ब्लंटशली के शब्दों में, “जैसे राज्य का वैयक्तिक आधार जनता है, उसी प्रकार उसका भौतिक आधार प्रदेश है। जनता उस समय तक राज्य का रूप धारण नहीं कर सकती, जब तक उसका कोई निश्चित प्रदेश न हो।”

गार्नर के शब्दों में, “ऐसी (फिरन्दर) अवस्था से लोग निर्माण की प्रक्रिया में राज्य हो सकते हैं, परन्तु वे तब तक राज्य नहीं होते जब तक वे स्थायी रूप से किसी निश्चित खण्ड पर स्थिर न हो जाएं।”

     राज्य के आवश्यक तत्व के रूप में निश्चित भू-भाग से अभिप्राय केवल भू-क्षेत्र से ही नहीं है अपितु इसके अन्तर्गत उस प्रदेश में विद्यमान नदियाँ, सरोवर झीलें, खनिज पदार्थ, समुद्र तटों से 12 मील तक का समुद्र तथा राज्य की सीमा के अन्तर्गत आने वाला वायुमण्डल भी सम्मिलित है।

       राज्य का क्षेत्र कितना होना चाहिए, इस सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद हैं। प्लेटो, अरस्तू, रूसो, डी. टाकविल, आदि छोटे राज्यों के पक्षधर हैं। वर्तमान में राज्य का कम क्षेत्र होना हानिकारक समझा जाता है, क्योंकि कम क्षेत्र वाले राज्य आर्थिक तथा जैविक दृष्टि से आत्मनिर्भर नहीं हो सकते हैं। आधुनिक युग में संघवाद की व्यवस्था के कारण बड़े राज्यों की स्थापना को बल मिला है। उत्पादन तथा जनशक्ति की दृष्टि से विशाल आकार वाले राज्य छोटे राज्यों से प्रायः बढ़कर ही होते हैं।

      राज्य के आकार के विषय में यह कहा जा सकता है, राज्य की जनसंख्या तथा क्षेत्र के बीच कोई अनुपात अवश्य होना चाहिए अन्यथा राज्य की प्रगति अवरुद्ध हो जाएगी। साथ ही राज्य का समस्त क्षेत्र परस्पर भली प्रकार से सम्बन्धित होना चाहिए। राज्य के विभिन्न टुकड़ों के बीच किसी प्रकार की प्राकृतिक बाधाएँ या किसी दूसरे राज्य का क्षेत्र नहीं होना चाहिए। यदि किसी राज्य के क्षेत्र एक-दूसरे से दूरी पर हों तो उसकी एकता को खतरा हो सकता है। सन् 1947 में पाकिस्तान का क्षेत्र त्रुटिपूर्ण था, क्योंकि पाकिस्तान राज्य के दो भाग पूर्वी तथा पश्चिमी पाकिस्तान एक-दूसरे से बहुत दूरी पर स्थित थे। यही दूरी पाकिस्तान के विघटन का कारण बनी।

(3) सरकार:-

      सरकार राज्य का संगठनात्मक तत्व है। किसी निश्चित प्रदेश के निवासी तब तक राज्य का स्वरूप धारण नहीं कर सकते जब तक कि उनका एक राजनीतिक संगठन न हो। यह राजनीतिक संगठन सरकार है जो राज्य के लक्ष्य तथा नीतियों को क्रियान्वित करता है।

     वस्तुतः सरकार राज्य का वह अभिन्न अंग है जिसके द्वारा राज्य उन उद्देश्यों की पूर्ति करता है जिसके लिए उसका संगठन होता है। यह वह एजेन्सी है जिसके माध्यम से राज्य के संकल्प बनते हैं और उसकी अभिव्यक्ति होती है। सरकार ही व्यवस्था स्थापित करती है और कानून पालन करने के लिए पुलिस या अन्य प्रकार की शक्ति का प्रयोग करती है। इस प्रकार, सरकार राज्य का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण निर्माणक तत्व है।

गैटिल के अनुसार, “सरकार के अभाव में जनसंख्या असंयमित, अराजक या विप्लवी जनसमूह हो जाएगा और किसी भी सामूहिक कार्य का होना असम्भव हो जाएगा।”

डॉ. गार्नर के अनुसार, “सरकार राज्य का वह साधन या यंत्र है जिसके द्वारा राज्य के उद्देश्य अर्थात् सामान्य नीतियों और सामान्य हितों की पूर्ति होती है। सरकार के बिना जनता असंगठित या अराजक जनसमूह के रूप में होगी जो सामूहिक रूप से कोई भी कार्य करने में अक्षम होगा।”

      प्रारम्भिक काल में सरकार का संगठन सरल और कार्य सीमित थे, किन्तु वर्तमान में सरकार का संगठन जटिल हो गया है। सरकार के तीन अंग हैं—व्यवस्थापिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका। अतीत में सरकार का कार्य शान्ति तथा व्यवस्था बनाए रखना तथा बाहरी आक्रमण से रक्षा करना था, किन्तु आज लोक-कल्याणकारी राज्य की धारणा अपना लिए जाने के कारण राज्य के कार्यों में अत्यधिक वृद्धि हो गई है।

     सरकार का कोई एक निश्चित स्वरूप नहीं है। सरकार राजतन्त्रात्मक, कुलीनतन्त्रात्मक या प्रजातन्त्रात्मक किसी भी प्रकार की हो सकती है, जैसे—चीन, पोलैण्ड में साम्यवाद; सऊदी अरब, जोर्डन, आदि में राजतंत्र; टर्की, लीबिया में सैनिक शासन; भारत, ब्रिटेन व जापान में संसदीय लोकतंत्र तथा संयुक्त राज्य अमेरिका में अध्यक्षात्मक लोकतंत्र है।

(4) सम्प्रभुता:-

गैटिल के अनुसार, “सम्प्रभुता ही राज्य का वह लक्षण है जो उसे अन्य समुदायों से अलग करता है।”

    सम्प्रभुता सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व है। सम्प्रभुता राज्य का प्राण है। इसके अभाव में राज्य अस्तित्व में नहीं आ सकता। किसी निश्चित प्रदेश में रहने वाले सरकार सम्पन्न लोग भी उस समय तक राज्य का निर्माण नहीं कर सकते, जब तक कि इनके अधिकार में सम्प्रभुता न हो, जैसे- स्वतन्त्रता प्राप्ति से पूर्व भारत एक राज्य नहीं था, क्योंकि वह सम्प्रभुता-सम्पन्न न होकर ब्रिटिश नियंत्रण में था।

      राज्य की सम्प्रभुता से अभिप्राय है कि राज्य अपने क्षेत्र में स्थित सभी व्यक्तियों तथा समुदायों को आज्ञा प्रदान कर सके, इन आज्ञाओं का पालन करा सके तथा बाहरी नियंत्रण से पूरी तरह मुक्त हो अर्थात् दूसरे राज्यों के साथ अपनी इच्छानुसार सम्बन्ध स्थापित कर सके। इस सम्बन्ध में यह तथ्य स्मरणीय है कि यदि कोई राज्य अन्य राज्यों के साथ सम्बन्ध स्थापित करते समय किन्हीं प्रतिबन्धों को स्वीकार कर लेता है तो इससे उसकी सम्प्रभुता किसी भी रूप में खण्डित नहीं होती है।

निष्कर्ष

   इस प्रका निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि राज्य के लिए जनसंख्या, निश्चित भू-भाग, सुसंगठित सरकार तथा सम्प्रभुता का होना अत्यावश्यक है। इनमें से एक भी तत्व के अभाव में उस संगठन को राज्य नहीं कहा जा सकता है।


10. स्पाइकमेन का रिमलैण्ड सिद्धान्त (Spykman’s Rimland Theory)

 10. स्पाइकमेन का रिमलैण्ड सिद्धान्त

(Spykman’s Rimland Theory)



        स्पाइकमेन

       स्पाइकमेन अमेरिकी भू-राजनीतिज्ञ था। रिमलैण्ड सिद्धान्त का प्रतिपादन उसी ने किया। उसने मैकिण्डर के स्थल शक्ति सिद्धान्त को अस्वीकार किया और उसकी युद्ध नीति का खण्डन किया। उसने मैकिण्डर के हृदय-स्थल सिद्धान्त की वैधता को अस्वीकार किया, क्योंकि यह स्थल इतना शक्ति सम्पन्न व महत्वपूर्ण नहीं था जितना उसके चारों ओर का सीमान्त परिवेश था।

       स्पाइकमैन ने अपनी पुस्तक The Geography of the Peace (1944) में हार्टलैण्ड के स्थान पर यूरेशिया के तटीय क्षेत्र जो मैकिण्डर के सीमावर्ती अर्द्धवृत्त से समता रखते हैं, को अधिक शक्तिशाली व्यक्त किया। इसमें सामुद्रिक यूरोप, मध्य-पूर्व, भारत, दक्षिण-पूर्वी एशिया, चीन तथा कोरिया, आदि सम्मिलित किए जाते हैं। इनके शक्तिशाली होने का कारण जनसंख्या, प्रचुर संसाधन तथा सामुद्रिक मार्गों का उपयोग है। इस सम्पूर्ण क्षेत्र को इन्होंने रिमलैण्ड के नाम से सम्बोधित किया।

     जर्मनी की बढ़ती शक्ति से स्पाइकमैन इतना प्रभावित हुआ कि उसने किसी एक शक्ति द्वारा उसे नियंत्रित करने के सिद्धान्त को अस्वीकार किया तथा कहा कि परिधीय स्थलखण्ड राज्यों को अधिक संगठित कर अपतटीय पट्टी के राज्यों के सहयोग से ही जर्मन अधिग्रहण को कमजोर बनाया जा सकता है।

       स्पाइकमैन ने यूरेशियाई हृदय-स्थल की सम्भाव्य शक्ति स्रोत के समकक्ष ही संयुक्त राज्य अमेरिका व कनाडा का पूर्वी भाग बनाया, परन्तु विश्व नियंत्रण का आधार यूरेशियाई तटवर्ती भू-भागों को ही माना। इसी आधार पर उसने द्वितीय विश्वयुद्ध के समय यह आग्रह किया कि मित्र राष्ट्रों को मुख्यतः संयुक्त राज्य अमेरिका को अपनी भविष्यकालीन नीतियों का आधार परिधीय स्थलखण्ड के किसी भी प्रकार के संगठन को रोकने का होना चाहिए।

       मैकिण्डर के समान स्पाइकमैन ने भी अपने मत को व्यक्त करते हुए लिखा था:

” जो रिमलैण्ड को नियंत्रित करता है, वह यूरेशिया पर शासन करता है,

जो यूरेशिया पर शासन करता है, वह विश्व के भविष्य को नियंत्रित करता है।”

(“Who controls the Rimland rules Eurasia,

who rules Eurasia controls the destinies of the world.”)

      स्पाइकमैन ने यह भी स्पष्ट किया कि ब्रिटिश, सोवियत व अमेरिकी जल व स्थल शक्तियों के सहयोग से परिधीय स्थलखण्ड यूरोपीय तटवर्ती क्षेत्र को नियंत्रित करेगा तथा इससे विश्व के आवश्यक शक्ति सम्बन्धों को नियंत्रित करेगा। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय नाजी जर्मनी तथा जापानी शासक रिमलैण्ड के बड़े भाग को नियंत्रित करने में सक्षम थे, किन्तु इनका शासन तीन-चार वर्षों तक ही रहा।

      स्पाइकमैन ने व्यक्त किया कि रिमलैण्ड का क्षेत्र विश्व संघर्ष का कारण है। इसका ऐतिहासिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हुए यह मत व्यक्त किया कि सदैव स्थल एवं जलीय शक्तियों में संघर्ष रहा है तथा रिमलैण्ड के देश एवं रूस में संघर्ष का मूल कारण रिमलैण्ड पर अधिकार की चेष्टा है। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका की नीति रिमलैण्ड पर अधिकार करने की या सोवियत संघ के विस्तार को रोकने की होनी चाहिए।

        यूरेशियाई भू-भाग का परिधीय स्थलखण्ड हृदय स्थल व सीमान्त समुद्रों के मध्य स्थित होने से इसे स्पाइकमैन स्थल शक्ति व समुद्र शक्ति के मध्य के संघर्षों का मध्यवर्ती अन्तस्थ क्षेत्र (Buffer Zone) कहता है। यूरेशिया के विश्लेषण में स्पाइकमैन ने ग्रेट ब्रिटेन व जापान को परिधीय स्थलखण्ड से बाहर राजनीतिक व सैनिक शक्ति के केन्द्र माना जो पश्चिम यूरोप तथा पूर्वी एशिया के तट से दूर स्थित हैं। अफ्रीका व आस्ट्रेलिया समुद्रस्थ अपतटीय महाद्वीप हैं।

      अफ्रीका यूरेशिया के दक्षिण-पश्चिम तट से तथा यूरोपीय भूमध्य सागर से सम्बन्धित है तथा आस्ट्रेलिया, यूरेशिया के दक्षिण-पूर्व तटों से एशियाई भूमध्य सागर से जुड़ा हुआ है। एशियाई भूमध्य सागर आस्ट्रेलिया को दक्षिण-पूर्वी एशिया से अलग करने वाला जलपुंज है और स्वाधीन एशियाई विश्व के राजनीतिक व सामरिक महत्व हेतु विशिष्टता लिए है।

       इस क्षेत्र में अनेक देश हैं जो राजनीतिक तथा प्राकृतिक विविधताओं से युक्त हैं। यहाँ की प्रजातियों एवं संस्कृति में भिन्नता है। अतः ये सभी कभी संगठित नहीं हो सके और न ही किसी एक शक्ति के नियंत्रण में रहे। इस क्षेत्र की एक कमजोरी और है कि इस क्षेत्र पर दोहरा आक्रमण किया जा सकता है- एक ओर हार्टलैण्ड की ओर से तथा दूसरी ओर बाह्य शक्तियों द्वारा।

निष्कर्ष:

     स्पाइकमैन का सिद्धान्त द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति से पूर्व प्रस्तुत किया गया था और युद्ध समाप्ति तक इस सिद्धान्त की मान्यता आधी रह गई थी। जर्मनी, इटली व जापान हार गए और समुद्री शक्ति के स्थान पर वायु शक्ति की श्रेष्ठता सिद्ध हो चुकी थी। कोई भी परिधीय स्थलखण्ड (Rimland) शक्ति सम्पूर्ण परिधीय स्थलखण्ड को संगठित या नियंत्रित करने में असफल रही है, क्योंकि यह हृदय-स्थल शक्ति व अपतटीय शक्तियों द्वारा आक्रमणीय है, संगठित तटीय यूरोप को सर्वप्रथम भूमध्य सागर, उत्तरी अफ्रीका, मध्य-पूर्व, सहारा के दक्षिण अफ्रीका तथा आस्ट्रेलिया पर आधिपत्य स्थापित करने के पश्चात् ही परिधीय स्थलखण्ड प नियंत्रण की कल्पना को साका करना पड़ेगा।

प्रश्न प्रारूप

1. स्पाइकमेन का रिमलैण्ड सिद्धान्त (Spykman’s Rimland Theory) का विवरण दीजिए


 

9. मैकिण्डर का हृदय स्थल सिद्धान्त (Mackinder’s Theory of Heartland)

9. मैकिण्डर का हृदय स्थल सिद्धान्त

(Mackinder’s Theory of Heartland)



      मैकिण्डर का हृदय स्थल

        मैकिण्डर का सर्वप्रमुख सिद्धान्त हृदय-स्थल सिद्धान्त (Heartland Theory) है जो Natural Seat of Power एवं Pivot Area पर आधारित है। मैकिण्डर का विचार था कि समुद्री यात्राओं द्वारा नवीन देशों की खोज का समय तो समाप्त हो गया अतः ब्रिटेन के लिए नौसेना में वृद्धि करना राजनीतिक प्रभुसत्ता के लिए आवश्यक नहीं है।

        विश्व के अधिकांश द्वीपों एवं महाद्वीपों की खोज हो चुकी है, किन्तु साइबेरिया प्रदेश ऐसा क्षेत्र है जिसे अभी तक पूर्णतः खोजा नहीं गया है। यह पुरानी दुनिया (एशिया, यूरोप एवं अफ्रीका) का अभेद्य प्रदेश है। यह समुद्र से दूर है अतः यहाँ जलीय शक्ति का प्रभाव नहीं है। इसके उत्तर में आर्कटिक महासागर है जो बर्फ से जमा रहता है जिसके कारण उत्तर से भी जल शक्ति का प्रवेश नहीं हो सकता है। मैकिण्डर ने इसे अभेध प्रदेश माना। इस अभेद्य प्रदेश को ही उन्होंने हृदय स्थल (Heartland) कहा। उनका विचार था कि जो इस हृदय स्थल पर अधिकार कर लेगा उसे नौसेना शक्ति परास्त नहीं कर पाएगी।

       मैकिण्डर ने विश्व के सबसे बड़े स्थल खण्ड को पुरानी दुनिया में बताया। उसने यूरोप, एशिया एवं अफ्रीका को विश्व द्वीप (World Island) माना। विश्व का 9/12 भाग जल एवं 3/12 भाग स्थल है। विश्वद्वीप ग्लोब के 2/12 भाग को और दोनों अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड तथा अन्य छोटे-मोटे द्वीप शेष 1/12 भाग को घेरे हुए हैं। स्थल खण्ड की दृष्टि से विश्व द्वीप में एकता है। विश्व द्वीप में विश्व की 14/16 जनसंख्या बसती है, अन्य 1/16 जनसंख्या दोनों अमेरिका व आस्ट्रेलिया में तथा शेष 1/16 समुद्रस्थ अन्य द्वीपों में निवास करती है।

     मैकिण्डर ने हृदय स्थल के चारों ओर चन्द्राकार पेटी में ईरान, अफगानिस्तान, मध्य पूर्व के देश तथा मंगोलिया, आदि अविकसित देश बताए तथा बाहरी चन्द्राकार पेटी में ब्रिटेन, फ्रांस, जापान तथा अमेरिका जैसी नौसैनिक शक्तियाँ बताईं। प्रारम्भिक अवस्था में उन्होंने हृदय स्थल के अन्तर्गत ईरान की अधिकांश उच्च भूमि, अफगानिस्तान, पश्चिमी चीन, साइबेरिया तथा मंगोलिया माना, किन्तु बाद में इसमें पूर्वी यूरोप को भी सम्मिलित कर लिया।

      इस प्रकार इसका विस्तार पूर्वी यूरोप में एल्ब नदी तक कर दिया गया। 1904 में धुरी क्षेत्र सिद्धान्त में कैस्पियन सागर से श्वेत सागर तक खींची जाने वाली रेखा को सीमा स्वीकार किया गया था, परन्तु 1919 में हृदय स्थल में वाल्टिक सागर, मध्य व निम्न नाव्य डेन्यूब, काला सागर, एशिया माइनर, आर्मीनिया, पर्सिया, तिब्बत व मंगोलिया सम्मिलित कर लिया गया और अनातोलिया के पठार, पिण्डस पर्वत, दिनारिक आल्पस, मध्य डेन्यूब, मध्य जर्मनी, डेनमार्क व स्केण्डेनेवियाई प्रायद्वीप से होकर गुजरने वाली रेखा से परिवृत्त क्षेत्र में सीमा पश्चिमी क्षेत्र को स्थानान्तरित कर दी गई। मैकिण्डर के इस सिद्धान्त में हृदय स्थल को पश्चिम, दक्षिण व पूर्व में घेरे हुए जल-स्थल राज्यों की एक आन्तरिक तटीय सीमान्त क्षेत्र पड़ी है।

      मैकिण्डर के हृदय स्थल की सीमा में परिवर्तन किया गया, किन्तु उन्होंने बड़ी दृढ़ता से यह मत व्यक्त किया कि जो हृदय-स्थल पर शासन करेगा, वह विश्वद्वीप को नियंत्रित करेगा और अन्ततः विश्व पर राज्य करने में सफल होगा। उन्होंने अपने विचार इस प्रकार व्यक्त किए:

“जो पूर्वी यूरोप पर शासन करता है, ‘हृदय क्षेत्र’ को नियंत्रित करता है।

जो ‘हृदय क्षेत्र’ पर शासन करता है, वह विश्वद्वीप पर नियंत्रण रखता है।

जो विश्वद्वीप पर शासन करता है, वह विश्व पर नियंत्रण रखता है।”

चित्र : मैकिंडर का ह्रदय-स्थल

     मैकिण्डर पूर्वी यूरोप को हृदय-स्थल का द्वार मानते थे। उनका विचार था कि हृदय स्थल में पूर्वी यूरोप के देशों से होकर ही प्रवेश किया जा सकता है। इसीलिए इन देशों की सामरिक महत्ता है। शक्ति सन्तुलन पूर्वी एवं पश्चिमी यूरोप के हाथों में रहेगा। शक्ति सन्तुलन बनाए रखने के लिए उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि पश्चिमी यूरोपीय देशों की महान शक्तियों को पूर्वी यूरोपीय देशों एवं हृदय-स्थल क्षेत्रों के साधनों को संगठित करने वाली शक्तियों का विरोध करना चाहिए।

     जर्मनी द्वारा पूर्वी यूरोप के खुले मार्ग द्वारा सोवियत संघ पर 1917 एवं 1942-43 में दो बार हमले किए गए। जर्मन भू-राजनीतिज्ञ हृदय-स्थल द्वारा विश्वद्वीप पर प्रभुत्व स्थापित करने तथा नई दुनिया के आधिपत्य को जर्मन नेतृत्व में ही सम्भव मानते रहे तथा जर्मनी के सभी प्रयास भी इसी नीति पर आधारित रहे। जर्मन भू-राजनीतिज्ञ स्थल शक्ति को समुद्री शक्ति से श्रेष्ठ व लाभप्रद मानते रहे तथा मैकिण्डर के हृदय-स्थल हेतु संघर्ष को नीतिगत स्वीकार किया।

      1941 में जब जर्मनी ने सोवियत संघ पर हमला कर दिया तो उसका विरोध जर्मन भू-राजनीतिज्ञों ने किया। 1943 में मैकिण्डर ने ‘The Round World and the Winning of the Peace’ नामक लेख प्रकाशित किया एवं अपने हृदय-स्थल सिद्धान्त को नवीन अभिव्यक्ति प्रदान की। उन्होंने समुद्र पार स्थित शक्तियों को यह सुझाव भी दिया कि समुद्रपारीय शक्तियों को फ्रांस, इटली, मिस्र एवं भारत, आदि से सम्बन्ध सुदृढ़ रखने चाहिए। ये सम्बन्ध हृदय-स्थल क्षेत्रों के देशों को अपनी स्थलीय शक्तियों का विकास करने पर बाध्य करेंगे।

     मैकिण्डर ने हृदय-स्थल सिद्धान्त को महत्वपूर्ण माना था तथा वह हृदय स्थल के सन्दर्भ में जर्मनी की सैनिक स्थिति की महत्ता को भी मानता था।

    मैकिण्डर का हृदय स्थल सिद्धान्त उस समय तक अधिक मान्य रहा जब तक स्थल या जल से ही गमनागमन होता था। मैकिण्डर ने जब अपना सिद्धान्त प्रस्तुत किया तब रेलों व समुद्री आवागमन के साधनों में प्रतिस्पर्द्धा थी एवं हवाई शक्ति का विकास अपनी प्रारम्भिक अवस्था में था। आज परिस्थितियाँ 1919 जैसी नहीं हैं, अब उपनिवेशवाद बहुत कुछ समाप्त हो गया है।

       मैकिण्डर ने 1943 में वायुशक्ति के महत्व को स्वीकार किया था, किन्तु वह इतना सन्तुष्ट नहीं था और सोचता था कि यह आने वाले समय में जल-स्थल शक्तियों की तुलना में इतना अधिक श्रेष्ठ साबित नहीं होगा, किन्तु वर्तमान समय में वायुयानों का इतना अधिक विकास हो चुका है कि इनके द्वारा पूरे विश्व में जाया जा सकता है। इस समय के परमाणु युग में प्रक्षेपास्त्रों एवं रॉकेटों का प्रयोग होने लगा है।

      1943 के संशोधन से उनके हृदय स्थल सिद्धान्त में कमियाँ दिखाई देने लगी थीं। द्वितीय विश्वयुद्ध के अन्त तक इस सिद्धान्त की महत्ता और भी कम हो गई थी। इसका प्रमुख कारण हवाई हमलों का होना था। वे दुर्गम क्षेत्र जहाँ जाना सम्भव नहीं था अब आसानी से पहुंचा जा सकता है। इससे तो पूरी ग्लोबीय राजनीति ही बदल गई।

      इस आलोचना से यह अर्थ नहीं निकालना चाहिए कि उनका हृदय-स्थल सिद्धान्त का विचार महत्व नहीं रखता है। उनके विचा आज भी विश्व सामरिकता के सम्बन्ध में महत्व रखते हैं।  

8. सीमान्त एवं सीमाएँ क्या हैं?

8. सीमान्त एवं सीमाएँ क्या हैं?



  सीमान्त एवं सीमा

     सीमान्त एवं सीमाओं का अध्ययन राजनीतिक भूगोल का महत्वपूर्ण पहलू है, क्योंकि राजनीतिक भूगोल में राज्यों का अध्ययन किया जाता है। राज्यों के समुचित अध्ययन के लिए आवश्यक हो जाता है कि उनकी निश्चित सीमाएँ हों।

     सीमान्त तथा सीमाओं का प्रयोग सदैव समानार्थक अर्थों में होता रहा है तथा इसके अन्तर के सम्बन्ध में विद्वान एकमत नहीं रहे हैं। सीमा तो एक रेखा के रूप में है जबकि सीमान्त एक क्षेत्र होता है। सीमा रेखा सीमान्त के अन्दर होती है जो राज्यों के मध्य सम्प्रभुता को अलग करती है। सीमाएँ राज्य की अभिन्न अंग हैं, अतः राजनीतिक भूगोल में इन्हें अधिक महत्व दिया गया है।

सीमान्त (Frontiers)

      सीमान्त के लिए प्रयुक्त अंग्रेजी शब्द Frontier की उत्पत्ति लैटिन भाषा के Frons अथवा Frontis तथा फ्रेंच भाषा के Front शब्द से हुई है, जिसका अर्थ ‘सम्मुख भाग’ या ‘अग्र भाग’ से है। सीमान्त (Frontier) के लिए Foreland, Borderland, Marchland, आदि समानार्थी शब्दों का प्रयोग भी किया जाता है। इन सभी का आशय ‘एक ही राज्य के पृष्ठप्रदेश के क्षेत्रयुक्त अग्रिम भाग से है।’

     हिन्दी शब्द सीमान्त का आशय भी राज्य के सीमावर्ती क्षेत्र से ही है।

प्रेसकाट के अनुसार, “सीमान्त क्षेत्र दो राज्यों के मध्य का राजनीतिक भाग है जो एक ही राज्य के सघन बसे हुए और विकसित मूल क्षेत्र (Core Area) से दूर सीमा के निकट निर्जन और अविकसित क्षेत्र होता है।””

गोबलेट के अनुसार, “सीमान्त वह भौगोलिक स्थिति है, जहाँ उसके विस्तार के विरुद्ध प्रतिरोधक शक्तियाँ तटस्थ हो जाती हैं।” अर्थात् सीमान्त राज्य के बहिर्वर्ती क्षेत्रों में विद्यमान क्षेत्रीय विस्तार है, यहाँ पर राज्य की प्रभुसता अपेक्षाकृत शिथिल हो जाती है।

मुडी के अनुसार, “एक सीमान्त का स्वरूप चाहे प्राकृतिक, भाषायी, धार्मिक या जातीय हो, उसे स्थानान्तरित नहीं किया जा सकता है। इसके लक्षण परिवर्तित हो सकते हैं अथवा इसके सीमान्त सम्बन्धी कार्य समाप्त हो सकते हैं, परन्तु सीमान्त यथावत ही बना रहता है।”

डी ब्लिज ने सीमान्त का अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखा है कि “सीमान्त राजनीतिक इकाई के एकीकृत क्षेत्र के बाहर का राजनीतिक भौगोलिक क्षेत्र है और इसमें राजनीतिक इकाई का विस्तार सम्भव है।”

क्रिस्टोक के अनुसार, “सीमान्त एक विस्तृत क्षेत्र है जो राज्य के पृष्ठ प्रदेश का अग्र भाग है।”

कर्जन के अनुसार, “सीमान्त यथार्थ में तीक्ष्ण धार है, जिस पर आधुनिक युद्ध अथवा शान्ति सम्बन्धी परिणाम अथवा राष्ट्रों का जीवन-मरण अवलम्बित है।” यद्यपि यह मान्यता अब समाप्त सी हो गई है, क्योंकि सीमान्तों का स्थान सीमा रेखाओं ने और सीमा रेखाओं का स्थान अतिरिक्त राष्ट्रीय सीमाओं ने ग्रहण कर लिया है। राज्यों के मध्य अनियंत्रित क्षेत्र अब समाप्त हो गए हैं, फिर भी

फिशर ने स्पष्ट किया है कि, “सीमान्त राज्य का वह अंग है जो सीमा रेखा के भीतर की ओर विस्तार लिए हुए होता है एवं अप्रत्यक्ष रूप से अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में विलीन हो जाता है।”

वेगेट और प्रियर्स ने दो राज्यों के मध्य संक्रमण क्षेत्र के लिए सीमान्त शब्द को प्रयुक्त किया है, इसे वे सीमान्त स्थल (Borderland) भी कहते हैं।

      उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि सीमान्त क्षेत्र राज्यों के मध्य का संक्रमण क्षेत्र है जो राज्य के मूल क्षेत्र से दूर स्थित रहता है और जो सीमा रेखा के रूप में न रहकर एक क्षेत्र के रूप में अस्तित्व में रहता है। यह प्राकृतिक रूप से निर्मित क्षेत्र होता है और राज्य की सीमाओं की परिधि में किसी भी प्रकार के राजनीतिक परिवर्तन या युद्ध आदि को सबसे पहले सहन करता है। चूंकि सीमान्त दो राज्यों के मध्य संक्रमण क्षेत्र के रूप में है अतः दोनों राज्यों की राजनीतिक विचारधारा का प्रवाह इसी क्षेत्र से होकर जाता है।

सीमाएँ (Boundaries)

      शब्दकोश के अनुसार सीमा का अर्थ क्षेत्र विशेष को घेरकर परिसीमित करना अथवा आबद्ध करना है। राजनीतिक भूगोल में सीमा दो राज्यों के बीच वह रेखाएँ हैं जो एक राज्य की प्रभुसत्ता को पड़ोसी राज्य से पृथक करती हैं। ये मानचित्र पर एक रेखा के रूप में चिह्नित की जाती हैं। मानचित्र एवं धरातल पर रेखात्मक रूप में ये सीमाएँ दो संलग्न राज्यों के पृथक-पृथक अस्तित्व को स्पष्ट करती हैं। साथ ही आकाशीय सीमा और भौमिकीय तल को भी ये सीमा रेखाएँ दो राज्यों के मध्य अलग कर देती हैं।

     सीमा रेखाओं का अध्ययन राजनीतिज्ञों, तिथि विशेषज्ञों, सैन्य विशेषज्ञों, भूगोलवेत्ताओं और इतिहासवेत्ताओं द्वारा किया जाता रहा है। भूगोलवेत्ता सीमा रेखाओं का अध्ययन इसलिए करता है कि वे सांस्कृतिक दृश्यावली के तत्व हैं तथा राजनीतिक प्रभुसत्ता की सीमाएँ भी। भौगोलिक तथ्य सीमा की स्थिति तथा उसके प्रकार के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और एक बार सीमा निर्धारण के पश्चात् ये राज्य की भू-दृश्यावली पर भी प्रभाव डालते हैं।

एन्सेल (Ancel, J.) ने “सीमा को दो राज्यों के मध्य दबाव का परिणाम बताते हुए, इनके मध्य की साम्यावस्था रेखा को सीमा रेखा कहा है।” स्पष्ट है कि सीमा रेखा द्वारा पृथक किए गए राज्य अपनी स्वतंत्र विचारधारा एवं कार्यात्मक इकाई का विकास कर लेते हैं। ऐसी स्थिति में दोनों राज्यों की प्रभुसत्ता का दबाव सीमाओं पर पड़ता है। इस दबाव के मध्य जहाँ सन्तुलन की स्थिति रहती है, वहीं से होकर सीमा रेखा खींची जाती है।

स्पाइकमेन ने भी “सीमा रेखाओं को उन रेखाओं की संज्ञा दी है जहाँ राज्य दबाव शक्तियाँ प्रायः तटस्थ या निष्क्रिय रहती हैं।”

प्रेसकॉट (Prescott) के अनुसार, “अन्तर्राष्ट्रीय व संघीय सीमा रेखाएँ सामान्यतः द्विपक्षीय या बहुपक्षीय समझौते द्वारा अंकित की जाती हैं।”

बोग्ज (Boggs) के अनुसार, “सीमा के दोनों ओर प्रत्येक राज्य, प्रशासन, व्यापार, सुरक्षा, आर्थिक विकास और अपने अन्य अधिकारों का प्रयोग करता है।” अर्थात् सीमा रेखा के दोनों ओर अलग-अलग स्वरूप वाली राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक पद्धति विकसित होती है और सम्पूर्ण क्षेत्रीय इकाई में इन पद्धतियों का प्रसार होता है।

       सीमा में पृथक्कीकरण कार्य से सम्बन्धित बोग्ज के निम्नलिखित विचार विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं, “सीमा की स्थिति लाखों लोगों के लिए इस बात को निर्धारित करेगी कि विद्यालय में बच्चों को कौन-सी भाषा तथा विचार दिए जाएंगे अथवा लोग कौन-सी पुस्तकें तथा समाचार-पत्र खरीद सकेंगे या पढ़ेंगे, वे किस मुद्रा का प्रयोग करेंगे, किन बाजारों में वस्तुओं को खरीदेंगे या बेचेंगे। साथ ही सीमा यह भी निश्चित करेगी कि लोग किस प्रकार की राष्ट्रीय संस्कृति से सम्बन्धित होंगे अथवा किस सेना के अन्तर्गत सेवा करने के लिए बाध्य होंगे तथा किस भूमि की रक्षा अपने जीवन का बलिदान देकर करेंगे चाहे वे इस बात के इच्छुक हो या नहीं।”

मूडी (Moodie) के अनुसार, “सीमा-रेखा उस क्षेत्र का निर्धारण करती है जिसके अन्तर्गत राज्य की आन्तरिक व्यवस्था विकसित होती है एवं इसी के सहारे विभिन्न राज्य प्रणालियाँ एक-दूसरे के सम्पर्क में आती हैं अतः यह भौगोलिक लक्षण नहीं होकर राजनीतिक है।”

पाउण्ड्स (Pounds) के अनुसार, “सीमाएँ राज्य की सार्वभौमिकता को पड़ोसी राज्य से पृथक करती है।”

     स्पष्ट है कि सीमा रेखाएँ वस्तुतः जहाँ एक ओर तो दो राज्यों के मध्य विभाजक की भूमिका निभाती हैं वहीं दूसरी ओर एक राज्य क्षेत्र की बाहरी सीमा को निर्धारित कती हैं।

7. भू-राजनीति का अर्थ तथा इसका विकास

7. भू-राजनीति का अर्थ तथा इसका विकास



राजनीति का अर्थ     

   भू-राजनीति मानव भूगोल की एक महत्वपूर्ण शाख है। वर्तमान राजनीतिक भूगोल इसी का पूर्ण विकसित रूप है। इसके अन्तर्गत राज्य की अवस्थिति, संसाधन व समाज क उसकी राजनीतिक प्रक्रियाओं पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन किया जाता है, जिससे राज्य की शक्ति व नीति निर्धारित होती है और उस पर राज्य की प्रगति व कल्याण निर्भर करता है।

     भू-राजनीति की अवधारणा रैटजेल की जैविक राज्य संकल्पना तथा जेलेन की ज्योपोलिटिक संकल्पनाओं पर आधारित है। प्रथम विश्वयुद्ध में जर्मनी की पराजय के पश्चात् जर्मनी के विद्वानों, विचारकों व सैन्य अधिकारियों द्वारा पराजय के कारणों का विश्लेषण किया गया। इस प्रक्रिया में विस्तारवादिता की नीति से जर्मनी की खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त करने के प्रयास किए गए।

      भू-राजनीति शब्द जर्मन भाषा के Geopolitik से व्युत्पन्न अंग्रेजी के Geopolitics से लिया गया है।

परिभाषा (Definition)- भू-राजनीति को विद्वानों ने इस प्रकार परिभाषित किया है:-

रूडोल्फ जेलेन के अनुसार, “भू-राजनीति राज्य के प्राकृतिक पर्यावरण से सम्बन्धित है। यह स्पष्ट करता है कि राज्य ऐतिहासिक एवं यथार्थ वास्तविकता में गहराई से प्रविष्ट है। यह जीव की भांति विकसित होता है और जीवधारी रचना का एक प्रमुख प्रकार है। जिस प्रकार एक मनुष्य होता है।”

हॉशोफर के अनुसार, “भू-राजनीति ‘क्षेत्र’ को राज्य के रूप में देखता है अर्थात् इसका समस्त अध्ययन ‘क्षेत्र’ पर ही केन्द्रित रहता है।”

ओटोमाल के अनुसार, “भू-राजनीति राज्य की क्षेत्रीय आवश्यकताओं से सम्बन्धित है, जबकि राजनीतिक भूगोल केवल राज्य की स्थानिक पारिस्थितियों का परीक्षण करता है।”

भूराजनीति का विकास-

       भूराजनीति के विकास में मुख्यतः जर्मन भूगोलवेत्ताओं का विशेष योगदान रहा है। इनके अनुसार राज्य एक भूराजनीतिक जीव है तथा इसे जीवित रखने के लिए क्षेत्र की आवश्यकता होती है। राज्य के विकास के अनुसार क्षेत्र विस्तार की आवश्यकता में वृद्धि होती जाती है। फ्रेडरिक रैटजेल इस विचार के जनक रहे हैं।

     स्वीडिश विद्वान जेलेन ने रैटजेल के विचारों को स्पष्ट भी किया है और इनकी पुष्टि भी की है। जेलेन के अनुसार राज्य रूपी जीव का शरीर क्षेत्र है, सीमाएं अंतस्थ अंग हैं, उत्पादन क्षेत्र भुजाएं हैं, परिवहन के साधन रक्त तन्त्र है तथा राजधानी उसका मस्तिष्क, हृदय तथा फेफड़ा हैं। भूराजनीति में इन विचारों को और अधिक विकसित करने में जर्मन भूराजनीतिज्ञ होशोफर का भी सक्रिय एवं व्यावहारिक योगदान रहा है।

रैटजेल का योगदन (1844-1904)-

      यदि काण्ट को राजनीतिक भूगोल का जनक कहा जा सकता है तो रैटजेल को इसके पोषक एवं पालनकर्ता के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। यद्यपि रेटजेल जर्मन विदेश नीति से सम्बन्धित समस्याओं से पृथक रहे और उन्होंने केवल राज्य-विकास सम्बन्धी सैद्धान्तिक विचार प्रस्तुत किए फिर भी इनके विचारों ने न केवल राजनीतिक भूगोल के अध्ययन में राष्ट्र शक्ति दृष्टिकोण को जन्म दिया अपितु अप्रत्यक्ष रूप में भू-राजनीतिक विचारों को भी जन्म दिया।

    रैटजेल के अनुसार राज्य के पोषण क्षेत्र को ही लैबेन्स् रॉम अर्थात् निर्वाह क्षेत्र कहा जाता है। जिसे प्राप्त करने के लिए राज्य को सदैव संघर्षरत रहना पड़ता है तथा अस्तित्व के लिए किया गया संघर्ष क्षेत्र संघर्ष में परिवर्तित हो जाता है। इतिहास में संघर्ष सदैव प्रभावकारी कारक रहा है। राज्य विकास के लिए क्षेत्र चेतना एवं राजनीतिक तथा आर्थिक दृष्टिकोण से उपयोगी क्षेत्रों पर नियन्त्रण आवश्यक होता है। उसने बताया कि राज्य क्षेत्र के प्रसारण तथा संकुचन के अनुसार सीमान्त परिवर्तित होते रहते हैं और ये राज्य प्रसार, शक्ति तथा परिवर्तन को प्रतिबिम्बित करते हैं।

      सीमान्त की चौड़ाई संलग्न राज्यों की प्रकृति पर निर्भर करती है अर्थात् यदि विकसित एवं कम विकसित राज्यों के मध्य सीमान्त की चौड़ाई सर्वाधिक होती है तो समान रूप से विकसित राज्यों के मध्य न्यनूतम । साथ ही सीमावर्ती समुदाय अपनी परिधीय स्थिति के कारण स्वतन्त्रता की अभिलाषा रखते हैं। रैटजेल के अनुसार राज्य एक जैविक सत्ता है जो मानवीय एवं धरातलीय अंशों से निर्मित है। राज्य का प्रारम्भिक क्षेत्र नाभि क्षेत्र कहलाता है तथा इसी क्षेत्र से राज्य का क्षेत्रीय प्रसार होता है।

जेलेन का योगदान-

      जेलेन ने रैटजेल के विचारों को और अधिक स्पष्ट किया तथा भूराजनीति शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किया। जेलेन ने राज्य के अध्ययन हेतु भूराजनीति, जनसंख्या राजनीति, आर्थिक संसाधन राजनीति, समाज राजनीति और राज्य प्रशासन विषयों का विश्लेषण आवश्यक माना। रैटजेल की भांति इन्होंने राज्य को न केवल एक जैविक इकाई ही माना अपितु नैतिक तथा बौद्धिक गुण सम्पन्न चेतन सत्ता के रूप में देखा। रैटजेल के अनुरूप जेलेन की भी यह मान्यता थी कि राज्य विकास का अन्तिम उद्देश्य शक्ति संग्रहण है। इनकी यह भी मान्यता थी कि शक्ति संग्रहण केवल क्षेत्रीय प्रसार के सरल जैविक नियमों के अनुसार ही नहीं होता है अपितु इसके लिए आधुनिक प्रगति एवं तकनीकी विकास की भी आवश्यकता होती है।

    राज्य शक्ति के विकास हेतु बाह्य दृष्टिकोण से प्राकृतिक सीमान्त एवं आन्तरिक दृष्टिकोण से समन्वित एकता प्राप्त करना आवश्यक है। विश्व राजनीति के क्षेत्र में भविष्यवाणी करते हुए इन्होंने कहा था कि सामुद्रिक शक्ति पर आधारित साम्राज्यों की सत्ता के स्थान पर महाद्वीपीय शक्ति पर आधारित साम्राज्य अधिक शक्ति सम्पन्न हो जाएंगे जो कालान्तर में समुद्रों पर भी नियन्त्रण करेंगे। इनके साथ ही इन्होंने यह भी कहा कि अन्त में कुछ विशालकाय राज्यों का उद्भव एवं विकास होगा जिनमें यूरोप, अफ्रीका तथा पश्चिमी एशिया के क्षेत्र में जर्मनी महान शक्ति के रूप में उभरेगा।

       ग्रेट ब्रिटेन के वयोवृद्ध अनुभवी तथा बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न भूगोलवेत्ता मेकिण्डर ने सार्वभौम स्तर पर राज्यशक्ति विकास की व्याख्या हेतु महाद्वीपीय शक्ति सम्बन्धी नवीन विचार प्रस्तुत किए। मेकिण्डर ने 1919 में अपनी हृदय स्थल सम्बन्धी अवधारणा को निम्न शब्दों में प्रस्तुत किया-

जो पूर्वी यूरोप पर शासन करता है, वही हृदय स्थल को नियंत्रित करेगा।

जो हृदय स्थल पर शासन करेगा, वही विश्व द्वीप को नियंत्रित करेगा।

जो विश्व द्वीप पर शासन करेगा, वही विश्व को नियंत्रित करेगा।

      मेकिण्डर के समकालीन जर्मन भूराजनीतिज्ञ कार्ल होशोफर मेकिण्डर के विचारों से न केवल प्रभावित हुए अपितु उन्होंने अपने भूराजनीतिक विचारों की पुष्टि हेतु इनके विचारों का प्रयोग किया। स्पष्ट है कि मेकिण्डर ने अपने विचारों द्वारा जर्मन भूराजनीति को पर्याप्त मात्रा में प्रभावित किया।

       दो विश्वयुद्धों के मध्य के काल को भूराजनीति के विकास का स्वर्णिम युग कहा जा सकता है। इस काल में जेलेन द्वारा स्थापित भूराजनीति को कार्ल होशोफर और उनके अनुयायियों ने और भी अधिक सुदृढ़ बनाया। होशोफर के विचारों ने जर्मन विदेश नीति को प्रभावित करने के साथ हिटलर की युद्ध एवं प्रसार नीति को भी प्रभावित किया। भूराजनीति किसी एक विद्वान के विचारों की उपज नहीं है, अपितु अनेक विद्वानों के विचारों का फल है।

       रैटजेल, महान, मेकिण्डर जेलेन, आदि विद्वानों ने भूराजनीति सम्बन्धी विचार सैद्धान्तिक स्तर पर प्रस्तुत किए तो कार्ल होशोफर ने उन विचारों को शाब्दिक अभिव्यक्ति एवं व्यावहारिक सन्दर्भ प्रदान करने के साथ-साथ उनका प्रचार एवं प्रसार भी किया। फलस्वरूप जर्मन भूराजनीति के रूप में यह राजनीतिक भूगोल से अलग हटकर राज्य के क्षेत्रीय विस्तार के अधिकार को दर्शाने वाली संकल्पना के रूप में विकसित हुई।

कार्ल होशोफर का योगदान (1869-1946)-

      होशोफर जेलेन तथा मेकिण्डर के समकालीन थे। भूराजनीति के क्षेत्र में इनका चिन्तन यद्यपि जापान प्रवास काल से ही प्रारम्भ हो गया। था फिर भी म्यूनिख विश्वविद्यालय में जाने के पश्चात् ही इनका भूराजनीतिक अध्ययन परिपक्वता प्राप्त कर सका। यहाँ इन्होंने Institut fur Geopolitik नामक संस्था की स्थापना की एवं 1924 में ओटोमोल एवं एरिक ओबस्ट के साथ Zeitschrift fur Geopolitik नामक मासिक पत्रिका का सम्पादन प्रारम्भ किया। कार्ल होशोफर के भूराजनीति सम्बन्धी विचार निष्कर्ष रूप में निम्नांकित बिन्दुओं के आधार पर स्पष्ट किए जा सकते हैं-

⇒ उनके अनुसार राज्य एक जैविक सत्ता है। राज्य के लिए क्षेत्र अथवा रॉम प्रथम आवश्यकता है।

⇒ निर्वाह क्षेत्र (लैबेन्स् रॉम) का विचार होशोफर द्वारा विकसित भूराजनीति का केन्द्र बिन्दु माना जाता है।

⇒ राज्य शक्ति के उपार्जन हेतु क्षेत्र विस्तार अपरिहार्य है तथा जर्मनी के लिए क्षेत्र विस्तार पूर्व दिशा में स्लाव क्षेत्र में ही सम्भव है।

⇒  राज्य के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता (ओटोरकी) आवश्यक है जिसकी प्राप्ति क्षेत्रीय प्रसार द्वारा ही सम्भव है।

⇒ भूराजनीतिक दृष्टि से प्रशान्त महासागरीय क्षेत्र सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।

⇒ जर्मनी के लिए ग्रेट ब्रिटेन की शक्ति का विनाश आवश्यक है। पूर्वी गोलार्द्ध में अमेरिकी हस्तक्षेप अवांछनीय है। जर्मनी के नेतृत्व में सोवियत संघ, भारत, चीन तथा जापान के मध्य मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध वांछनीय है तथा सोवियत संघ से जर्मनी का संघर्ष अनुचित है।

⇒ मेकिण्डर द्वारा वर्णित धुरी क्षेत्र के कारण भी जर्मनी का सोवियत संघ से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध रखना आवश्यक है, क्योंकि वह क्षेत्र शक्ति आधार रूप में है।

⇒ जर्मन भूराजनीतिज्ञों ने हृदय स्थल में आर्थिक और सैन्य समझौतों के माध्यम से मैत्रीपूर्ण ढंग से प्रवेश करने और उसके क्षेत्रों को जर्मन प्रभुत्व में लाने पर बल दिया।

      होशोफर के अनुसार भूराजनीति एक गतिक विज्ञान है जो राज्य के असीमित प्रसार की इच्छा को व्यक्त करता है तथा विश्वव्यापी परिवर्तनशील अवस्थाओं का क्षेत्र अनुप्राणित दृष्टि से अध्ययन करता है। इसके विपरीत राजनीतिक भूगोल स्थितिक एवं विवरणात्मक अध्ययन मात्र ही है। उपरोक्त विवरण से यह स्पष्ट होता है कि होशोफर के भूराजनीतिक विचार जर्मन राष्ट्रहित को दृष्टिगत रखते हुए प्रस्तुत किए गए थे।

     यह उल्लेखनीय है कि द्वितीय विश्वयुद्ध में जर्मनी की पराजय के साथ ही होशोफर और उनके साथियों द्वारा परिश्रम से निर्मित भूराजनीति का प्रासाद ध्वस्त हो गया एवं पर्याप्त समय तक भूगोलवेत्ता तथा राजनीतिशास्त्रियों द्वारा इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया।

    ग्लोबीय सम्बन्धों का भूराजनीतिक अध्ययन अमेरिकी राजनीति शास्त्री स्पाइकमेन एवं ब्रिटिश भूगोलवेत्ता फेअरग्रीव ने मेकिण्डर के हृदय स्थल सिद्धान्त के सन्दर्भ में प्रस्तुत किया। जेम्स फेअरग्रीव ने अपनी पुस्तक The Geography of World Power के प्रथम संस्करण में अपने विचार प्रस्तुत किए एवं कुछ समय पश्चात् अपने विचारों में संशोधन करते हुए हृदय स्थल, सामुद्रिक शक्ति एवं इन दोनों के मध्य सन्तुलन मण्डल का उल्लेख किया।

निकोलस जे. स्पाइकमेन (1893-1943)-

       इन्होंने मेकिण्डर की हृदय स्थल अवधारणा का खण्डन अपने परिधीय स्थल-खण्ड (Rimland) सिद्धान्त के माध्यम से किया। स्पाइकमेन ने अपने सिद्धान्त की व्याख्या निम्नांकित शब्दों में अभिव्यक्त की-

जो परिधीय स्थल खण्ड पर नियंत्रण करता है,

वही यूरेशिया पर शासन करेगा,

जो यूरेशिया पर शासन करेगा, वही विश्व निर्यात को नियंत्रित करेगा।

   स्पाइकमेन राष्ट्र शक्ति एवं विदेशी नीति की दृष्टि से विश्व में राज्य की स्थिति का अध्ययन आवश्यक मानते हैं। इसी कारण से कहा जाता है कि स्पाइकमेन के विचार राष्ट्र शक्ति दृष्टिकोण पर आधारित होने के साथ-साथ भूराजनीतिक भी हैं, क्योंकि ये विचार संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर प्रकट किए गए हैं।

      स्पाइकमेन की इस भूराजनीतिक अवधारणा का अभिप्राय यह था कि हृदय स्थल के आन्तरिक पेटी के समुद्रीय राष्ट्र अधिक महत्वपूर्ण हैं। इन पर नियंत्रण करने वाला राज्य ही अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर महान शक्तिशाली बन सकता है। स्पाइकमेन की यही अवधारणा आगे चलकर संयुक्त राज्य अमेरिका की विदेश नीति का आधार बनी।

     स्पष्ट है कि जर्मन भूराजनीति का संकल्पनात्मक विकास रैटजेल की राज्य विकास की जैवीय अवधारणा, जेलेन की भूराजनीति और लैबेन्स् रॉम एवं खिसकते सीमान्त की विचारधाराओं तथा मैकिण्डर की हृदय स्थल के सिद्धान्त को आधार मानकर ही हुआ।

     द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् भूराजनीति की पुनर्स्थापना के अतिरिक्त ग्लोबीय सम्बन्धों का भूराजनीतिक अध्ययन ईस्ट, मीनिंग, डाल, डीसेवेरस्की, ईस्ट एवं मूडी, सूजन, आदि विद्वानों द्वारा प्रस्तुत किया गया। इन विद्वानों द्वारा किया गया अध्ययन मुख्य रूप से मेकिण्डर तथा स्पाइकमेन द्वारा प्रतिपादित हृदय स्थल एवं परिधीय स्थल-खण्ड सिद्धान्तों के पुनरावलोकन के रूप में है। भूराजनीति के अध्ययन में शक्ति विश्लेषण उपागम का प्रयोग अधिक किया गया।

      इस उपागम के अनुसार राज्य के आन्तरिक एवं बाह्य सम्बन्ध शक्ति उपार्जन एवं संगठन से सम्बन्धित हैं तथा राज्य को शक्ति क्षेत्र की दृष्टि से देखा जाता है। राज्य संगठन ही राज्य शक्ति है एवं राज्य शक्ति ही संगठन है। इस उपागम के प्रतिपादकों ने राज्य के विकास की जैवीय प्रक्रिया का अनुकरण करते हुए सामाजिक डार्विनवाद को अपनाया और यह माना गया कि सबसे शक्तिशाली राज्य ही अपने अस्तित्व को बनाए रख सकता है। इसके लिए राज्य के विभिन्न प्राकृतिक और मानवीय तत्वों का शक्ति के निर्धारक रूप में वर्णन किया जाने लगा। इस उपागम के परिणामस्वरूप जर्मन भू-राजनीति ब्रिटिश तथा अमेरिकी विद्वानों ने अपने-अपने देश के सन्दर्भ में भूराजनीतिक दृष्टिकोणों की परिकल्पना की।

प्रश्न प्रारूप

1. भू-राजनीति का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा इसके विकास को समझाइए।



6. प्रवास अथवा प्रव्रजन को प्रभावित करने वाले कारक

6. प्रवास अथवा प्रव्रजन को प्रभावित करने वाले कारक

प्रवास अथवा प्रव्रजन

     प्रवास को प्रभावित करने वाले अनेक कारक हैं। इनमें समय, स्थान व परिस्थितियों के अनुसार कभी कोई तत्व प्रभावशाली रहता है, तो कभी कोई दूसरा। वास्तव में प्रवास को प्रभावित करने में आकर्षण व प्रत्याकर्षण का महत्व होता है। एक स्थान से लोग दूसरे स्थान को तभी प्रवास करते हैं, जब उनके अपने स्थान में कोई आकर्षण नहीं होता है। इस प्रकार प्रवास को प्रभावित करने वाले कारकों को मुख्य रूप से निम्नलिखित दो श्रेणियों में रखा जा सकता है-

(1) आकर्षक कारक (Pull factors)

(2) प्रत्याकर्षण कारक (Push factors)

(1) आकर्षक कारक

       लोगों का कम विकसित क्षेत्रों, ग्रामों, आदि से ऐसे क्षेत्रों में जाना, जहाँ उनको उन्नति के अधिक अवसर मिलते हैं। ऐसे अवसरों को आकर्षक कारक के रूप में रखा जाता है। यह अवसर निम्नलिखित प्रकार के होते हैं-

(i) आर्थिक प्रगति के अधिक अवसर,

(ii) रोजगार के अवसर,

(iii) उच्च शिक्षा प्राप्ति का अवसर,

(iv) वैज्ञानिक व सांस्कृतिक परम्पराओं के अवसर,

(v) सुरक्षा व न्याय के अवसर,

(vi) जीवन स्तर सुधारने के अवसर,

(vii) राजनीतिक स्थायित्व होना,

(viii) स्वास्थ्यप्रद वातावरण में रहने के अवसर।

       प्रवास को आकर्षित करने वाले कारकों में प्रवाहित क्षेत्र की विकसित होती हुई अर्थव्यवस्था, अनुकूल आवास कानून, कृषि भूमि की उपलब्धता, आदि महत्वपूर्ण हैं। जापान में श्रमिकों की कमी ने बड़ी संख्या में प्रवासियों को अपने यहाँ आवासित होने के लिए आकर्षित किया है। इन आवासियों में अधिकांश लोग कम वेतन पर ऐसे खतरे वाले काम करते हैं जिन कामों को जापान के मूल निवासी नहीं करते हैं।

(2) प्रत्याकर्षण कारक

    जब लोग अपने निवास स्थान में रहना नहीं चाहते। वहाँ उन्हें अपना जीवन निराशाजनक लगता है। ऐसा निम्नलिखित परिस्थितियों में सम्भव होता है।
(i) रोजगार सुविधाओं का अभाव,

(ii) स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव,

(iii) गरीबी, निम्न जीवन स्तर का होना,

(iv) सुरक्षा व न्याय की कम सुविधाएं,

(v) राजनीतिक अलगाववाद का प्रभाव और गृह भूमि पर युद्ध की आशंका,

(vi) उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा सुविधा का अभाव,

(vii) परम्परावादी व रूढ़िवादी संस्कृति का प्रभाव,

(vii) रोजगार की कठिन परिस्थितियों का होना,

(viii) प्राकृतिक आपदाओं का प्रभाव (सूखा एवं अकाल)।

     1929-1939 की अवधि में संयुक्त राज्य अमेरिका में आया महान मंदी का दौर (Great Depression) प्रत्याकर्षण का सर्वोत्तम उदाहरण है। इस दौर में संयुक्त राज्य अमेरिका में आवासन की अपेक्षा प्रवसन अधिक हुआ। इसी प्रकार 1980-90 के दशक में अकाल एवं युद्ध के कारण हजारों अफ्रीकन लोग अपने मूल स्थान से प्रवासित होकर पड़ोसी देशों में आवासित होने को मजबूर हुए।

     सामान्य तौर पर प्रवास को प्रभावित करने वाले कारकों में निम्नलिखित महत्व होते है:-

1. प्राकृतिक कारक (Natural Factors)-

       प्राकृतिक आपदाएँ जैसे भूकम्प, ज्वालामुखी, बाड़, सूखा, तूफान, भूस्खलन, जलवायु की कठोरता, आदि के कारण लोग एक स्थान से दूसरे स्थान को प्रवास कर जाते हैं। विश्व के विभिन्न भागों में मौसमीय प्रवास (Transhumance) मानवीय समूहों द्वारा जलवायु की कठोरता के दुष्प्रभाव से बचने तथा रोजगार जुटाने के उद्देश्य से किया जाता है। समुद्रतटीय भागों में तूफान से प्रभावित क्षेत्रों तथा नदियों के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों से लोग सुरक्षित स्थलों पर प्रवास कर जाते हैं। वास्तव में वह क्षेत्र जो किसी भी प्रकार की प्राकृतिक आपदा की आशंका से ग्रस्त होते हैं, लोग सुरक्षित क्षेत्रों पर प्रवास कर जाते हैं।

2. आर्थिक कारक (Economic Factors)-

      विश्व के अधिकांश प्रवासों को प्रभावित करने में आर्थिक कारकों का योगदान अत्यन्त महत्वपूर्ण रहा है। नए-नए क्षेत्रों में कृषि का विस्तार, नई-नई खानों का पता लगना, उद्योग धन्धों का विस्तार होना, यातायात सुविधाओं में सुधार होना, आदि विशेषताएं रोजगार के नए-नए अवसर प्रदान करने में महत्वपूर्ण सिद्ध होती हैं। इसी कारण लोग रोजगार के नए क्षेत्रों में आकर बस जाते हैं। पिछली तीन शताब्दियों में यूरोपीय लोगों का विश्व के विभिन्न भागों में रोजगार की तलाश में वहाँ जाकर बसना, वर्तमान में अनेक भारतीयों का अमेरीका तथा विश्व के अन्य भागों में रोजगार के कारण बस जाना, बिहार के श्रमिकों का पंजाब, पश्चिम उत्तर प्रदेश में मजदूरी कार्यों के लिए प्रवास करना, आर्थिक कारकों का ही परिणाम है।

3. सामाजिक व सांस्कृतिक कारक (Social and Cultural Factors)-

      सामाजिक रीति-रिवाज, धार्मिक व सामाजिक स्वतंत्रता, सामाजिक व सांस्कृतिक सम्पर्क, धर्म प्रचार, आदि ऐसे सामाजिक कारक हैं, जिनके कारण लोग अपना जन्म स्थान छोड़ने को बाध्य हो जाते हैं। धार्मिक श्रद्धा लोगों को धर्म स्थल पर बसने के लिए प्रेरित करती है। धार्मिक आयोजन मेले व विशेष पर्व पर लोग प्रवास करते हैं।

       लाखों हज यात्री प्रतिवर्ष मक्का व मदीना धार्मिक स्थलों की यात्रा करते हैं। उच्च व तकनीकी शिक्षा की प्राप्ति, उच्च चिकित्सा हेतु भी लोग प्रवास करते हैं। खेलों का आयोजन, जैसे क्रिकेट, हॉकी टूर्नामेन्ट, कुम्भ मेला, विशेष तिथि पर लगने वाले बड़े-बड़े मेले, नौचन्दी मेला, वैष्णो देवी के दर्शनों के लिए प्रतिवर्ष लाखों भक्तजनों का जाना, आदि ऐसे कारक हैं, जो किसी न किसी रूप में अस्थायी प्रवास के साथ-साथ स्थायी प्रवास को बढ़ावा देते हैं।

4. राजनीतिक कारक (Political Factors)-

      इतिहास इस बात का गवाह है कि राजनीतिक कारकों ने प्रवास को सबसे अधिक प्रभावित किया है तथा प्रवास की आवश्यक मजबूरी बनाया है। भारत-पाक विभाजन, दो देशों के बीच युद्ध की स्थिति, पड़ोसी देश से राजनीतिक सम्बन्धों में बिगाड़ के कारण सीमा क्षेत्र पर युद्ध स्थिति बने रहना, आदि तत्व जनसंख्या प्रवास को प्रभावित कर रहे हैं।

       वर्तमान में लंका में जातीय संघर्ष के कारण श्रीलंकाई तमिल भारत के तमिलनाडु तट में आकर बस रहे हैं। तिब्बत से बौद्ध लोगों का भारत आकर बसना भी राजनीतिक प्रवास का उदाहरण है। 18वीं व 19वीं शताब्दी में संयुक्त राज्य अमेरीका व ब्रिटेन के लोगों ने दक्षिण अफ्रीका, आस्ट्रेलिया व न्यूजीलैण्ड, आदि देशों के मूल निवासियों को बलपूर्वक वहाँ से खदेड़ दिया तथा वहाँ पर नए राष्ट्रों की स्थापना की।

     कई बार सरकारी नीतियाँ भी प्रवास को आकर्षित करती हैं। उदाहरण के लिए मध्य-पूर्व के देशों ने आवास को प्रोत्साहन देने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की है। इसी प्रकार आस्ट्रेलिया में आवासीय लोगों को मुफ्त में कृषि योग्य भूमि प्रदान की गई है। 1990 में जापान ने लेटिन अमेरिका से आए लोगों को रोजगार के अधिकार एवं आवासीय सुविधाएं प्रदान की।

5. जनांकिकी कारक (Demographic Factors)-

      इसके अन्तर्गत कृषि भूमि पर बढ़ता हुआ जनसंख्या का दबाव, कृषि क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों की कमी के कारण बेरोजगारी की समस्या, नगर के भीतरी भाग से नगर के बाहरी छोरों पर लोगों का बसना, उच्च घनत्व वाले क्षेत्रों से कम घनत्व वाले क्षेत्रों की ओर लोगों का जाकर बसना, आदि तत्व शामिल हैं। इनके अलावा साक्षरता की दर, विशेष जाति या धर्म के लोगों को कहीं अधिक प्रोत्साहन मिलना, असन्तुलित लिंग अनुपात, आदि बातें भी प्रवास को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीके से प्रभावित करती हैं। आस्ट्रेलिया व दक्षिण अफ्रीका की रंग भेदी नीतियों ने काले लोगों के प्रवास पर रोक लगा दी थी।

       वर्तमान में रूस व यूक्रेन के बीच युद्ध, इजराइल व फिलीस्तीन के बीच मतभेद, आदि जनांकिकी प्रवास को किसी न किसी रूप में प्रभावित कर रहे हैं। एक राज्य का दूसरे राज्य के लोगों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार भी जनसंख्या प्रवास को प्रभावित कता है।

प्रश्न प्रारूप

1.  प्रवास अथवा प्रव्रजन को प्रभावित करने वाले कारकों की विवेचना कीजिये।



5. प्रवास अथवा प्रव्रजन (Migration)

5. प्रवास अथवा प्रव्रजन (Migration)



प्रव्रजन

         मानव का वह कार्यकलाप, जिसके द्वारा वह अपने निवास स्थान से कहीं अन्यत्र स्थान पर एक निश्चित लम्बी अवधि लिए कुछ विशेष उद्देश्य के साथ बस जाता है, तो उसे स्थानान्तरण कहते हैं।

     इसमें मानव का अस्थायी रूप से अन्य स्थान पर जाना, मौसम के अनुसार स्थान परिवर्तन करना, नगर में रोजाना अन्य नगरों व उपान्त क्षेत्रों से आना जाना, श्रमिकों का फसल मौसम में एक स्थान से दूसरे स्थानों पर जाना, नगर के भीतर निवास परिवर्तन, आदि को स्थानान्तरण की श्रेणी में नहीं रखा जाता है। यह सभी अस्थाई प्रवास संचरण (Circulation) की श्रेणी में शामिल किए जाते हैं।

     जनसंख्या स्थानान्तरण की विशेषताओं को इस प्रकार रखा जा सकता है:

(1) निवास स्थान व नवीन स्थान के बीच समुचित दूरी होना।

(2) नवीन स्थान पर रुकने की अवधि दीर्घकालिक होना।

(3) नवीन स्थान पर किसी विशेष उद्देश्य से जाकर बसना।

(4) नवीन बसे स्थान के कार्यकलापों का निवास-स्थान के कार्यकलापों से भिन्न होना।

(5) नवीन स्थान पर बसने वाले लोगों का अपने आपको बेहतर स्थिति में अनुभव करना।

प्रवास के प्रकार (TYPES OF MIGRATION)

     प्रवास को वर्गीकृत करने के अनेक आधार हैं। इन आधारों में समय, दूरी, स्थान, उद्देश्य उल्लेखनीय हैं।

(1) दूरी के आधार पर

⇒ जब स्थानान्तरण थोड़ी-सी दूरी के लिए होता है, तो उसे छोटी दूरी (short distance) स्थानान्तरण कहते हैं।

⇒ जब स्थानान्तरण लम्बी दूरी के प्रवास से जुड़ता है तो उसे लम्बी दूरी (long distance) स्थानान्तरण कहते है।

(2) क्षेत्र के आधार पर

1. राष्ट्रीय प्रवास:-

       इसे आन्तरिक प्रवास भी कहते हैं। यह प्रवास एक राष्ट्र के भीतर किसी भी स्थान के लिए बिना किसी रोकटोक के होता है। यह आन्तरिक प्रवास चार वर्गों में बांटा जा सकता है-

(i) गांवों से नगरों की ओर प्रवास,

(ii) नगरों से गांवों की ओर प्रवास,

(iii) गांवों से गांवों की ओर प्रवास,

(iv) नगरों से नगरों की ओर प्रवास।

        इनमें गांवों से नगरों की ओर तथा छोटे नगरों से महानगरों की ओर लोगों का प्रवास अधिक संख्या में होता है।

2. अन्तर्राष्ट्रीय प्रवास:-

      इसे बाह्य प्रवास भी कहते हैं। इसमें प्रवास एक राष्ट्र से दूसरे राष्ट्र के लिए होता है। यह प्रवास स्थानान्तरण किए जाने वाले राष्ट्र की प्रवास नीतियों पर निर्भर करता है।

(3) समय या काल के आधार पर

       प्रवास अध्ययन के काल पक्ष के अन्तर्गत प्रवासन या आवासन समय को महत्वपूर्ण माना गया है। इस दृष्टि से इसका अध्ययन निम्नांकित रूप में किया जा सकता है।

(i) दीर्घकालीन प्रवास:-

      इसमें प्रव्रजन की कालिक प्रवृत्ति दीर्घकालीन होती है। ऐसे प्रव्रजन प्रायः अन्तर्महाद्वीपीय व अन्तर्राष्ट्रीय हुआ करते हैं। 18-19वीं शताब्दी में यूरोप महाद्वीप से उत्तरी अमेरिका व दक्षिणी अमेरिका, आदि महाद्वीपों में जाकर बसे एवं विकास कार्य किए। कुछ देशों में भी लोग राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक, सामाजिक, आदि कारणों से दीर्घकालीन प्रवास व आवासन करते रहते हैं।

(ii) अस्थायी या मौसमी प्रवास:-

      अस्थायी प्रव्रजन अल्पकालिक होता है इसके अन्तर्गत जनसंख्या किसी देश अथवा स्थान में स्थायी रूप से बसती नहीं है। बल्कि अपने उद्देश्यों की पूर्ति के पश्चात् पुनः अपने मूल स्थान को प्रत्यावर्तित हो जाती है। इसी के अन्तर्गत एक अन्य तरह का प्रवास होता है जिसे मौसमी प्रवास (Transhumance) की संज्ञा दी जाती है। ऐसे प्रवास क्षेत्रीय उच्चावच व जलवायु से प्रभावित होते हैं।

       इस प्रकार के प्रवास का सुन्दर उदाहरण भारत के पर्वतीय क्षेत्रों के बकरवाल, भोटिया, बछी आदि पशुचारकों से लिया जा सकता है जो ग्रीष्म ऋतु में पर्वतों पर जाकर पशुचारण करते हैं तथा शीत ऋतु में मैदानी भागों की ओर वापस आ जाते हैं। ऐसे उदाहरण विश्व के अनेक क्षेत्रीय पशुचारक जन-जातियों से ग्रहण किए जा सकते हैं।

(iii) दैनिक प्रवास:-

      इस प्रकार का प्रव्रजन पूर्णरूपेण अस्थायी होता है। ऐसे प्रव्रजन के अन्तर्गत बड़े-बड़े नगरों, कस्बों, आदि में ग्रामीण क्षेत्रों से मजदूरी करने, दूध, शाक-सब्जी बेचने एवं अध्ययन अध्यापन व अन्य कार्यों से आना जाना होता है जिसकी अवधि मात्र दिनभर की होती है।

(4) उद्देश्य के आधार पर

       स्थानान्तरण जिस उद्देश्य से किया जाता है, वह निम्न चार प्रकार का होता है-

(i) आर्थिक प्रवास,

(ii) सामाजिक प्रवास,

(iii) धार्मिक प्रवास,

(iv) राजनीतिक प्रवास।

       एक राष्ट्र से दूसरे राष्ट्र में जाने वाले व्यक्ति को आप्रवासी या आगन्तुक (Immigrants) कहते हैं। जिस राष्ट्र से वह व्यक्ति दूसरे राष्ट्र को जाता है, उस राष्ट्र की दृष्टि से यह बहिर्गन्तुक (Emmigrants) या प्रवासी कहलाता है।

       ब्राइडे ने अपनी पुस्तक ‘Human Geography : Principles, Processes and Pattern’ में प्रवास को दो प्रमुख वर्गों में रखा है:

1. अन्तर्महाद्वीपीय प्रवास (Inter-continental migra tion)-

      विश्व में एक देश से दूसरे देश अथवा एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप के देशों की प्रवास अन्तर्महाद्वीपीय प्रवास कहलाता है।

2. आन्तरिक प्रवास (Internal migration)-

      यह चार प्रकार के होते हैं:

(a) अन्तप्रदेशीय प्रवास (Inter-regional migration)-

      जब किसी देश के एक भाग से दूसरे भाग में लोग काम की तलाश में जाकर बस जाते हैं, तो ऐसे प्रवास को अन्तप्रदेशीय प्रवास कहते हैं। सामान्यतया कम विकसित क्षेत्रों से लोग विकसित क्षेत्रों की ओर प्रवास कर जाते हैं।

(b) सामयिक या मौसमी प्रवास (Periodic or seasonal migration)-

     जब प्रवास किसी समय विशेष पर आधारित हो। जैसे शीतकाल में चरवाहे लोग ऊंचे पहाड़ी भागों से निम्न भू-भागों में चले जाते हैं और ग्रीष्मकाल में पुनः वापस पहाड़ी भागों में आ जाते हैं।
(c) ग्रामीण-नगरीय प्रवास (Rural-urbanmigration)-

      वह प्रवास जिसमें लोग रोजगार की तलाश में ग्रामीण क्षेत्र से नगरों में जाकर बस जाते हैं।

(d) कार्य-यात्रा प्रवास (Work-travel migration)-

       जब लोग एक स्थान से दूसरे स्थान को काम कने के लिए रोजाना इधर से उधर आते जाते हैं, तो इसे कार्य यात्रा प्रवास कहते हैं। सैकड़ों कार्यकर्ता रोजाना सुबह बड़े महानगरों में विभिन्न साधनों से जाते हैं औ शाम वापिस अपने घरों को लौट जाते हैं।

प्रश्न प्रारूप

1. प्रवास अथवा प्रव्रजन (Migration) किसे कहते है? प्रवास के प्रमुख प्रकारों की विवेचना कीजिये।



4. जनसंख्या भूगोल की परिभाषा एवं विषय क्षेत्र

जनसंख्या भूगोल की परिभाषा एवं विषय क्षेत्र


प्रश्न प्रारूप

1. जनसंख्या भूगोल को परिभाषित करते हुए इसके विषय क्षेत्र की विवेचना कीजिये।

जनसंख्या भूगोल की

       जनसंख्या भूगोल मानव भूगोल की एक शाखा है, जिसमें मानव संख्या के मात्रात्मक एवं गुणात्मक पहलुओं का और इनके वितरण से सम्बन्धित विभिन्न पक्षों का अध्ययन किया जाता है। वस्तुतः जनसंख्या भूगोल मानव का अध्ययन है, चूंकि मानव ही किसी क्षेत्र की विशेषताएँ एवं विभिन्नताएँ प्रदान करता है, अतः जनसंख्या भूगोल में मानव संख्या के वितरण में व्याप्त क्षेत्रीय असमानताओं का अध्ययन एवं समीक्षा कारण सहित की जाती है।

⇒ जे. आई. क्लार्क के अनुसार जनसंख्या भूगोल में जनसंख्या के वितरण, संघटन, प्रवास और वृद्धि में पायी जाने वाली स्थानिक भिन्नताओं का अध्ययन किया जाता है। साथ ही ये स्थानिक भिन्नताएं क्षेत्र विशेष की प्रकृति में पायी जाने वाली स्थानिक भिन्नताओं से किस प्रकार से सम्बन्धित होती हैं, का भी अध्ययन किया जाता है।

       इस प्रकार जनसंख्या भूगोल का सम्बन्ध स्थानिक भिन्नताओं के साथ-साथ क्षेत्र के भौतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक घटकों से है। क्लार्क के अनुसार जनसंख्या भूगोल जनसंख्या में प्रादेशिक अन्तरों को उसके भौतिक, सांस्कृतिक तथा आर्थिक सन्दर्भ में समझने का प्रयास करता है।

⇒ विल्वर जेलिंस्की के अनुसार जनसंख्या भूगोल एक ऐसा विज्ञान है जो किसी क्षेत्र की जनसंख्या के विविध पहलुओं का अध्ययन उस क्षेत्र की प्राकृतिक परिस्थितियों के संदर्भ में करता है। इनके अनुसार जनसंख्या के विभिन्न लक्षणों के क्षेत्रीय वितरण का जनसंख्या के क्षेत्रीय वितरण में पायी जाने वाली समानताओं एवं असमानताओं हेतु उत्तरदायी कारकों का और जनसंख्या की दृष्टि से क्षेत्रों का वर्तमान भौगोलिक स्वरूप कैसे बना है, इन सभी का अध्ययन जनसंख्या भूगोल में किया जाता है।

⇒ जे. व्युजे गारनियर ने फ्रांसीसी भाषा में लिखी गई अपनी पुस्तक जिसका अनुवाद बीवर ने Geography of Population के नाम से किया है, में लिखा है कि जनसंख्या भूगोल वर्तमान वातावरण के सन्दर्भ में जनांकिकी तथ्यों का वर्णन है। साथ ही जनांकिकी तथ्यों के कारणों, मूलभूत विशेषताओं और संभावित परिणामों का अध्ययन भी जनसंख्या भूगोल में किया जाता है।

⇒ जी. जे. डैम्को ने अपने द्वारा सम्पादित पुस्तक Population Geography : A Reader में लिखा है कि जनसंख्या भूगोल, भूगोल की वह शाखा है जिसमें किसी क्षेत्र के जनांकिकी लक्षणों के क्षेत्रीय वितरण का विश्लेषण किया जाता है। इसके अतिरिक्त क्षेत्रीय दशाओं की आपसी क्रिया-प्रतिक्रिया से उत्पन्न सामाजिक और आर्थिक प्रतिफलों का अध्ययन भी किया जाता है। इन सभी पक्षों पर चूंकि समय का अत्यधिक प्रभाव पड़ता है इसलिए समयानुसार जनसंख्या वितरण के क्षेत्रीय प्रारूप को प्रभावित करने वाली प्रक्रियाओं का भी अध्ययन किया जाता है। डैम्को ने ऐसे मॉडल विकसित करने पर भी जोर दिया। जिनके द्वारा किसी क्षेत्र के समस्त जनसंख्या लक्षणों को निर्धारित करने वाली प्रक्रियाओं को भली-भांति समझा जा सके।

      निष्कर्षतः जनसंख्या का अध्ययन भौगोलिक अध्ययन का मुख्य केन्द्र बिन्दु है। वस्तुतः मानव (जनसंख्या) वह संदर्भ बिन्दु अथवा केन्द्र बिन्दु है जिसको केन्द्र में रखते हुए क्षेत्रीय लक्षणों का अवलोकन और निर्धारण किया जाता है। ज्ञातव्य है। कि मानव (जनसंख्या) से ही अन्य भौगोलिक तत्वों को अर्थ एवं महत्व मिलता है।

       उदाहरण के लिए मानव के संदर्भ में ही किसी स्थान विशेष की जलवायु को अर्थपूर्ण नाम एवं महत्व मिल पाता है। इसी प्रकार से किसी भी प्राकृतिक पदार्थ की संसाधनता भी मानव उपयोगिता के संदर्भ में ही अस्तित्व में आ पाती है। जनसंख्या भूगोल में जनांकिकी प्रक्रियाओं और इन प्रक्रियाओं के परिणामों का अध्ययन पर्यावरणीय संदर्भ में किया जाता है।

     स्पष्टतः जनसंख्या भूगोल में जनसंख्या की संरचना, वृद्धि और स्थानान्तरण में मिलने वाली स्थानिक विभिन्नताओं (Spatial Variation) का अध्ययन और इन स्थानिक विभिन्नताओं के सामाजिक एवं आर्थिक प्रभावों का अध्ययन किया जाता है।

जनसंख्या भूगोल का अध्ययन क्षेत्र (Scope of Population Geography)

       जनसंख्या भूगोल के अध्ययन क्षेत्र को निम्न वर्गों में रखा जा सकता है:

⇒ भूतकाल की जनसंख्या सम्बन्धी विशेषताओं का अध्ययन।
⇒ जनसंख्या के वितरण के अध्ययन के अन्तर्गत महाद्वीपों तथा उसके विभिन्न क्षेत्रों में जनसंख्या वितरण प्रतिरूप, विश्व में बसे हुए और बिना बसे हुए क्षेत्रों का वितरण, जनसंख्या का अन्तर्प्रदेशीय और अन्तर्सामयिक वितरण, बस्तियों का आकार, वितरण एवं उनमें परस्पर दूरियों का अध्ययन।

⇒ जनसंख्या के घनत्व के अध्ययन में विभिन्न प्रकार के घनत्व, स्थानीय स्तर से लेकर विश्व स्तर तक जनघनत्व की विशेषताएं, घनत्व वितरण का स्थानिक प्रतिरूप तथा उनको प्रभावित करने वाले कारक, प्रवास के नियम एवं परिणाम तथा शिक्षित एवं योग्य मानव श्रम का कम विकसित देशों से अधिक विकसित देशों को स्थानान्तरण आदि का अध्ययन।

⇒ जनसंख्या वृद्धि के अन्तर्गत जनसंख्या वृद्धि का मापन, जन्म-दर, मृत्यु-दर, जनसंख्या वृद्धि पर प्रभाव डालने वाले कारक, वृद्धि प्रतिरूप का वितरण, जनसंख्या वृद्धि के सिद्धान्त तथा जनसंख्या वृद्धि भावी अनुमान आदि का अध्ययन।

⇒ जनसंख्या के संघटन के अन्तर्गत जाति, धर्म, भाषा, आयु, लिंग, कार्यकर्ता-आश्रित तथा कार्यशील जनसंख्या की व्यावसायिक संरचना का अध्ययन।

⇒ जनसंख्या के लक्षणों के अन्तर्गत जनसंख्या की साक्षरता एवं साक्षरता के स्तर को प्रभावित करने वाले कारकों तथा विश्व में साक्षरता का प्रतिरूप आदि का अध्ययन।

⇒ ग्रामीण एवं नगरीय जनसंख्या की सभी प्रकार की विशेषताएँ एवं लक्षण, नगरीकरण की प्रक्रिया एवं उस पर प्रभाव डालने वाले कारक तथा विश्व एवं उसके राष्ट्रों में नगरीकरण का प्रतिरूप का अध्ययन।

⇒ जनसंख्या संसाधन अनुपात में जनसंख्या वृद्धि तथा संसाधन विकास, जनसंख्या का बढ़ता दबाव, संसाधन एवं जनसंख्या अनुपात, संसाधनों पर आधारित जनसंख्या के सिद्धान्त, संसाधन एवं जनसंख्या प्रतिरूप, जनसंख्या क्षमता, अधिकतम जनसंख्या, अल्प जनसंख्या, अनुकूलतम जनसंख्या आदि का अध्यय


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